Tuesday, October 27, 2026

पहले प्यार की खुशबू

 


पहले प्यार की खुशबू

यह उस दौर की बात है जब दिल्ली-एनसीआर की सर्दियों में सिर्फ कोहरे की ठंडक नहीं होती थी, बल्कि आईटी दफ्तरों के केबिन, ऑर्कुट (Orkut) के स्क्रैप्स और जीटॉक (GTalk) की हरी बत्ती के इर्द-गिर्द धड़कते नौजवान दिल हुआ करते थे। राघव अपनी आईटी कंपनी में नया-नया जुड़ा था। नाइट शिफ्ट्स, वेब ऐप्लिकेशन्स की टेस्टिंग, प्रोजेक्ट की सख्त डेडलाइन्स और दफ्तर के रिस्ट्रिक्टेड इंटरनेट के बीच उसकी ज़िंदगी अपनी सीधी चाल चल रही थी।

राघव के लिए अवनी कोई अजनबी चेहरा नहीं थी। वह उसके एक पुराने दोस्त की कलीग थी और दोनों पहले भी कई मौकों पर मिल चुके थे—कभी किसी वीकेंड गेट-टुगेदर में, तो कभी ऑफिस के बाद किसी चाय की टपरी या कॉमन फ्रेंड्स के साथ कॉफी टेबल पर। राघव पहली ही मुलाकात से उसकी तरफ खिंचा चला गया था। अवनी का बोलने का बेबाक अंदाज़, उसकी बुद्धिमानी और उसकी खिलखिलाती हंसी राघव के दिल में धीरे-धीरे एकतरफ़ा मोहब्बत का बीज बो चुकी थी। वह जब भी मिलती, राघव का दिल करता कि बस उसे देखता रहे, पर हर बार अपनी झिझक और इस अहसास के चलते चुप रह जाता कि अवनी उससे कहीं आगे, कहीं ज़्यादा परिपक्व और सुलझी हुई थी। दिल में प्यार पलता रहा, मगर लफ़्ज़ों को बाहर आने का हौसला नहीं मिल रहा था।

फिर वह मौका आया, जिसकी राघव ने कभी कल्पना भी नहीं की थी—एक कॉमन फ्रेंड की शादी।

शादी का पूरा माहौल ही रूमानी और उत्सव से सराबोर था। गेंदे के फूलों की भीनी महक, शहनाई की धीमी धुन, और मंडप के पास जलती पवित्र अग्नि की रोशनी। उसी जादुई माहौल में जब राघव की नज़र अवनी पर पड़ी, तो उसकी सांसें जैसे थम सी गईं। अवनी ने गहरे जामुनी और सुनहरे बॉर्डर वाली बेहद सलीकेदार रेशमी साड़ी पहन रखी थी। खुले बाल, कानों में हल्के झुमके और चेहरे पर वही गज़ब का आत्मविश्वास, जो राघव को हमेशा दीवाना बना देता था। वह महफ़िल में जिस गरिमा और सहजता के साथ लोगों से मिल रही थी, शादी की उस जगमगाहट में वह सबसे अलग और सबसे खास लग रही थी。

माहौल ही ऐसा बना हुआ था कि दिल की बात छिपाना अब राघव के बस में नहीं था। रात के फेरों की रस्म के बाद जब लोग वर-वधू को बधाई देने में व्यस्त हो गए और मंडप के पास कुछ पल के लिए शांति हुई, राघव ने अपनी सारी हिचकिचाहट किनारे रख दी। उसके कदम खुद-ब-खुद अवनी की ओर बढ़ गए।

"अवनी..." राघव की आवाज़ में हल्की सी कंपकंपी थी, पर आँखों में बरसों से जमा जज़्बात तैर रहे थे।

अवनी ने मुस्कुराकर देखा, "अरे राघव! तुम यहाँ? कब आए?"

"बस थोड़ी देर पहले... पर सच कहूँ तो जब से तुम्हें इस साड़ी में देखा है, मैं यहीं मंडप के पास खोया हुआ हूँ," राघव ने सीधे उसकी आँखों में झांकते हुए दिल की बात कह डाली। "अवनी, हम पहले भी मिले हैं, और शायद तुम न जानती हो, पर मैं हर बार तुम्हें देखकर यही सोचता था कि कोई इतना मुकम्मल कैसे हो सकता है। आज इस माहौल में, जब फेरे चल रहे हैं, मुझसे रहा नहीं गया। मैं तुम्हें बहुत पसंद करता हूँ... सच कहूँ तो मुझे तुमसे प्यार हो गया है।"

अवनी एक पल के लिए हैरान रह गई। उसने शायद राघव की इस बेबाकी की उम्मीद नहीं की थी। लेकिन उसने न कोई तल्खी दिखाई, न कोई गुस्सा। अपनी समझदार, गहरी आँखों से उसने राघव को देखा और उसके चेहरे पर एक बेहद शालीन, कोमल मुस्कान उभर आई।

उसने बहुत आहिस्ता से कहा, "राघव, तुम बहुत अच्छे और सच्चे इंसान हो, और मुझे तुम्हारी यह मासूमियत बहुत अच्छी लगती है। लेकिन मैं तुम्हारी इस बात का वो जवाब नहीं दे सकती जो तुम चाहते हो। हम दोनों बहुत अलग हैं... हम बहुत अच्छे दोस्त रह सकते हैं, पर इससे ज़्यादा कुछ नहीं। इसे यहीं छोड़ दो, तो हमारे बीच की सहजता बनी रहेगी।"

उस शालीन इनकार ने राघव के दिल को छुआ ज़रूर, पर अवनी के प्रति उसका सम्मान और गहरा हो गया। राघव को हमेशा से भीतर ही भीतर लगता था कि अवनी एक ऊँचे आसमान का सितारा है, जिसे छूना मुमकिन नहीं, सिर्फ़ उसकी चमक से अपनी दुनिया रोशन की जा सकती है। उस रात उसने फैसला किया कि वह इस रिश्ते में कोई कड़वाहट नहीं आने देगा।

शादी के कुछ दिनों बाद दोनों के बीच ऑर्कुट और जीटॉक के ज़रिए बातचीत का सिलसिला शुरू हुआ।

राघव अपनी उस एकतरफ़ा मोहब्बत को दोस्ती की हल्की-फुल्की हंसी में समेटकर पेश करता। जब उसने पहला स्क्रैप भेजा:
"तुम हो तो गाता है दिल... तुम नहीं तो क्या है यहाँ... हाहाहा।"
तो अवनी ने भी मुस्कुराते हुए जवाब दिया。

जब अवनी ने तस्वीरें शेयर करने के लिए ईमेल आईडी माँगी, तो राघव ने अपनी आईडी भेजी。
अवनी ने झट से छेड़ा, "अरे, अपनी आईडी दो, किशन जी की नहीं!"
राघव ने लिखा, "अरे यार, वो मेरी माँ का नाम है।"
उस दिन अवनी ने महसूस किया कि इस शोख लड़के के भीतर परिवार और रिश्तों के लिए कितनी गहरी सादगी और अपनापन है।

ऑफिस की व्यस्तताओं, सख्त फ़ायरवॉल और प्रोजेक्ट्स के तनाव के बीच दोनों की जीटॉक चैट एक ताज़ी हवा के झोंके जैसी होती थी。
अवनी ने एक दिन पूछा, "ये LOL क्या होता है?"
राघव ने अपने अंदाज़ में समझाया, "जब दोस्तों के बीच मन खूब ज़ोर से ठहाका लगाकर हंसने को करे, तो चैट पर LOL लिख देते हैं—Laugh Out Loudly!" और फिर स्क्रीन पर 'lol lol lol' की बौछार हो जाती।

जब नंबर एक्सचेंज हुए, तो राघव ने अपनी शरारत नहीं छोड़ी, "मैंने तुम्हारा नंबर 'जानेमन' के नाम से सेव किया है।"
अवनी ने हँसते हुए लिखा, "और मैंने तुम्हारा नाम एक बहुत अच्छे दोस्त की तरह सेव किया है।"

बातों-बातों में जब शेरो-शायरी का दौर चला, तो अवनी ने लिखा:
"अंदाज़ अपने देखते हैं आईने में वो,
और ये भी देखते हैं कि कोई देखता न हो..."

राघव ने तुरंत दिल की बात को अल्फ़ाज़ में पिरोकर जवाब दिया:
"कांटों से दामन उलझाना मेरी आदत है,
जिनको दुनिया ने ठुकराया, जिनसे हैं सब दूर...
ऐसे लोगों को अपनाना मेरी आदत है।"

अवनी ने मुस्कुराकर लिखा, "वाह वाह... कहीं से मारा हुआ लगता है, पर दिल को छू गया।"

दिसंबर बीता और नए साल की शुरुआत में जब राघव को पता चला कि अवनी कनॉट प्लेस (CP) में किसी के साथ लंच डेट पर गई थी, तो राघव के सीने में एक बार फिर बेबसी और जलन की हल्की सी टीस उठी। उसने जज़्बातों में बहकर एक लंबा एसएमएस भेज दिया:
"मुझे तुम्हारी पहली जनवरी की सीपी वाली डेट के बारे में पता चला... तुम फ्लर्टिंग की उस्ताद हो और मैं बस एक नया स्टूडेंट। तुमने मुझे ज़िंदगी की एक खूबसूरत याद दी, जिसे मैं कभी नहीं भूलूँगा। खैर, मेरी फिक्र किसे है... तुम खुश रहो, बाय।"

अवनी का जवाब बहुत साफ़ और गंभीर आया:
"मैंने तुम्हारे साथ कभी कोई दिखावा या फ्लर्ट नहीं किया राघव। मैं तुम्हें हमेशा एक सच्चा दोस्त मानती आई हूँ और आगे भी मानूँगी। मेरी शुभकामनाएं हमेशा तुम्हारे साथ हैं।"

उस मैसेज ने राघव को आईना दिखा दिया। उसे अपनी नादानी का अहसास हुआ कि प्यार में किसी की निजी ज़िंदगी पर हक नहीं जताया जा सकता। उसने तुरंत माफ़ी मांगी और बात संभाली। उसने अवनी की आज़ादी और उसकी प्राथमिकताओं का दिल से सम्मान किया। इसके बाद बातचीत फिर से सामान्य और दोस्ताना हो गई—ऑफिस की गपशप, मौसम, चाय और दिल्ली की शामों के साथ। धीरे-धीरे समय बीता, प्रोजेक्ट्स पूरे हुए, दोनों अपने-अपने करियर में आगे बढ़े और जीटॉक की वह हरी बत्ती एक दिन हमेशा के लिए शांत हो गई।

***

पंद्रह साल गुज़र गए।

राघव अब अपनी ज़िंदगी के एक बेहद परिपक्व और कामयाब मुकाम पर पहुँच चुका था। उसका अपना भरा-पूरा परिवार था, करियर में स्थिरता थी और मन में गहरा ठहराव। वह समझ चुका था कि हर प्यार का मंज़िल तक पहुँचना ज़रूरी नहीं होता। कुछ अहसास इसलिए खूबसूरत होते हैं क्योंकि वे आपको ज़िंदगी में पहली बार शिद्दत से धड़कना और किसी की बिना शर्त इज़्ज़त करना सिखाते हैं।

एक शाम, दिल्ली के कनॉट प्लेस के एक कॉफ़ी हाउस में राघव अपनी एक मीटिंग के बाद बैठा था। बाहर हल्की बारिश की बूंदें गिर रही थीं। तभी काउंटर से वही जानी-पहचानी, खनकती हुई आवाज़ सुनाई दी:
"एक कैपुचीनो, प्लीज़..."

राघव ने मुड़कर देखा। वह अवनी ही थी।

चेहरे पर वही पुराना, गज़ब का आत्मविश्वास और आँखों में वही ठहराव। उम्र ने उसके चेहरे को और भी गरिमामयी बना दिया था।

राघव अपनी कुर्सी से उठा। उसके दिल में न कोई पुरानी टीस थी, न कोई कसक—बस एक बेहद सुकून भरी, खिली हुई मुस्कान。
"अवनी?"

अवनी पलटी और पहचानते ही उसकी आँखें खुशी से चमक उठीं, "राघव! अरे, तुम यहाँ?"

दोनों एक ही मेज़ पर बैठे। पंद्रह साल का फासला देखते ही देखते हवा हो गया। दोनों ने अपनी-अपनी ज़िंदगी, अपने काम और अपने परिवारों की बातें कीं। दोनों खुलकर हंसे, जैसे बरसों पुराने साथी ज़िंदगी के किसी खुशनुमा मोड़ पर अचानक मिल गए हों।

राघव ने एक बार भी उस पुरानी बात को नहीं छेड़ा। न उसने उस शादी वाली रात के प्रपोज़ल का ज़िक्र किया, न उस साड़ी की तारीफ का, और न ही उन भावुक मैसेजेस का। वह पहला प्यार, वह अनमोल अहसास आज भी राघव के सीने के सबसे महफ़ूज़ कोने में एक मीठा, पावन राज़ बनकर मुस्कुरा रहा था। वह जानता था कि कुछ अहसास जब दिल के भीतर ही बंद रहते हैं, तभी उनकी पवित्रता और गरिमा हमेशा ताज़ा रहती है।

कॉफ़ी खत्म हुई और बाहर बारिश थम चुकी थी。

"बहुत अच्छा लगा राघव तुमसे मिलकर। तुम बिल्कुल नहीं बदले, वही ज़िंदादिली और सकारात्मक ऊर्जा है तुम्हारे अंदर," अवनी ने विदा लेते हुए गर्मजोशी से हाथ मिलाया।

"मुझे भी बहुत खुशी हुई अवनी... हमेशा ऐसे ही मुस्कुराती रहो," राघव ने सच्चे दिल से कहा।

अवनी अपनी कैब की तरफ बढ़ गई और राघव अपनी गाड़ी की ओर। चलते-चलते राघव के होंठों पर वही जानी-पहचानी, बेफिक्र मुस्कान तैर गई। ज़िंदगी कितनी खूबसूरत है! वह जानता था कि मुकद्दर के किसी भी मोड़ पर अगर अवनी उसे फिर कभी यूँ ही टकरा जाएगी—चाहे दस साल बाद या बीस साल बाद—तो उसके चेहरे पर कोई झिझक या दर्द नहीं होगा, सिर्फ़ वही खिली हुई, सच्ची खुशी होगी और दिल से निकली एक दुआ।

कुछ कहानियों का मुकम्मल न होना ही उनकी सबसे बड़ी खूबसूरती होती है।

Friday, August 14, 2026

वो घर, जो कभी मेरा था

यह वर्ज़न पहले से काफी मजबूत है। मैंने इसे ज़्यादा मानवीय, सहज और बोलचाल के भाव में थोड़ा सँवारा है—बिना दर्द को ज़्यादा साहित्यिक बनाए। खासकर आखिरी हिस्से को थोड़ा कम दोहराव वाला रखा है।

विदाई के समय मैंने उसे अपने ही हाथों से उठाकर डोली में बैठाया था। बहन विदा तो हो रही थी, लेकिन मेरे दिल से वह कभी विदा नहीं हुई। मैंने हमेशा उसे अपने घर का हिस्सा माना।

वह घर छोड़कर चली गई थी, लाख विरोध के बावजूद, लेकिन उस घर से उसका रिश्ता कभी खत्म नहीं हुआ। दिन बीते, हफ्ते बीते, महीने बीते और फिर साल गुजर गए… मगर उसके लिए उस घर के दरवाज़े हमेशा खुले रहे।

फिर एक दिन मैंने वह घर छोड़ दिया।

धीरे-धीरे घरवालों को मेरे बिना जीने की आदत हो गई। पता ही नहीं चला कि कब मेरा अपना घर मेरे लिए बदल गया। मैं घर आता था, मगर अब वहाँ पहले जैसा अपनापन महसूस नहीं होता था। सब कुछ अपना होकर भी कुछ अजनबी-सा लगता था।

भाई का कमरा था, लेकिन अब मेरा नहीं था। बहन के लिए जगह थी, मेरे लिए नहीं।

वहाँ अब बहन जा बसी थी। कमरे वही थे, दीवारें वही थीं, रिश्ते भी वही थे… बस मेरे हिस्से की जगह कहीं पीछे छूट गई थी।

जिस बहन को मैंने कभी उस घर में अजनबी महसूस नहीं होने दिया, उसी घर में एक दिन मैं खुद अजनबी हो गया।

शायद बस मेरे विवाह करने की देर थी।

रिश्तों की जगह बदल गई, घर की परिभाषाएँ बदल गईं और मेरी जगह भी बदल गई। यादें आज भी उसी घर में थीं, लेकिन अब उनमें मेरा होना नहीं था।

मैं घर से दूर नहीं हुआ था,
बस घर वालों से दूर होता चला गया।

और सबसे अजीब बात यह थी कि घर अब भी वही था.
बस उसमें मेरे लिए पहले जैसा अपनापन नहीं था।

कुछ छूटेगा, तभी कुछ नया बनेगा — ज़ेन ज़ी से एक संवाद


आज का दौर ज़ेन ज़ी का है, ऐसा लोग बताते हैं। इस आंदोलन ने पहली बार शायद उनका असली रूप हमारे सामने रखा है। मुझे खुशी इस बात की है कि वे किसी का बोझ अपने ऊपर लेकर नहीं जी रहे—न सभ्यता का, न समाज का और न ही रिश्तों का।
हमारा दौर कुछ और था। हम तो धर्मराज की तरह रिश्तों को सुलझाते-सुलझाते एक उम्र गुज़ार बैठे। सबको साथ रखने की कोशिश में खुद से ही दूर होते गए। अंत में हाथ क्या आया? न माया मिली, न राम।
ज़ेन ज़ी, तुमसे बस यही अनुरोध है—अपना और अपने देश का ख़याल रखना। जब खिड़की खुलेगी तो हवा के साथ कुछ अच्छी चीज़ें भी आएँगी और कुछ बुरी भी। लेकिन वक्त तुम्हें खुद सिखा देगा कि क्या भीतर आने देना है और क्या बाहर ही छोड़ देना है।
बिना पुराने बोझ के शायद तुम नई सोच पैदा कर पाओगे, नए रास्ते खोज पाओगे। हम तो रिश्ते सुलझाते-सुलझाते रह गए; न कुछ नया सोच पाए, न बहुत कुछ नया कर पाए।
जिस नई खोज के लिए भारत सदियों से तरसता रहा है, शायद वह तुम्हारी पीढ़ी कर पाए।
याद रखना—कुछ छूटेगा, तभी कुछ नया बनेगा।
तुम्हें मेरी शुभकामनाएँ।

Sunday, June 21, 2026

माता-पिता का साथ: जिम्मेदारी, प्रेम और एक कठिन सफर


​जीवन का एक चक्र है, जिसे समझना और स्वीकार करना हर संतान के लिए एक परीक्षा जैसा होता है। एक दिन वह समय आता है जब हमारे माता-पिता, जिन्होंने कभी हमारी उँगली पकड़कर हमें चलना सिखाया था, हम पर निर्भर हो जाते हैं। उनकी दुनिया, जो कभी हमारे इर्द-गिर्द घूमती थी, अब छोटी होकर हमारे निर्णयों पर सिमट जाती है।

​पुत्र या पुत्री होना सिर्फ एक रिश्ता नहीं है, यह एक कर्तव्य है।

​बुढ़ापे में उनके साथ खड़े होना, उनकी बीमारी की रातों में जागना, और जब उनका शरीर साथ छोड़ रहा हो, तब उनके पास मौजूद रहना—यह सब आसान नहीं है। किसी भी संतान के लिए अपने माता-पिता को कमजोर होते देखना और उनके अंतिम समय में उन्हें विदा होते देखना, जीवन का सबसे कठिन क्षण होता है।

​इस सफर में हमें अक्सर वो भूमिका निभानी पड़ती है जो कभी वे हमारे लिए निभाया करते थे। उनके फैसले हमें लेने होते हैं, जैसे कभी वे हमारे भविष्य के लिए लिया करते थे। हम उनकी भलाई के लिए जो निर्णय लेते हैं, उनमें से कौन सा 'सही' था और कौन सा 'गलत', यह तो सिर्फ वक्त ही बताता है। कभी-कभी विवशता में लिए गए फैसले हमें अंदर तक तोड़ देते हैं, हमें लगता है कि शायद हम कुछ और बेहतर कर सकते थे।

​लेकिन याद रखिए, उनके जाने के बाद मन में उठने वाले 'पछतावे' से कहीं ज्यादा सुकून इस बात का होता है कि हम उनके साथ थे। हम उनके अंतिम क्षणों तक उनकी सेवा में उपस्थित रहे। यह संतुष्टि ही उस खालीपन को भरने की ताकत देती है जो उनके जाने के बाद पीछे छूट जाता है।

​आज वे भले ही भौतिक रूप से हमारे बीच न हों, लेकिन हम उनके जाने के बाद भी उन्हीं को जी रहे हैं। उनके संस्कार, उनकी सीख और उनके दिए हुए मूल्य हमारे हर फैसले में जीवित हैं। असल में, वे कहीं गए ही नहीं, वे तो हमारे व्यक्तित्व में, हमारे व्यवहार में और हमारी यादों में हमेशा हमारे साथ हैं।

Wednesday, June 10, 2026

क्रांति या कठपुतली?

जब से बंगाल के चुनाव हुए हैं, तब से हमारी आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक गिरावट का ज़िक्र अचानक कुछ ज़्यादा ही बढ़ गया है।
क्या देश की आर्थिक हालत एक दिन में अचानक ही गिरने लगी होगी? उससे पहले इन विषयों पर इतना खुलकर कोई पॉडकास्ट भी नहीं आ रहा था और न ही देश की सरकार का इस स्तर पर इतना खुलकर विरोध हो रहा था।
समझ नहीं आ रहा कि हम किसी क्रांति की ओर बढ़ रहे हैं या फिर किसी की कठपुतली बनते जा रहे हैं। हमें खुद ही पता नहीं।
नेपाल और बांग्लादेश में जिस तरह के हालात बने, वह हम सबने देखे। सोशल मीडिया का कमाल देखिए—रातों-रात सरकार बदल गई, लेकिन फिर देश के हाथ क्या आया? एक दिशाहीन सरकार।
मैं किसी सरकार के समर्थन में नहीं लिख रहा हूँ, पर ऐसा न हो कि देश ऐसी दिशा में चला जाए जहाँ से उसे वापस लाना आसान न रहे।
सरकार को भी जिन चीज़ों को समझदारी से संभालना चाहिए था, वह भी कहीं-कहीं वही करती दिखाई दे रही है जो कभी पुरानी सरकार अपने आख़िरी दिनों में किया करती थी।
वे शिक्षक, जिन्होंने हमें लफ़्ज़ों में ज्ञान दिया, जिन्होंने न जाने कितने अनसुलझे प्रश्नों के उत्तर दिए, आज वही कटघरे में खड़े हैं।

Sunday, May 31, 2026

चाँद वहीं था

एक चकोर था, जो हर रात चाँद को निहारता था। उसकी ओर खिंचा चला जाता था। उसे लगता था कि चाँद ही उसकी दुनिया है, उसका प्रेम है, उसका जीवन है। चाँद भी यह देखकर अभिभूत था कि कोई उस पर इतना मोहित है।
समय बीता। एक रात बादल छा गए, फिर अमावस्या आई। चाँद की रोशनी गायब हो गई। लेकिन चाँद कहीं गया नहीं था। वह वहीं था, उसी आसमान में, उसी जगह। बदला केवल इतना था कि उसकी रोशनी दिखाई नहीं दे रही थी।
चकोर ने कुछ रातें प्रतीक्षा की, फिर धीरे-धीरे किसी और उजाले की ओर उड़ गया।
चाँद हैरान था। उसे लगा था कि चकोर उसका प्रेमी है। पर सच यह था कि चकोर चाँद का नहीं, उसकी रोशनी का दीवाना था। और वह रोशनी भी चाँद की अपनी कहाँ थी? वह तो सूरज से उधार ली हुई थी।
जब तक चाँद चमकता रहा, चकोर उसके इर्द-गिर्द मंडराता रहा। जैसे ही उजाला कम हुआ, उसका प्रेम भी कम हो गया।
तब चाँद को समझ आया कि चकोर को उसके होने से प्रेम नहीं था, उसके चमकने से था। क्योंकि जब चाँदनी चली गई, तब चकोर भी चला गया; जबकि चाँद तो अब भी वहीं था—उसी आसमान में, उसी जगह, अपने पूरे वजूद के साथ।

Sunday, May 10, 2026

माँ- तुम्हे Mothers Day की हार्दिक शुभकामनाएं

आज Mothers Day है।
सब अपनी माँ को इस दिन की हार्दिक शुभकामनाएँ दे रहे हैं,
पर उनका क्या जो “माँ” तो रोज़ बुलाते हैं,
पर “हाँ बेटा, मैं हूँ…” की आवाज़ अब वापस सुनाई नहीं देती।
माँ तो परमधाम चली गईं। कहते हैं, माँ कहीं भी रहे, अपने बच्चों को कभी नहीं भूलती।
पर एक सच यह भी है कि बच्चे भी माँ को हर रोज़ जीते हैं — हर पल, हर घड़ी।
आज जब मेरा बेटा अपनी माँ को Mothers Day की बधाई दे रहा था,
तो सच मानो, तुम्हारा एहसास आँखों में पानी बनकर उतर आया।
सभी को Mothers Day की हार्दिक शुभकामनाएँ।
जब तक माँ ज़िंदा रहती है, शायद उनकी अहमियत उतनी महसूस नहीं होती।
जिस दिन वो चली जाती हैं, उस दिन के बाद इंसान उनकी यादों के साथ हर रोज़ जीता है

तुम्हारा बेटा
राहुल

Monday, February 16, 2026

विवाह के चौदह बरस


आज हमारे विवाह को 14 वर्ष हो गए। कहते हैं 14 वर्ष का समय बहुत बड़ा होता है। राम ने 14 वर्ष का वनवास पूर्ण कर जब अयोध्या लौटकर अपने प्रियजनों को गले लगाया होगा, तो वह मिलन कितना मधुर रहा होगा।
हमारे इन 14 वर्षों में भी कितने ही मौसम आए- कभी धूप, कभी छाँव, कभी बारिश की नमी, तो कभी सर्द सुबहों की खामोशी।
प्रेम हुआ… झगड़े भी हुए… रूठना भी आया… मनाना भी।
पर हर बार अंत में जो बचा, वह सिर्फ “हम” थे।
कहते हैं समय के साथ प्रेम कम हो जाता है, पर मुझे लगता है हमारा प्रेम बदला है- गहरा हुआ है, शांत हुआ है, समझदार हुआ है।
अब हाल कुछ ऐसा है कि मैं अगली बात क्या कहूँगा, यह उन्हें पहले से पता होता है।
मेरे तर्क, मेरे बहाने, मेरी आधी अधूरी दलीलें- सब उनकी मुस्कान के आगे हार मान लेती हैं।
कई बार बिना बोले ही बातें पूरी हो जाती हैं, जैसे दिलों के बीच कोई अदृश्य संवाद चलता हो।
इन 14 वर्षों में उन्होंने सिर्फ मेरा साथ नहीं दिया, उन्होंने मुझे समझा, सँभाला, और कई बार मुझसे बेहतर “मुझे” जाना।
उनके बिना यह सफर अधूरा था, है और रहेगा।
आज इन 14 वर्षों के बाद मैं कोई ठहराव नहीं देखता-
मैं एक नई शुरुआत देखता हूँ।
नए सपनों के साथ, नए वादों के साथ, और उसी पुराने प्रेम के साथ…
जो हर सुबह फिर से नया लगता है।
आप सभी परिवारजनों और इष्टमित्रों का आशीर्वाद यूँ ही बना रहे....
समय से परे, शब्दों से परे… सिर्फ प्रेम में।🙏

Thursday, February 12, 2026

दिखावे का महोत्सव और हाशिए पर दोस्ती: आडंबर और सच्ची दोस्ती के बीच का संघर्ष।


​हम आज उस दौर में हैं, जिस दौर में कभी हमारे माता-पिता थे। कॉलेज के दिन बीत चुके हैं और शादी के बाद अब बच्चे भी बड़े हो गए हैं। बच्चे अब अपना ख्याल खुद रख सकते हैं। अब हमारे पास दोस्ती निभाने का वक्त और हौसला दोनों है, पर मैं देख क्या रहा हूँ?

​समय के साथ दोस्ती के सारे समीकरण बदल रहे हैं। जो दोस्त हमारे साथ फकीरी में रहे, जिन्होंने एक ही थाली में निवाले तोड़-तोड़ कर खाए, अब उनका परिवेश बदल चुका है। उनकी आर्थिक स्थिति के अनुसार उनके मित्र और मंडली बदल गई है। हम अलग-अलग आर्थिक समूहों में बंट गए हैं, जहाँ एक समूह का व्यक्ति दूसरे समूह में अब सहजता से जा नहीं सकता।

​यदि आप एक साधारण जीवन जीते हुए यह चाहते हैं कि सामने वाला भी वैसा ही सरल रहे, तो यह अब संभव नहीं लगता। आपकी सरलता कभी-कभी आपके लिए ही कठिनाई बन जाती है, क्योंकि जब आप सादगी चुनते हैं, तो सामने वाला आपके प्रति अपना व्यवहार कठिन (जटिल) कर लेता है।

​दोस्त अब हमें हमारी आर्थिक और सामाजिक स्थिति के अनुसार ही दावत पर बुलाते हैं। 'विशिष्ट' श्रेणी के मित्रों के लिए 'रिटर्न गिफ्ट' अलग से पैक होता है और यदि आप साधारण हैं, तो आपके हिस्से साधारण उपहार ही आता है।

​जन्मदिन और विवाह की वर्षगांठ पर आपको घर तो बुलाया जाता है, पर उस दिन नहीं जिस दिन वास्तविक उत्सव होता है। आपको कुछ दिन पहले या बाद में बुलाया जाता है, क्योंकि उस मुख्य दिन पर तो उन्हें अपने 'खास' लोगों के साथ ही जश्न मनाना है।

​हम बचपन से साथ रहे और हर पल साथ जिया, पर अब उन्हें पुरानी दोस्ती भी निभानी है और नए रसूखदार लोगों के साथ भी जुड़े रहना है। इसलिए असली दिन 'उनके' नाम रहता है और बाकी कोई दिन 'हमारे' नाम, ताकि उनके मन में कोई अपराधबोध (गिल्ट) भी न रहे और उनका महोत्सव भी संपन्न हो जाए।

अनचाहा अपराधी

जब आप यह तय करते है कि आप किसी को तकलीफ नही देंगे तो अंत में हासिल यही होता है की  स्वयं आप किसी की तकलीफ का कारण बन गए हो

Thursday, January 8, 2026

अमरनाथ — वादा जो पूरा न हुआ


कुछ बरस पहले की यह बात है, जब हम नवरात्रि के समय अपने मित्र के साथ रामकृष्ण मिशन गए थे, जो कि लखनऊ में है। दुर्गा पूजा देखने के बाद, जब हम अपने परिवार एवं मित्रों के साथ परिसर का भ्रमण कर रहे थे, तभी अचानक एक व्यक्ति सामने आता है और बोलता है कि तुम राहुल हो न।
मैंने बोला, हाँ, मैं राहुल हूँ।
फिर वह बोलता है कि अगर तुमने मुझे पहचान लिया तो ठीक है, नहीं तो मैं तुम्हारे रास्ते से हट जाऊँगा।
समझ नहीं आ रहा था कि ऐसा कौन है जो मुझे जानता है और इतने आत्मविश्वास से मिल रहा है। तभी कुछ मिनट सोचने के बाद मुझे याद आया उसका चेहरा। वह कोई और नहीं, हमारे स्कूल के दिनों का मित्र था। बीस सालों से भी ज़्यादा समय हो गया था उससे मिले। नाम याद करने में थोड़ी तकलीफ़ हो रही थी। थोड़ी जद्दोजहद करने के बाद मुझे उसका नाम याद आया।
नाम था अमरनाथ। मेरे पहचान लिए जाने के बाद वह खुश हुआ और हमने अपने नंबर एक-दूसरे से साझा किए। रास्ता तो छोड़ दिया था उसने, फिर कभी मिलने का वादा कर वह चला गया। मैं भी आगे बढ़ चला मंदिर परिसर घूमने और प्रसाद लेने के लिए।
वक़्त बीतता जा रहा था और मुझे याद ही नहीं रहा कि कभी उसे मिला था। दो बरस के बाद अचानक कॉन्टैक्ट डिटेल्स देखने पर अमरनाथ का नाम दिखा, जिससे न तो दोबारा मिलने की कोशिश की और न ही कोई संदेश भेजा।
2025 के दिसंबर के आख़िरी दिन चल रहे थे। एक दिन मैंने अपनी फटफटिया उठाई और निकल लिया उसके घर की तरफ। बीस साल पहले का मोहल्ला आज बहुत बदल गया था। एक-मंज़िला मकान अब कई-मंज़िला हो गए थे। घरों के बाहर की बनावट भी बदल चुकी थी। सभी घरों की ज्यामिति बदल जाने के कारण उसका घर मुझे नहीं मिला। मैं वापस आ गया। फिर घर से मैंने उसे फ़ोन मिलाया। एक बार में न उठा तो दोबारा फ़ोन मिलाया। फ़ोन उठा और मैंने बोला, “अमरनाथ!”
उधर से आवाज़ आई, “हाँ भाई राहुल, क्या हाल है?”
बात शुरू हुई कि हम मंदिर में मिले थे, फिर दोबारा मौका ही नहीं लगा कि मिल सकें। मैंने पूछा, “कहाँ हो तुम?”
उधर अमरनाथ बोला, “भाई, अभी तो मैं कानपुर में हूँ। कभी-कभी वीकेंड पर घर आता हूँ। इस वीक घर जाऊँगा तो कॉल करता हूँ।”
मैंने बोला, “हाँ भाई, घर पहुँचना तो कॉल करना।”
दुआ-सलाम के बाद फ़ोन रख दिया। नया साल आया, फिर मैंने मोबाइल पर संदेश भेज नए वर्ष की बधाइयाँ दीं। अमरनाथ की तरफ से कोई संदेश नहीं आया, तो आगे बात हुई ही नहीं। मैं भी नए वर्ष के बाद अयोध्या अपनी ससुराल आ गया, एक फ़ंक्शन के मौके पर।
तभी स्कूल के ग्रुप में एक मैसेज देखा—किसी का शोक संदेश। पढ़ते ही मेरी हवाइयाँ उड़ गईं। दिल बार-बार यही कह रहा था कि यह वह नहीं है, कोई और होगा। फ़ोन में उसकी फोटो देखनी चाही, तो डीपी में उसके बच्चों की फ़ोटो थी। चेहरा समझ नहीं आ रहा था। तभी मैंने अपने मित्र दिवान को कन्फ़र्म करने के लिए फ़ोन किया। दिवान भी घर से बाहर गया हुआ था। बात सुनकर वह भी चकित था। थोड़ी देर बाद फ़ोन करने को कहकर उसने फ़ोन काट दिया।
कुछ पल बीते न थे कि फ़ोन फिर आया। बोला, “भाई, यह वही है जो तुम्हें मंदिर में मिला था।” सदमे में वह भी था। “शरद से बात करने को बोल रहा हूँ,” कहकर फ़ोन काट दिया। मुझे अभी भी यक़ीन नहीं हो रहा था कि वह यही अमरनाथ है। फ़ोन हाथ में था ही, तभी मैंने काँपते हुए हाथों से फ़ोन मिलाया कि शायद अमरनाथ ही फ़ोन उठाए।
तभी उधर से एक काँपती हुई आवाज़ आई, “जी, बताइए।”
मैंने बोला, “क्या अमरनाथ से बात हो सकती है? मैं उसका बचपन का दोस्त राहुल बोल रहा हूँ।”
उधर से आवाज़ आई, “अब वो तो नहीं रहे।”
मैंने बोला, “हमने मिलने का वादा किया था…”
अभी वह जो बोली, वे शब्द आज भी मेरे कानों में गूँज रहे हैं

“अब हम ही नहीं मिल सकते हैं, आप क्या मिलोगे।”
निःशब्द हो मैंने फ़ोन रख दिया।

Saturday, January 3, 2026

अव्यक्त प्रेम की सुंदरता

मेरी समझ से, एकतरफा प्यार जिसे कभी बयान ही न किया गया हो, वह हमेशा ज़िंदा रहता है। बिना किसी उम्मीद के बोझ के, वह हमेशा खुशी का अहसास देता रहता है। जो प्यार कामयाब हो जाता है, वह शायद उतनी खुशी नहीं देता।

​इसलिए हर किसी को प्यार करना चाहिए। हमने यह भी देखा है कि प्रेम कभी सिर्फ एक से नहीं होता है। काल, स्थान और परिस्थिति पर निर्भर करता है कि आपको किससे और कितना प्यार होगा।

​प्रेम भाई, बहन, दोस्त—किसी से भी हो सकता है। प्रेम में इंसान सबकुछ लुटा सकता है और लुटाने के बाद भी उसे खुशी का ही अहसास रहता है।