Saturday, August 16, 2025

जब सच का मौन, झूठ के शोर में खो जाए: एक दिल की कहानी

​कोरोना काल ने हमें अपनों के और भी करीब ला दिया। 'वर्क फ्रॉम होम' के बहाने कई लोगों को अपने घर लौटने और परिवार के साथ वक्त बिताने का मौका मिला। ऐसा ही एक मौका मुझे भी मिला, जब मैं अपने माता-पिता के अंतिम दिनों में उनकी सेवा कर पाया। यह मेरे लिए सिर्फ एक कर्तव्य नहीं, बल्कि एक आशीर्वाद था। मैंने अपनी हर सांस, हर पल उनकी देखभाल में लगा दिया। मैंने जो कुछ किया, वह दिल से किया, बिना किसी स्वार्थ के।

​सेवा हुई और वो परमधाम चले गए। दिल में एक शांति थी कि मैं उनके अंतिम समय में उनके साथ था, उनके काम आया। मगर, कुछ साल बाद जब किसी अपने ने कहा, "उसने किया ही क्या है? वो रहता ही कहाँ था यहाँ जो सेवा करेगा," तब मेरे भीतर कुछ टूट गया।

​यह बात सिर्फ मेरे बारे में नहीं थी। यह सच की उस खामोशी के बारे में थी जो हर उस व्यक्ति को महसूस होती है जिसने निस्वार्थ भाव से कुछ किया हो।

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