Sunday, August 17, 2025

​वो घर अब मेरा नहीं

एक बार जो लड़का घर छोड़ दे, तो समझो वो मर गया।

​यह बात मुझे आज समझ आई। पापा ने ऐसा क्यों कहा, शायद इसलिए कि वो सिर्फ अपने हिस्से का सच कह रहे थे, मेरे हिस्से का नहीं। मैं तो उन्हें रोज़-रोज़ जी रहा था।

​बरसों बाद मुझे एहसास हुआ कि सब मेरे बिना जीना सीख चुके हैं। जब मैं वापस आया, तो मेरा सारा सामान, मेरी किताबें, मेरी अलमारी हटा दी गईं, जैसे किसी के मरने के बाद उसकी यादें मिटा दी जाती हैं। दर्द तब हुआ जब मुझे यह समझ आया कि अब मेरी किसी को ज़रूरत नहीं।

​फिर भी मैं घर आता रहा। सबके अपने-अपने कमरे थे, पर मेरा कोई कमरा नहीं था। मैं जब भी आता, तो सब कहते कि उसके कमरे में सो जाओ। मेरा कुछ था ही नहीं, मानो मेरी जड़ें ही काट दी गई हों।

​शादी के बाद भले एक कमरा मिला, पर वो भी मेरा नहीं था, सबका था। उसमें मैं कुछ भी अपने हिसाब से नहीं रख सकता था। अगर रखने की कोशिश करता, तो मानो गुस्ताखी हो जाती।

​किसी को अंदाज़ा नहीं था कि एक दिन कोरोना आएगा और वर्क फ्रॉम होम के चलते मैं फिर घर आ जाऊँगा। उन दिनों जब सबने मान लिया था कि मैं कभी नहीं लौटूँगा, मैं वापस आ गया। और एक दिन ऐसा भी आया जब मुझे सिर्फ़ कमरे से ही नहीं, पूरे घर से निकाल दिया गया।

​जिस घर में मेरा बचपन बीता, जिसकी दीवारों ने मेरी हँसी और चुप्पियों को सँभाला था, वो घर अब मेरा नहीं रहा। और जब माँ-बाप परमधाम चले गए, तो उस घर से जुड़ी बची-खुची यादें भी मेरी नहीं रहीं। धीरे-धीरे लोग कहने लगे, “वो तो यहाँ थे ही नहीं, उनका कोई हक़ कहाँ बनता है?”

​तब जाकर मुझे पूरी तरह समझ आया कि पहला वाक्य सही था। कि बच्चा जब घर से निकलता है, तो वो सचमुच घर से मिट ही जाता है।

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