Monday, December 15, 2025

ऐ दोस्त

ऐ दोस्त,
जब-जब मैं तेरे नज़दीक से गुज़रा, एक छाँव हमेशा साथ रही। ज़िंदगी की तपिश ने मुझे जितनी बार जलाने की कोशिश की, तुम हर बार एक सुकून भरी छाया बनकर खड़ी रही।

जो तुम्हारे साथ हुआ है, उससे मैं दुखी नहीं हूँ — यह तुम्हारी ज़िंदगी के एक नए दौर की शुरुआत है। तुमने अपनी हर जंग पूरी हिम्मत से लड़ी है और जीतकर ही लौटी हो। यह भी एक जंग ही है। ज़िंदगी ने तुम्हारे लिए कुछ और ही लिखा है, और मुझे यक़ीन है कि एक दिन तुम हम सबके लिए एक मिसाल बनोगी।

हौसला मत हारना। ठोकरें ही इंसान को चलना सिखाती हैं।

ज़िंदगी में न जाने कितनी कठिनाइयाँ आएँगी और चली जाएँगी। यह दौर भी गुज़र जाएगा। नया सवेरा फिर आएगा। बस अपना हौसला बनाए रखना, और याद रखना — तुम्हारे दोस्त हमेशा कंधे से कंधा मिलाकर खड़े रहेंगे।

हम हर हाल में तुम्हारे साथ हैं… तुम्हारी हर जीत और हर हार में।

Sunday, December 7, 2025

मटर छीलने का मज़ा: जब कहानियाँ वही रहती हैं, बस किरदार बदल जाते हैं

मटर छीलने का मज़ा: जब कहानियाँ वही रहती हैं, बस किरदार बदल जाते हैं


​आज मौसम की पहली मटर मेरे घर आई। प्लान बना कि सुबह का नाश्ता घुघरी से होगा और अगर मटर बची तो निमोना बनेगा।

​योजना तो बन गई पर बिना मटर छीले तो कुछ होने वाला नहीं था। सुबह उठने के बाद मेरे पास डलिया भर मटर छीलने का प्रस्ताव आया, हम भी घुघरी के लिए तैयार थे। घुघरी के लिए कुछ भी करना पड़े, करेंगे!

​मटर छीलना शुरू हुआ। तभी मैं अतीत में चला गया जब पापा और मम्मी बात करते-करते न जाने कितनी मटर छील लेते थे। वैसे पापा और मम्मी कम ही बैठते थे बात करने को, पर मटर एक ऐसी चीज़ थी जो घर को बाँध कर रखती थी। दुनिया भर की बातें मटर छीलते समय याद आती थीं।

​'फलनवा ई किहिस', 'धमकावा ऊ किहिस' (यानी 'फलाँ ने क्या कहा', 'फलाँ ने क्या किया'), सब चर्चाएँ होती थीं।

​अचानक देखता क्या हूँ कि श्रीमती जी भी स्वयं आ गईं मटर छीलने के लिए। वह कहती हैं:

कहानियाँ वही रहती हैं, बस किरदार बदल जाते हैं।


​हमने भी शुरू की मटर छीलना और बातें शुरू हुईं 'फलनवा' और 'धमकावा' की। 

किस मौसम में किसके घर बछिया बियान रही और किसका कब बियाह हुआ था—हमने कोई कोना नहीं छोड़ा होगा बात करने का।

​और मटर न जाने कब छिल गई, पता ही नहीं लगा।

​फ़्रोज़न मटर जिनके घर आती है, वो मटर छीलने का मज़ा उनकी किस्मत में नहीं है। दुनिया भर की बातें सिमट आती हैं इस मटर छीलने के छोटे से अंतराल में।

Saturday, September 13, 2025

छठ

आज यूट्यूब पर छठ मैया के गीत सुन रहा था, और हर शब्द याद आ रहा था।

​जब तुम्हारे साथ छठ मैया की पूजा के लिए गया था। उस positive energy को मैं अपने कंधे पर आज भी महसूस करता हूँ। धन्यवाद मुझे इसका अहसास कराने के लिए।

Wednesday, September 3, 2025

नानी के घर का डिब्बा


नानी के घर एक डिब्बा था,
छोटा-सा, टिन का...
ढक्कन खोलो तो लगता था
जैसे पूरा आसमान भीतर रख दिया हो।

मैंने उसमें तारे चुन–चुन रखे थे,
चाँद की एक मोड़ी हुई किरन भी थी,
और बरगद की छाँव
जिसमें गर्मियों की दोपहरी सोई रहती थी।

आम की गुठलियाँ थीं,
कंचों की चमक थी,
नानी की हँसी थी,
माँ की चोटी में बंधा लाल रिबन भी...
सब वही रखा था।

फिर एक दिन—
वो डिब्बा गुम हो गया,
शायद बटवारे के शोर में,
या बड़ों की अलमारी के हिसाब–किताब में।

अब सिर्फ़ उसकी याद बची है,
टूटे हुए सितारों की तरह—
जो हर रात पलकों पर टिमटिमाते हैं।

Tuesday, September 2, 2025

बदले हुए रिश्ते- प्रिंस भैया का रिटायरमेंट

कल मुझे अचानक पता चला कि प्रिंस भैया अपनी नौकरी से सेवानिवृत्त हो गए हैं और इसके उपलक्ष्य में उन्होंने एक पार्टी रखी थी। पर सबसे ज़्यादा हैरानी तब हुई जब हमें उसमें आमंत्रित नहीं किया गया। वहाँ सभी खास लोग मौजूद थे, पर हम नहीं थे। यह जानकर खुद को बहुत अकेला महसूस किया, और ऐसा लगा जैसे मैं अब उनकी ज़िंदगी का हिस्सा नहीं हूँ। रात भर यही सोचता रहा कि उन्होंने मुझे क्यों नहीं बुलाया और क्या मैं उनकी ज़िंदगी में इतना ज़रूरी नहीं हूँ कि वो मुझे अपने इस खास मौके का गवाह बनाएँ।

यह मेरे लिए एक भावनात्मक क्षति (इमोशनल लॉस) थी। जब मैंने यह बात स्वाति को बताई, तो उसे भी बुरा लगा। मुझे लगा कि शायद उसे इस बात का अंदाज़ा नहीं होगा कि प्रिंस भैया मेरी ज़िंदगी से कितने जुड़े हुए हैं। खैर, यह भी अब यादों का हिस्सा बन जाएगा और स्मृति के किसी कोने में पड़ा रहेगा, क्योंकि भविष्य तो किसी ने नहीं देखा।

अब मुझे इसकी आदत सी होने लगी है। यह पहली बार नहीं हुआ है कि मुझे ऐसा एहसास हुआ हो। जब से मैं लखनऊ आया हूँ, तब से मुझे यह महसूस होने लगा है कि ऐसी भावनाएँ भी ज़िंदगी का एक हिस्सा हैं। होता है, कभी-कभी पुरानी यादें दामन छुड़ाकर नई यादों की ओर बढ़ जाती हैं, और हमें इन सब से आगे निकल जाना चाहिए।

यादों की महक

 आज छत पर लगी लौकी और कद्दू की बेल के पास से गुजर रहा था। यह बेल काफी पुरानी है। अचानक मुझे एक ऐसी गंध महसूस हुई, जिसका रिश्ता मेरे बचपन से था। गंध नाक तक पहुंची ही थी कि उससे जुड़ी सारी यादें एक तस्वीर की तरह मेरी आँखों के सामने आ गईं।

वो गंध मिट्टी की सोंधी खुशबू जैसी थी, ठीक वैसी ही जो नानी के घर लगे पौधों के पास आती थी। शहरों में बरसों रहने के कारण, नानी का घर छोड़ने के बाद मुझे यह खुशबू फिर कभी नहीं मिली।

सच कहा जाए तो, सिर्फ सुगंध ही नहीं, हर एक महक की अपनी एक याद होती है। यह बात आज पता चली।

Monday, September 1, 2025

एक सफर फ्रेंड लिस्ट से ब्लॉकलिस्ट की ओर

जिसे मैं साजिशकर्ता समझता था, वह तो सिर्फ एक संदेशवाहक निकला। असली बुद्धि तो किसी और की थी। एक सफर के दौरान, मुझे घेरकर एक ऐसा कमिटमेंट कराने की कोशिश की गई जिससे मेरा परिवार तंगी की हालत में आ जाए

​उल्टी गिनती तभी चालू हो गई थी। पर एक दिन तो अति हो गई; समय की कमी के कारण जब मैं कुछ नहीं कर पा रहा था, लोगों ने मेरे हिस्से के निर्णय खुद ही लेना शुरू कर दिया।

​मेरा तो चरित्र ही बदल गया।

​जिन लोगों को मैं अपने बचपन से संभालकर रखा था, उन्हें चिट्ठी-पत्री, फोन, तार सब भेजा। और जब वे मिले तो इतना मिले कि एक दिन अजनबी हो गए। अब सामने पड़ने पर रास्ते बदल लेते हैं।

​वक्त-वक्त की बात है, होता है, होता रहा है, होता रहेगा।

​यह एक सफर है, 'फ्रेंड लिस्ट से ब्लॉक लिस्ट की ओर'

Sunday, August 17, 2025

​छोटे-छोटे फैसले: बड़े लीडर्स की नींव

क्या आपने कभी सोचा है कि एक अच्छा लीडर कहाँ बनता है? किसी बड़े कॉर्पोरेट ट्रेनिंग प्रोग्राम में या किसी प्रतिष्ठित मैनेजमेंट कॉलेज में? मेरा मानना है कि इसकी नींव हमारे अपने घरों में रखी जाती है।

​बात सिर्फ लीडरशिप क्वालिटी की नहीं है, बल्कि जीवन भर सही निर्णय लेने की क्षमता की है। अगर एक बच्चे को कभी भी अपने फैसले खुद लेने का मौका नहीं मिला, तो वह जिंदगी भर अपने प्रोफेशनल फैसलों में भी कमजोर रहेगा।

​जब हम बच्चे के हर छोटे-बड़े फैसले में दखल देते हैं और उसे नीचा दिखाते हैं, तो हम अनजाने में उसका आत्मविश्वास तोड़ रहे होते हैं। अगर वह हिम्मत करके कोई निर्णय लेता भी है, तो लोग उसे 'असली' नहीं मानते। वे कहते हैं, "इस पर किसी का प्रभाव है," या "इसे किसी ने सिखाया है।" निजी जिंदगी में तो इससे भी बुरा होता है। घरवाले कहते हैं, "लड़के पर टोना हो गया है," या "लड़की ने उसे अपने वश में कर लिया है।"

​जब कोई बच्चा ऐसी बातें सुनता है, तो उसका आत्मविश्वास पूरी तरह बिखर जाता है।

​इसलिए, बच्चों को उनके फैसले लेने दीजिए। उन्हें गिरने दीजिए। हाँ, वे 10 बार गिरेंगे, पर ठीक है। जब भी वे उठेंगे, खुद से उठेंगे। वे अपनी हर असफलता से सीखेंगे कि कैसे दोबारा खड़ा होना है।

​यह एक ऐसा सबक है जो उन्हें जीवन भर आगे बढ़ने में मदद करेगा। याद रखिए, मजबूत फैसले लेने वाला इंसान किसी कंपनी का अच्छा लीडर ही नहीं, बल्कि अपनी जिंदगी का भी बेहतर लीडर बनता है।

​वो घर अब मेरा नहीं

एक बार जो लड़का घर छोड़ दे, तो समझो वो मर गया।

​यह बात मुझे आज समझ आई। पापा ने ऐसा क्यों कहा, शायद इसलिए कि वो सिर्फ अपने हिस्से का सच कह रहे थे, मेरे हिस्से का नहीं। मैं तो उन्हें रोज़-रोज़ जी रहा था।

​बरसों बाद मुझे एहसास हुआ कि सब मेरे बिना जीना सीख चुके हैं। जब मैं वापस आया, तो मेरा सारा सामान, मेरी किताबें, मेरी अलमारी हटा दी गईं, जैसे किसी के मरने के बाद उसकी यादें मिटा दी जाती हैं। दर्द तब हुआ जब मुझे यह समझ आया कि अब मेरी किसी को ज़रूरत नहीं।

​फिर भी मैं घर आता रहा। सबके अपने-अपने कमरे थे, पर मेरा कोई कमरा नहीं था। मैं जब भी आता, तो सब कहते कि उसके कमरे में सो जाओ। मेरा कुछ था ही नहीं, मानो मेरी जड़ें ही काट दी गई हों।

​शादी के बाद भले एक कमरा मिला, पर वो भी मेरा नहीं था, सबका था। उसमें मैं कुछ भी अपने हिसाब से नहीं रख सकता था। अगर रखने की कोशिश करता, तो मानो गुस्ताखी हो जाती।

​किसी को अंदाज़ा नहीं था कि एक दिन कोरोना आएगा और वर्क फ्रॉम होम के चलते मैं फिर घर आ जाऊँगा। उन दिनों जब सबने मान लिया था कि मैं कभी नहीं लौटूँगा, मैं वापस आ गया। और एक दिन ऐसा भी आया जब मुझे सिर्फ़ कमरे से ही नहीं, पूरे घर से निकाल दिया गया।

​जिस घर में मेरा बचपन बीता, जिसकी दीवारों ने मेरी हँसी और चुप्पियों को सँभाला था, वो घर अब मेरा नहीं रहा। और जब माँ-बाप परमधाम चले गए, तो उस घर से जुड़ी बची-खुची यादें भी मेरी नहीं रहीं। धीरे-धीरे लोग कहने लगे, “वो तो यहाँ थे ही नहीं, उनका कोई हक़ कहाँ बनता है?”

​तब जाकर मुझे पूरी तरह समझ आया कि पहला वाक्य सही था। कि बच्चा जब घर से निकलता है, तो वो सचमुच घर से मिट ही जाता है।

Saturday, August 16, 2025

जब सच का मौन, झूठ के शोर में खो जाए: एक दिल की कहानी

​कोरोना काल ने हमें अपनों के और भी करीब ला दिया। 'वर्क फ्रॉम होम' के बहाने कई लोगों को अपने घर लौटने और परिवार के साथ वक्त बिताने का मौका मिला। ऐसा ही एक मौका मुझे भी मिला, जब मैं अपने माता-पिता के अंतिम दिनों में उनकी सेवा कर पाया। यह मेरे लिए सिर्फ एक कर्तव्य नहीं, बल्कि एक आशीर्वाद था। मैंने अपनी हर सांस, हर पल उनकी देखभाल में लगा दिया। मैंने जो कुछ किया, वह दिल से किया, बिना किसी स्वार्थ के।

​सेवा हुई और वो परमधाम चले गए। दिल में एक शांति थी कि मैं उनके अंतिम समय में उनके साथ था, उनके काम आया। मगर, कुछ साल बाद जब किसी अपने ने कहा, "उसने किया ही क्या है? वो रहता ही कहाँ था यहाँ जो सेवा करेगा," तब मेरे भीतर कुछ टूट गया।

​यह बात सिर्फ मेरे बारे में नहीं थी। यह सच की उस खामोशी के बारे में थी जो हर उस व्यक्ति को महसूस होती है जिसने निस्वार्थ भाव से कुछ किया हो।

Friday, August 8, 2025

राखी की यादें और माँ का दर्द

 जब भी रक्षाबंधन आने वाला होता है, मेरे मन में मेरी माँ की यादें ताज़ा हो जाती हैं। जैसे ही यह त्यौहार करीब आता, उनका चेहरा उदास हो जाता और उनका मूड ख़राब रहने लगता। मेरे चार भाई होने के बाद भी, एक-एक करके सबने ज़िंदगी का साथ छोड़ दिया। और जो सबसे छोटा था, वह मेरी आँखों के सामने ही टिटनेस से जाता रहा।

राखी का त्यौहार आते ही, माँ अक्सर बताती थीं कि तेरे सबसे छोटे मामा बहुत गुणी थे। वह खेती के बीच में, जहाँ फसल नहीं उगती थी, वहाँ भी लहसुन, प्याज़, साग या कुछ और बो दिया करते थे। राखी के लिए वह साल भर थोड़ा-थोड़ा पैसा इकट्ठा करते थे, और उस दिन मेरी माँ को दो रुपये दिया करते थे। आज मेरे पास बहुत पैसे हैं, पर वह दो रुपये बहुत ही अनमोल थे, जिनकी कीमत किसी भी चीज़ से ज़्यादा थी।

भाई-बहनों के इस त्यौहार पर, बहुत से लोगों ने माँ से कहा, "दीदी, मैं तो हूँ। मुझे राखी बाँध दो।" पर माँ कभी तैयार नहीं हुईं। वह बस किनारे बैठी रहती और रोती रहती। यह एक-दो साल की बात नहीं थी, यह सिलसिला तब भी जारी रहा, जब वह बूढ़ी हो गईं।

आज, माँ खुद इस धरती पर नहीं हैं, पर जब फिर से रक्षाबंधन है, तो मैं उन्हीं बातों को याद कर भावुक हो उठता हूँ। उस दो रुपये की कीमत को समझता हूँ, उस दर्द को महसूस करता हूँ जो मेरी माँ ने हर साल सहा, और उस प्रेम को याद करता हूँ जो उन्होंने अपने छोटे भाई के लिए महसूस किया।

Friday, July 25, 2025

मेरे पिता की कहानी: एक संघर्षमय यात्रा

मेरे पिता की कहानी: एक संघर्षमय यात्रा

आज जब मैंने कलम उठाई, तो शब्दों ने स्वयं राह पकड़ ली — एक ऐसी राह, जो मेरे पिता की यादों से होकर गुजरती है। वे अब हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनका साया, उनकी सीख, उनकी मुस्कान — सब मेरे साथ हैं, हर दिन, हर फैसले में।

मेरे पिता सिर्फ मेरे जीवन के स्तंभ नहीं थे, वे मेरे जीवन का मार्गदर्शक सितारा थे। उनके संघर्षों की परछाइयाँ और सफलताओं की रोशनी — दोनों ही मुझे दिशा देते रहे हैं।

यह कहानी उनके जीवन की नहीं, उनके जीवट की है। यह उस मिट्टी की खुशबू है, जहाँ से वे उठे, उस आंधी का ज़िक्र है जिससे वे टकराए, और उस सूरज का स्मरण है जिसे उन्होंने खुद के भीतर जगाया।

यादें जब शब्दों में ढलती हैं, तो वे इतिहास नहीं रहतीं — वे विरासत बन जाती हैं। यह विरासत मैं सहेज रहा हूँ, ताकि आने वाली पीढ़ियाँ जानें कि एक साधारण व्यक्ति कैसे असाधारण बन जाता है।

1. जन्म और बचपन की दहलीज

मेरे पिताजी का जन्म उत्तर प्रदेश के गोंडा ज़िले के एक छोटे-से गाँव भटवलिया में हुआ था — करीब 10 फरवरी 1951 के आसपास। सरकारी कागज़ों में यही तारीख़ दर्ज है, पर असल जन्म किस दिन हुआ था, ये बात पक्के तौर पर कोई नहीं जानता। उस समय तिथियाँ याद नहीं रखी जाती थीं, मौसम, त्योहार या किसी घरेलू घटना के आस-पास ही जन्म की पहचान होती थी। यही उस दौर की सच्चाई थी।

  परिवार में उन्हें मिलाकर तीन भाई और दो बहनें थीं, और पिताजी उन सबमें सबसे बड़े थे। सबसे बड़े होने के नाते ज़िम्मेदारियाँ भी सबसे पहले उन्हीं के हिस्से आईं। छोटे भाई-बहनों के लिए वे सिर्फ़ भाई नहीं, एक तरह से अभिभावक जैसे ही थे। 

हमारे बाबा (दादाजी) लकड़ी का काम करते थे — बढ़ई थे। जो कुछ भी रोज़ की मेहनत से कमा कर लाते, उससे घर का जैसे-तैसे भरण-पोषण हो जाता था। पेट भर जाता था, लेकिन मन की इच्छाएँ अक्सर अधूरी ही रह जाती थीं।

घर में सदस्यों की संख्या अच्छी-ख़ासी थी, और अक्सर कोई न कोई रिश्तेदार या मेहमान भी महीनों ठहरा करता था। उस समय ये सामान्य बात थी — किसी को मना करना रिवाज में नहीं था। पर इसका असर बाबा की कमाई पर ज़रूर पड़ता था, क्योंकि जिम्मेदारियाँ बढ़ जाती थीं।

थोड़ी-बहुत खेती भी थी, लेकिन वह इतनी नहीं थी कि उस पर पूरी तरह निर्भर हुआ जा सके। इसलिए जब भी ज़रूरत पड़ती, घर के सभी सदस्य — बच्चे, महिलाएँ, और खुद बाबा — खेतों में एकजुट होकर काम करते थे। यही जीवन था — साधन सीमित थे, लेकिन सहयोग और समझदारी अपार थी।

2. शिक्षा का जुनून और संघर्ष

बुआ अक्सर बताया करती थीं कि बाबा जी का मन था कि पिताजी पढ़ाई करें। इसलिए वे उनसे खेतों में ज़्यादा काम नहीं करवाते थे। उनके मन में ठान लिया था कि चाहे जैसे भी हो, बेटे की पढ़ाई में कोई कमी नहीं आने देंगे।

पिताजी का भी पढ़ाई में मन लगता था, लेकिन इसका ये मतलब नहीं था कि वे जिम्मेदारियों से बचते थे। स्कूल से लौटते ही बिना थके सीधे खेत में बाबा का हाथ बंटाने पहुँच जाते थे। उनकी दिनचर्या बिल्कुल तय थी — सुबह स्कूल, दोपहर खेत, और शाम को ढिबरी की टिमटिमाती रोशनी में पढ़ाई।

वे अक्सर कहा करते थे, “अगर पढ़ने का जुनून हो, तो बिजली का इंतज़ार नहीं करना पड़ता — स्ट्रीट लाइट भी काफी होती है।” उन्होंने कई ऐसे लोगों को देखा था जो सरकारी खंभों की रौशनी में बैठकर पढ़ते थे और परीक्षा में टॉप करते थे।

जैसे-जैसे छोटे भाई बड़े होते गए, पिताजी का खेतों में जाना थोड़ा कम होता गया, और वे पूरी तरह पढ़ाई में मन लगाने लगे। जिम्मेदारियाँ अब भी थीं, लेकिन अब उनका लक्ष्य भी साफ़ होता जा रहा था।

उस समय अभाव था, पर वह सिर्फ़ उनका नहीं था, सबके साथ था। न जूते की कमी अजीब लगती थी, न किताब के लिए तरसना दुखद, क्योंकि उस समय यह सब सामान्य था। शायद इसी कारण कोई शिकायत नहीं थी। आज जब पीछे मुड़कर देखते हैं, तो लगता है कि वह आम ज़िंदगी आज कितनी विशेष थी। जहाँ संघर्ष व्यक्तिगत नहीं, सामूहिक होते थे — और उस साझेपन में एक अद्भुत संतुलन था। जो बीत गया, वो समय नहीं था — वो सिखावन थी, जो अब जीवन का हिस्सा बन चुकी है।

उनकी पढ़ाई आसान नहीं थी — संघर्ष हर कदम पर था। गाँव के कुछ दबंग लोग नहीं चाहते थे कि पिताजी पढ़ाई करें। उनका मानना था कि अगर कोई उनसे नीची जाति का लड़का पढ़-लिख गया, तो वो अपने अधिकार पहचान लेगा। बेगारी खत्म हो जाएगी, लोग उनके खेतों में बिना मेहनताना काम करने से इनकार कर देंगे, और फिर शायद उन्हें सलाम भी नहीं करेंगे। यही डर उनके अहम को खाए जाता था।

वे चाहते थे कि गाँव के गरीब लोग हमेशा सिर झुकाकर चलें, किताबों से दूर रहें, ताकि सत्ता और सम्मान सिर्फ उन्हीं के पास बना रहे। पिताजी को बार-बार डराया गया, धमकाया गया — यहाँ तक कि कई बार लड़ाई-झगड़े और मारपीट की नौबत भी आई।

लेकिन पिताजी हिम्मत से कभी पीछे नहीं हटे। वे शारीरिक रूप से मजबूत थे और खुद्दार भी। अगर किसी ने ज़्यादा दबाव डाला, तो वे जवाब देना जानते थे। लेकिन एक बात तय थी — पढ़ाई से कभी समझौता नहीं किया। उनका कहना था, "ज़ुल्म सहना गलत है, और हक़ के लिए लड़ना ज़रूरी।"

शिक्षा उनके लिए सिर्फ़ ज्ञान नहीं थी, सम्मान और आत्मनिर्भरता का रास्ता थी। वे हमेशा पढ़ाई में अव्वल रहे। स्कूल में शिक्षक बहुत सख्त थे, सबक याद न हो तो बुरी तरह पीटते थे। लेकिन पिताजी को कभी मार खाने की नौबत नहीं आई। वे सबक समय से पहले ही याद कर लेते थे।

हमें जब कभी पढ़ाई में ढील मिलती, तो वे मुस्कुराकर कहते,

"तुम्हें 2 से 20 तक की टेबल याद नहीं होती, और हमसे तो टीचर पौना, अद्धा, सवा तक के पहाड़े रटवाते थे।"

उनका अंदाज़ मज़ाकिया होता था, लेकिन उसके पीछे मेहनत की पूरी कहानी छिपी होती थी।

3. तालाब का किस्सा: दादी का गुस्सा और पिताजी की पिटाई

एक बार की बात थी कि पिताजी खेतों में काम कर रहे थे। तभी कुछ लोग गाँव के तालाब में मछली मार रहे थे। वे तालाब में घुसकर मछली पकड़ रहे थे और जैसे ही मछली हाथ आती, वे झट से तालाब के किनारे फेंक देते थे। पिताजी वहीं तालाब के किनारे बैठकर यह सब देख रहे थे। तभी किसी ने दादी को बता दिया कि "बड़के भैया तालाब में मछली मार रहे हैं।"

तभी दादी उठीं और डंडा लेकर तालाब के किनारे पहुँच आईं। सुनते हैं, वे पिताजी को पीटते हुए घर तक लाईं और कुएँ से पानी निकालकर नहलाया। पिताजी लगातार सफ़ाई दे रहे थे कि वे सिर्फ़ देख रहे थे, छुआ नहीं था, पर दादी कहाँ मानने वाली थीं! पिटाई जारी रही। बाद में पिताजी की दादी, जिन्हें वे प्यार से 'दीदी' कहते थे, ने आकर उन्हें छुड़ाया। पिताजी दुबक कर दीदी के पास चिपक कर घंटों तक रोए और कुछ दिनों तक उन्हीं के पास रहे। यह घटना पिताजी के बचपन की एक मज़ेदार और मार्मिक याद थी।

4. बड़े बप्पा से दोस्ती और बचपन की नोकझोंक

पिताजी अपने एक बड़े भाई, जो उनकी बुआ के लड़के थे, उनका किस्सा बड़े मज़े से बताते थे। उन्हें हम 'बड़के बप्पा' बुलाते थे। जब भी पिताजी की बुआ घर आती थीं, तो उनके साथ उनका बेटा भी आता था, जो पिताजी से कुछ ही साल बड़े थे, पर ख़ानदान में सबसे बड़े थे। उनसे पिताजी का बहुत पंगा होता था। उनके आते ही लड़ाई शुरू हो जाती थी।

एक बार की बात थी कि दोनों में किसी बात को लेकर इतनी लड़ाई हुई कि एक-दूसरे को मारने के लिए ईंट उठा ली। मारने ही जा रहे थे कि पिताजी की दादी और उनके बड़े भाई मिसरीलाल की नानी ने दोनों को संभाला। बाद में मेरी दादी और पिताजी की बुआ में अलग से वाद-विवाद शुरू हो गया। दोनों जब लड़ लीं, तो थोड़ी देर बाद फिर से खेलने लगे। पिताजी बताते थे कि बचपन में खूब लड़ाई होती थी, पर बाद में उनसे ही सबसे ज़्यादा प्यार था। दोनों भाई एक-दूसरे का खूब ख़्याल रखते थे। बिना उनके हमारे घर में कोई फंक्शन नहीं होता था। बचपन बीत जाता है, पर उसकी ख़ामोश गूंज ज़िंदगी भर साथ चलती है।

5. गुड़ का किस्सा: बड़ी बुआ की शरारत और पिताजी की चतुराई

एक बार की बात थी, घर में गुड़ आया था। उस समय गुड़ बहुत क़ीमती हुआ करता था। मेहमान के आने पर वही परोसा जाता था। दादी शायद किसी मेहमान के आने पर गुड़ निकाल रही थीं, तभी देखा कि उस पर कुछ दाँतों के निशान थे। दुर्भाग्य से पिताजी भी वहीं मौजूद थे।

पिताजी ने सारे भाई-बहनों को बुलाया और पूछा, "किसने खाया है यह?" किसी का कोई जवाब नहीं मिला। डराया गया, फिर भी कोई नहीं बोला। तब पिताजी ने जुगत लगाई और बोले, "अब सब मुँह खोलो और जिसके दाँत फ़िट हो जाएँगे, उसकी कुटाई पक्की।" फिर भी कोई नहीं बोला और चेकिंग शुरू हुई। आखिर में दाँतों के निशान बड़ी बुआ के निकले और फिर उनकी भी कुटाई चालू हुई। बुआ के दाँत ख़ास हैं – उनके दाँतों के बीच में थोड़ी ज़्यादा जगह है। यह किस्सा पिताजी को उनकी बचपन की शरारतों और परिवार के अनमोल पलों की याद दिलाता था।

6. बाबा पर हमला और पिताजी का दर्द

यह उस समय की बात है, शायद हम तीनों भाई-बहनों में से कोई पैदा नहीं हुआ था। उन दिनों का किस्सा है कि हमारे बाबा घर के बगल में चल रही नौटंकी देखने गए थे। उन दिनों नौटंकी देखना बहुत ख़ास हुआ करता था। उसी के बीच में किसी से हमारे बाबा का पंगा हो गया था। हमारे बाबा को दो लोगों ने पकड़ा और मारने लगे थे। हमारे घर का कोई और वहाँ नहीं था, बाबा शायद अकेले थे। दो लोगों ने मेरे बाबा को खूब पीटा और टाँगारी (कुल्हाड़ी) से उन पर वार किया। बाबा भी बलिष्ठ थे, उन्होंने मुकाबला किया, पर टाँगारी का एक वार उनके हाथ में जा लगा और वे घायल हो गए। बाद में लड़ाई शांत हुई थी।

पिताजी को जब यह पता लगा, तो वह घाव बाबा को नहीं, बल्कि पिताजी के दिल को चीर गया। हाथ का घाव तो भर गया, पर दिल का कभी नहीं भरा। गाँव में कुछ दबंग और शक्तिशाली लोग थे, जो ज़मींदार जैसे थे, पर हमारा परिवार भी धीरे-धीरे शक्ति अर्जित कर रहा था। पिताजी को अपने जीवन में कुछ कर गुज़रने का जुनून शायद इसी घटना से आया, यह उनके लिए एक गहरा भावनात्मक आघात थी जिसने उन्हें और मज़बूत बना दिया। पुरानी बातें धूल नहीं होतीं, वे आत्मा की परतों में चमकते अनुभव होते हैं।

7. दबंगों से सामना और अनमोल एहसान

गाँव के दबंगों ने एक बार पिताजी को जान से मारने के लिए कुछ गुंडे भेजे थे। जब उन गुंडों को पता लगा कि पिताजी मेरे बाबा राम फूल के बेटे हैं, तो उन्होंने मेरे बाबा को बताया, "तुम्हारे बेटे को मारने के लिए कुछ लोगों ने गुंडे भेजे थे।"

दरअसल, मेरे बाबा का उन गुंडों पर कुछ एहसान रहा था, उन्होंने मुसीबत में उनकी सहायता की थी। उसका बदला चुकाने के लिए उन्होंने पहले से बाबा को बता दिया और यह सुनिश्चित किया कि कोई और मेरे पिताजी को न मार सके। उन्होंने उन दबंगों को चेतावनी भी दी कि अगर इस लड़के को कुछ हुआ तो वे उन्हें नहीं छोड़ेंगे। यह घटना दिखाती थी कि कैसे विपरीत परिस्थितियों में भी, पुराने संबंध और किए गए एहसान जीवन रक्षक बन जाते थे।

8. दबंगों से सीधी टक्कर और चाचा का रौद्र रूप

एक बार की बात थी, पिताजी अपने किसी रिश्तेदार के घर गए थे, उनका घर हमारे ही गाँव के दूसरे कोने में था। वे खाट पर बैठे थे, तभी गाँव के दबंग परिवार का एक सदस्य आया और बोला, "तुम खाट से नीचे बैठो, हम खाट पर बैठेंगे!" पिताजी बोले, "खाट मेरे बाप ने बनाई है, तो बैठूँगा तो मैं ही, तुम क्यों बैठोगे!" अपनी बेइज़्ज़ती सुन वह भड़क गया और पिताजी पर हाथ उठा दिया। पिताजी भी कम नहीं थे, उन्होंने उसे पकड़ा और उसकी अच्छी-ख़ासी धुनाई कर दी। वह अधमरा सा हो गया और बाकी दबंगों को बुलाने के लिए भागा।

पिताजी भागते हुए अपने चाचा जी के पास पहुँचे। पिताजी के चाचा भी कुछ कम नहीं थे; वे गाँव के बड़े लठबाज़ थे। गाँव के दबंग उन्हें ढूँढते हुए पिताजी के चाचा, जिन्हें वे 'काका' बोलते थे, उनके पास पहुँचे और पिताजी को उन्हें सौंपने को कहा। तब काका ने कहा, "मैं सौंप तो दूँगा, पर याद रहे कि अगर मेरे भतीजे को कुछ भी हुआ तो तुम्हारे घर से भी लाशें निकलेंगी। हम तो मरेंगे, पर तुम्हारे घर से भी कोई ज़िंदा नहीं बचेगा। खाट हम बनाएँ और हमें ही बैठने का अधिकार नहीं है – यह दबंगई नहीं चलेगी।" पिताजी यह भी बताते थे कि अगर कोई दबंगों के सामने से सिर उठाकर चला जाए तो वे उसे माँ-बहन की गालियाँ देने से भी नहीं चूकते थे। काका की इस दबंग धमकी सुनकर बाकी सब वापस चले गए।

फिर पिताजी अपने काका के साथ घर वापस आए। पिताजी बताते थे कि उनके काका गाँव के मशहूर लठबाज़ थे। जब वे लाठी घुमाते थे, तो कोई चीज़ उन पर फेंकने की हिम्मत नहीं करता था; उनकी लाठी से टकराकर वह चकनाचूर हो जाती थी। यह घटना पिताजी के निडर स्वभाव और परिवार के मजबूत समर्थन को दर्शाती थी।

9. राम भजन जी का साथ और बड़े सपने की नींव

घर से स्कूल 8 किलोमीटर दूर था, और गोंडा रेलवे स्टेशन होते हुए जाना पड़ता था। रास्ते में रेलवे कॉलोनी पड़ती थी, जहाँ पिताजी के सीनियर और दोस्त राम भजन जी रहते थे। उनसे उनकी गहरी दोस्ती हुई थी। दोनों साथ स्कूल जाते थे। राम भजन अपने बड़े भाई के साथ रेलवे कॉलोनी में रहते थे, जो रेलवे में नौकरी करते थे। पिताजी स्कूल जाते समय अक्सर उनके साथ ही जाते थे।

राम भजन जी, जिन्हें पिताजी अपना बड़ा भाई मानते थे, उन्हें एक बड़े भाई की तरह गाइड करते थे। पढ़ने में राम भजन जी बहुत अच्छे थे और टॉपर थे। पिताजी को आगे बढ़ने का सपना उन्होंने ही दिखाया था। राम भजन जी को जज बनने का जुनून था, यही उनका एकमात्र लक्ष्य था। तो वे खूब मन लगाकर पढ़ते थे और हमेशा अव्वल रहते थे।

10. बचपन की शादी

पिताजी के जीवन की एक और महत्वपूर्ण पड़ाव उनकी शादी थी। वे तब मुश्किल से 12 साल के रहे होंगे, जब उनके फूफा जी ने मेरी माँ से उनका रिश्ता तय कर दिया था। उन दिनों लड़की देखने जैसी कोई रस्म नहीं होती थी; बड़ों ने जो कह दिया, वही अंतिम निर्णय होता था। पिताजी अक्सर बताते थे कि उनकी शादी में पूरे पाँच दिनों की बारात थी। हमें शादी की सटीक सालगिरह तो याद नहीं, पर इतना पता है कि यह गेहूँ की कटाई के बाद हुई थी।

पिताजी अक्सर मज़ाक में कहते थे कि उन्हें तो याद भी नहीं कि उनकी शादी हुई थी! उनकी यह बात सुनकर माँ भी मुस्कुराते हुए कहती थीं कि उन्हें भी अपनी शादी का कोई ख़ास एहसास नहीं था। उन्हें तो बस ऐसा लगता था, जैसे यह गुड़िया-गुड़ियों का कोई बड़ा खेल हो, और उनके गुड्डे की शादी हो रही हो। पिताजी बताते थे कि उनके माता-पिता जी ने जब उन्हें बताया कि उनकी शादी हो गई है, तो उन्होंने बस मान लिया।

उस समय की शादियाँ आज से काफी अलग थीं। बारात में मनोरंजन के लिए 'नाचनिया' (लड़के जो लड़की का रूप धरकर नाचते और गाते थे) भी साथ जाते थे। लड़की के घर वाले बारातियों के स्वागत में गालियाँ गाते थे, जो एक पारंपरिक रस्म थी। घर की स्त्रियाँ एक तरफ शादी की रस्मों में व्यस्त होती थीं, तो वहीं दूसरी तरफ गालियों के गीत गूँज रहे होते थे। बाराती अपने साथ गोला दागने वाले (पटाखे चलाने वाले) को भी ले जाते थे, जिससे बारात में खूब धूम-धड़ाका होता था। बारात को अक्सर गाँव के बाहर खेतों में ठहराया जाता था, जहाँ गाँव के लोग बेटी की शादी में सहयोग के तौर पर अपने घर से खटिया और तख्त लाते थे, ताकि बाराती आराम से बैठ और सो सकें। इन्हीं खेतों में बड़े-बड़े टेंट लगाए जाते थे।

पिताजी यह भी बताते थे कि पाँच दिनों की इस बारात में हर रोज़ नए-नए पकवान परोसे जाते थे। इनमें पूड़ी, कद्दू की मिठास वाली सब्ज़ी, मसारंगी, खड़ी उड़द की दाल, भात (चावल), खाजा, बालूशाही, बूंदी का लड्डू, बड़ी बूंदी (जो धोड़ी चावल के आटे से बनती थी), दही, और चिउड़ा-घी-गुड़ जैसे स्वादिष्ट व्यंजन शामिल थे। यह सब बारातियों के लिए एक शानदार और यादगार दावत होती थी।

11. प्रेम मामा का साथ और बड़े सपने

इस कहानी में उनके चचेरे मामा प्रेम का ज़िक्र करना ज़रूरी है। पिताजी का ननिहाल शहर के पास ही था। उन दिनों एक परंपरा थी कि लड़कियों की संपत्ति उनके चचेरे भाइयों को मिल जाती थी, और मेरी दादी के साथ भी ऐसा ही हुआ। इसके बावजूद, पिताजी की अपने चचेरे मामा प्रेम से बहुत पटती थी। दोनों एक ही उम्र के थे, और प्रेम मामा पैसे से भी संपन्न थे।

दोनों साथ रहते, रात में फ़िल्में देखने जाते थे। उस समय की बात है जब किसी के पास साइकिल भी नहीं हुआ करती थी, उनके पास मोटरसाइकिल थी। पिताजी उन्हीं के साथ रहते थे – 'दांत काटी रोटी' जैसे रिश्ते थे उनके। नानी भी उन्हें बहुत प्यार करती थीं, तो उनका ननिहाल में आना-जाना लगा रहता था। प्रेम मामा का खुद मन पढ़ाई में नहीं लगता था, वे उन दिनों बिज़नेस के बारे में सोच रहे थे। पर पिताजी का संकल्प था कि उन्हें आगे बढ़ना था।

12. संघर्ष की पराकाष्ठा और पहली जीत

10वीं कक्षा के परिणाम की बात करें तो, परीक्षाएँ देने के बाद उन्हें यकीन था कि वे अच्छे नंबरों से पास हो जाएँगे। जब परिणाम आया और वे रिजल्ट देखने स्कूल गए, तो वहाँ उन्हें अपना नाम दिखा ही नहीं। उदास होकर वे घर वापस आए और बाबा जी के गले लगकर ख़ूब रोए। बाबा जी ने हौसला बढ़ाया और कहा, "तुम पढ़ो, फेल होने की चिंता मत करो।" रोने का एक और कारण था – 10वीं की परीक्षा के लिए बाबा ने साहूकार से उधार लिया था। पैसे इतने नहीं थे कि वे परीक्षा शुल्क दे पाते। पिताजी को आगे पढ़ाई करना मुश्किल लग रहा था। खैर, रात किसी तरह रोते हुए बीती।

सुबह एक मास्टर साहब अपनी साइकिल से भागते हुए आए और बाबा जी, जो अपने काम पर जा रहे थे, उन्हें रोका और बोले, "आपके बेटे ने टॉप किया है, फर्स्ट क्लास आया है! उसका रिजल्ट अलग छपता है, इसलिए वह देख नहीं पाया होगा।" बाबा भी दौड़ते हुए घर आए और पिताजी को गले लगा लिया। धीरे-धीरे यह ख़बर पूरे गाँव में फैल गई और फिर पूरी बिरादरी में। एक बात और जोड़ना चाहूँगा कि पिताजी को कोई भी उनके नाम से नहीं बुलाता था; घर में सब उन्हें 'भैया' कहते थे, चाहे कोई छोटा हो या बड़ा।

10वीं में टॉप करने के बाद, उन्होंने 12वीं भी फर्स्ट क्लास से पास की। साथ ही, परिवार की आर्थिक मदद के लिए उन्होंने टाइपिंग और शॉर्टहैंड भी सीखा। उसके बाद वे गोंडा में ही टाइपिस्ट की नौकरी करने लगे। उनकी पहली नौकरी कुनैन फैक्ट्री में लगी, जो मलेरिया की दवा बनाती और बाँटती थी। साथ में अलग-अलग जगह आवेदन भी करते रहे। उनका संकल्प था कि वे पढ़ाई करके गोंडा जैसे छोटे शहर को छोड़कर किसी बड़े शहर में जाएँगे।

13. गवना और नई पारिवारिक जिम्मेदारियाँ

स्कूल के दिन ख़त्म होने के बाद, जब माँ 18 साल की हो गईं, तब उनका गवना हुआ और वे पिताजी के घर आईं। अब उनके पास परिवार था। माँ की ज़िम्मेदारी भी बढ़ गई। घर में ज़रूरी सामान का अभाव था, साथ ही माँ के मायके में कोई और सहारा देने वाला नहीं था। तो दोनों की ज़िम्मेदारी उठाना आसान नहीं था, लेकिन मेरी माँ भी कमज़ोर नहीं थीं।

उन्हें खेती में अच्छा अनुभव था। जब भी वे ससुराल से मायके जातीं, तो खेतों में मज़दूर की तरह काम करतीं और साल भर का राशन इंतज़ाम करके देतीं, जिससे उनके घर वालों को कभी किसी के सामने हाथ न फैलाना पड़े। मैंने खुद अपनी माँ को बोझ उठाते हुए देखा है। गर्मी की छुट्टियों में जब हम नानी के घर जाते थे, तो गेहूँ काटने का वक्त हो चुका होता था। माँ और नानी सुबह तड़के खेतों में जाती थीं और 9 बजे से पहले खेतों में काम करके वापस आ जाती थीं। शाम 5 बजे के बाद वे फिर से खेतों में जाती थीं गेहूँ काटने। हमारा काम तो सिर्फ़ उन्हें गुड़ और पानी लेकर जाना होता था। पानी पिलाकर हम वापस घर आ जाते थे। थोड़ी देर बाद जब मुझे खुद प्यास लगती तो हम, चाहे दीदी, मुकुल या मैं, दूध वाली बाल्टी में ताज़ा कुएँ से निकला पानी भरकर खेतों की तरफ निकल लेते थे।

14. अंतिम बाधा और अपनों का साथ

नौकरी तो मिल गई थी, पर ज्वाइन करने से पहले एक और बड़ी बाधा सामने आई – कैरेक्टर सर्टिफिकेट और कुछ अन्य दस्तावेज़ों पर राजपत्रित अधिकारियों (gazetted officers) के हस्ताक्षर करवाने थे। पिताजी दर-बदर भटके, पर कोई भी अधिकारी उन पर हस्ताक्षर करने को तैयार न हुआ। यह एक ऐसा पल था जब उम्मीद टूटने लगी थी।

तभी गाँव के ही भभूती तिवारी जी, जिन्हें हम प्यार से 'बाबा' कहते हैं, और मेरे पिताजी जिन्हें चाचा कहते थे, उनके दस्तावेज़ों पर हस्ताक्षर करवाने के लिए तैयार हुए। कुछ दिनों के बाद, उन्होंने अटेस्ट किए हुए दस्तावेज़ पिताजी को दिए, और तब जाकर वे अपनी नई नौकरी के लिए लखनऊ रवाना हुए। यह दिखाता था कि कैसे हर मुश्किल घड़ी में अपनों का साथ ही सबसे बड़ा सहारा होता था।

15. लखनऊ में नई शुरुआत और शिक्षा का सफ़र

जैसे-तैसे पिताजी लखनऊ पहुँचे। शुरू में वे दूर के एक रिश्तेदार के घर ठहरे, पर कुछ ही दिनों बाद अपने बचपन के मित्र राम भजन के घर जा पहुँचे। राम भजन भी उस समय लखनऊ के खदरा में एक हॉस्टल में रहते थे। वे उस समय LLB कर रहे थे और साथ में मुंशीब (न्यायिक सेवा) की तैयारी भी। राम भजन ने पिताजी को भी कहा, "तुम भी तैयारी करो, मैं तुम्हें पढ़ाऊँगा।" पर पिताजी के जीवन में संघर्ष था, वे अपनी नौकरी नहीं छोड़ सकते थे।

फिर भी, दोस्त के दबाव में आकर उन्होंने कॉलेज ज्वाइन किया और BA करने लगे। उनकी नौकरी भी चल रही थी, एक टाइपिस्ट के रूप में। चाचा बताते थे कि जब भी वे खाली होते, तो अमीनाबाद के आस-पास की किसी दुकान में जाकर टाइपिस्ट का काम करते थे, जिससे उन्हें अतिरिक्त आय हो जाती और घर को सहारा मिलता। जब BA पूरा हुआ, तो दोस्त राम भजन का दबाव और बढ़ा कि "तुम LLB कर डालो और मेरे साथ मुंशीब की तैयारी करो।" राम भजन उन्हें अक्सर पढ़ाया करते थे और परीक्षाओं के लिए भी ले जाते थे। इस तरह LLB भी पूरा हो गया। इसी दौरान पिताजी अक्सर नौकरियाँ भी बदलते रहते थे।

16. दोस्ती का अनमोल रिश्ता: भूख मिटाने का पुण्य

एक बार कॉलेज के दिनों की बात है, पिताजी लखनऊ में थे। अचानक उन्हें उनके स्कूल के दिनों के दोस्त कौशल दिख गए। बचपन का दोस्त जब बहुत दिनों बाद मिलता है, तो खूब बातें होती हैं। पिताजी उन्हें अपने साथ घर ले आए। खाना खाने का समय हो चुका था, उस दिन शायद कोई त्योहार भी था, पकवान बने थे। माँ ने खाना परोसा। पिताजी और अंकल ने साथ मिलकर खाना खाया। खाना खाने के बाद अंकल खाने की तारीफ़ किए जा रहे थे। चाचा ने उनके लिए बिस्तर लगाया। गर्मी के दिनों में हम छत पर बादलों की चादर ओढ़कर सोया करते थे।

अंकल एक दिन आराम करने के बाद दूसरे दिन नाश्ता करके, माँ द्वारा सफ़र के लिए बाँधे गए कुछ पराठे और सब्ज़ी लेकर वापस गोंडा आ गए।

कुछ बरसों बाद जब पिताजी किसी केस के सिलसिले में उनसे मिले और अपना केस उनसे लड़ने की बात की, तो वे झट से तैयार हो गए। पिताजी ने जब फ़ीस के बारे में पूछा, "कितनी फ़ीस लगेगी, बताओ भाई," तो उन्होंने फ़ीस लेने से मना कर दिया। जब उन्होंने पूछा, "तुम मुझसे फ़ीस क्यों नहीं ले रहे हो," तब वे किस्सा सुनाते थे, "जिस दिन मैं तुमसे लखनऊ में मिला था, उस दिन मैं 2 दिन से भूखा था। इतने लोग मिले पर किसी ने मुझे खाना नहीं खिलाया। उस समय मेरे पास इतने पैसे नहीं थे कि मैं कहीं बाहर खाना खा सकूँ। वह जो भूख थी, वह तुमने मिटाई थी। तुमसे पैसे नहीं ले सकता।" पिताजी ने कहा, "तुम मेरे मित्र हो। तुम पर कोई एहसान नहीं किया मैंने।" अंकल बोले, "भूख लगने पर जो खाना खिला दे, उससे बड़ा पुण्य कुछ नहीं है। वह दिन था और आज का दिन। आज मेरे पास सब कुछ है, पर उस दिन जब मेरे पास कुछ नहीं था, तुमने खाना खिलाया। मैं अपने दोस्त से पैसे नहीं ले सकता।" पिताजी ने हमेशा याद दिलाया, "कभी-कभी अनजाने में पुण्य हो जाता है। और पुण्य करने वाले से ज़्यादा महान वह है जिस पर किया गया पुण्य याद रखा जाए, पुण्य करने वाला नहीं।" हम जिनके साथ बड़े हुए, वो लोग हमारे भीतर आज भी साँस लेते हैं — बस हम उन्हें याद कर लेते हैं, तो आवाज़ सुनाई देती है।

17. लखनऊ में दोस्ती और नई आदतें

राम भजन (जिन्हें हम 'बप्पा' कहते थे) के साथ रहकर पिताजी की तरक्की तो हुई, पर कुछ बुरी आदतें भी लग गईं, जिनमें शराब पीना शामिल था। बप्पा खूब शराब पीते थे, और संघर्ष भरा जीवन चल ही रहा था, तो पिताजी भी उनके साथ शराब पीने लगे। नए दोस्त मिले, नई महफ़िलें बनीं, तरक्की के नए रास्ते खुले, पर यह एक बुरी आदत पड़ गई।

माँ बताती थीं कि जब वे पिताजी के साथ रहने लखनऊ आईं, तो यह सब देखकर दंग रह गईं। गाँव का सीधा-साधा लड़का यहाँ शराब पी रहा था! माँ उम्र में छोटी थीं, बप्पा के एहसान थे, और वे माँ को बहुत सम्मान भी देते थे – 'बहू' कहकर बुलाते थे। पूरी कॉलोनी में उनकी बहुत इज़्ज़त थी। ज्ञानी वे बहुत थे, पर एक ही बुरी आदत थी शराब की। पिताजी की दो शर्तें थीं: वे केवल बप्पा के साथ शराब पीते थे, और कभी अपना पैसा ख़र्च नहीं करते थे। उनका कहना था कि जब वे गाँव से आए थे, तो कोई दोस्त नहीं था, किसी को जानते नहीं थे। जब आप किसी के साथ रहते थे और उसके साथ शराब और सिगरेट पीते थे, तो वह जल्दी दोस्त बनता और साथ निभाता था। पिताजी के अनुसार, शराब पीना उन दिनों उनकी 'मजबूरी' था, शौक नहीं।

18. सचिवालय में प्रवेश और गाँव में धूम

एक दिन उनके दोस्त राम भजन ने सचिवालय का फॉर्म भरा, और साथ में पिताजी ने भी टाइपिस्ट की नौकरी के लिए फॉर्म भरा। परीक्षा हुई और दोनों पास हो गए। राम भजन साथ में जज होने के लिए तैयारी भी कर रहे थे। पिताजी और उनके दोस्त बप्पा, दोनों की नौकरी लग गई। सचिवालय एक बड़ा नाम था – पूरे प्रदेश की राजधानी में सबसे बड़े अधिकारी के वे टाइपिस्ट थे।

यह ख़बर जब गाँव पहुँची तो हल्ला हो गया। कहा जाता है कि इस ख़बर को कन्फर्म करने के लिए गाँव से कुछ लोग पिताजी के ऑफिस पहुँचे थे। और अक्सर गाँव में लोग बोलते थे, "जितनी कैलाश (मेरे पिताजी का नाम) को तनख्वाह नहीं पता है, उतने की तो मैं चाय ही पी जाता हूँ।" यह उनके लिए और पूरे गाँव के लिए गर्व का विषय था।

19. समाज सेवा और नेतृत्व

संघर्ष के दिन बीत रहे थे, तो उसी के साथ उन्होंने अपनी और अपने परिवार की जड़ों को मज़बूत करने के लिए लखनऊ में अपने समाज के लोगों से भी संपर्क साधा। मज़बूर रानी में स्थित ककुहास पंचाल ब्राह्मण सभा का एक विश्वकर्मा मंदिर है। पिताजी ने उस समाज को ज्वाइन किया और आजीवन सदस्यता ली। वे उनके दैनिक कार्यों में सम्मिलित होते रहे। समाज के विभिन्न लोगों से संपर्क बनाया। अपने परिवार के अनेकों लोगों को समाज के विभिन्न कार्यों से अवगत कराया और समाज को जोड़ने के लिए संघर्ष भी करते रहे।

बरसों मेहनत के बाद उनकी पदोन्नति होती रही और एक दिन वे महामंत्री पद, फिर उपाध्यक्ष और बाद में अध्यक्ष भी बने। पिताजी जब भी समाज के महत्वपूर्ण लोगों से मिलते, उनकी कहानियाँ हमें ज़रूर बताते। वे बताते थे कि कैसे विश्वकर्मा मंदिर बनकर तैयार हुआ, और कैसे राय बहादुर दुर्गा प्रसाद जी ने भगवान विश्वकर्मा के साथ अपनी भी मूर्ति बनवाई। वे अलग-अलग लोगों के संघर्ष और उनकी कामयाबी की कहानियाँ साझा करते थे।

मंदिर के दोस्त, जो कभी-कभी घर आते थे, उनमें से कुछ के नाम आज भी हमें अच्छे से याद हैं। इनमें प्रमुख थे राजकुमार अंकल, राजेश अंकल, महेश अंकल और राजेंद्र अंकल। बाद में राजेंद्र अंकल के बेटे से मेरी चचेरी बहन की शादी भी हुई। ये दोस्त मंदिर के विषय में चर्चा करते थे और हमें भी प्रेरित करते थे कि मंदिर जाया करो। लोगों से मिलो, खुद भी प्रेरित हो और दूसरों को भी प्रेरित करो। बहुत से लोगों ने मंदिर में अपना योगदान दिया, संघर्ष करते हुए भी बहुत से लोगों ने मंदिर और समाज के लिए अपना सब कुछ दिया।

20. अध्यक्ष के रूप में दूरदर्शी कार्य

अध्यक्ष बनने के बाद जब उन्होंने वहाँ के संविधान को ठीक से पढ़ा तो उसमें कुछ परिवर्तन की ज़रूरत वे शुरुआत से समझ रहे थे। सभी बड़े अधिकारियों से मंत्रणा करने के बाद कुछ अभूतपूर्व परिवर्तन भी लाए। जैसे कि कोई भी अध्यक्ष आजीवन अध्यक्ष नहीं बन सकता। उसका कार्यकाल सिर्फ 3 साल का होगा, और 3 बार से ज़्यादा नहीं बन सकता।

उन्होंने मंदिर के निर्माण के लिए लोगों को जोड़ा, पैसे इकट्ठा किए और मंदिर का जीर्णोद्धार किया। और एक दिन जब कार्यकाल पूरा हुआ तो उन्होंने नए लोगों को आगे बढ़ाया और अपना पद छोड़कर समाज को नई दिशा देने लगे।

21. मदद की भावना और मेहमानवाज़ी

लखनऊ में रहते हुए पिताजी ने बहुतों की मदद की। कभी किसी को किसी चीज़ की ज़रूरत पड़ी हो तो वे हमेशा तैयार रहे। घर के दरवाज़े हमेशा खुले रहे उन सब लोगों के लिए जो पढ़-लिखकर आगे बढ़ना चाहते थे। उनका हमेशा हमारे घर में स्वागत था। ख़ानदान या गाँव का कोई भी सदस्य एग्ज़ाम्स देने के लिए अक्सर हमारे घर आते। उनका स्वागत होता, वे एग्ज़ाम्स देते।

अगर किसी का कोई भी काम फँसा होता और पिताजी उसमें मदद कर सकते होते तो मदद ज़रूर करते। अगर नहीं कर सकते तो कोशिश करते कोई न कोई रास्ता निकले। हमें याद नहीं कि हम बड़े होने तक कभी भी कोई भी वीकेंड हम अकेले रहे हों। कोई न कोई मेहमान हमारे साथ रहा था। यहाँ तक कि पिताजी कभी-कभी हम पर ध्यान देने की जगह समाज में इतने मशगूल हो जाते थे कि हमारी कोई फ़िक्र ही नहीं रहती थी।

22. पिंटू चाचा की संघर्ष यात्रा

पिंटू चाचा उम्र में मुझसे बहुत बड़े नहीं थे, पर वे पिताजी की बुआ के बेटे हैं। दुर्भाग्य से किसी बीमारी की वजह से उनकी आँखें बचपन में ही चली गई थीं। जब से हमने होश संभाला है तब से उन्हें अंधा ही देख रहा हूँ। पिताजी की बुआ अक्सर हमारे गाँव वाले घर आया जाया करती थीं। जहाँ पिताजी की बुआ जाती, वे साथ में रहते थे। हर कोई उनसे मज़ाक में कई प्रश्न पूछता था। जैसे "पहचानो कौन है यह?" वे हाथ पकड़कर सही बताने की कोशिश करते थे। और अक्सर वे सही ही होते थे। सिक्के दिखाकर पूछते थे, "बताओ कितने का सिक्का है?" वैसे ही नोट पकड़ा कर भी यही पूछते थे। जब भी वे आते, ऐसे प्रश्नों की महफ़िल लग जाती थी।

चाचा थोड़े बड़े हुए तो पिताजी को एहसास हुआ कि अगर ऐसे ही चलता रहा तो आगे इनका क्या होगा। बुआ तो एक दिन चली जाएँगी और फिर ये अकेले रह जाएँगे। फिर इनकी देखभाल कौन करेगा। पिताजी लखनऊ आकर यहाँ के ब्लाइंड स्कूल में बात की कि उनका एक छोटा भाई अंधा है। तो वहाँ उनके एडमिशन की बात पक्की हो गई। अब उन्हें स्कूल में एडमिशन कराना था। यह कोई छोटी बात नहीं थी कि पिताजी ने निर्णय लिया और सब मान गए। पिताजी अपनी बुआ के पास गए और बताया कि उन्होंने स्कूल में पिंटू (जिनका असली नाम विजय है) का एडमिशन करा दिया है। बस पिंटू को वहाँ जाना था। सारी व्यवस्था उनकी होगी, आप लोगों को कुछ भी नहीं करना। पिताजी की बुआ ने आनाकानी शुरू कर दी। उनका बच्चा कैसे रहेगा? दिनचर्या के काम कैसे करेगा? पिताजी बोले, "जैसे बाकी बच्चे करते हैं, वह वैसे ही करेगा।" जब ज़्यादा आनाकानी हुई तो पिताजी ने बुआ को डाँटते हुए कहा, "कल तुम मर जाओगी तो इसका क्या होगा? भाई अपनी ज़िंदगी में व्यस्त हो जाएँगे, सिर्फ़ यह कुछ टुकड़ों पर पलेगा। अच्छा लगेगा तुम्हें?" ज़बरदस्ती उन्हें स्कूल ले आए। चैलेंज सिर्फ़ पिताजी की बुआ का नहीं, पिंटू का भी था। वह बुआ को छोड़कर जाना ही नहीं चाहता था। सुरती खाने की आदत पड़ चुकी थी और स्कूल में वह मिलेगी नहीं। कैसे जिएगा?

पिंटू स्कूल तो आ गया पर मन नहीं लगा। फिर तांडव का सिलसिला शुरू हुआ। बच्चों के कंबल बाथरूम में भिगो आते थे। कहीं किसी से पंगा कर लेते, ताकि स्कूल वाले उन्हें निकाल दें। पिताजी के पास अक्सर शिकायतें आतीं, पिताजी जाते और उन्हें डाँटकर वापस चले आते। पिंटू के लिए स्कूल एक क़ैद था। कहाँ गाँव में सबके साथ घूमने जाते थे, और यहाँ बंद दरवाज़े। अक्सर उनके साथी घर आते और मम्मी को सारी घटना बताते। मैं उन सबको देखकर चकित रहता कि इन लोगों को दिखता नहीं था फिर भी कैसे स्कूल से घर ढूँढ लिया और चले गए। बस एक डंडी के बल पर। शाम को छत पर महफ़िल लगती, पूरी कॉलोनी पिंटू चाचा से मिलने आती। फिर वही उनसे बातें – "बताओ यह कौन है?" पिंटू चाचा ने तो कई बार वहाँ से भागने की कोशिश भी की, पर असफल रहे।

यह सिलसिला सालों तक चला पर एक दिन उन्हें समझ आया कि अब पढ़ाई में आगे बढ़ा जाए। न जाने कब वह पढ़ाई में गंभीर हो गए और 10वीं की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की। उनकी किताबें भी अजीब सी थीं। न कोई चित्र न कोई रंग। बस उसमें बिंदियाँ थीं। एक स्लेट थी और एक पटरी जिसकी मदद से वह लिखते थे। कभी-कभी हमें लिखकर भी दिखाते थे। नोटबुक के पन्ने काफ़ी मोटे होते थे।

आगे की बात करें तो उन्हें 11वीं के लिए दिल्ली जाना था। पर यहाँ लखनऊ में सिर्फ़ 10वीं तक ही था। अब दिल्ली में हमारा कोई जानने वाला नहीं था जो मदद कर सके। फिर चाचा के बड़े भाइयों ने वहाँ के सांसद से संपर्क किया और वे मदद करने के लिए भी तैयार हो गए। दिल्ली पहुँचने पर वे खुद पिंटू चाचा को स्कूल ले गईं और एडमिशन कराया। वह पढ़-लिखकर आज मथुरा रिफाइनरी में काम कर रहे हैं। आज उनकी आर्थिक स्थिति बाकी भाइयों से लाख गुना बेहतर है। उनका विवाह भी उनके टीचर की बेटी से हुआ। चाची के भाई और पिता दोनों ही ब्लाइंड हैं। चाची को सारे चैलेंज पता हैं। अब उनका परिवार वृंदावन में रहता है। पिताजी का यह कार्य मुझे व्यक्तिगत रूप से बहुत प्रेरित करता है। और लगता है कि अगर पिताजी चाचा का एडमिशन नहीं कराते तो आज चाचा क्या करते। बाकी लोग सामान्य थे, वे कुछ न कुछ तो करते। पर इनका क्या होता?

23. वास्तविक फाँसी का अनुभव: एक दहला देने वाला पल

ठंड के दिन चल रहे थे, हम सब रज़ाई ओढ़े दिन काट रहे थे। स्कूल बंद थे। पूरा परिवार भी इकट्ठा था, पिताजी भी आज ऑफिस नहीं गए थे। हम सब एक साथ बैठकर मूवी देख रहे थे, जिसमें अदालत मुल्ज़िम को अंत में फाँसी देती है, और फिर मूवी का नायक उस खलनायक को सरेआम अदालत के बाहर फाँसी पर लटका देता है और मूवी खत्म हो जाती है। अब उस मूवी पर चर्चा का खेल चालू हुआ। अचानक पिताजी बोले, "मूवीज़ में कितना बकवास दिखाते हैं, ऐसे कोई किसी को भी फाँसी पर चढ़ा सकता है? पुलिस ऐसे ही देखती रहती है क्या? इन लोगों ने कभी हकीकत में भी ऐसी फाँसी होती है, सब बकवास दिखाते हैं, और फिर सोचते हैं कि मूवी हिट हो जाए, ज़रूर यह मूवी पिट गई होगी।" फाँसी पर चर्चा होने लगी, फिर पिताजी बताने लगे कि कभी वह एक बार फाँसी देखने गए थे। सच्ची-मुच्ची फाँसी।

पिताजी कभी किसी डिपार्टमेंट में रहे होंगे। उन्होंने किसी अधिकारी से बात की होगी, सच में फाँसी देखने के लिए। फिर उस अधिकारी ने कहा, "शर्मा जी, आसान नहीं है फाँसी देखना। बड़े-बड़ों की हालत ख़राब हो जाती है, आप देख पाएंगे?" "हम चाहते हैं कि फाँसी खत्म हो जाए और आप फाँसी देखना चाहते हैं।" तभी पिताजी और उनके साथियों ने कहा, "देख लेंगे इसमें कौन सी बड़ी बात है।" पिताजी और उनके साथियों को कॉलेज से निकले बस कुछ ही दिन हुए थे। नया खून था और जोश भी भरपूर था। तभी उनके अधिकारी ने कहा, "तो ठीक है, कुछ महीनों बाद किसी व्यक्ति को फाँसी होने वाली है जिसने किसी परिवार को बड़े ही वीभत्स तरीके से खेत में ही काट डाला था। अदालत ने उसे फाँसी की सज़ा सुनाई है।" पिताजी और उनके साथी बोले, "तो ठीक है, हम देख लेंगे, हम मज़बूत हैं।" अधिकारी ने कहा, "मैं तुम्हें दिन-तारीख बता दूँगा। फाँसी का ऑर्डर तुम लेकर जाना और तुम सबको तड़के जाना पड़ेगा और इस बात की चर्चा आप किसी से नहीं करेंगे, फाँसी कोई प्रदर्शनी नहीं है। इसलिए, फाँसी आप एक झरोखे से देख पाएंगे, न कि सामने से।"

दिन-तारीख बताई गई, रात भर कोई सोया नहीं और तड़के सब कारगर पहुँच गए। फाँसी का ऑर्डर जेलर को दिया गया। फिर उन्हें एक झरोखे तक ले जाया गया, सभी के अंदर फाँसी देखने की उत्सुकता थी। 1 घंटे इंतज़ार करने के बाद फाँसी के हॉल में उस कातिल को लाया गया। कोई अधिकारी उसे कुछ पूछ रहा था, इन लोगों को साफ़ सुनाई नहीं दिया। जल्लाद उसे फाँसी के तख्ते पर ले गया और मुँह पर कपड़ा बाँधने और फंदा लगाने से पहले उसने खुदा को याद किया और बोला, "ला इलाहा इल्लल्लाह मोहम्मद रसूलुल्लाह।" उस डाकू के चेहरे का भाव देख, और उसकी आवाज़ के कंपन ने पिताजी और उनके साथियों को अंदर से हिला दिया।

इसके बाद उस हॉल में इतना सन्नाटा था कि बयान नहीं किया जा सकता। मौत का डर उसकी आँखों में साफ़ महसूस हो रहा था। जल्लाद ने इशारा पाते ही उसे फाँसी पर लटका दिया। फिर एक और गहरा सन्नाटा था। सबकी हालत और ख़राब हो गई थी। सब उठे और चल दिए। आपस में बात करने की भी हिम्मत किसी में नहीं बची थी कि फाँसी पर चर्चा कर लें।

पिताजी के अनुसार, कई रातों तक वह फाँसी उनके सपनों में आई। दहशत में आ जाते थे जब भी वह नज़ारा सपने में आता था। पिताजी के अनुसार, उस फाँसी की चर्चा फिर कभी ऑफिस में नहीं हुई। पिताजी के चेहरे पर वह दहशत दिखाई दे रही थी। हम भी खामोश थे, अपनी जगह चिपक गए हों जैसे। थोड़ी देर बाद माँ ने वह सन्नाटा तोड़ा और कहा, "चलो खाना खाओ।" आज भी जब मैं लिख रहा हूँ, सन्नाटा आज भी याद आ रहा है।

24. परिवार में नया आगमन: मेरी दीदी का जन्म

माँ बताती थीं कि जब पिताजी को पता लगा कि दीदी होने वाली थीं, तो वे बहुत खुश थे। अभी तक हमारे ख़ानदान में कोई भी बच्चा अस्पताल में पैदा नहीं हुआ था; सब घर में ही दाई के हाथ से पैदा होते थे। लाखों विरोध होने के बाद भी पिताजी ने माँ को अस्पताल में भर्ती कराया था। पूरे घर में हंगामा हुआ, पर सब एक तरफ और पिताजी एक तरफ। 10 नवंबर को दीदी पैदा हुईं। बाक़ी सब तो मुँह लटकाए थे, पर पिताजी खुश थे कि उनको लड़की हुई थी।

दीदी की ख़ास देखभाल होती थी। जब माँ दीदी को लेकर शहर-ए-लखनऊ आईं, तो पिताजी के पूरे ग्रुप ने खुशी मनाई। बप्पा अक्सर घर के बाहर जाते तो दीदी को सजा-धजा कर ले जाते थे। दीदी को प्यार से सब 'गुड़िया' कहते थे। वह बप्पा की भी और पिताजी की भी लाड़ली थी।

25. मेरा जन्म: पीलिया का संघर्ष और बप्पा का सहारा

मेरा जन्म शायद तब हुआ था जब पिताजी सचिवालय में नौकरी कर रहे थे और बप्पा मुंशीब नहीं बने थे। उन दिनों दोनों दोस्तों में कुछ अनबन भी चल रही थी। पिताजी खुद बताते थे कि जब मैं पैदा हुआ तो पीलिया से ग्रसित था। माँ को भी पीलिया था। मैं अलग वार्ड में था और माँ अलग वार्ड में थीं। लखनऊ के मेडिकल कॉलेज में पिताजी पर एक साथ दो लोगों की देखभाल करने की ज़िम्मेदारी थी। दादी और बुआ घर पर थीं, पर बाहर संभाल नहीं सकती थीं।

मेरे पैदा होने पर जब दादी मुझे देखने आईं और घर पहुँचीं, तो जीना चढ़ते हुए रुक गईं। बप्पा को देखकर रोने लगीं। बप्पा ने पूछा, "क्या हुआ अम्मा?" तो उन्होंने पूरा किस्सा बताया। वह झट से उठे और मेडिकल कॉलेज पहुँचे। पिताजी से मिले। मैं गांधी वार्ड में था और माँ क्वीन मैरी में थीं। मेरी आँखों पर पट्टी लगी थी और पिताजी को एक रुई का बंडल पकड़ा दिया गया था, जिसे अगर मैं टट्टी और सुसु करता तो पोंछते रहने को कहा गया था।

बप्पा पहुँचे तो न हाल न चाल। बप्पा ने पूछा, "पैसे हैं तुम्हारे पास?" पिताजी बोले, "लाए हो तो दे दो।" पिताजी ने पैसे लिए और रुई का बंडल बप्पा को पकड़ा दिया और बताया, "जब यह टट्टी-सुसु करता तो पोंछ देना। दो दिन से सोया नहीं था।" "आराम करके वापस आ जाऊँगा।" बस यही कहकर पिताजी निकल लिए। बप्पा काफी देर तक रहे। देर रात जब पिताजी वापस आए, तब वे वहाँ से हटे। यह बप्पा की दोस्ती और संकट में साथ निभाने का एक अद्भुत उदाहरण था।

26. मेरे छोटे भाई का आगमन

पिताजी बताते थे कि उनके समय पर नारा था 'हम दो और हमारे तीन'। इसी फ़ॉर्मूले के तहत एक दिन हमारा छोटा भाई आ गया। मुझे याद है कि हम क्वीन मैरी हॉस्पिटल गए थे, जहाँ माँ भर्ती थीं और साथ में एक बच्चा भी था। लोग बता रहे थे, "तुम्हारा एक भाई आया है।" घर पर भी सब खुश थे। बाक़ी मुकुल (भाई का नाम) के पैदा होने से संबंधित ज़्यादा किस्से मुझे याद नहीं थे।

27. बच्चों के नाम: 'उल' की परंपरा

सभी चाचाओं की शादियाँ हो गईं और जब हमारे अलावा बाकी चचेरे भाई हुए, तो उनके नाम पिताजी ने ऐसे रखे कि सभी लोग एक साथ खड़े हों तो एक ही परिवार के लगें। जैसे कि मेरे नाम की शुरुआत 'राहुल' से होती है, जिसके अंत में 'उल' है। फिर छोटे भाई का नाम 'मुकुल' है, उसके भी नाम में 'उल' है। फिर बाकी भाइयों के नाम भी वैसे ही रखे गए, जिनमें अंत में 'उल' आए: राहुल, मुकुल, बिपुल, अंशul, अतुल और सबसे लास्ट में मृदुल।

28. दादी का हादसा: खदरा में एक भयावह शाम

मुझे एक किस्सा याद है जब हम खदरा में रहते थे। दादी को गाँव से आना था। हम सब उनका इंतज़ार कर रहे थे। देर काफ़ी हो गई थी, पर वे अभी तक पहुँची नहीं थीं। हम सब अपनी साइकिल लेकर निकलने ही वाले थे कि अचानक देखते क्या हैं – रिक्शेवाला और दादी खून से लथपथ दिखे। सभी उन्हें देखकर घबरा गए। दोनों को ऊपर घर लाया गया। पड़ोस में खान अंकल रहते थे, उन्हें जल्दी से बुलाया गया। वे मेडिकल कॉलेज में ही थे। जल्दी से दोनों का प्राथमिक उपचार हुआ। रिक्शेवाले को थोड़ी ज़्यादा चोट आई थी। पिताजी ने उसकी दवा-पट्टी करवाने के बाद थोड़े और पैसे देकर विदा किया। रिक्शेवाला बताने लगा कि कहीं मेडिकल कॉलेज के पास एक ढलान थी, रिक्शा वहीं से डिसबैलेंस हो गया और सामने की रेलing से टकरा गया। दोनों गिर गए और घायल हो गए।

29. पहला टेलीविज़न: एक अनमोल उपहार

एक बार की बात है जब रामायण आया करती थी। हम रामायण देखने के लिए दूसरों के घर जाया करते थे। कभी-कभी कुछ और भी देखने हम बिन बुलाए उनके घर पहुँच जाते थे। उस समय टीवी ऐसी जगह रखी जाती थी जहाँ से काफ़ी लोग देख लें। खदरा में एक नेता जी का भी घर था, उनकी खिड़की हमारे घर की छत पर खुलती थी। हम खिड़की से झाँक कर रामायण देखते थे। ऐसे ही किसी रोज़ हम किसी के घर टीवी देख रहे थे, और जिनके घर टीवी देख रहे थे, उन्होंने टीवी बंद कर दी। हम उठे और चल दिए। कुछ दिनों के बाद फिर हम गए तो उन्होंने हमें भगा दिया। हम जब भी जाते, वे हमें टीवी देखने ही न देते। बाकी लोगों के लिए टीवी सुलभ था। अब कॉलोनी में काफ़ी लोगों के पास टीवी आ चुका था। उन दिनों पिताजी से कुछ भी डिमांड करना बहुत ही ख़तरनाक था। एक दिन हमने हिम्मत करके पिताजी से बोला कि "आप हमारे लिए टीवी क्यों नहीं ले आते हैं? यहाँ तो अब काफ़ी लोगों के पास टीवी थी।" पिताजी ने डाँटकर हमें भगा दिया। हम रोते हुए उनसे दूर चले गए। माँ ने आँसू पोंछे और बोला कि "एक दिन अपने घर भी टीवी आएगा।"

कुछ दिनों के बाद देखते क्या हैं, पिताजी अपने साथ एक टीवी लेकर आ रहे हैं! उस दिन खुशी का कोई ठिकाना ही नहीं था। टीवी सेटअप किया गया, एंटीना सेटअप किया गया। टीवी ऑन हुआ तो शायद चौपाल आ रहा था। टीवी को देखकर हम इतने एक्साइटेड थे कि सारे प्रोग्राम देखे जाते थे। उस समय हम 9 बजे तक सो जाते थे। हम टीवी ऑन करके सुबह और शाम दोनों बैठ जाते थे। कुछ नहीं भी आता था, जो भी आता, हम टीवी देखते थे। पिताजी द्वारा दिया गया यह हम तीनों के लिए सबसे बड़ा उपहार था।

30. 31 मार्च की रात: पिता का अनमोल उपहार

31 मार्च की रात हमारे लिए बहुत ही रोचक रात हुआ करती थी। पिताजी फाइनेंस डिपार्टमेंट में थे, और 31 मार्च की पूरी रात वे ऑफिस में रहते थे। तड़के वे घर आते थे। हम तीनों बहुत एक्साइटेड रहते थे कि पिताजी देर रात जब आएँगे तो पकवानों से भरा लंच बॉक्स लाएँगे। देर रात में पिताजी को डिनर भी मिलता था, तो वे खुद नहीं खाते थे, वे हमारे लिए लेकर आते थे। वह ज़माना नहीं था कि हम बाहर जाकर लंच या डिनर करें। दावत के नाम पर बताशे और टिक्कियाँ हुआ करती थीं। सुबह नींद खुलते ही उस डिब्बे की तलाश होती थी। उस डिब्बे में कई तरह की सब्ज़ी, पूड़ी, पुलाव और मीठा भी होता था। हम तीनों बाँटकर खाते थे। आज यह बहुत ही सामान्य सा लगता है, पर उन दिनों पिताजी जो लेकर आते थे, उसका मज़ा ही कुछ और होता था।

31. समय पर घर वापसी: परिवार और ईमानदारी

पिताजी अक्सर समय पर ऑफिस जाते और समय पर वापस आ जाते थे। उनका ऑफिस से देर से आना बहुत ही दुर्लभ था। पर मैं अक्सर पिताजी के दोस्तों को देखता था कि वे बहुत देर से ऑफिस से आते थे। तब पिताजी हमें बताते थे, "मुझे सबसे ज़्यादा अच्छा लगता है अपने परिवार के साथ समय बिताना। भरा-पूरा परिवार है हमारा। जिन्हें खूब कमाना है या कहीं 'ऊपर की कमाई' करनी है, वे देर से आते हैं, फाइल फँसा लेते हैं, फिर लोग मोलभाव करने के लिए देर रात में सक्रिय होते हैं। मुझे तो सुकून की नींद चाहिए। आता हूँ और सुकून से सो जाता हूँ। बुआ, बच्चे ठीक से निकल जाएँ और क्या चाहिए।"

32. राम कुमार मामा: अपराध से सम्मान तक का सफ़र

हमारे पड़ोस में एक मामा रहते थे जिनका नाम राम कुमार था। मामा मम्मी को बहुत सम्मान देते थे। मम्मी के हर कष्ट में हमेशा साए की तरह रहते थे। नानी और बाकी मामा को भी हमेशा मम्मी से खूब सम्मान मिला। पिताजी एक किस्सा बताते हैं कि कभी मामा की संगति कुछ बुरे लोगों के साथ हो गई और वे अपराध की दुनिया में चले गए। पिताजी को जब यह पता लगा तो उन्होंने हर संभव प्रयास किया उन्हें इससे बाहर निकालने का। कभी प्यार से समझाया और कभी गुस्से से। एक बार की बात है जो कि मामा खुद ही बताते थे कि एक बार मामा कोई अपराध के लिए जा रहे थे। तभी अचानक पिताजी रास्ते में मिल गए। पिताजी को एहसास हुआ कि कुछ गड़बड़ है। पिताजी उन्हें पकड़ कर घर ले आए और समझाया कि "इस दुनिया में मत जाओ, वापसी संभव नहीं है।" उन्होंने मामा के लिए एक दुकान भी खुलवाई ताकि वे उसमें व्यस्त हो जाएँ और अपराध की दुनिया से दूर हो जाएँ। मामा ने भी अपराध की दुनिया छोड़ दी और एक बैंक में कैश ट्रांसफर करने वाली एजेंसी में नौकरी शुरू की। मामा दबंग तो थे ही, और उस नौकरी में उनका यह टैलेंट भी काम आया। मामा पिताजी का खूब सम्मान करते थे और अगर पिताजी ने कुछ बोल दिया तो वे ऐसे सुनते थे जैसे कोई बच्चा डर के मारे अपने घर के बड़ों की बात सुनता हो।

33. पिताजी की प्रिय कविताएँ

पिताजी हमें कुछ कविताएँ अक्सर सुनाया करते थे, जिनमें से एक थी:

'टुकड़े टुकड़े हो जाए चाहे हर एक इंसान के, टुकड़े न हम होने देंगे हरगिज़ हिंदुस्तान के। कश्मीर है देश हमारा, यह है मेरे प्राणों से प्यारा, बच्चे बच्चे का है नारा, खून उबलता है सीने में भारत के हर नव जवान के, टुकड़े टुकड़े हो जाए चाहे हर एक इंसान के, टुकड़े न हम होने देंगे हरगिज़ हिंदुस्तान के। अरे जिया यह तानाशाही यहाँ न चलने पाएगी, राजू जी की आगे तेरी दाल न गलने पाएगी। टुकड़े टुकड़े हो जाए चाहे हर एक इंसान के, टुकड़े न हम होने देंगे हरगिज़ हिंदुस्तान के। जैसे टुकड़े करे तमोली जैसे समूचे पान के, जैसे टुकड़े दर्ज़ी करता कपड़े के हर थान के, जैसे टुकड़े चिकवा करता बकरी की संतान के, वैसे टुकड़े कर दूँगा मैं, देशद्रोही बेईमान के।'

और एक थी:

'बलिदान सिंह का नो होते सुना बकरे बलिबेदी चढ़ाए गए। कभी टेढ़े पेड़ न काटे गए, सदा सीधे पे आरे चलाए गए। विषधारी को दूध पिलाया गया, केंचुए कटिए में फँसाए गए। बलवान का बाल न बाँका हुआ, बलहीन ही सदा सताए गए।'

और एक अन्य कविता थी:

'मानव ने पत्थर पूजे हैं, मानव को कब कौन पहचान सका। पत्थर नहलाए जाते हैं मधु, गुड़ और घी से, पर एक भीखमंगिन का बेटा दो बूँद नहीं पाता तन को। श्रृंगार नहीं पूरा होता है इन मंदिर के पाषाणों का, पर किसी निर्धन को वस्त्र नहीं मिलता तन ढकने को। इंसान उठो, फेंको पत्थर अब मानव का पूजन होगा।'

हमें यह तो नहीं पता है कि मूल रूप से यह किसने लिखी है, पर हमें ये बचपन से याद थीं। दीदी तो इसका पाठ स्कूल में भी करके आई थीं और वाहवाही भी खूब मिली थी।

34. पिताजी की सीख: आशा, दौलत और चरित्र

पिताजी अक्सर हमें कुछ सीख दिया करते थे, जिनमें से एक थी: "आशा की माता, दौलत का बाप, न होते को दोस्त, होते को भाई, और बिगड़े पे औरत चली जाती है।" पिताजी हमें यह समझाते थे कि माँ हमेशा अपने बच्चों के लिए आशावान रहती है, जबकि पिता हमेशा यह देखता है कि बच्चा कितना कमा रहा है या कमा पाएगा, या बच्चे को कितना पैसा चाहिए – उसका प्रेम दौलत के नज़दीक होता है।

वे यह भी कहते थे कि जब आप कुछ बन जाओगे तो रिश्तेदार तुम्हारे आगे-पीछे भागेंगे और तुम्हारा सम्मान करेंगे। और सबसे महत्वपूर्ण सीख यह थी कि अगर तुमने चरित्र खो दिया या व्यभिचारी हो गए तो दुनिया की कोई भी औरत जो तुम्हारी पत्नी है, तुम्हें छोड़कर चली जाएगी। जब भी पिताजी खाली होते और अच्छे मूड में होते, तो वे हमें यही बातें सुनाते थे।

35. बड़े चाचा का विवाह: एक दिन की बारात का नया चलन

मेरे पैदा होने के बाद बड़े चाचा की शादी हुई थी। बड़े चाचा की शादी का किस्सा तो बड़ा मजेदार था। मेरे बाबा ने चाची की शादी पास के मानिकपुर से तय कर दी थी। पिताजी का विरोध था कि जब तक उनका भाई राम कृष्ण कमाने नहीं लगता, तब तक उसका विवाह नहीं होगा। पर गाँव और समाज के दबाव में मेरे बाबा ने उनका विवाह फाइनल कर दिया।

अब जब फाइनल हो गया तो बाकी चीज़ें भी तय हुईं। तय यह हुआ कि बारात 5 दिन की होनी थी। पिताजी ने इसका विरोध किया, "इतनी छुट्टी लेकर कौन आएगा।" तब प्रस्ताव आया कि 3 दिन का कर लिया जाए। पिताजी ने कहा, "विवाह एक दिन का होगा। बारात जाएगी, एक रात रुकेगी और दूसरे दिन वापस आएगी।" लड़की वाले बोलने लगे, "क्या बोलेगा समाज कि मास्टर साहिब की औकात ही नहीं कि बारात को कुछ दिन खिला सके।" पिताजी की ज़िद के आगे किसी की न चली और फिर एक दिन की बारात फाइनल हुई।

हम बारात लेकर पहुँचे। अच्छे से स्वागत हुआ और विवाह संपन्न कर दूसरे दिन वापस आ गए। गाँव के लोग पिताजी को खूब उल्टा-सीधा बोलते थे, पर पिताजी कोई जवाब नहीं देते थे। उसके बाद गाँव में भी 1 दिन की बारात का चलन शुरू हो गया। यह पिताजी के व्यावहारिक स्वभाव और समाज में उनके बढ़ते प्रभाव को दर्शाता था।

36. छोटी बुआ का विवाह: एक अप्रत्याशित इंतज़ार

छोटी बुआ की शादी का किस्सा तो और ही गज़ब था। छोटी बुआ की शादी खुटहना, बहराइच में तय हुई थी। लड़का पढ़ाई ही कर रहा था। पिताजी जब शादी देखने गए थे तो वहाँ के लोग काफी पिछड़े हुए थे। सिर्फ एक ही लड़का पढ़ाई कर रहा था, बाकी लोग सिर्फ खेती पर निर्भर थे। वे बस इतना चाहते थे कि लड़का पढ़ जाए फिर जुगाड़-पानी से उसके रोज़गार की व्यवस्था करवा दी जाएगी। लड़का पढ़ने में ठीक था, तो शादी तय हो गई थी।

शादी का दिन आया। गाँव में पहली बार शादी के लिए स्टैंडर्ड व्यवस्था की गई थी। पहले सबको ज़मीन पर बैठा कर खिलाया जाता था पर इस बार टेंट लगा था और टेबल-चेयर का इंतज़ाम था। बारात का इंतज़ार चल रहा था और शाम हुई, बारात का कोई अता-पता नहीं था। रात हुई, बारात का अभी तक कुछ पता नहीं था। घर में मातम जैसा माहौल था। पहली बार पकवान में कुछ नए व्यंजन ऐड किए गए थे, जैसे कोफ़्ता। मैं बहुत छोटा था, मुझे कुछ याद नहीं था, यह सब पिताजी, दीदी, मम्मी बताया करती थीं।

चारों तरफ रिश्तेदार दौड़ाए गए, पर कोई ख़बर नहीं। काटो तो खून नहीं। लड़की सजी-धजी बैठी थी, पर बारात का पता नहीं था। उन्हीं दिनों में गाँव की कुछ दबंगों से हमारे परिवार का पंगा चल रहा था। गाँव में हम तरक्की पर थे और बाकी लोगों को यह देखा नहीं जा रहा था। डर और बढ़ गया था कि कहीं उन दबंगों ने तो कुछ नहीं किया।

तभी अचानक सुबह 4 बजे ख़बर आई कि बारात आ गई थी। घर में खुशी का माहौल फिर से दौड़ पड़ा। रात किसी ने खाना नहीं खाया था। सारी व्यवस्था अस्त-व्यस्त हो गई थी। खाना ठंडा हो गया था। जैसे-तैसे बारात का स्वागत किया गया और विवाह संपन्न हुआ। तब जाकर सबकी जान में जान आई थी।

37. बप्पा की मुंशीब में सफलता और उनका विवाह

एक दिन खुशखबरी आई कि बप्पा का मुंशीब में हो गया! फाइनल जॉइनिंग के लिए उन्हें लखनऊ से बाहर जाना होगा। पिताजी खुश तो बहुत थे – अपनी नौकरी के बाद अगर वे सबसे ज़्यादा खुश थे तो वह बप्पा की नौकरी लगने की थी। पिताजी अक्सर बताते थे कि बप्पा का जज बनने का सपना उनका जुनून था, जिसके लिए उन्होंने दिन-रात एक कर दी थी। जब उन्होंने अपनी मेहनत से उसे पा लिया, तो पिताजी की खुशी का ठिकाना न रहा।

पिताजी बप्पा के विवाह की एक बात और बताते थे। बप्पा हरदोई के रहने वाले थे। पिताजी उनकी शादी में गए थे। बारात में सब खूब नाचे और एंजॉय किया। जब पालकी घर की तरफ बढ़ रही थी, तब बप्पा ने अम्मा का घूँघट उठा दिया और कहा, "कैलाश, देख तेरी भाभी!" अम्मा शर्मा गई थीं। यह पल उनकी दोस्ती की गहराई और उनके बीच के खुलेपन को दर्शाता था।

38. छोटे भाई का दबंग रूप और पिताजी का दूरदर्शी प्रयास

गाँव में दुश्मनी थी और पिताजी गाँव में न रहकर लखनऊ में रहा करते थे। घर को दबंगों से रक्षा करने के लिए पिताजी के छोटे भाई, जो तीसरे नंबर पर थे, दबंग बने। उनकी छवि दबंग की थी। जब भी उन्हें कोई हमारे परिवार को परेशान करता या सुरक्षा के लिए खतरा बनता, तो वे उसे घर में घुस कर मारने की क्षमता रखते थे। जब भी वे घर से बाहर निकलते, तो अपने आप को तैयार रखते कि कभी भी हमला हो सकता है। उनके दोस्त-यार भी उनके साथ रहते थे। ऊँची आवाज़ में उनसे कोई बात नहीं कर सकता था। थोड़ा बहुत डरते थे तो सिर्फ पिताजी से।

10वीं की परीक्षा तो उन्होंने कई बार दी, पर पास होने में उन्हें बरसों लगे थे। उनका दिमाग सिर्फ पढ़ाई में नहीं लगता था, बाकी कामों में नंबर 1 थे – किसी को कोई मदद करनी हो, कहीं कुछ पंगा हुआ हो, या कोई तकनीकी काम हो। जहाँ कोई और काम नहीं आता था, वहां निवास (जिन्हें प्यार से लोग 'बघौवा' कहते थे) ही काम आते थे। जब किसी तरह उन्होंने 10वीं पास की, तब उनकी नौकरी घर के पास ही लगी। अब वे हर जगह हिट थे – घर में भी और बाहर में भी। पिताजी को अब सुकून हुआ कि "चलो, अब इसकी भी ज़िंदगी संभल गई।"

39. फीस का किस्सा: चाचा की नादानी और पिताजी का गुस्सा

पिताजी अक्सर हम तीनों को बोलते थे कि अगर तुम पढ़ाई नहीं करोगे तो तुम्हें हम छत से नीचे लटका देंगे। अक्सर हमारे बड़े चाचा और छोटे चाचा की पिटाईयों के किस्से आम थे, जिसमें वे बताते थे कि कैसे उनसे सब डरते थे और उनके डर से उनके भाइयों में कुछ पढ़ाई की और बाद में नौकरी लगी। एक किस्सा है जो हमारे छोटे चाचा जी का है, वे बड़े मुस्कुराते हुए बताते थे। एक बार की बात है जब हमारे छोटे चाचा यानी निवास चाचा का नाम स्कूल से कट गया। कुछ दिनों बाद जब पिताजी गोंडा अपने घर गए तो दादी ने बताया कि निवास का नाम स्कूल से कट गया है। वजह पूछी तो पता लगा कि स्कूल की फ़ीस जमा ही नहीं हुई थी, इसलिए नाम कट गया।

पिताजी हैरान थे कि फ़ीस तो पिताजी ने उन्हें खुद दी थी कि जमा कर देना। तो नाम कैसे कट गया? जब पिताजी ने चप्पल उठाई और पीटना शुरू किया, तो बाद में पता चला कि उन्होंने अपनी स्कूल की फ़ीस मेरे मुंडन (जो अयोध्या में हुआ था) की न्यौछावर में डाल दी थी। अब न्यौछावर में डालने के बाद फ़ीस कहाँ से जमा करते! बस इतना बताना था कि क्या हुआ, कुटाई थोड़ी और बढ़ गई। बाद में पिताजी ने फिर से पैसे दिए और फ़ीस जमा हुई।

40. भाइयों और रिश्तेदारों को शिक्षा व रोज़गार

उन दिनों डिग्री के हिसाब से भी लोगों को नौकरियाँ मिल जाती थीं। पिताजी ने अपने भाइयों को पढ़ाई करने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने अपने छोटे भाइयों को पढ़ाया और पढ़ाई पूरी करने पर उनकी योग्यता के हिसाब से नौकरियाँ लगवाईं। चाचा तो थे ही, साथ में दोनों फूफाओं की भी नौकरी लगवाई। इन सबकी नौकरी लगवाने के लिए पिताजी को काफ़ी संघर्ष करना पड़ा। पहले तो इन लोगों पर पढ़ने का दबाव डाला कि वे पढ़ें। कोई पढ़ने को तैयार नहीं था – पिताजी ने 'शाम, दाम, दंड, भेद' सब इस्तेमाल किया। आख़िर में सबने किसी तरह से पढ़ाई की और बाद में उनकी योग्यता के हिसाब से नौकरी लगी।

जब तक पिताजी इस स्थिति में रहे, उन्होंने अपने समाज और अपने परिवार का कल्याण करने की कोशिश करते रहे। अगर किसी की नौकरी न लगवा पाए, तो उन्हें मार्गदर्शन ज़रूर दिया।

41. पत्रों में झलकती चिंता: परिवार के प्रति समर्पण

पिताजी द्वारा लिखी गईं कुछ चिट्ठियाँ देखीं, उनमें नाना जी को लिखी चिट्ठियाँ भी थीं। उनमें वे नाना जी के स्वास्थ्य को लेकर चिंतित दिखे थे। एक चिट्ठी में उन्होंने लिखा था कि नाना जी की तबीयत ख़राब थी और किसी टेस्ट की वजह से उन्हें दवाइयाँ नहीं मिल पा रही थीं। तो उन्होंने लिखा कि कुछ दिनों में वे घर (यानी मेरी नानी के घर) आएँगे तो उनका टेस्ट करवा देंगे जिससे उनको दवाइयाँ मिल सकें। हर चिट्ठी में वे उनका हाल-चाल लेते हुए नज़र आ रहे थे, साथ में मेरी माँ, जो उन दिनों नाना जी के घर में थीं, उनको भी आयरन की दवा लेने की सलाह दे रहे थे, कि वे दवा खा लें जिससे उनका स्वास्थ्य ठीक हो जाए।

कुछ चिट्ठियाँ मौसी के नाम भी थीं, जिनसे उनके और जीजा जी के बीच अच्छे संबंध झलकते थे। वे अक्सर उन्हें बाकी लोगों का ख़्याल रखने को बोल रहे होते थे।

वो गुज़रा हुआ कल नहीं गया — वो हमारे शब्दों में आज भी ज़िंदा है।

कॉलेज के दिनों की साथी: चंद्रिका चाट की टिक्की

लखनऊ के कॉलेज के दिनों में, हॉस्टल में रहते हुए खुद से खाना बनाना एक चुनौती थी, खासकर पढ़ाई और काम के साथ। पिताजी बताते थे कि जब भी खाना बनाने का मन नहीं करता था, तो उनकी भूख का सहारा बनती थी, पुराने लखनऊ की मशहूर 'चंद्रिका चाट'

चंद्रिका जी बड़े से 'झाबे' (टोकरी) में टिक्की का सारा सामान लिए रहते थे और वहीं स्टोव जलाकर गरमा-गरम टिक्की बनाते थे। यह आम टिक्की नहीं थी – यह मटर की टिक्की थी, जिसमें 'सोहल' (एक तरह की मटर) और कुछ घर के बने सूखे मसाले डाले जाते थे। टिक्की का स्वाद इतना ज़बरदस्त था कि संघर्ष के उन दिनों में यह सादगी भरा भोजन भी किसी शाही दावत से कम नहीं लगता था।

यह टिक्की सिर्फ़ पेट भरने का साधन नहीं थी; यह उनके संघर्ष के दिनों की साथी थी। पिताजी के जाने के बाद भी यह परंपरा कायम है। जब भी हम पुराने लखनऊ से गुजरते हैं, तो उनकी याद में यह टिक्की ज़रूर लेकर आते हैं। अब चंद्रिका जी के बेटे यह दुकान संभालते हैं, और उन्हें फ़ोन करके जाने पर वे ख़ास हमारे लिए गरमा-गरम टिक्की तैयार रखते हैं। इस टिक्की का स्वाद आज भी वैसा ही है, जैसा पहले था — यह सिर्फ़ चाट नहीं, हमारे परिवार की एक मीठी याद है।

Friday, June 6, 2025

मेरी सौ हाँ पर एक ना भारी

जिनके साथ हम बरसो रहे। हमसाया न सही हमदम रहे। हर हर बार की हाँ, बस एक बार की ना, बरसो का भरोसा पंछी की तरह फुर्र से उड़ गया। 

अब ऐसे अनजान से फिरते है जैसे कभी कोई नाता ही न रह हो। दिन रात बिताये जिनके साथ आज अजनबी है। 

कभी जिन्होंने इतनी भी जगह नहीं दी कि कोई और आ सके। और आज फासला इतना कि पूरी दुनिया समाए। 

कभी हर पल का हिसाब होता था,  आज हर पल बेहिसाब है।कभी आते थे आंधी की तरह और जाते थे तूफान की तरह। और अब खामोश है, कोई हलचल ही नही। 

रूठे हुए को तो मनाया जा सकता है पर नफरत करने वालो से बात नहीं की जा सकती। 

जब आप किसी के लिए आसान हो जाते हो तो वह खुद को कठिन बना लेता है। 

खैर ज़िन्दगी है, लोग मिलते और बिछड़ते रहेंगे, खिड़कियां खुली रखो ठंडी हवा एक दिन जरूर आएगी। 

Tuesday, April 29, 2025

एक स्टेटस जिसने ज़िन्दगी का रुख ही बदल दिया

एक रिश्ते में टिकट क्यों नहीं हो, इतने सस्ते हो तो फिर बिकते क्यों नहीं हो, प्यार, अदब, तहज़्ज़ेब सलीका, ये ढोंग क्यों जैसे हो वैसे दिखते क्यों नहीं हो!

मेरे ही मित्र ने मेरे लिए कभी अपने व्हाट्सएप स्टेटस में लगाया था। थोड़ी नाराज़गी क्या हुई पूरा का पूरा मेरा चित्रण ही बदल गया। 
ठहर कर मुझे अपने आप के बारे में सोंचने पर मजबूर कर दिया। यदि में सरल दिखता हूँ तो क्या बाकी लोग मेरे लिए कठिन बन जाएंगे। 
आति हर चीज़ की बुरी होती है चाहे वह प्रेम हो या मित्रता। जब ज़्यादा शुद्ध मिलने लगता है तो देखा गया है कि उसे पाचन उतना ही मुश्किल हो जाता है। 

अब मैं कभी किसी के लिए इतना सुलभ नही रहूंगा। ढोंग शब्द कही मेरे दिल मे एक कील की तरह चुभ गया है। कोशिश है कि कभी यह कील मेरे दिल से निकल जाए। 

Sunday, February 16, 2025

एक प्रेम कहानी - शक्ति में भक्ति

कॉलेज के दिनों के दो दोस्त बहुत मशहूर थे अपनी दोस्ती के लिए।  वे थे, रोहित और अमित। दोनो इतने घनिष्ट मित्र थे कि एक दूसरे के बिना रह नही सकते थे। जहां अमित जाता वही रोहित भी,  दोनो भाई की तरह हमसाये थे, शोले नई नही आई थी, जय और वीरू की उपमा रोहित और अमित से की जाती थी। 
कॉलेज खत्म हुआ तो दोनों ने एक दूसरे से वादा किया कि जब भी उनकी शादी होगी, अगर किसी को लड़का हुआ और दूसरे को लड़की, तो दोनों ज़िन्दगी भर के एक रिश्तेदार बन जाएंगे। फिर वो कभी भी एक दूसरे से अलग नही होंगे। क्योंकि रिश्तेदार बिछड़ते नही है। 

कॉलेज के बाद दोनों अपनी अपनी मंज़िल की तरफ बढ़ चले, दोनो सरकारी नौकरी करने लगे, नौकरी के बाद दोनों की शादी हुई, अब दोनो को इंतज़ार करने लगे कि कौन पहले बाप बनेगा। 
रोहित ने जल्दी ही अमित को खुशखबरी दी कि वह बाप बनाने वाला है। अब दोनों ईश्वर से प्रार्थना कर रहे थे कि लड़का हो नही तो बड़ी लड़की से छोटा लड़का शादी नही करेगा। 
प्रसव के दिन आ गया, अमित पहली गाड़ी पकड़ रोहित के घर आ गया। दोनो अस्पताल के बाहर इंतज़ारकर रहे थे कि रिजल्ट क्या होगा। तभी नर्स आयी और बोली कि दिव्या के पति कौन है?
तभी अमित, रोहित हो बुलाता है कि उसे नर्स बुला रही है। रोहित को नर्स अपने साथ ले गयी, थोड़ी देर बाद जब रोहित बाहर निकल तो खुशी में चिल्लाता हुआ बोला, बेटा हुआ है। 
अमित की भी खुशी का कोई ठिकाना नही था।

अबकी बारी थी अमित की, लाख कोशिशें करने के बाद उसे संतान की प्राप्ति नही हो पा रही थी। देश के कोने कोने में घूम घूम कर थक गए थे। पर कुछ हासिल न हुआ। तभी एक आयुर्वेदिक डॉक्टर मिला जिसने उनके अंदर उम्मीद जगाई की वह कुछ कर सकता है। 

इलाज चालू हुआ। रिजल्ट आने में 6 महीनों से ज़्यादा लग गए। पर एक दिन खुशखबरी आयी की अब अमित भी बाप बनाने वाला है। रोहित मिठाई की पूरी टोकरी लेकर अमित से मिला।
अब इंतज़ार था कि लड़का होगा या लड़की?
घड़ी की सुनियाँ जैसे जैसे आगे बढ़ रही थी, दिलो की धड़कन भी उतनी ही तेज़ थी। 
तभी फिर से वही मंज़र दोहराया गया, नर्स आयी और बोली, कामना के पति कौन है। अमित भागता हुआ गया, थोड़ी देर बाद वापस आया है चिल्ला कर बोला।

बेटी हुई है.....
अब से हम समधी..
दोनो दोस्तो में खुशी का कोई ठिकाना नही रह।
मिठाइयां बटवाई गयी। 
छट्ठी बरही में क्या धूम थी बिटिया की। 
दोनो दोस्तो के परिवार वाले इकट्ठा थे, सबको बताया गया कि जब दोनों बच्चे बड़े हो जाएंगे तो हम दोनों की शादी करा देंगे और हम समाधी बन जाएंगे। 
वक्त बीत रहा था अब दोनों दोस्त अपने अपने कामो में व्यस्त हो गए, और बच्चे भी धीरे धीरे बड़े हो रहे थे। साल में एक दो बार परिवार इकट्ठा हो जाता था। 

बच्चो को अभी अहसास नही था कि दोनों की शादी पहके से तय है, दोनो दोस्त की तरह बड़े हो रहे थे। तभी अमित का ट्रांसफर कही दूर दूसरे प्रदेश में हो गया। अब दोनों का मिलना बहुत ही मुश्किल हो गया था। 
राघव जो कि लड़के का नाम था और शिखा लड़की का नाम है। राघव पढ़ने में तेज़ और होशियार था। जबकि शिखा नाज़ों से पाली थी, हर नखरे उठाये गए थे, नखरीली थी, पढ़ना तो उसके बस की बात नही थी, राजकुमारी की तरह पाली होने के कारण उसके मिज़ाज़ भी गर्म थे। 
उधर राघव तेज़ तर्रार, बुद्धिमान था , घर के सामने रहने वाले कपिल को राघव से बहुत ज़्यादा प्रतियोगिता थी। नंबर दोनो के ठीक ही आते थे, राघव अपनी पढ़ी पूरी कर रात में अपने कमरे की लाइट जल कर दूसरे कमरे में सो जाता था। कपिल को अक्सर लगता था कि राघव रात भर पड़ता है तो वो भी रात भर पड़ता था। सुबह स्कूल में कपिल को नींद आती रहती थी। और राघव बड़े आराम से दोस्तो के साथ मस्ती करते हुए क्लास करता था। 
राघव ने पढ़ाई पूरी की, और इंजीनियरिंग करने के बाद नौकरी की तलाश करने लगा, तभी रोहित ने एक दिन राघव को बताया कि उसकी शादी तय कर दी थी उसके बचपन मे ही,  लड़की का नाम शिखा है। 

तभी राघव ने बोला वही अमित अंकल की बेटी शिखा, रोहित ने बोला हाँ वही। राघव ने बोला लड़की ठीक है पर उसे पसंद नही है पत्नी के रूप में। रोहित गुस्से से आग बबूला हो गया। राघव को खूब खरी खोटी सुनाई, और बोला तुम्हारी शादी तो वही होगी, जल्दी से नौकरी ढूंढो और शादी करो। इसके अलावा कुछ नही सुनना है। 
राघव ने नौकरी की तलाश जारी की, पर नौकरी थी जो कि मिल ही नही रही थी। साल भर बीत गया नौकरी हाथ न लगी पर प्रयाश जारी रहा। 

रोहित ने अमित से मिलकर, रश्मो पर चर्चा करने के लिए उसके घर पहुँचा, साथ मे राघव की चचेरी बहन इंदिरा भी थी। जब परिवार इकट्ठा हुए तो इंदिरा ने अपनी होने वाली भाभी से कुछ प्रश्न पूछने की अनुमति मांगी, राघव ने ही प्रश्नों की लिस्ट इंदिरा को सौपी थी, जैसे जैसे इंदिरा प्रश्न पूछ रही थी शिखा का पारा चढ़ता जा रहा था। एक प्रश्न पर शिखा के सब्र का बांध टूट गया, इंदिरा को ऐसे खरी खोटी सुनाई की रोहित आश्चर्य में खड़ा हो गया। इधर इंदिरा और राघव शांत बैठे रहे। 

शिखा का यह रूप देख सब चकित थे, दूसरे ही दिन रोहित ने घर वापसी कर ली। 

घर आते ही राघव की माँ दिव्या ने मोर्चा संभाला, रोहित और दिव्या जम कर बहस शरू हुई , दिव्या ने साफ मन कर दिया शिखा को बहू बनाने से, पर रोहित के सपना था कि बच्चो की शादी करा कर रिश्तेदार बने। 

सपना जब टूटता है तो बहुत दर्द होता है।
अमित बार बार फोन कर शिखा द्वारा की गई गलती की माफी मांग रहा था। शिखा से भी माफी मनवाई गयी, पर शिखा अपने ही रंग में थी। 

रोहित ने एक बार और कोशिश करने की कोशिश के पर दिव्या अपने निर्णय से टस से मस नही हो रही थी। रिश्तेदारी को बुलाया गया कि किसी तरह दिव्या मान जाए, पर ऐसा हो न सका और अब यह आलम है कि रिश्ता टूटने की कगार पर था, बचपन की दोस्ती आज अंतिम सांस ले रही थी। 

रोहित ने राघव को पास बुलाया और उसे भी समझने की कोशिश करी, राघव ने भी मना कर दिया। तनाव में रोहित की ताभियत खराब होने लगी, समझ ने आ रहा था कि अमित को कैसे मना करे। 
महीनों चली वार्ता के बात रोहित ने थक हार कर अमित को फ़ोन पर मना किया कि हम रिश्तेदार नही बन पाएंगे। अब दोनों की दोस्ती टूट चुकी थी, बचपन का दोस्त अब बिछड़ गया था। 
रिश्ता टूटने की खबर जब राघव को लगी ना थी कि उसकी नौकरी लग गयी, एक नही दो दो। 
राघव ने ट्रेनिंग के लिए दूसरे प्रेदेश जाने की अनुमति मांगी और निकल लिया अपने घर से दूर। 

ट्रेनिंग में बिजी हो गया राघव, महीनों बीत गए राघव घर नही आया। इधर रोहित और दिव्या परेशान होने लगे। एक दिन फोन की घंटी बजती है और राघव बोलता है, माँ मेरी शादी है 10 दिन में आप आ जाना, मैं ट्रेन की टिकट भिजवा रहा हूँ। 
रोहित को काटो तो खून नही, समझ नही आ रहा था कि क्या किया जाए, अपनी ही औलाद इतना बड़ा निर्णय ले रहा है और माँ बाप को बताया ही नही। 
लड़की कौन है, किस कुल की है, किस समाज की है कुछ बताया ही नही बस शादी करने जा रहा है, यह सारे प्रश्न लेकर रोहित अपने छोटे भाई इंदिरा के पापा मोहित के पास पहुचे। उन्हें यह भी डर था कि कही किसी ने जादू टोना तो नही कर दिया है उनके बेटे पर। 
पूजा पाठ भी कराया गया कि सारा जादू टोना खत्म हो जाये। मन्नते मांगी गई, धागे बंधे गए, अलग अलग चौखटों के दरवाजे खटखटाये गए, ना जाने कहाँ कहाँ सजदे किये गए।  पर हुआ कुछ नही क्योंकि प्रेम था दोनो में। 

राघव अपने चाचा की बात सुनता था। मोहित ने फ़ोन पर बात की राघव से, और बोला पहले घर तो आओ, लड़की की फ़ोटो दिखाओ, अगर लड़की अच्छी होगी तो मैं खुद भाई से बात करूंगा की लड़की को स्वीकार कर ले। 

राघव राज़ी हो गया, छुट्टी ले राघव घर आया। साथ मे लड़की की फ़ोटो भी लाया। सारा परिवार इकट्ठा हुए, सबको फ़ोटो भी दिखाई गई, चाचा ने लड़की की फ़ोटो देखते ही कहा कि वाह!!! क्या पसंद है लड़के की !! 
नाम पूछने पर पता लगा कि लड़की का नाम शक्ति है। तभी चाचा के मुझ से निकला। 

शक्ति में भक्ति या भक्ति में शक्ति

 लड़की तो बहुत ही सुंदर है, भाई साहिब तो सात जन्मों तक ऐसी लड़की ढूँढते, तब भी नही खोज पाते। हमारी बिरादरी और जान पहचान में ऐसी कोई लड़की है ही नही। पर माँ बाप को वो पसंद नही आई, उन्हें लगता था कि लड़के को लड़की ने जाल में फसा लिया है, नौकरी लगी नही की लड़का हाथ से गया। 

इंदिरा को भी बहुत उत्सुकता हो रही थी कि भइया को भाभी मिली कैसे। तब शरू हुई प्रेम कहानी का विवरण।

किस्सा कुछ यूं है कि, 
ट्रेनिंग के दौरान उनके मित्र के पैरों में चोट लग गयी, तो उन्हें हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया, मित्र से मिलने वो हर शाम जय करते थे, उनके बेड के बगल में एक और व्यक्ति जो कि उन्ही के आफिस में काम करते थे वो भी पैरो में चोट लगने के कारण भर्ती थे, हमारी होने वाली भाभी, उनकी बहन थी, वो भी अपने भाई की देख रेख के लिए वही रहा करती थी, भाई पहली ही नज़र में लट्टू हो गए, बस क्या था, उन्हें देखने और मिलने का बहाना ढूंढने लगा, इसी बीच, भाई ने उनके बारे में सब पता लगाया, जैसे कि 
नाम क्या है।
कहाँ की रहने वाली है।
उनके परिवार में कौन कौन है। 
कितनी पढ़ी लिखी है।
कितने भाई बहन है।
कोई बॉयफ्रेंड तो पहले से नही है। 

जब सबकुछ पता लग गया और उनके भाई की हॉस्पिटल से छुट्टी हो गयी तो एक दिन उनके घर जा कर उनसे विवाह का प्रस्ताव रखा।

किसी अजनबी से कैसे कोई अपनी बहन का विवाह कर दे। फिर उन्होंने भी अपनी तरफ से तहिकीकात की, तसल्ली होने के बाद और बार बार आग्रह करने पर भाभी के घर वाले भी तैयार हो गए। 
अब वक्त आया विवाह का, कोर्ट में जाकर विवाह करना तय हुआ, दहेज में कुछ भी ना लेने का निर्णय लिया राघव ने, उधर राघव ने अपने घरवालो को बताया कि इस दिन विवाह है, आप आ जाईयेगा नही तो आपके बिना भी शादी हो जाएगी।

घर मे हलचल मच गई। 

लाख मनाने के बाद माता पिता ने माने, भाई भाभी के शामिल न होने पर चाचा ने भी अपनी असमर्थता जताई पर पूरा आशिर्वाद दिया। राघव के वापस जाने का समय हो गया था। राघव के बचपन बचपन के मित्र महेश उनके विवाह में शामिल हुए। 

जब विवाह गो गया, तस्वीरे रोहित और दिव्या के पास भिजवाई गयी, और राजीव ने विवाह कर लिया है यह खबर पूरे मोहल्ले और बिरादरी में फैल गयी, तब जा कर रोहित ने फैसला लिया कि सामाजिक तौर पर इन दोनों को स्वीकार कर लिया जाए, नही तो बिरादरी में कही भी मुँह दिखाना मुश्किल हो गायेगा। 
दिव्या ने राघव को फोन किया कि हम तुम दोनों को स्वीकार करते है, बहू को लेकर घर आओ हम बहू को सामाजिक रीति रिवाज से विवाह संपन्न कराएंगे और स्वीकार करेंगे। 

छुट्टी ले राघव, शक्ति के साथ घर आया। पूरा खानदान स्टेशन लेने गया बहू को, घर पहुचते ही बैंड बाजा बजने लगा, खुशी की लहर दौड़ गयी।
पारंपरिक तौर पर विवाह कराया गया, रिसेप्शन हुआ, सबने वर वधू हो ढेर सारी शुभकामनाये दी। 

सबकुछ अच्छे से होने के बाद भी रोहित-दिव्या, शक्ति को दिल से अपना नही पा रहे थे, दिव्या का व्यवहार तो ऐसा था जैसे शक्ति ने राघव को जादू टोने से फसा लिया है। बहू से इतनी उम्मीदे पाल रखी थी कि उसे पूरा करना बहुत ही मुश्किल था। 

शक्ति अलग परिवेश में पाली थी, घर का काम करती तो थी पर वैसे नही जैसे दिव्या चाहती थी, खाना बनाने में वो दिव्या का स्टैंडर्ड से मैच ही नही कर पा रही थी, शक्ति के हर काम पर तंज बहुत ज़्यादा ही हो रहा था। 

राघव और शक्ति के बीच मित्रवत व्यवहार भी रोहित और दिव्या को पसंद नही आ रहा था, दिव्या चाहती थी कि शक्ति पारंपरिक पत्नी जैसा व्यवहार करें। सुबह उठे, राघव और हमारे पैर छुए। घूँघट करें, पायल पहने और पैरों से छन छन की आवाज़ आये। 
शक्ति पूरा  प्रयास कर रही थी कि वह अपनी सास का दिल जीत सके पर लाख कोशिश करने के बाद भी ऐसा हो न सका, और एक दिन रागव ने हवाई जहाज का टिकट कटाया और उड़ गया अपनी पत्नी के साथ हमेशा के लिए। 







Saturday, February 15, 2025

मरीना बीच- एक बुरा अनुभव

परिवार के साथ पहला हवाई सफ़र: लखनऊ से चेन्नई

यह सुनकर बहुत अच्छा लगा! आपके परिवार का लखनऊ से चेन्नई तक का हवाई सफ़र सचमुच रोमांचक और यादगार रहा होगा। पहली बार की यात्राएँ, खासकर जब सात्विक जैसा कोई बच्चा इतना उत्साहित हो, बहुत ही स्पेशल होती हैं। चेक-इन से लेकर हवाई जहाज़ में बैठने तक का उसका उत्साह कल्पना करना भी सुखद है।

सफ़र के छोटे और ज़रूरी पल:

हैदराबाद में रुकना और दोस्तों से न मिल पाना थोड़ा निराशाजनक रहा होगा, पर लंबी यात्राओं में ऐसा होता रहता है। असली रोमांच तो चेन्नई पहुँचकर शुरू हुआ। देर रात जब भूख लगी और आपको याद आया कि इतने बड़े शहर में स्विग्गी तो ज़रूर होगी, और झट से डिनर आ गया—ये छोटे-छोटे पल ही सफ़र को खास बनाते हैं। ड्राइवर का हिंदी के कुछ शब्द जानना भी मुश्किल समय में कितनी बड़ी मदद होती है!

मरीना बीच का अविस्मरणीय अनुभव:

लेकिन मरीना बीच का अनुभव तो सबसे ख़ास रहा। समंदर का इतना विस्तार पहली बार देखना और ठंडी हवा का अहसास, सचमुच अद्भुत! जब सात्विक लहरों में नहाने की ज़िद करने लगा और फिर एक बड़ी लहर से आप डर गए, वह पल सुनकर दिल की धड़कन बढ़ गई। यह पल दिखाता है कि आप दोनों माता-पिता कितनी जल्दी और मज़बूती से अपने बेटे के लिए खड़े हुए।

चेन्नई की गर्मजोशी:

बीच पर आम पर मिर्च लगाकर खाना और फिर कुछ देर बाद भूला हुआ बैग वापस मिल जाना—यह सब चेन्नई के लोगों की गर्मजोशी और ईमानदारी को दर्शाता है। हिंदी और अंग्रेजी दोनों बोलने वाले लोगों का मिलना और आपकी मदद करना बताता है कि भारत में कहीं भी हों, लोग सहायता के लिए तैयार रहते हैं।

यह सुनकर बहुत खुशी हुई कि सात्विक आज भी मरीना बीच की यादें संजोए हुए है। ऐसी यात्राएँ हमेशा साथ रहती हैं!

Monday, February 10, 2025

पापा का जन्मदिन- बिना आपके, मगर आपके साथ

आज पापा का ऐसा जन्मदिन है जिसमे वे खुद ही नही है। यही एक दिन है जब पूरा परिवार एक साथ एक जगह इकठ्ठा हुआ करता था। 

आज आपकी याद कुछ ज़्यादा आ रही है। समझ नही आ रहा है आज के दिन, मैं, आपको याद करते हुए,  दुखी हूँ, कि आप नही हो या आपको याद कर खुशियाँ मनाऊँ। अगर कुछ भी नही करता हूँ तो आपका जन्मदिन किसी अन्य तारीख की तरह विलुप्त हो जाएगा। 

मगर मैं ऐसा नही चाहता हूं, आज की तारीख ज़िंदा रहे, अगर यह तारीख ज़िंदा रही तो आप अपने आप ज़िंदा रहेंगे। मैं आपके पोते लिए भी चाहता हूं कि वो आपको हमेशा याद रखे, मैं आपके द्वारा किये गए संघर्षो को भी आपके पोते को बताऊंगा की वह आपको याद रखे, अपने बाबा से प्रेरणा ले सके।

आप जहां भी है, निश्चिंत रहे आपका बेटा आपको याद करता है, प्रेम भी करता है।

Thursday, January 30, 2025

श्रेष्ठता का भ्रम

वाकिया कुछ दिनों पूर्व का है जब हमारा सामना एक ऐसी सज्जन दंपति से हुआ, जिन्हें अपने आपको श्रेष्ठ साबित करने का जुनून था। हर वह चीज़ जो आपके पास है वह उनके या उनके रिस्तेदारो के पास है, न सिर्फ उनके पास है वह आपसे बेहतर भी है। 

श्रेष्ठता साबित करने के लिए वो कुछ भी बोलते। सामने वाले को साफ नजर आ रहा है कि आप झूठ बोल रहे है, पर उन्हें अपनी जुबान पर कोई भी कंट्रोल नही है। 

पहला किस्सा कुछ यूं है कि एक दिन हम उदयपुर घूमकर आये थे,  सज्जन दम्पत्ति हमारे घर आये, बातो बातो में मैंने उदयपुर की सुंदरता के बारे में बताना चाहा तभी वो बोले कि हिमांचल जैसी दुनिया मे कोई जगह ही नही है, मुझे बार बार मौका मिले तो मैं वही जाना पसंद करूँगी। स्वर्ग है वो स्वर्ग। मैंने सोंचा की हिमांचल तो स्वर्ग के समान है यह माना मैंने पर धरती पर एक ही स्वर्ग नही है और भी है। जितना आप जानते हो बस वही सत्य नही है।

दूसरा किस्सा है जब मैंने कार खरीदी, मित्रवत हम उन्हें मिठाई देने उनके घर जा पहुचे, कार के बारे में जानकारी दी तो बताते है कि आई20 को की उनके परिवार के पास है, उसके जैसी गाड़ी ही नही देखी है, इतनी तेज चलती है, बस हवा में बाते करती है। इतने पहाड़ घूम डाले, कार में तो मज़ा आ गया। इन्हें कौन समझाए की जब इश्क होता है तब सिर्फ महबूब देखा जाता नही। वो कौन है कहाँ से है, यह मायने नही रखता है।

तीसरा किस्सा कुछ यूँ है कि हम दिल्ली गए हुए थे, रीगल सिनेमा के पास घड़ी बेच रहा था, तो मेरी पत्नी को एक घड़ी पसंद आई और हमने 100 ₹ में ग़रीद ली। रविवार के दिन सज्जन दम्पत्ति का आगमन हुआ तो उनकी नज़र हमारी उस घड़ी पर पड़ी। तभी उनके प्रश्नों की बौछार होने लगी। किस ब्रांड की है, कितने की है, मुझे तो इसमें कोई खास बात लग नही रही है। लोचल है लग रहा है, मेरी पति बोली हैं लोचल है 100₹ कि है, रीगल से ली है। तभी दम्पत्ति बोलते है, देखा मैंने पहचान लिया, नही तो आप लोग बताते की यह बहुत महंगी है, अमुक ब्रांड की है। जो बात हमने बोली ही नही, वे ख़ुद ही समझ गयी तो हम क्या करे। अत्यधिक ज्ञान भी बहुत खतरनाक है।

चौथा किस्सा है जब हमारे एक मित्र ने फ्लैट खरीद, सबको अपने गृह प्रवेश पर बुलाया, सब लोगो को घर देख कर प्रसन्नता हुई, सबने बधाई दी, तभी अमुक दम्पत्ति आते है और बोलते है, घर तो अच्छा है पर मैं कभी भी पुराना फ्लैट नही खरीदूंगी, मुझे फ्रेश फ्लैट ही पसंद आते है, नही तो मैं ज़मीन खरीदकर घर बनाने को अच्छा समझती हूं। अमुक दम्पत्ति को एक बार देखा और सिर झुका कर उनके विचारों का सम्मान किया और अपने मित्र को बधाई देने के लिए आगे बढ़ चला।

पांचवा किस्सा, नोएडा से लखनऊ आते समय मैंने अपनी कार की स्पीड 120 तक ले गया, बात आगरा एक्सप्रेसवे की हो रही थी कि 120 पर भी स्पीड का अहसास नही हो रहा था। तभी सज्जन दम्पत्ति बोलते है कि एक बार मैंने 140 की स्पीड में गाड़ी चलाई थी, मंत्री जी आगे चल रहे थे और मैं उनके पीछे पीछे, काफिला 140 पर चल रहा था और मैं उन्ही के पीछे लग लिया, 120 किलोमीटर मैंने 1 घंटे में तय कर डाला। इसके बाद मेरे पास कहने को कुछ नही बचा था। मन ही मन मन मैंने खुद से माफी मांगी और अपने काम मे लग लिया।

छठा किस्सा, अमुक दम्पत्ति वैष्णो देवी घूम कर आये थे, हम प्रशाद लेने उनके घर गए तो वो दिखाने लगे कि वे जम्मू से क्या क्या लाये है, तभी उन्होंने एक स्वेटर दिखाया और बोले अंदाज़ लगाओ यह कितने का है, अब हमें क्या पता कितने का हो सकता है, स्वेटर तो माँ बुन कर मुझे देती थी, खरीदने की कभी नौबत ही नही आई, कैसे अंदाज़ लगता कि कितने का है। तभी दंपति जी बोलते है देख लो प्यूमा का है, अब अंदाज़ लगाओ। मैंने जब हार मान ली,  तो बोलते है 400 का लेकर आया हूँ। तब से मैं शून्य पर हूँ, कुछ समझ नही आया कि क्या व्यक्त करूँ।

सातवां किस्सा एक विवाह समाहरोह का है जब हम अमुक दम्पत्ति के साथ विवाह की रश्मो का आनंद ले रही थी तभी अमुक दम्पत्ति बोली कि आज कल पर्स कितने महंगे हो गए है। पूरा शहर घूम डाला तब जाकर यह पर्स मिला है, पूरे 900 ₹ का है। अब मेरी पत्नी पशोपेह में पड़ गयी कि वह क्या बोले। मेरी तरफ देखते हुए इशारा किया कि क्या मैं अपने पर्स की कीमत बात दूँ। हमने शांत रहने का निर्णय लिया। 

आठवां किस्सा है जब दिल्ली की सरोजनी मार्किट में खड़े होकर अमुक दम्पत्ति मुझसे बोलते है कि देखो मेरी लेदर की जैकेट, लोग इसे देख कर मुझे बड़ा ही अमीर समझ रहे होंगे। इतनी बात सुन अचानक मुझे खाँसी आने लगी। पानी मंगाया गया। पानी पिया फिर जा कर मेरी खासी रुकी। 

नौवां किस्सा है 1000 ₹ कि सब्जी का, अमुक दम्पत्ति ने अपने घर के लिए नया नया फ्रिज लिया था, हम उनके घर की काम से गये थे, तभी अमुक दंपति मेरी पत्नी को प्रिज़ दिखाते हुए बोलते है कि देखो कितना बड़ा फ्रिज है, पूरे पूरे 1000₹ की सब्जी खरीद कर लाया हूँ और सारी की सारी सब्जी इस फ्रिज में आ गयी। मेरी पत्नी को समझ नही आ रहा था कि वह क्या प्रतिक्रिया दे। उनके घर मे आज फ्रिज आयी है, उससे बड़ी फ्रिज मेरे घर मे पिछले 11 सालों से है।






Wednesday, January 29, 2025

पनीर की सब्जी

एक किस्सा मेरी श्रीमती जुबानी

एक खूबसूरत शाम, स्वाति और आदि दोनों एक मिठाई की दुकान पर पानी के बताशे पैक करा रहे थे, तभी एक महानुभव दुकान में  पनीर खरीदने की चेष्टा लिए दुकानदार दुकान में प्रवेश करते है और उनकी और दुकानदार के बीच रोचक चर्चा की शरुवात होती है। 

चर्चा कुछ इस प्रकार है:

ग्राहक: पनीर कितने का दे रहे है भाई साब। 
दुकानदार: पनीर 320₹ में है। 
ग्राहक: मुझे तो बस 100 ग्राम ही लेना है।
दुकानदार: 35₹ का 100 ग्राम मिलेगा।
ग्राहक: क्यों 35 ₹ का क्यों? हिसाब करो तो 32₹ का होता है, आप तो 350₹ में बेच रहे है। 
दुकानदार: 100 ग्राम हम 35₹ में ही देंगे,  लेना हो तो लो नही तो जाओ।
ग्राहक: एक अकेले के लिए कोई किलो भर तो लेगा नही, आप लूट रहे है। 
दुकानदार: भाईसाहब हम लूट नही रहे है, हमारा जो नियम है वही बात रहे है। 

ग्राहक: तो 100 ग्राम दे दो। अच्छा तो यह बताइये मटर कितने की दे रहे है। 
दुकानदार: मटर 160₹ किलो है, आपको कितनी चाहिए?
ग्राहक: मुझे तो थोड़ी ही मटर चाहिए,  एक कटोरी सब्जी बनानी है बस । आप सिर्फ 5 रुपये की ही मटर दे दो।

दुकानदार: 50ग्राम से कम नही मिलेगी, इससे नीचे हम नही बेचते। 
ग्राहक: 50 ग्राम मटर कितने की हुई? 
दुकानदार: 50ग्राम मटर 8रुपये की हुई। 
 ग्राहक: दे दो फिर।
दुकानदार: ये लीजिये आपके 45 रुपये हुए।
ग्राहक: 45रुपये कैसे हुए? 
दुकानदार: 35 रुपये की पनीर और 10 रुपये की मटर।
ग्राहक: अभी तो मटर 8 रुपये की थी अब 10 रुपये की कैसे हो गई? इसका मतलब 200 रुपये किलो मटर बेंच रहे है आप। 160 रुपये में तो हर जगह मिल रही है , लूट मचा रखी है आपने तो। 
दुकानदार: अरे 200 रुपये किलो कहा दे रहे है मटर। 160रुपये किलो ही तो दे रहे है। 
ग्राहक: तो ये 50 ग्राम मटर 10 रुपये की कैसे हो गई?
दुकानदार: अरे भैया ये 50 ग्राम से ज्यादा है  मटर इसलिए 10 रुपये की हुई। 
ग्राहक, अरे मुझे तो थोड़ी सी ही चाहिए बस, एक से तो यह 200₹ किलो हुई, इतना मत लूटो ग्राहक को। 
एक बार मैंने आपके यहाँ से मटर ली थी 10₹ की, मटर पनीर की सब्जी में बस मटर ही मटर दिख रहा था, बेचारा पनीर तो दिखा नही। 
दुकानदार की पत्नी: भाई साहब हम आपको सौदा बेच रहे है कि पनीर की सब्जी, हमे क्या मतलब की आपने जो सब्जी बनाई उसमे मटर दिख रही थी या पनीर। 

आप मुझे 8₹ की ही दीजिये, नही तो ज़्यादा हो जाएगी, एक कटोरी से ज़्यादा थोड़े न खाना है मुझे। 

दुकानदार: हम सोना थोड़े न तौलते है, तौलने में थोड़ा ज्यादा ही हो जाता है। 50 ग्राम तौलो तो 60- 70 ग्राम हो जाता है। 
ग्राहक: आप मुझे 8₹ का ही मटर दो नही तो बहुत ज़्यादा हों जाएगा। 
दुकानदार अपनी पत्नी को बोलता है कि भाईसाहब के लिए 100 ग्राम पनीर और 50 ग्राम मटर तौल दो, तभी उसकी पत्नी बोली, मैं सोना नही तौल पाऊंगी, आप ही इनके लिए तौल दो। 

ग्राहक: मैडम जी आप तौल दो मुझे घर जाकर खाना भी बनाना है और खाना भी है। 


बंगाली दूल्हे की लखनवी बारात

घर की बिटिया ने अपना सुंदर सा वर चुना बंगाल से, लड़का बिल्कुल मिष्टिदोई जैसा है। बारात भी बंगाल की राजधानी कोलकाता से आई थी। दूरी इतनी थी कि कम ही बरती थे, शाम को बारात तैयार हुई निकलने के लिए, 20 लोग बरती, तो बहुत कम होते है, हमारे लखनऊ के हिसाब से। यहाँ छोटी से छोटी बारात में भी काम से कम 200 लोग होते है,   बंगाल में, जहां की रश्मो में इतना शोर शराबा होता ही नही है और ना ही इतनी झूम के बारात निकलती है। 

तय यह हुआ कि हम घराती, बारातियो के साथ बैंड बाजे के साथ जाएंगे। फिर क्या था सबको मौका मिला नाचने का, हम बारातियो के साथ झूम के नाचे। बारातियो को पकड़ पकड़ के नचाया। बाकी घर वालों को भी नचाया। 

1 घंटे लगातार नाचने के बाद हम द्वार पर पहुचे, द्वार पर पहुचे की हमारा किरदार बदल गया। अब हम जिस बारात को लेकर आये थे अब उसी बारात के स्वागत में खड़े थे। फूल माला से सबका स्वागत किया और विवाह हर्षोउल्लास के साथ संपन्न हुआ । 

Monday, January 27, 2025

रिश्तों का नया अध्याय


अभी कल ही हम भांजी की शादी में शामिल हो घर आये है, रिस्तो का ताना बना भी अजीब है, अनुषा की शादी के बाद अब हम ससुर हो गए। 

अपने आंखों के सामने देखते देखते न जाने कब बच्चे बड़े हो गए। अहसास ही नही हुआ कि उनके साथ हम कब इतने बड़े हो गए। 
माँ बाप पर ससुर होने का तमगा लगा तो आम बात थी पर हम अब उसी दौर में है। अब हमारा हाथ आशीर्वाद देने के लिए अपने आप ही उठ जाता है। 

ईश्वर से बस यही कामना करता हूँ कि दोनों सदैव प्रसन्नचित रहकर अपने दाम्पत्य जीवन का निर्वाहन करे और हर संभव खुशियाँ उनके कदम चूमे।