क्या आपने कभी सोचा है कि एक अच्छा लीडर कहाँ बनता है? किसी बड़े कॉर्पोरेट ट्रेनिंग प्रोग्राम में या किसी प्रतिष्ठित मैनेजमेंट कॉलेज में? मेरा मानना है कि इसकी नींव हमारे अपने घरों में रखी जाती है।
बात सिर्फ लीडरशिप क्वालिटी की नहीं है, बल्कि जीवन भर सही निर्णय लेने की क्षमता की है। अगर एक बच्चे को कभी भी अपने फैसले खुद लेने का मौका नहीं मिला, तो वह जिंदगी भर अपने प्रोफेशनल फैसलों में भी कमजोर रहेगा।
जब हम बच्चे के हर छोटे-बड़े फैसले में दखल देते हैं और उसे नीचा दिखाते हैं, तो हम अनजाने में उसका आत्मविश्वास तोड़ रहे होते हैं। अगर वह हिम्मत करके कोई निर्णय लेता भी है, तो लोग उसे 'असली' नहीं मानते। वे कहते हैं, "इस पर किसी का प्रभाव है," या "इसे किसी ने सिखाया है।" निजी जिंदगी में तो इससे भी बुरा होता है। घरवाले कहते हैं, "लड़के पर टोना हो गया है," या "लड़की ने उसे अपने वश में कर लिया है।"
जब कोई बच्चा ऐसी बातें सुनता है, तो उसका आत्मविश्वास पूरी तरह बिखर जाता है।
इसलिए, बच्चों को उनके फैसले लेने दीजिए। उन्हें गिरने दीजिए। हाँ, वे 10 बार गिरेंगे, पर ठीक है। जब भी वे उठेंगे, खुद से उठेंगे। वे अपनी हर असफलता से सीखेंगे कि कैसे दोबारा खड़ा होना है।
यह एक ऐसा सबक है जो उन्हें जीवन भर आगे बढ़ने में मदद करेगा। याद रखिए, मजबूत फैसले लेने वाला इंसान किसी कंपनी का अच्छा लीडर ही नहीं, बल्कि अपनी जिंदगी का भी बेहतर लीडर बनता है।
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