जब भी रक्षाबंधन आने वाला होता है, मेरे मन में मेरी माँ की यादें ताज़ा हो जाती हैं। जैसे ही यह त्यौहार करीब आता, उनका चेहरा उदास हो जाता और उनका मूड ख़राब रहने लगता। मेरे चार भाई होने के बाद भी, एक-एक करके सबने ज़िंदगी का साथ छोड़ दिया। और जो सबसे छोटा था, वह मेरी आँखों के सामने ही टिटनेस से जाता रहा।
राखी का त्यौहार आते ही, माँ अक्सर बताती थीं कि तेरे सबसे छोटे मामा बहुत गुणी थे। वह खेती के बीच में, जहाँ फसल नहीं उगती थी, वहाँ भी लहसुन, प्याज़, साग या कुछ और बो दिया करते थे। राखी के लिए वह साल भर थोड़ा-थोड़ा पैसा इकट्ठा करते थे, और उस दिन मेरी माँ को दो रुपये दिया करते थे। आज मेरे पास बहुत पैसे हैं, पर वह दो रुपये बहुत ही अनमोल थे, जिनकी कीमत किसी भी चीज़ से ज़्यादा थी।
भाई-बहनों के इस त्यौहार पर, बहुत से लोगों ने माँ से कहा, "दीदी, मैं तो हूँ। मुझे राखी बाँध दो।" पर माँ कभी तैयार नहीं हुईं। वह बस किनारे बैठी रहती और रोती रहती। यह एक-दो साल की बात नहीं थी, यह सिलसिला तब भी जारी रहा, जब वह बूढ़ी हो गईं।
आज, माँ खुद इस धरती पर नहीं हैं, पर जब फिर से रक्षाबंधन है, तो मैं उन्हीं बातों को याद कर भावुक हो उठता हूँ। उस दो रुपये की कीमत को समझता हूँ, उस दर्द को महसूस करता हूँ जो मेरी माँ ने हर साल सहा, और उस प्रेम को याद करता हूँ जो उन्होंने अपने छोटे भाई के लिए महसूस किया।
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