Friday, July 25, 2025

मेरे पिता की कहानी: एक संघर्षमय यात्रा

मेरे पिता की कहानी: एक संघर्षमय यात्रा

आज जब मैंने कलम उठाई, तो शब्दों ने स्वयं राह पकड़ ली — एक ऐसी राह, जो मेरे पिता की यादों से होकर गुजरती है। वे अब हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनका साया, उनकी सीख, उनकी मुस्कान — सब मेरे साथ हैं, हर दिन, हर फैसले में।

मेरे पिता सिर्फ मेरे जीवन के स्तंभ नहीं थे, वे मेरे जीवन का मार्गदर्शक सितारा थे। उनके संघर्षों की परछाइयाँ और सफलताओं की रोशनी — दोनों ही मुझे दिशा देते रहे हैं।

यह कहानी उनके जीवन की नहीं, उनके जीवट की है। यह उस मिट्टी की खुशबू है, जहाँ से वे उठे, उस आंधी का ज़िक्र है जिससे वे टकराए, और उस सूरज का स्मरण है जिसे उन्होंने खुद के भीतर जगाया।

यादें जब शब्दों में ढलती हैं, तो वे इतिहास नहीं रहतीं — वे विरासत बन जाती हैं। यह विरासत मैं सहेज रहा हूँ, ताकि आने वाली पीढ़ियाँ जानें कि एक साधारण व्यक्ति कैसे असाधारण बन जाता है।

1. जन्म और बचपन की दहलीज

मेरे पिताजी का जन्म उत्तर प्रदेश के गोंडा ज़िले के एक छोटे-से गाँव भटवलिया में हुआ था — करीब 10 फरवरी 1951 के आसपास। सरकारी कागज़ों में यही तारीख़ दर्ज है, पर असल जन्म किस दिन हुआ था, ये बात पक्के तौर पर कोई नहीं जानता। उस समय तिथियाँ याद नहीं रखी जाती थीं, मौसम, त्योहार या किसी घरेलू घटना के आस-पास ही जन्म की पहचान होती थी। यही उस दौर की सच्चाई थी।

  परिवार में उन्हें मिलाकर तीन भाई और दो बहनें थीं, और पिताजी उन सबमें सबसे बड़े थे। सबसे बड़े होने के नाते ज़िम्मेदारियाँ भी सबसे पहले उन्हीं के हिस्से आईं। छोटे भाई-बहनों के लिए वे सिर्फ़ भाई नहीं, एक तरह से अभिभावक जैसे ही थे। 

हमारे बाबा (दादाजी) लकड़ी का काम करते थे — बढ़ई थे। जो कुछ भी रोज़ की मेहनत से कमा कर लाते, उससे घर का जैसे-तैसे भरण-पोषण हो जाता था। पेट भर जाता था, लेकिन मन की इच्छाएँ अक्सर अधूरी ही रह जाती थीं।

घर में सदस्यों की संख्या अच्छी-ख़ासी थी, और अक्सर कोई न कोई रिश्तेदार या मेहमान भी महीनों ठहरा करता था। उस समय ये सामान्य बात थी — किसी को मना करना रिवाज में नहीं था। पर इसका असर बाबा की कमाई पर ज़रूर पड़ता था, क्योंकि जिम्मेदारियाँ बढ़ जाती थीं।

थोड़ी-बहुत खेती भी थी, लेकिन वह इतनी नहीं थी कि उस पर पूरी तरह निर्भर हुआ जा सके। इसलिए जब भी ज़रूरत पड़ती, घर के सभी सदस्य — बच्चे, महिलाएँ, और खुद बाबा — खेतों में एकजुट होकर काम करते थे। यही जीवन था — साधन सीमित थे, लेकिन सहयोग और समझदारी अपार थी।

2. शिक्षा का जुनून और संघर्ष

बुआ अक्सर बताया करती थीं कि बाबा जी का मन था कि पिताजी पढ़ाई करें। इसलिए वे उनसे खेतों में ज़्यादा काम नहीं करवाते थे। उनके मन में ठान लिया था कि चाहे जैसे भी हो, बेटे की पढ़ाई में कोई कमी नहीं आने देंगे।

पिताजी का भी पढ़ाई में मन लगता था, लेकिन इसका ये मतलब नहीं था कि वे जिम्मेदारियों से बचते थे। स्कूल से लौटते ही बिना थके सीधे खेत में बाबा का हाथ बंटाने पहुँच जाते थे। उनकी दिनचर्या बिल्कुल तय थी — सुबह स्कूल, दोपहर खेत, और शाम को ढिबरी की टिमटिमाती रोशनी में पढ़ाई।

वे अक्सर कहा करते थे, “अगर पढ़ने का जुनून हो, तो बिजली का इंतज़ार नहीं करना पड़ता — स्ट्रीट लाइट भी काफी होती है।” उन्होंने कई ऐसे लोगों को देखा था जो सरकारी खंभों की रौशनी में बैठकर पढ़ते थे और परीक्षा में टॉप करते थे।

जैसे-जैसे छोटे भाई बड़े होते गए, पिताजी का खेतों में जाना थोड़ा कम होता गया, और वे पूरी तरह पढ़ाई में मन लगाने लगे। जिम्मेदारियाँ अब भी थीं, लेकिन अब उनका लक्ष्य भी साफ़ होता जा रहा था।

उस समय अभाव था, पर वह सिर्फ़ उनका नहीं था, सबके साथ था। न जूते की कमी अजीब लगती थी, न किताब के लिए तरसना दुखद, क्योंकि उस समय यह सब सामान्य था। शायद इसी कारण कोई शिकायत नहीं थी। आज जब पीछे मुड़कर देखते हैं, तो लगता है कि वह आम ज़िंदगी आज कितनी विशेष थी। जहाँ संघर्ष व्यक्तिगत नहीं, सामूहिक होते थे — और उस साझेपन में एक अद्भुत संतुलन था। जो बीत गया, वो समय नहीं था — वो सिखावन थी, जो अब जीवन का हिस्सा बन चुकी है।

उनकी पढ़ाई आसान नहीं थी — संघर्ष हर कदम पर था। गाँव के कुछ दबंग लोग नहीं चाहते थे कि पिताजी पढ़ाई करें। उनका मानना था कि अगर कोई उनसे नीची जाति का लड़का पढ़-लिख गया, तो वो अपने अधिकार पहचान लेगा। बेगारी खत्म हो जाएगी, लोग उनके खेतों में बिना मेहनताना काम करने से इनकार कर देंगे, और फिर शायद उन्हें सलाम भी नहीं करेंगे। यही डर उनके अहम को खाए जाता था।

वे चाहते थे कि गाँव के गरीब लोग हमेशा सिर झुकाकर चलें, किताबों से दूर रहें, ताकि सत्ता और सम्मान सिर्फ उन्हीं के पास बना रहे। पिताजी को बार-बार डराया गया, धमकाया गया — यहाँ तक कि कई बार लड़ाई-झगड़े और मारपीट की नौबत भी आई।

लेकिन पिताजी हिम्मत से कभी पीछे नहीं हटे। वे शारीरिक रूप से मजबूत थे और खुद्दार भी। अगर किसी ने ज़्यादा दबाव डाला, तो वे जवाब देना जानते थे। लेकिन एक बात तय थी — पढ़ाई से कभी समझौता नहीं किया। उनका कहना था, "ज़ुल्म सहना गलत है, और हक़ के लिए लड़ना ज़रूरी।"

शिक्षा उनके लिए सिर्फ़ ज्ञान नहीं थी, सम्मान और आत्मनिर्भरता का रास्ता थी। वे हमेशा पढ़ाई में अव्वल रहे। स्कूल में शिक्षक बहुत सख्त थे, सबक याद न हो तो बुरी तरह पीटते थे। लेकिन पिताजी को कभी मार खाने की नौबत नहीं आई। वे सबक समय से पहले ही याद कर लेते थे।

हमें जब कभी पढ़ाई में ढील मिलती, तो वे मुस्कुराकर कहते,

"तुम्हें 2 से 20 तक की टेबल याद नहीं होती, और हमसे तो टीचर पौना, अद्धा, सवा तक के पहाड़े रटवाते थे।"

उनका अंदाज़ मज़ाकिया होता था, लेकिन उसके पीछे मेहनत की पूरी कहानी छिपी होती थी।

3. तालाब का किस्सा: दादी का गुस्सा और पिताजी की पिटाई

एक बार की बात थी कि पिताजी खेतों में काम कर रहे थे। तभी कुछ लोग गाँव के तालाब में मछली मार रहे थे। वे तालाब में घुसकर मछली पकड़ रहे थे और जैसे ही मछली हाथ आती, वे झट से तालाब के किनारे फेंक देते थे। पिताजी वहीं तालाब के किनारे बैठकर यह सब देख रहे थे। तभी किसी ने दादी को बता दिया कि "बड़के भैया तालाब में मछली मार रहे हैं।"

तभी दादी उठीं और डंडा लेकर तालाब के किनारे पहुँच आईं। सुनते हैं, वे पिताजी को पीटते हुए घर तक लाईं और कुएँ से पानी निकालकर नहलाया। पिताजी लगातार सफ़ाई दे रहे थे कि वे सिर्फ़ देख रहे थे, छुआ नहीं था, पर दादी कहाँ मानने वाली थीं! पिटाई जारी रही। बाद में पिताजी की दादी, जिन्हें वे प्यार से 'दीदी' कहते थे, ने आकर उन्हें छुड़ाया। पिताजी दुबक कर दीदी के पास चिपक कर घंटों तक रोए और कुछ दिनों तक उन्हीं के पास रहे। यह घटना पिताजी के बचपन की एक मज़ेदार और मार्मिक याद थी।

4. बड़े बप्पा से दोस्ती और बचपन की नोकझोंक

पिताजी अपने एक बड़े भाई, जो उनकी बुआ के लड़के थे, उनका किस्सा बड़े मज़े से बताते थे। उन्हें हम 'बड़के बप्पा' बुलाते थे। जब भी पिताजी की बुआ घर आती थीं, तो उनके साथ उनका बेटा भी आता था, जो पिताजी से कुछ ही साल बड़े थे, पर ख़ानदान में सबसे बड़े थे। उनसे पिताजी का बहुत पंगा होता था। उनके आते ही लड़ाई शुरू हो जाती थी।

एक बार की बात थी कि दोनों में किसी बात को लेकर इतनी लड़ाई हुई कि एक-दूसरे को मारने के लिए ईंट उठा ली। मारने ही जा रहे थे कि पिताजी की दादी और उनके बड़े भाई मिसरीलाल की नानी ने दोनों को संभाला। बाद में मेरी दादी और पिताजी की बुआ में अलग से वाद-विवाद शुरू हो गया। दोनों जब लड़ लीं, तो थोड़ी देर बाद फिर से खेलने लगे। पिताजी बताते थे कि बचपन में खूब लड़ाई होती थी, पर बाद में उनसे ही सबसे ज़्यादा प्यार था। दोनों भाई एक-दूसरे का खूब ख़्याल रखते थे। बिना उनके हमारे घर में कोई फंक्शन नहीं होता था। बचपन बीत जाता है, पर उसकी ख़ामोश गूंज ज़िंदगी भर साथ चलती है।

5. गुड़ का किस्सा: बड़ी बुआ की शरारत और पिताजी की चतुराई

एक बार की बात थी, घर में गुड़ आया था। उस समय गुड़ बहुत क़ीमती हुआ करता था। मेहमान के आने पर वही परोसा जाता था। दादी शायद किसी मेहमान के आने पर गुड़ निकाल रही थीं, तभी देखा कि उस पर कुछ दाँतों के निशान थे। दुर्भाग्य से पिताजी भी वहीं मौजूद थे।

पिताजी ने सारे भाई-बहनों को बुलाया और पूछा, "किसने खाया है यह?" किसी का कोई जवाब नहीं मिला। डराया गया, फिर भी कोई नहीं बोला। तब पिताजी ने जुगत लगाई और बोले, "अब सब मुँह खोलो और जिसके दाँत फ़िट हो जाएँगे, उसकी कुटाई पक्की।" फिर भी कोई नहीं बोला और चेकिंग शुरू हुई। आखिर में दाँतों के निशान बड़ी बुआ के निकले और फिर उनकी भी कुटाई चालू हुई। बुआ के दाँत ख़ास हैं – उनके दाँतों के बीच में थोड़ी ज़्यादा जगह है। यह किस्सा पिताजी को उनकी बचपन की शरारतों और परिवार के अनमोल पलों की याद दिलाता था।

6. बाबा पर हमला और पिताजी का दर्द

यह उस समय की बात है, शायद हम तीनों भाई-बहनों में से कोई पैदा नहीं हुआ था। उन दिनों का किस्सा है कि हमारे बाबा घर के बगल में चल रही नौटंकी देखने गए थे। उन दिनों नौटंकी देखना बहुत ख़ास हुआ करता था। उसी के बीच में किसी से हमारे बाबा का पंगा हो गया था। हमारे बाबा को दो लोगों ने पकड़ा और मारने लगे थे। हमारे घर का कोई और वहाँ नहीं था, बाबा शायद अकेले थे। दो लोगों ने मेरे बाबा को खूब पीटा और टाँगारी (कुल्हाड़ी) से उन पर वार किया। बाबा भी बलिष्ठ थे, उन्होंने मुकाबला किया, पर टाँगारी का एक वार उनके हाथ में जा लगा और वे घायल हो गए। बाद में लड़ाई शांत हुई थी।

पिताजी को जब यह पता लगा, तो वह घाव बाबा को नहीं, बल्कि पिताजी के दिल को चीर गया। हाथ का घाव तो भर गया, पर दिल का कभी नहीं भरा। गाँव में कुछ दबंग और शक्तिशाली लोग थे, जो ज़मींदार जैसे थे, पर हमारा परिवार भी धीरे-धीरे शक्ति अर्जित कर रहा था। पिताजी को अपने जीवन में कुछ कर गुज़रने का जुनून शायद इसी घटना से आया, यह उनके लिए एक गहरा भावनात्मक आघात थी जिसने उन्हें और मज़बूत बना दिया। पुरानी बातें धूल नहीं होतीं, वे आत्मा की परतों में चमकते अनुभव होते हैं।

7. दबंगों से सामना और अनमोल एहसान

गाँव के दबंगों ने एक बार पिताजी को जान से मारने के लिए कुछ गुंडे भेजे थे। जब उन गुंडों को पता लगा कि पिताजी मेरे बाबा राम फूल के बेटे हैं, तो उन्होंने मेरे बाबा को बताया, "तुम्हारे बेटे को मारने के लिए कुछ लोगों ने गुंडे भेजे थे।"

दरअसल, मेरे बाबा का उन गुंडों पर कुछ एहसान रहा था, उन्होंने मुसीबत में उनकी सहायता की थी। उसका बदला चुकाने के लिए उन्होंने पहले से बाबा को बता दिया और यह सुनिश्चित किया कि कोई और मेरे पिताजी को न मार सके। उन्होंने उन दबंगों को चेतावनी भी दी कि अगर इस लड़के को कुछ हुआ तो वे उन्हें नहीं छोड़ेंगे। यह घटना दिखाती थी कि कैसे विपरीत परिस्थितियों में भी, पुराने संबंध और किए गए एहसान जीवन रक्षक बन जाते थे।

8. दबंगों से सीधी टक्कर और चाचा का रौद्र रूप

एक बार की बात थी, पिताजी अपने किसी रिश्तेदार के घर गए थे, उनका घर हमारे ही गाँव के दूसरे कोने में था। वे खाट पर बैठे थे, तभी गाँव के दबंग परिवार का एक सदस्य आया और बोला, "तुम खाट से नीचे बैठो, हम खाट पर बैठेंगे!" पिताजी बोले, "खाट मेरे बाप ने बनाई है, तो बैठूँगा तो मैं ही, तुम क्यों बैठोगे!" अपनी बेइज़्ज़ती सुन वह भड़क गया और पिताजी पर हाथ उठा दिया। पिताजी भी कम नहीं थे, उन्होंने उसे पकड़ा और उसकी अच्छी-ख़ासी धुनाई कर दी। वह अधमरा सा हो गया और बाकी दबंगों को बुलाने के लिए भागा।

पिताजी भागते हुए अपने चाचा जी के पास पहुँचे। पिताजी के चाचा भी कुछ कम नहीं थे; वे गाँव के बड़े लठबाज़ थे। गाँव के दबंग उन्हें ढूँढते हुए पिताजी के चाचा, जिन्हें वे 'काका' बोलते थे, उनके पास पहुँचे और पिताजी को उन्हें सौंपने को कहा। तब काका ने कहा, "मैं सौंप तो दूँगा, पर याद रहे कि अगर मेरे भतीजे को कुछ भी हुआ तो तुम्हारे घर से भी लाशें निकलेंगी। हम तो मरेंगे, पर तुम्हारे घर से भी कोई ज़िंदा नहीं बचेगा। खाट हम बनाएँ और हमें ही बैठने का अधिकार नहीं है – यह दबंगई नहीं चलेगी।" पिताजी यह भी बताते थे कि अगर कोई दबंगों के सामने से सिर उठाकर चला जाए तो वे उसे माँ-बहन की गालियाँ देने से भी नहीं चूकते थे। काका की इस दबंग धमकी सुनकर बाकी सब वापस चले गए।

फिर पिताजी अपने काका के साथ घर वापस आए। पिताजी बताते थे कि उनके काका गाँव के मशहूर लठबाज़ थे। जब वे लाठी घुमाते थे, तो कोई चीज़ उन पर फेंकने की हिम्मत नहीं करता था; उनकी लाठी से टकराकर वह चकनाचूर हो जाती थी। यह घटना पिताजी के निडर स्वभाव और परिवार के मजबूत समर्थन को दर्शाती थी।

9. राम भजन जी का साथ और बड़े सपने की नींव

घर से स्कूल 8 किलोमीटर दूर था, और गोंडा रेलवे स्टेशन होते हुए जाना पड़ता था। रास्ते में रेलवे कॉलोनी पड़ती थी, जहाँ पिताजी के सीनियर और दोस्त राम भजन जी रहते थे। उनसे उनकी गहरी दोस्ती हुई थी। दोनों साथ स्कूल जाते थे। राम भजन अपने बड़े भाई के साथ रेलवे कॉलोनी में रहते थे, जो रेलवे में नौकरी करते थे। पिताजी स्कूल जाते समय अक्सर उनके साथ ही जाते थे।

राम भजन जी, जिन्हें पिताजी अपना बड़ा भाई मानते थे, उन्हें एक बड़े भाई की तरह गाइड करते थे। पढ़ने में राम भजन जी बहुत अच्छे थे और टॉपर थे। पिताजी को आगे बढ़ने का सपना उन्होंने ही दिखाया था। राम भजन जी को जज बनने का जुनून था, यही उनका एकमात्र लक्ष्य था। तो वे खूब मन लगाकर पढ़ते थे और हमेशा अव्वल रहते थे।

10. बचपन की शादी

पिताजी के जीवन की एक और महत्वपूर्ण पड़ाव उनकी शादी थी। वे तब मुश्किल से 12 साल के रहे होंगे, जब उनके फूफा जी ने मेरी माँ से उनका रिश्ता तय कर दिया था। उन दिनों लड़की देखने जैसी कोई रस्म नहीं होती थी; बड़ों ने जो कह दिया, वही अंतिम निर्णय होता था। पिताजी अक्सर बताते थे कि उनकी शादी में पूरे पाँच दिनों की बारात थी। हमें शादी की सटीक सालगिरह तो याद नहीं, पर इतना पता है कि यह गेहूँ की कटाई के बाद हुई थी।

पिताजी अक्सर मज़ाक में कहते थे कि उन्हें तो याद भी नहीं कि उनकी शादी हुई थी! उनकी यह बात सुनकर माँ भी मुस्कुराते हुए कहती थीं कि उन्हें भी अपनी शादी का कोई ख़ास एहसास नहीं था। उन्हें तो बस ऐसा लगता था, जैसे यह गुड़िया-गुड़ियों का कोई बड़ा खेल हो, और उनके गुड्डे की शादी हो रही हो। पिताजी बताते थे कि उनके माता-पिता जी ने जब उन्हें बताया कि उनकी शादी हो गई है, तो उन्होंने बस मान लिया।

उस समय की शादियाँ आज से काफी अलग थीं। बारात में मनोरंजन के लिए 'नाचनिया' (लड़के जो लड़की का रूप धरकर नाचते और गाते थे) भी साथ जाते थे। लड़की के घर वाले बारातियों के स्वागत में गालियाँ गाते थे, जो एक पारंपरिक रस्म थी। घर की स्त्रियाँ एक तरफ शादी की रस्मों में व्यस्त होती थीं, तो वहीं दूसरी तरफ गालियों के गीत गूँज रहे होते थे। बाराती अपने साथ गोला दागने वाले (पटाखे चलाने वाले) को भी ले जाते थे, जिससे बारात में खूब धूम-धड़ाका होता था। बारात को अक्सर गाँव के बाहर खेतों में ठहराया जाता था, जहाँ गाँव के लोग बेटी की शादी में सहयोग के तौर पर अपने घर से खटिया और तख्त लाते थे, ताकि बाराती आराम से बैठ और सो सकें। इन्हीं खेतों में बड़े-बड़े टेंट लगाए जाते थे।

पिताजी यह भी बताते थे कि पाँच दिनों की इस बारात में हर रोज़ नए-नए पकवान परोसे जाते थे। इनमें पूड़ी, कद्दू की मिठास वाली सब्ज़ी, मसारंगी, खड़ी उड़द की दाल, भात (चावल), खाजा, बालूशाही, बूंदी का लड्डू, बड़ी बूंदी (जो धोड़ी चावल के आटे से बनती थी), दही, और चिउड़ा-घी-गुड़ जैसे स्वादिष्ट व्यंजन शामिल थे। यह सब बारातियों के लिए एक शानदार और यादगार दावत होती थी।

11. प्रेम मामा का साथ और बड़े सपने

इस कहानी में उनके चचेरे मामा प्रेम का ज़िक्र करना ज़रूरी है। पिताजी का ननिहाल शहर के पास ही था। उन दिनों एक परंपरा थी कि लड़कियों की संपत्ति उनके चचेरे भाइयों को मिल जाती थी, और मेरी दादी के साथ भी ऐसा ही हुआ। इसके बावजूद, पिताजी की अपने चचेरे मामा प्रेम से बहुत पटती थी। दोनों एक ही उम्र के थे, और प्रेम मामा पैसे से भी संपन्न थे।

दोनों साथ रहते, रात में फ़िल्में देखने जाते थे। उस समय की बात है जब किसी के पास साइकिल भी नहीं हुआ करती थी, उनके पास मोटरसाइकिल थी। पिताजी उन्हीं के साथ रहते थे – 'दांत काटी रोटी' जैसे रिश्ते थे उनके। नानी भी उन्हें बहुत प्यार करती थीं, तो उनका ननिहाल में आना-जाना लगा रहता था। प्रेम मामा का खुद मन पढ़ाई में नहीं लगता था, वे उन दिनों बिज़नेस के बारे में सोच रहे थे। पर पिताजी का संकल्प था कि उन्हें आगे बढ़ना था।

12. संघर्ष की पराकाष्ठा और पहली जीत

10वीं कक्षा के परिणाम की बात करें तो, परीक्षाएँ देने के बाद उन्हें यकीन था कि वे अच्छे नंबरों से पास हो जाएँगे। जब परिणाम आया और वे रिजल्ट देखने स्कूल गए, तो वहाँ उन्हें अपना नाम दिखा ही नहीं। उदास होकर वे घर वापस आए और बाबा जी के गले लगकर ख़ूब रोए। बाबा जी ने हौसला बढ़ाया और कहा, "तुम पढ़ो, फेल होने की चिंता मत करो।" रोने का एक और कारण था – 10वीं की परीक्षा के लिए बाबा ने साहूकार से उधार लिया था। पैसे इतने नहीं थे कि वे परीक्षा शुल्क दे पाते। पिताजी को आगे पढ़ाई करना मुश्किल लग रहा था। खैर, रात किसी तरह रोते हुए बीती।

सुबह एक मास्टर साहब अपनी साइकिल से भागते हुए आए और बाबा जी, जो अपने काम पर जा रहे थे, उन्हें रोका और बोले, "आपके बेटे ने टॉप किया है, फर्स्ट क्लास आया है! उसका रिजल्ट अलग छपता है, इसलिए वह देख नहीं पाया होगा।" बाबा भी दौड़ते हुए घर आए और पिताजी को गले लगा लिया। धीरे-धीरे यह ख़बर पूरे गाँव में फैल गई और फिर पूरी बिरादरी में। एक बात और जोड़ना चाहूँगा कि पिताजी को कोई भी उनके नाम से नहीं बुलाता था; घर में सब उन्हें 'भैया' कहते थे, चाहे कोई छोटा हो या बड़ा।

10वीं में टॉप करने के बाद, उन्होंने 12वीं भी फर्स्ट क्लास से पास की। साथ ही, परिवार की आर्थिक मदद के लिए उन्होंने टाइपिंग और शॉर्टहैंड भी सीखा। उसके बाद वे गोंडा में ही टाइपिस्ट की नौकरी करने लगे। उनकी पहली नौकरी कुनैन फैक्ट्री में लगी, जो मलेरिया की दवा बनाती और बाँटती थी। साथ में अलग-अलग जगह आवेदन भी करते रहे। उनका संकल्प था कि वे पढ़ाई करके गोंडा जैसे छोटे शहर को छोड़कर किसी बड़े शहर में जाएँगे।

13. गवना और नई पारिवारिक जिम्मेदारियाँ

स्कूल के दिन ख़त्म होने के बाद, जब माँ 18 साल की हो गईं, तब उनका गवना हुआ और वे पिताजी के घर आईं। अब उनके पास परिवार था। माँ की ज़िम्मेदारी भी बढ़ गई। घर में ज़रूरी सामान का अभाव था, साथ ही माँ के मायके में कोई और सहारा देने वाला नहीं था। तो दोनों की ज़िम्मेदारी उठाना आसान नहीं था, लेकिन मेरी माँ भी कमज़ोर नहीं थीं।

उन्हें खेती में अच्छा अनुभव था। जब भी वे ससुराल से मायके जातीं, तो खेतों में मज़दूर की तरह काम करतीं और साल भर का राशन इंतज़ाम करके देतीं, जिससे उनके घर वालों को कभी किसी के सामने हाथ न फैलाना पड़े। मैंने खुद अपनी माँ को बोझ उठाते हुए देखा है। गर्मी की छुट्टियों में जब हम नानी के घर जाते थे, तो गेहूँ काटने का वक्त हो चुका होता था। माँ और नानी सुबह तड़के खेतों में जाती थीं और 9 बजे से पहले खेतों में काम करके वापस आ जाती थीं। शाम 5 बजे के बाद वे फिर से खेतों में जाती थीं गेहूँ काटने। हमारा काम तो सिर्फ़ उन्हें गुड़ और पानी लेकर जाना होता था। पानी पिलाकर हम वापस घर आ जाते थे। थोड़ी देर बाद जब मुझे खुद प्यास लगती तो हम, चाहे दीदी, मुकुल या मैं, दूध वाली बाल्टी में ताज़ा कुएँ से निकला पानी भरकर खेतों की तरफ निकल लेते थे।

14. अंतिम बाधा और अपनों का साथ

नौकरी तो मिल गई थी, पर ज्वाइन करने से पहले एक और बड़ी बाधा सामने आई – कैरेक्टर सर्टिफिकेट और कुछ अन्य दस्तावेज़ों पर राजपत्रित अधिकारियों (gazetted officers) के हस्ताक्षर करवाने थे। पिताजी दर-बदर भटके, पर कोई भी अधिकारी उन पर हस्ताक्षर करने को तैयार न हुआ। यह एक ऐसा पल था जब उम्मीद टूटने लगी थी।

तभी गाँव के ही भभूती तिवारी जी, जिन्हें हम प्यार से 'बाबा' कहते हैं, और मेरे पिताजी जिन्हें चाचा कहते थे, उनके दस्तावेज़ों पर हस्ताक्षर करवाने के लिए तैयार हुए। कुछ दिनों के बाद, उन्होंने अटेस्ट किए हुए दस्तावेज़ पिताजी को दिए, और तब जाकर वे अपनी नई नौकरी के लिए लखनऊ रवाना हुए। यह दिखाता था कि कैसे हर मुश्किल घड़ी में अपनों का साथ ही सबसे बड़ा सहारा होता था।

15. लखनऊ में नई शुरुआत और शिक्षा का सफ़र

जैसे-तैसे पिताजी लखनऊ पहुँचे। शुरू में वे दूर के एक रिश्तेदार के घर ठहरे, पर कुछ ही दिनों बाद अपने बचपन के मित्र राम भजन के घर जा पहुँचे। राम भजन भी उस समय लखनऊ के खदरा में एक हॉस्टल में रहते थे। वे उस समय LLB कर रहे थे और साथ में मुंशीब (न्यायिक सेवा) की तैयारी भी। राम भजन ने पिताजी को भी कहा, "तुम भी तैयारी करो, मैं तुम्हें पढ़ाऊँगा।" पर पिताजी के जीवन में संघर्ष था, वे अपनी नौकरी नहीं छोड़ सकते थे।

फिर भी, दोस्त के दबाव में आकर उन्होंने कॉलेज ज्वाइन किया और BA करने लगे। उनकी नौकरी भी चल रही थी, एक टाइपिस्ट के रूप में। चाचा बताते थे कि जब भी वे खाली होते, तो अमीनाबाद के आस-पास की किसी दुकान में जाकर टाइपिस्ट का काम करते थे, जिससे उन्हें अतिरिक्त आय हो जाती और घर को सहारा मिलता। जब BA पूरा हुआ, तो दोस्त राम भजन का दबाव और बढ़ा कि "तुम LLB कर डालो और मेरे साथ मुंशीब की तैयारी करो।" राम भजन उन्हें अक्सर पढ़ाया करते थे और परीक्षाओं के लिए भी ले जाते थे। इस तरह LLB भी पूरा हो गया। इसी दौरान पिताजी अक्सर नौकरियाँ भी बदलते रहते थे।

16. दोस्ती का अनमोल रिश्ता: भूख मिटाने का पुण्य

एक बार कॉलेज के दिनों की बात है, पिताजी लखनऊ में थे। अचानक उन्हें उनके स्कूल के दिनों के दोस्त कौशल दिख गए। बचपन का दोस्त जब बहुत दिनों बाद मिलता है, तो खूब बातें होती हैं। पिताजी उन्हें अपने साथ घर ले आए। खाना खाने का समय हो चुका था, उस दिन शायद कोई त्योहार भी था, पकवान बने थे। माँ ने खाना परोसा। पिताजी और अंकल ने साथ मिलकर खाना खाया। खाना खाने के बाद अंकल खाने की तारीफ़ किए जा रहे थे। चाचा ने उनके लिए बिस्तर लगाया। गर्मी के दिनों में हम छत पर बादलों की चादर ओढ़कर सोया करते थे।

अंकल एक दिन आराम करने के बाद दूसरे दिन नाश्ता करके, माँ द्वारा सफ़र के लिए बाँधे गए कुछ पराठे और सब्ज़ी लेकर वापस गोंडा आ गए।

कुछ बरसों बाद जब पिताजी किसी केस के सिलसिले में उनसे मिले और अपना केस उनसे लड़ने की बात की, तो वे झट से तैयार हो गए। पिताजी ने जब फ़ीस के बारे में पूछा, "कितनी फ़ीस लगेगी, बताओ भाई," तो उन्होंने फ़ीस लेने से मना कर दिया। जब उन्होंने पूछा, "तुम मुझसे फ़ीस क्यों नहीं ले रहे हो," तब वे किस्सा सुनाते थे, "जिस दिन मैं तुमसे लखनऊ में मिला था, उस दिन मैं 2 दिन से भूखा था। इतने लोग मिले पर किसी ने मुझे खाना नहीं खिलाया। उस समय मेरे पास इतने पैसे नहीं थे कि मैं कहीं बाहर खाना खा सकूँ। वह जो भूख थी, वह तुमने मिटाई थी। तुमसे पैसे नहीं ले सकता।" पिताजी ने कहा, "तुम मेरे मित्र हो। तुम पर कोई एहसान नहीं किया मैंने।" अंकल बोले, "भूख लगने पर जो खाना खिला दे, उससे बड़ा पुण्य कुछ नहीं है। वह दिन था और आज का दिन। आज मेरे पास सब कुछ है, पर उस दिन जब मेरे पास कुछ नहीं था, तुमने खाना खिलाया। मैं अपने दोस्त से पैसे नहीं ले सकता।" पिताजी ने हमेशा याद दिलाया, "कभी-कभी अनजाने में पुण्य हो जाता है। और पुण्य करने वाले से ज़्यादा महान वह है जिस पर किया गया पुण्य याद रखा जाए, पुण्य करने वाला नहीं।" हम जिनके साथ बड़े हुए, वो लोग हमारे भीतर आज भी साँस लेते हैं — बस हम उन्हें याद कर लेते हैं, तो आवाज़ सुनाई देती है।

17. लखनऊ में दोस्ती और नई आदतें

राम भजन (जिन्हें हम 'बप्पा' कहते थे) के साथ रहकर पिताजी की तरक्की तो हुई, पर कुछ बुरी आदतें भी लग गईं, जिनमें शराब पीना शामिल था। बप्पा खूब शराब पीते थे, और संघर्ष भरा जीवन चल ही रहा था, तो पिताजी भी उनके साथ शराब पीने लगे। नए दोस्त मिले, नई महफ़िलें बनीं, तरक्की के नए रास्ते खुले, पर यह एक बुरी आदत पड़ गई।

माँ बताती थीं कि जब वे पिताजी के साथ रहने लखनऊ आईं, तो यह सब देखकर दंग रह गईं। गाँव का सीधा-साधा लड़का यहाँ शराब पी रहा था! माँ उम्र में छोटी थीं, बप्पा के एहसान थे, और वे माँ को बहुत सम्मान भी देते थे – 'बहू' कहकर बुलाते थे। पूरी कॉलोनी में उनकी बहुत इज़्ज़त थी। ज्ञानी वे बहुत थे, पर एक ही बुरी आदत थी शराब की। पिताजी की दो शर्तें थीं: वे केवल बप्पा के साथ शराब पीते थे, और कभी अपना पैसा ख़र्च नहीं करते थे। उनका कहना था कि जब वे गाँव से आए थे, तो कोई दोस्त नहीं था, किसी को जानते नहीं थे। जब आप किसी के साथ रहते थे और उसके साथ शराब और सिगरेट पीते थे, तो वह जल्दी दोस्त बनता और साथ निभाता था। पिताजी के अनुसार, शराब पीना उन दिनों उनकी 'मजबूरी' था, शौक नहीं।

18. सचिवालय में प्रवेश और गाँव में धूम

एक दिन उनके दोस्त राम भजन ने सचिवालय का फॉर्म भरा, और साथ में पिताजी ने भी टाइपिस्ट की नौकरी के लिए फॉर्म भरा। परीक्षा हुई और दोनों पास हो गए। राम भजन साथ में जज होने के लिए तैयारी भी कर रहे थे। पिताजी और उनके दोस्त बप्पा, दोनों की नौकरी लग गई। सचिवालय एक बड़ा नाम था – पूरे प्रदेश की राजधानी में सबसे बड़े अधिकारी के वे टाइपिस्ट थे।

यह ख़बर जब गाँव पहुँची तो हल्ला हो गया। कहा जाता है कि इस ख़बर को कन्फर्म करने के लिए गाँव से कुछ लोग पिताजी के ऑफिस पहुँचे थे। और अक्सर गाँव में लोग बोलते थे, "जितनी कैलाश (मेरे पिताजी का नाम) को तनख्वाह नहीं पता है, उतने की तो मैं चाय ही पी जाता हूँ।" यह उनके लिए और पूरे गाँव के लिए गर्व का विषय था।

19. समाज सेवा और नेतृत्व

संघर्ष के दिन बीत रहे थे, तो उसी के साथ उन्होंने अपनी और अपने परिवार की जड़ों को मज़बूत करने के लिए लखनऊ में अपने समाज के लोगों से भी संपर्क साधा। मज़बूर रानी में स्थित ककुहास पंचाल ब्राह्मण सभा का एक विश्वकर्मा मंदिर है। पिताजी ने उस समाज को ज्वाइन किया और आजीवन सदस्यता ली। वे उनके दैनिक कार्यों में सम्मिलित होते रहे। समाज के विभिन्न लोगों से संपर्क बनाया। अपने परिवार के अनेकों लोगों को समाज के विभिन्न कार्यों से अवगत कराया और समाज को जोड़ने के लिए संघर्ष भी करते रहे।

बरसों मेहनत के बाद उनकी पदोन्नति होती रही और एक दिन वे महामंत्री पद, फिर उपाध्यक्ष और बाद में अध्यक्ष भी बने। पिताजी जब भी समाज के महत्वपूर्ण लोगों से मिलते, उनकी कहानियाँ हमें ज़रूर बताते। वे बताते थे कि कैसे विश्वकर्मा मंदिर बनकर तैयार हुआ, और कैसे राय बहादुर दुर्गा प्रसाद जी ने भगवान विश्वकर्मा के साथ अपनी भी मूर्ति बनवाई। वे अलग-अलग लोगों के संघर्ष और उनकी कामयाबी की कहानियाँ साझा करते थे।

मंदिर के दोस्त, जो कभी-कभी घर आते थे, उनमें से कुछ के नाम आज भी हमें अच्छे से याद हैं। इनमें प्रमुख थे राजकुमार अंकल, राजेश अंकल, महेश अंकल और राजेंद्र अंकल। बाद में राजेंद्र अंकल के बेटे से मेरी चचेरी बहन की शादी भी हुई। ये दोस्त मंदिर के विषय में चर्चा करते थे और हमें भी प्रेरित करते थे कि मंदिर जाया करो। लोगों से मिलो, खुद भी प्रेरित हो और दूसरों को भी प्रेरित करो। बहुत से लोगों ने मंदिर में अपना योगदान दिया, संघर्ष करते हुए भी बहुत से लोगों ने मंदिर और समाज के लिए अपना सब कुछ दिया।

20. अध्यक्ष के रूप में दूरदर्शी कार्य

अध्यक्ष बनने के बाद जब उन्होंने वहाँ के संविधान को ठीक से पढ़ा तो उसमें कुछ परिवर्तन की ज़रूरत वे शुरुआत से समझ रहे थे। सभी बड़े अधिकारियों से मंत्रणा करने के बाद कुछ अभूतपूर्व परिवर्तन भी लाए। जैसे कि कोई भी अध्यक्ष आजीवन अध्यक्ष नहीं बन सकता। उसका कार्यकाल सिर्फ 3 साल का होगा, और 3 बार से ज़्यादा नहीं बन सकता।

उन्होंने मंदिर के निर्माण के लिए लोगों को जोड़ा, पैसे इकट्ठा किए और मंदिर का जीर्णोद्धार किया। और एक दिन जब कार्यकाल पूरा हुआ तो उन्होंने नए लोगों को आगे बढ़ाया और अपना पद छोड़कर समाज को नई दिशा देने लगे।

21. मदद की भावना और मेहमानवाज़ी

लखनऊ में रहते हुए पिताजी ने बहुतों की मदद की। कभी किसी को किसी चीज़ की ज़रूरत पड़ी हो तो वे हमेशा तैयार रहे। घर के दरवाज़े हमेशा खुले रहे उन सब लोगों के लिए जो पढ़-लिखकर आगे बढ़ना चाहते थे। उनका हमेशा हमारे घर में स्वागत था। ख़ानदान या गाँव का कोई भी सदस्य एग्ज़ाम्स देने के लिए अक्सर हमारे घर आते। उनका स्वागत होता, वे एग्ज़ाम्स देते।

अगर किसी का कोई भी काम फँसा होता और पिताजी उसमें मदद कर सकते होते तो मदद ज़रूर करते। अगर नहीं कर सकते तो कोशिश करते कोई न कोई रास्ता निकले। हमें याद नहीं कि हम बड़े होने तक कभी भी कोई भी वीकेंड हम अकेले रहे हों। कोई न कोई मेहमान हमारे साथ रहा था। यहाँ तक कि पिताजी कभी-कभी हम पर ध्यान देने की जगह समाज में इतने मशगूल हो जाते थे कि हमारी कोई फ़िक्र ही नहीं रहती थी।

22. पिंटू चाचा की संघर्ष यात्रा

पिंटू चाचा उम्र में मुझसे बहुत बड़े नहीं थे, पर वे पिताजी की बुआ के बेटे हैं। दुर्भाग्य से किसी बीमारी की वजह से उनकी आँखें बचपन में ही चली गई थीं। जब से हमने होश संभाला है तब से उन्हें अंधा ही देख रहा हूँ। पिताजी की बुआ अक्सर हमारे गाँव वाले घर आया जाया करती थीं। जहाँ पिताजी की बुआ जाती, वे साथ में रहते थे। हर कोई उनसे मज़ाक में कई प्रश्न पूछता था। जैसे "पहचानो कौन है यह?" वे हाथ पकड़कर सही बताने की कोशिश करते थे। और अक्सर वे सही ही होते थे। सिक्के दिखाकर पूछते थे, "बताओ कितने का सिक्का है?" वैसे ही नोट पकड़ा कर भी यही पूछते थे। जब भी वे आते, ऐसे प्रश्नों की महफ़िल लग जाती थी।

चाचा थोड़े बड़े हुए तो पिताजी को एहसास हुआ कि अगर ऐसे ही चलता रहा तो आगे इनका क्या होगा। बुआ तो एक दिन चली जाएँगी और फिर ये अकेले रह जाएँगे। फिर इनकी देखभाल कौन करेगा। पिताजी लखनऊ आकर यहाँ के ब्लाइंड स्कूल में बात की कि उनका एक छोटा भाई अंधा है। तो वहाँ उनके एडमिशन की बात पक्की हो गई। अब उन्हें स्कूल में एडमिशन कराना था। यह कोई छोटी बात नहीं थी कि पिताजी ने निर्णय लिया और सब मान गए। पिताजी अपनी बुआ के पास गए और बताया कि उन्होंने स्कूल में पिंटू (जिनका असली नाम विजय है) का एडमिशन करा दिया है। बस पिंटू को वहाँ जाना था। सारी व्यवस्था उनकी होगी, आप लोगों को कुछ भी नहीं करना। पिताजी की बुआ ने आनाकानी शुरू कर दी। उनका बच्चा कैसे रहेगा? दिनचर्या के काम कैसे करेगा? पिताजी बोले, "जैसे बाकी बच्चे करते हैं, वह वैसे ही करेगा।" जब ज़्यादा आनाकानी हुई तो पिताजी ने बुआ को डाँटते हुए कहा, "कल तुम मर जाओगी तो इसका क्या होगा? भाई अपनी ज़िंदगी में व्यस्त हो जाएँगे, सिर्फ़ यह कुछ टुकड़ों पर पलेगा। अच्छा लगेगा तुम्हें?" ज़बरदस्ती उन्हें स्कूल ले आए। चैलेंज सिर्फ़ पिताजी की बुआ का नहीं, पिंटू का भी था। वह बुआ को छोड़कर जाना ही नहीं चाहता था। सुरती खाने की आदत पड़ चुकी थी और स्कूल में वह मिलेगी नहीं। कैसे जिएगा?

पिंटू स्कूल तो आ गया पर मन नहीं लगा। फिर तांडव का सिलसिला शुरू हुआ। बच्चों के कंबल बाथरूम में भिगो आते थे। कहीं किसी से पंगा कर लेते, ताकि स्कूल वाले उन्हें निकाल दें। पिताजी के पास अक्सर शिकायतें आतीं, पिताजी जाते और उन्हें डाँटकर वापस चले आते। पिंटू के लिए स्कूल एक क़ैद था। कहाँ गाँव में सबके साथ घूमने जाते थे, और यहाँ बंद दरवाज़े। अक्सर उनके साथी घर आते और मम्मी को सारी घटना बताते। मैं उन सबको देखकर चकित रहता कि इन लोगों को दिखता नहीं था फिर भी कैसे स्कूल से घर ढूँढ लिया और चले गए। बस एक डंडी के बल पर। शाम को छत पर महफ़िल लगती, पूरी कॉलोनी पिंटू चाचा से मिलने आती। फिर वही उनसे बातें – "बताओ यह कौन है?" पिंटू चाचा ने तो कई बार वहाँ से भागने की कोशिश भी की, पर असफल रहे।

यह सिलसिला सालों तक चला पर एक दिन उन्हें समझ आया कि अब पढ़ाई में आगे बढ़ा जाए। न जाने कब वह पढ़ाई में गंभीर हो गए और 10वीं की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की। उनकी किताबें भी अजीब सी थीं। न कोई चित्र न कोई रंग। बस उसमें बिंदियाँ थीं। एक स्लेट थी और एक पटरी जिसकी मदद से वह लिखते थे। कभी-कभी हमें लिखकर भी दिखाते थे। नोटबुक के पन्ने काफ़ी मोटे होते थे।

आगे की बात करें तो उन्हें 11वीं के लिए दिल्ली जाना था। पर यहाँ लखनऊ में सिर्फ़ 10वीं तक ही था। अब दिल्ली में हमारा कोई जानने वाला नहीं था जो मदद कर सके। फिर चाचा के बड़े भाइयों ने वहाँ के सांसद से संपर्क किया और वे मदद करने के लिए भी तैयार हो गए। दिल्ली पहुँचने पर वे खुद पिंटू चाचा को स्कूल ले गईं और एडमिशन कराया। वह पढ़-लिखकर आज मथुरा रिफाइनरी में काम कर रहे हैं। आज उनकी आर्थिक स्थिति बाकी भाइयों से लाख गुना बेहतर है। उनका विवाह भी उनके टीचर की बेटी से हुआ। चाची के भाई और पिता दोनों ही ब्लाइंड हैं। चाची को सारे चैलेंज पता हैं। अब उनका परिवार वृंदावन में रहता है। पिताजी का यह कार्य मुझे व्यक्तिगत रूप से बहुत प्रेरित करता है। और लगता है कि अगर पिताजी चाचा का एडमिशन नहीं कराते तो आज चाचा क्या करते। बाकी लोग सामान्य थे, वे कुछ न कुछ तो करते। पर इनका क्या होता?

23. वास्तविक फाँसी का अनुभव: एक दहला देने वाला पल

ठंड के दिन चल रहे थे, हम सब रज़ाई ओढ़े दिन काट रहे थे। स्कूल बंद थे। पूरा परिवार भी इकट्ठा था, पिताजी भी आज ऑफिस नहीं गए थे। हम सब एक साथ बैठकर मूवी देख रहे थे, जिसमें अदालत मुल्ज़िम को अंत में फाँसी देती है, और फिर मूवी का नायक उस खलनायक को सरेआम अदालत के बाहर फाँसी पर लटका देता है और मूवी खत्म हो जाती है। अब उस मूवी पर चर्चा का खेल चालू हुआ। अचानक पिताजी बोले, "मूवीज़ में कितना बकवास दिखाते हैं, ऐसे कोई किसी को भी फाँसी पर चढ़ा सकता है? पुलिस ऐसे ही देखती रहती है क्या? इन लोगों ने कभी हकीकत में भी ऐसी फाँसी होती है, सब बकवास दिखाते हैं, और फिर सोचते हैं कि मूवी हिट हो जाए, ज़रूर यह मूवी पिट गई होगी।" फाँसी पर चर्चा होने लगी, फिर पिताजी बताने लगे कि कभी वह एक बार फाँसी देखने गए थे। सच्ची-मुच्ची फाँसी।

पिताजी कभी किसी डिपार्टमेंट में रहे होंगे। उन्होंने किसी अधिकारी से बात की होगी, सच में फाँसी देखने के लिए। फिर उस अधिकारी ने कहा, "शर्मा जी, आसान नहीं है फाँसी देखना। बड़े-बड़ों की हालत ख़राब हो जाती है, आप देख पाएंगे?" "हम चाहते हैं कि फाँसी खत्म हो जाए और आप फाँसी देखना चाहते हैं।" तभी पिताजी और उनके साथियों ने कहा, "देख लेंगे इसमें कौन सी बड़ी बात है।" पिताजी और उनके साथियों को कॉलेज से निकले बस कुछ ही दिन हुए थे। नया खून था और जोश भी भरपूर था। तभी उनके अधिकारी ने कहा, "तो ठीक है, कुछ महीनों बाद किसी व्यक्ति को फाँसी होने वाली है जिसने किसी परिवार को बड़े ही वीभत्स तरीके से खेत में ही काट डाला था। अदालत ने उसे फाँसी की सज़ा सुनाई है।" पिताजी और उनके साथी बोले, "तो ठीक है, हम देख लेंगे, हम मज़बूत हैं।" अधिकारी ने कहा, "मैं तुम्हें दिन-तारीख बता दूँगा। फाँसी का ऑर्डर तुम लेकर जाना और तुम सबको तड़के जाना पड़ेगा और इस बात की चर्चा आप किसी से नहीं करेंगे, फाँसी कोई प्रदर्शनी नहीं है। इसलिए, फाँसी आप एक झरोखे से देख पाएंगे, न कि सामने से।"

दिन-तारीख बताई गई, रात भर कोई सोया नहीं और तड़के सब कारगर पहुँच गए। फाँसी का ऑर्डर जेलर को दिया गया। फिर उन्हें एक झरोखे तक ले जाया गया, सभी के अंदर फाँसी देखने की उत्सुकता थी। 1 घंटे इंतज़ार करने के बाद फाँसी के हॉल में उस कातिल को लाया गया। कोई अधिकारी उसे कुछ पूछ रहा था, इन लोगों को साफ़ सुनाई नहीं दिया। जल्लाद उसे फाँसी के तख्ते पर ले गया और मुँह पर कपड़ा बाँधने और फंदा लगाने से पहले उसने खुदा को याद किया और बोला, "ला इलाहा इल्लल्लाह मोहम्मद रसूलुल्लाह।" उस डाकू के चेहरे का भाव देख, और उसकी आवाज़ के कंपन ने पिताजी और उनके साथियों को अंदर से हिला दिया।

इसके बाद उस हॉल में इतना सन्नाटा था कि बयान नहीं किया जा सकता। मौत का डर उसकी आँखों में साफ़ महसूस हो रहा था। जल्लाद ने इशारा पाते ही उसे फाँसी पर लटका दिया। फिर एक और गहरा सन्नाटा था। सबकी हालत और ख़राब हो गई थी। सब उठे और चल दिए। आपस में बात करने की भी हिम्मत किसी में नहीं बची थी कि फाँसी पर चर्चा कर लें।

पिताजी के अनुसार, कई रातों तक वह फाँसी उनके सपनों में आई। दहशत में आ जाते थे जब भी वह नज़ारा सपने में आता था। पिताजी के अनुसार, उस फाँसी की चर्चा फिर कभी ऑफिस में नहीं हुई। पिताजी के चेहरे पर वह दहशत दिखाई दे रही थी। हम भी खामोश थे, अपनी जगह चिपक गए हों जैसे। थोड़ी देर बाद माँ ने वह सन्नाटा तोड़ा और कहा, "चलो खाना खाओ।" आज भी जब मैं लिख रहा हूँ, सन्नाटा आज भी याद आ रहा है।

24. परिवार में नया आगमन: मेरी दीदी का जन्म

माँ बताती थीं कि जब पिताजी को पता लगा कि दीदी होने वाली थीं, तो वे बहुत खुश थे। अभी तक हमारे ख़ानदान में कोई भी बच्चा अस्पताल में पैदा नहीं हुआ था; सब घर में ही दाई के हाथ से पैदा होते थे। लाखों विरोध होने के बाद भी पिताजी ने माँ को अस्पताल में भर्ती कराया था। पूरे घर में हंगामा हुआ, पर सब एक तरफ और पिताजी एक तरफ। 10 नवंबर को दीदी पैदा हुईं। बाक़ी सब तो मुँह लटकाए थे, पर पिताजी खुश थे कि उनको लड़की हुई थी।

दीदी की ख़ास देखभाल होती थी। जब माँ दीदी को लेकर शहर-ए-लखनऊ आईं, तो पिताजी के पूरे ग्रुप ने खुशी मनाई। बप्पा अक्सर घर के बाहर जाते तो दीदी को सजा-धजा कर ले जाते थे। दीदी को प्यार से सब 'गुड़िया' कहते थे। वह बप्पा की भी और पिताजी की भी लाड़ली थी।

25. मेरा जन्म: पीलिया का संघर्ष और बप्पा का सहारा

मेरा जन्म शायद तब हुआ था जब पिताजी सचिवालय में नौकरी कर रहे थे और बप्पा मुंशीब नहीं बने थे। उन दिनों दोनों दोस्तों में कुछ अनबन भी चल रही थी। पिताजी खुद बताते थे कि जब मैं पैदा हुआ तो पीलिया से ग्रसित था। माँ को भी पीलिया था। मैं अलग वार्ड में था और माँ अलग वार्ड में थीं। लखनऊ के मेडिकल कॉलेज में पिताजी पर एक साथ दो लोगों की देखभाल करने की ज़िम्मेदारी थी। दादी और बुआ घर पर थीं, पर बाहर संभाल नहीं सकती थीं।

मेरे पैदा होने पर जब दादी मुझे देखने आईं और घर पहुँचीं, तो जीना चढ़ते हुए रुक गईं। बप्पा को देखकर रोने लगीं। बप्पा ने पूछा, "क्या हुआ अम्मा?" तो उन्होंने पूरा किस्सा बताया। वह झट से उठे और मेडिकल कॉलेज पहुँचे। पिताजी से मिले। मैं गांधी वार्ड में था और माँ क्वीन मैरी में थीं। मेरी आँखों पर पट्टी लगी थी और पिताजी को एक रुई का बंडल पकड़ा दिया गया था, जिसे अगर मैं टट्टी और सुसु करता तो पोंछते रहने को कहा गया था।

बप्पा पहुँचे तो न हाल न चाल। बप्पा ने पूछा, "पैसे हैं तुम्हारे पास?" पिताजी बोले, "लाए हो तो दे दो।" पिताजी ने पैसे लिए और रुई का बंडल बप्पा को पकड़ा दिया और बताया, "जब यह टट्टी-सुसु करता तो पोंछ देना। दो दिन से सोया नहीं था।" "आराम करके वापस आ जाऊँगा।" बस यही कहकर पिताजी निकल लिए। बप्पा काफी देर तक रहे। देर रात जब पिताजी वापस आए, तब वे वहाँ से हटे। यह बप्पा की दोस्ती और संकट में साथ निभाने का एक अद्भुत उदाहरण था।

26. मेरे छोटे भाई का आगमन

पिताजी बताते थे कि उनके समय पर नारा था 'हम दो और हमारे तीन'। इसी फ़ॉर्मूले के तहत एक दिन हमारा छोटा भाई आ गया। मुझे याद है कि हम क्वीन मैरी हॉस्पिटल गए थे, जहाँ माँ भर्ती थीं और साथ में एक बच्चा भी था। लोग बता रहे थे, "तुम्हारा एक भाई आया है।" घर पर भी सब खुश थे। बाक़ी मुकुल (भाई का नाम) के पैदा होने से संबंधित ज़्यादा किस्से मुझे याद नहीं थे।

27. बच्चों के नाम: 'उल' की परंपरा

सभी चाचाओं की शादियाँ हो गईं और जब हमारे अलावा बाकी चचेरे भाई हुए, तो उनके नाम पिताजी ने ऐसे रखे कि सभी लोग एक साथ खड़े हों तो एक ही परिवार के लगें। जैसे कि मेरे नाम की शुरुआत 'राहुल' से होती है, जिसके अंत में 'उल' है। फिर छोटे भाई का नाम 'मुकुल' है, उसके भी नाम में 'उल' है। फिर बाकी भाइयों के नाम भी वैसे ही रखे गए, जिनमें अंत में 'उल' आए: राहुल, मुकुल, बिपुल, अंशul, अतुल और सबसे लास्ट में मृदुल।

28. दादी का हादसा: खदरा में एक भयावह शाम

मुझे एक किस्सा याद है जब हम खदरा में रहते थे। दादी को गाँव से आना था। हम सब उनका इंतज़ार कर रहे थे। देर काफ़ी हो गई थी, पर वे अभी तक पहुँची नहीं थीं। हम सब अपनी साइकिल लेकर निकलने ही वाले थे कि अचानक देखते क्या हैं – रिक्शेवाला और दादी खून से लथपथ दिखे। सभी उन्हें देखकर घबरा गए। दोनों को ऊपर घर लाया गया। पड़ोस में खान अंकल रहते थे, उन्हें जल्दी से बुलाया गया। वे मेडिकल कॉलेज में ही थे। जल्दी से दोनों का प्राथमिक उपचार हुआ। रिक्शेवाले को थोड़ी ज़्यादा चोट आई थी। पिताजी ने उसकी दवा-पट्टी करवाने के बाद थोड़े और पैसे देकर विदा किया। रिक्शेवाला बताने लगा कि कहीं मेडिकल कॉलेज के पास एक ढलान थी, रिक्शा वहीं से डिसबैलेंस हो गया और सामने की रेलing से टकरा गया। दोनों गिर गए और घायल हो गए।

29. पहला टेलीविज़न: एक अनमोल उपहार

एक बार की बात है जब रामायण आया करती थी। हम रामायण देखने के लिए दूसरों के घर जाया करते थे। कभी-कभी कुछ और भी देखने हम बिन बुलाए उनके घर पहुँच जाते थे। उस समय टीवी ऐसी जगह रखी जाती थी जहाँ से काफ़ी लोग देख लें। खदरा में एक नेता जी का भी घर था, उनकी खिड़की हमारे घर की छत पर खुलती थी। हम खिड़की से झाँक कर रामायण देखते थे। ऐसे ही किसी रोज़ हम किसी के घर टीवी देख रहे थे, और जिनके घर टीवी देख रहे थे, उन्होंने टीवी बंद कर दी। हम उठे और चल दिए। कुछ दिनों के बाद फिर हम गए तो उन्होंने हमें भगा दिया। हम जब भी जाते, वे हमें टीवी देखने ही न देते। बाकी लोगों के लिए टीवी सुलभ था। अब कॉलोनी में काफ़ी लोगों के पास टीवी आ चुका था। उन दिनों पिताजी से कुछ भी डिमांड करना बहुत ही ख़तरनाक था। एक दिन हमने हिम्मत करके पिताजी से बोला कि "आप हमारे लिए टीवी क्यों नहीं ले आते हैं? यहाँ तो अब काफ़ी लोगों के पास टीवी थी।" पिताजी ने डाँटकर हमें भगा दिया। हम रोते हुए उनसे दूर चले गए। माँ ने आँसू पोंछे और बोला कि "एक दिन अपने घर भी टीवी आएगा।"

कुछ दिनों के बाद देखते क्या हैं, पिताजी अपने साथ एक टीवी लेकर आ रहे हैं! उस दिन खुशी का कोई ठिकाना ही नहीं था। टीवी सेटअप किया गया, एंटीना सेटअप किया गया। टीवी ऑन हुआ तो शायद चौपाल आ रहा था। टीवी को देखकर हम इतने एक्साइटेड थे कि सारे प्रोग्राम देखे जाते थे। उस समय हम 9 बजे तक सो जाते थे। हम टीवी ऑन करके सुबह और शाम दोनों बैठ जाते थे। कुछ नहीं भी आता था, जो भी आता, हम टीवी देखते थे। पिताजी द्वारा दिया गया यह हम तीनों के लिए सबसे बड़ा उपहार था।

30. 31 मार्च की रात: पिता का अनमोल उपहार

31 मार्च की रात हमारे लिए बहुत ही रोचक रात हुआ करती थी। पिताजी फाइनेंस डिपार्टमेंट में थे, और 31 मार्च की पूरी रात वे ऑफिस में रहते थे। तड़के वे घर आते थे। हम तीनों बहुत एक्साइटेड रहते थे कि पिताजी देर रात जब आएँगे तो पकवानों से भरा लंच बॉक्स लाएँगे। देर रात में पिताजी को डिनर भी मिलता था, तो वे खुद नहीं खाते थे, वे हमारे लिए लेकर आते थे। वह ज़माना नहीं था कि हम बाहर जाकर लंच या डिनर करें। दावत के नाम पर बताशे और टिक्कियाँ हुआ करती थीं। सुबह नींद खुलते ही उस डिब्बे की तलाश होती थी। उस डिब्बे में कई तरह की सब्ज़ी, पूड़ी, पुलाव और मीठा भी होता था। हम तीनों बाँटकर खाते थे। आज यह बहुत ही सामान्य सा लगता है, पर उन दिनों पिताजी जो लेकर आते थे, उसका मज़ा ही कुछ और होता था।

31. समय पर घर वापसी: परिवार और ईमानदारी

पिताजी अक्सर समय पर ऑफिस जाते और समय पर वापस आ जाते थे। उनका ऑफिस से देर से आना बहुत ही दुर्लभ था। पर मैं अक्सर पिताजी के दोस्तों को देखता था कि वे बहुत देर से ऑफिस से आते थे। तब पिताजी हमें बताते थे, "मुझे सबसे ज़्यादा अच्छा लगता है अपने परिवार के साथ समय बिताना। भरा-पूरा परिवार है हमारा। जिन्हें खूब कमाना है या कहीं 'ऊपर की कमाई' करनी है, वे देर से आते हैं, फाइल फँसा लेते हैं, फिर लोग मोलभाव करने के लिए देर रात में सक्रिय होते हैं। मुझे तो सुकून की नींद चाहिए। आता हूँ और सुकून से सो जाता हूँ। बुआ, बच्चे ठीक से निकल जाएँ और क्या चाहिए।"

32. राम कुमार मामा: अपराध से सम्मान तक का सफ़र

हमारे पड़ोस में एक मामा रहते थे जिनका नाम राम कुमार था। मामा मम्मी को बहुत सम्मान देते थे। मम्मी के हर कष्ट में हमेशा साए की तरह रहते थे। नानी और बाकी मामा को भी हमेशा मम्मी से खूब सम्मान मिला। पिताजी एक किस्सा बताते हैं कि कभी मामा की संगति कुछ बुरे लोगों के साथ हो गई और वे अपराध की दुनिया में चले गए। पिताजी को जब यह पता लगा तो उन्होंने हर संभव प्रयास किया उन्हें इससे बाहर निकालने का। कभी प्यार से समझाया और कभी गुस्से से। एक बार की बात है जो कि मामा खुद ही बताते थे कि एक बार मामा कोई अपराध के लिए जा रहे थे। तभी अचानक पिताजी रास्ते में मिल गए। पिताजी को एहसास हुआ कि कुछ गड़बड़ है। पिताजी उन्हें पकड़ कर घर ले आए और समझाया कि "इस दुनिया में मत जाओ, वापसी संभव नहीं है।" उन्होंने मामा के लिए एक दुकान भी खुलवाई ताकि वे उसमें व्यस्त हो जाएँ और अपराध की दुनिया से दूर हो जाएँ। मामा ने भी अपराध की दुनिया छोड़ दी और एक बैंक में कैश ट्रांसफर करने वाली एजेंसी में नौकरी शुरू की। मामा दबंग तो थे ही, और उस नौकरी में उनका यह टैलेंट भी काम आया। मामा पिताजी का खूब सम्मान करते थे और अगर पिताजी ने कुछ बोल दिया तो वे ऐसे सुनते थे जैसे कोई बच्चा डर के मारे अपने घर के बड़ों की बात सुनता हो।

33. पिताजी की प्रिय कविताएँ

पिताजी हमें कुछ कविताएँ अक्सर सुनाया करते थे, जिनमें से एक थी:

'टुकड़े टुकड़े हो जाए चाहे हर एक इंसान के, टुकड़े न हम होने देंगे हरगिज़ हिंदुस्तान के। कश्मीर है देश हमारा, यह है मेरे प्राणों से प्यारा, बच्चे बच्चे का है नारा, खून उबलता है सीने में भारत के हर नव जवान के, टुकड़े टुकड़े हो जाए चाहे हर एक इंसान के, टुकड़े न हम होने देंगे हरगिज़ हिंदुस्तान के। अरे जिया यह तानाशाही यहाँ न चलने पाएगी, राजू जी की आगे तेरी दाल न गलने पाएगी। टुकड़े टुकड़े हो जाए चाहे हर एक इंसान के, टुकड़े न हम होने देंगे हरगिज़ हिंदुस्तान के। जैसे टुकड़े करे तमोली जैसे समूचे पान के, जैसे टुकड़े दर्ज़ी करता कपड़े के हर थान के, जैसे टुकड़े चिकवा करता बकरी की संतान के, वैसे टुकड़े कर दूँगा मैं, देशद्रोही बेईमान के।'

और एक थी:

'बलिदान सिंह का नो होते सुना बकरे बलिबेदी चढ़ाए गए। कभी टेढ़े पेड़ न काटे गए, सदा सीधे पे आरे चलाए गए। विषधारी को दूध पिलाया गया, केंचुए कटिए में फँसाए गए। बलवान का बाल न बाँका हुआ, बलहीन ही सदा सताए गए।'

और एक अन्य कविता थी:

'मानव ने पत्थर पूजे हैं, मानव को कब कौन पहचान सका। पत्थर नहलाए जाते हैं मधु, गुड़ और घी से, पर एक भीखमंगिन का बेटा दो बूँद नहीं पाता तन को। श्रृंगार नहीं पूरा होता है इन मंदिर के पाषाणों का, पर किसी निर्धन को वस्त्र नहीं मिलता तन ढकने को। इंसान उठो, फेंको पत्थर अब मानव का पूजन होगा।'

हमें यह तो नहीं पता है कि मूल रूप से यह किसने लिखी है, पर हमें ये बचपन से याद थीं। दीदी तो इसका पाठ स्कूल में भी करके आई थीं और वाहवाही भी खूब मिली थी।

34. पिताजी की सीख: आशा, दौलत और चरित्र

पिताजी अक्सर हमें कुछ सीख दिया करते थे, जिनमें से एक थी: "आशा की माता, दौलत का बाप, न होते को दोस्त, होते को भाई, और बिगड़े पे औरत चली जाती है।" पिताजी हमें यह समझाते थे कि माँ हमेशा अपने बच्चों के लिए आशावान रहती है, जबकि पिता हमेशा यह देखता है कि बच्चा कितना कमा रहा है या कमा पाएगा, या बच्चे को कितना पैसा चाहिए – उसका प्रेम दौलत के नज़दीक होता है।

वे यह भी कहते थे कि जब आप कुछ बन जाओगे तो रिश्तेदार तुम्हारे आगे-पीछे भागेंगे और तुम्हारा सम्मान करेंगे। और सबसे महत्वपूर्ण सीख यह थी कि अगर तुमने चरित्र खो दिया या व्यभिचारी हो गए तो दुनिया की कोई भी औरत जो तुम्हारी पत्नी है, तुम्हें छोड़कर चली जाएगी। जब भी पिताजी खाली होते और अच्छे मूड में होते, तो वे हमें यही बातें सुनाते थे।

35. बड़े चाचा का विवाह: एक दिन की बारात का नया चलन

मेरे पैदा होने के बाद बड़े चाचा की शादी हुई थी। बड़े चाचा की शादी का किस्सा तो बड़ा मजेदार था। मेरे बाबा ने चाची की शादी पास के मानिकपुर से तय कर दी थी। पिताजी का विरोध था कि जब तक उनका भाई राम कृष्ण कमाने नहीं लगता, तब तक उसका विवाह नहीं होगा। पर गाँव और समाज के दबाव में मेरे बाबा ने उनका विवाह फाइनल कर दिया।

अब जब फाइनल हो गया तो बाकी चीज़ें भी तय हुईं। तय यह हुआ कि बारात 5 दिन की होनी थी। पिताजी ने इसका विरोध किया, "इतनी छुट्टी लेकर कौन आएगा।" तब प्रस्ताव आया कि 3 दिन का कर लिया जाए। पिताजी ने कहा, "विवाह एक दिन का होगा। बारात जाएगी, एक रात रुकेगी और दूसरे दिन वापस आएगी।" लड़की वाले बोलने लगे, "क्या बोलेगा समाज कि मास्टर साहिब की औकात ही नहीं कि बारात को कुछ दिन खिला सके।" पिताजी की ज़िद के आगे किसी की न चली और फिर एक दिन की बारात फाइनल हुई।

हम बारात लेकर पहुँचे। अच्छे से स्वागत हुआ और विवाह संपन्न कर दूसरे दिन वापस आ गए। गाँव के लोग पिताजी को खूब उल्टा-सीधा बोलते थे, पर पिताजी कोई जवाब नहीं देते थे। उसके बाद गाँव में भी 1 दिन की बारात का चलन शुरू हो गया। यह पिताजी के व्यावहारिक स्वभाव और समाज में उनके बढ़ते प्रभाव को दर्शाता था।

36. छोटी बुआ का विवाह: एक अप्रत्याशित इंतज़ार

छोटी बुआ की शादी का किस्सा तो और ही गज़ब था। छोटी बुआ की शादी खुटहना, बहराइच में तय हुई थी। लड़का पढ़ाई ही कर रहा था। पिताजी जब शादी देखने गए थे तो वहाँ के लोग काफी पिछड़े हुए थे। सिर्फ एक ही लड़का पढ़ाई कर रहा था, बाकी लोग सिर्फ खेती पर निर्भर थे। वे बस इतना चाहते थे कि लड़का पढ़ जाए फिर जुगाड़-पानी से उसके रोज़गार की व्यवस्था करवा दी जाएगी। लड़का पढ़ने में ठीक था, तो शादी तय हो गई थी।

शादी का दिन आया। गाँव में पहली बार शादी के लिए स्टैंडर्ड व्यवस्था की गई थी। पहले सबको ज़मीन पर बैठा कर खिलाया जाता था पर इस बार टेंट लगा था और टेबल-चेयर का इंतज़ाम था। बारात का इंतज़ार चल रहा था और शाम हुई, बारात का कोई अता-पता नहीं था। रात हुई, बारात का अभी तक कुछ पता नहीं था। घर में मातम जैसा माहौल था। पहली बार पकवान में कुछ नए व्यंजन ऐड किए गए थे, जैसे कोफ़्ता। मैं बहुत छोटा था, मुझे कुछ याद नहीं था, यह सब पिताजी, दीदी, मम्मी बताया करती थीं।

चारों तरफ रिश्तेदार दौड़ाए गए, पर कोई ख़बर नहीं। काटो तो खून नहीं। लड़की सजी-धजी बैठी थी, पर बारात का पता नहीं था। उन्हीं दिनों में गाँव की कुछ दबंगों से हमारे परिवार का पंगा चल रहा था। गाँव में हम तरक्की पर थे और बाकी लोगों को यह देखा नहीं जा रहा था। डर और बढ़ गया था कि कहीं उन दबंगों ने तो कुछ नहीं किया।

तभी अचानक सुबह 4 बजे ख़बर आई कि बारात आ गई थी। घर में खुशी का माहौल फिर से दौड़ पड़ा। रात किसी ने खाना नहीं खाया था। सारी व्यवस्था अस्त-व्यस्त हो गई थी। खाना ठंडा हो गया था। जैसे-तैसे बारात का स्वागत किया गया और विवाह संपन्न हुआ। तब जाकर सबकी जान में जान आई थी।

37. बप्पा की मुंशीब में सफलता और उनका विवाह

एक दिन खुशखबरी आई कि बप्पा का मुंशीब में हो गया! फाइनल जॉइनिंग के लिए उन्हें लखनऊ से बाहर जाना होगा। पिताजी खुश तो बहुत थे – अपनी नौकरी के बाद अगर वे सबसे ज़्यादा खुश थे तो वह बप्पा की नौकरी लगने की थी। पिताजी अक्सर बताते थे कि बप्पा का जज बनने का सपना उनका जुनून था, जिसके लिए उन्होंने दिन-रात एक कर दी थी। जब उन्होंने अपनी मेहनत से उसे पा लिया, तो पिताजी की खुशी का ठिकाना न रहा।

पिताजी बप्पा के विवाह की एक बात और बताते थे। बप्पा हरदोई के रहने वाले थे। पिताजी उनकी शादी में गए थे। बारात में सब खूब नाचे और एंजॉय किया। जब पालकी घर की तरफ बढ़ रही थी, तब बप्पा ने अम्मा का घूँघट उठा दिया और कहा, "कैलाश, देख तेरी भाभी!" अम्मा शर्मा गई थीं। यह पल उनकी दोस्ती की गहराई और उनके बीच के खुलेपन को दर्शाता था।

38. छोटे भाई का दबंग रूप और पिताजी का दूरदर्शी प्रयास

गाँव में दुश्मनी थी और पिताजी गाँव में न रहकर लखनऊ में रहा करते थे। घर को दबंगों से रक्षा करने के लिए पिताजी के छोटे भाई, जो तीसरे नंबर पर थे, दबंग बने। उनकी छवि दबंग की थी। जब भी उन्हें कोई हमारे परिवार को परेशान करता या सुरक्षा के लिए खतरा बनता, तो वे उसे घर में घुस कर मारने की क्षमता रखते थे। जब भी वे घर से बाहर निकलते, तो अपने आप को तैयार रखते कि कभी भी हमला हो सकता है। उनके दोस्त-यार भी उनके साथ रहते थे। ऊँची आवाज़ में उनसे कोई बात नहीं कर सकता था। थोड़ा बहुत डरते थे तो सिर्फ पिताजी से।

10वीं की परीक्षा तो उन्होंने कई बार दी, पर पास होने में उन्हें बरसों लगे थे। उनका दिमाग सिर्फ पढ़ाई में नहीं लगता था, बाकी कामों में नंबर 1 थे – किसी को कोई मदद करनी हो, कहीं कुछ पंगा हुआ हो, या कोई तकनीकी काम हो। जहाँ कोई और काम नहीं आता था, वहां निवास (जिन्हें प्यार से लोग 'बघौवा' कहते थे) ही काम आते थे। जब किसी तरह उन्होंने 10वीं पास की, तब उनकी नौकरी घर के पास ही लगी। अब वे हर जगह हिट थे – घर में भी और बाहर में भी। पिताजी को अब सुकून हुआ कि "चलो, अब इसकी भी ज़िंदगी संभल गई।"

39. फीस का किस्सा: चाचा की नादानी और पिताजी का गुस्सा

पिताजी अक्सर हम तीनों को बोलते थे कि अगर तुम पढ़ाई नहीं करोगे तो तुम्हें हम छत से नीचे लटका देंगे। अक्सर हमारे बड़े चाचा और छोटे चाचा की पिटाईयों के किस्से आम थे, जिसमें वे बताते थे कि कैसे उनसे सब डरते थे और उनके डर से उनके भाइयों में कुछ पढ़ाई की और बाद में नौकरी लगी। एक किस्सा है जो हमारे छोटे चाचा जी का है, वे बड़े मुस्कुराते हुए बताते थे। एक बार की बात है जब हमारे छोटे चाचा यानी निवास चाचा का नाम स्कूल से कट गया। कुछ दिनों बाद जब पिताजी गोंडा अपने घर गए तो दादी ने बताया कि निवास का नाम स्कूल से कट गया है। वजह पूछी तो पता लगा कि स्कूल की फ़ीस जमा ही नहीं हुई थी, इसलिए नाम कट गया।

पिताजी हैरान थे कि फ़ीस तो पिताजी ने उन्हें खुद दी थी कि जमा कर देना। तो नाम कैसे कट गया? जब पिताजी ने चप्पल उठाई और पीटना शुरू किया, तो बाद में पता चला कि उन्होंने अपनी स्कूल की फ़ीस मेरे मुंडन (जो अयोध्या में हुआ था) की न्यौछावर में डाल दी थी। अब न्यौछावर में डालने के बाद फ़ीस कहाँ से जमा करते! बस इतना बताना था कि क्या हुआ, कुटाई थोड़ी और बढ़ गई। बाद में पिताजी ने फिर से पैसे दिए और फ़ीस जमा हुई।

40. भाइयों और रिश्तेदारों को शिक्षा व रोज़गार

उन दिनों डिग्री के हिसाब से भी लोगों को नौकरियाँ मिल जाती थीं। पिताजी ने अपने भाइयों को पढ़ाई करने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने अपने छोटे भाइयों को पढ़ाया और पढ़ाई पूरी करने पर उनकी योग्यता के हिसाब से नौकरियाँ लगवाईं। चाचा तो थे ही, साथ में दोनों फूफाओं की भी नौकरी लगवाई। इन सबकी नौकरी लगवाने के लिए पिताजी को काफ़ी संघर्ष करना पड़ा। पहले तो इन लोगों पर पढ़ने का दबाव डाला कि वे पढ़ें। कोई पढ़ने को तैयार नहीं था – पिताजी ने 'शाम, दाम, दंड, भेद' सब इस्तेमाल किया। आख़िर में सबने किसी तरह से पढ़ाई की और बाद में उनकी योग्यता के हिसाब से नौकरी लगी।

जब तक पिताजी इस स्थिति में रहे, उन्होंने अपने समाज और अपने परिवार का कल्याण करने की कोशिश करते रहे। अगर किसी की नौकरी न लगवा पाए, तो उन्हें मार्गदर्शन ज़रूर दिया।

41. पत्रों में झलकती चिंता: परिवार के प्रति समर्पण

पिताजी द्वारा लिखी गईं कुछ चिट्ठियाँ देखीं, उनमें नाना जी को लिखी चिट्ठियाँ भी थीं। उनमें वे नाना जी के स्वास्थ्य को लेकर चिंतित दिखे थे। एक चिट्ठी में उन्होंने लिखा था कि नाना जी की तबीयत ख़राब थी और किसी टेस्ट की वजह से उन्हें दवाइयाँ नहीं मिल पा रही थीं। तो उन्होंने लिखा कि कुछ दिनों में वे घर (यानी मेरी नानी के घर) आएँगे तो उनका टेस्ट करवा देंगे जिससे उनको दवाइयाँ मिल सकें। हर चिट्ठी में वे उनका हाल-चाल लेते हुए नज़र आ रहे थे, साथ में मेरी माँ, जो उन दिनों नाना जी के घर में थीं, उनको भी आयरन की दवा लेने की सलाह दे रहे थे, कि वे दवा खा लें जिससे उनका स्वास्थ्य ठीक हो जाए।

कुछ चिट्ठियाँ मौसी के नाम भी थीं, जिनसे उनके और जीजा जी के बीच अच्छे संबंध झलकते थे। वे अक्सर उन्हें बाकी लोगों का ख़्याल रखने को बोल रहे होते थे।

वो गुज़रा हुआ कल नहीं गया — वो हमारे शब्दों में आज भी ज़िंदा है।

कॉलेज के दिनों की साथी: चंद्रिका चाट की टिक्की

लखनऊ के कॉलेज के दिनों में, हॉस्टल में रहते हुए खुद से खाना बनाना एक चुनौती थी, खासकर पढ़ाई और काम के साथ। पिताजी बताते थे कि जब भी खाना बनाने का मन नहीं करता था, तो उनकी भूख का सहारा बनती थी, पुराने लखनऊ की मशहूर 'चंद्रिका चाट'

चंद्रिका जी बड़े से 'झाबे' (टोकरी) में टिक्की का सारा सामान लिए रहते थे और वहीं स्टोव जलाकर गरमा-गरम टिक्की बनाते थे। यह आम टिक्की नहीं थी – यह मटर की टिक्की थी, जिसमें 'सोहल' (एक तरह की मटर) और कुछ घर के बने सूखे मसाले डाले जाते थे। टिक्की का स्वाद इतना ज़बरदस्त था कि संघर्ष के उन दिनों में यह सादगी भरा भोजन भी किसी शाही दावत से कम नहीं लगता था।

यह टिक्की सिर्फ़ पेट भरने का साधन नहीं थी; यह उनके संघर्ष के दिनों की साथी थी। पिताजी के जाने के बाद भी यह परंपरा कायम है। जब भी हम पुराने लखनऊ से गुजरते हैं, तो उनकी याद में यह टिक्की ज़रूर लेकर आते हैं। अब चंद्रिका जी के बेटे यह दुकान संभालते हैं, और उन्हें फ़ोन करके जाने पर वे ख़ास हमारे लिए गरमा-गरम टिक्की तैयार रखते हैं। इस टिक्की का स्वाद आज भी वैसा ही है, जैसा पहले था — यह सिर्फ़ चाट नहीं, हमारे परिवार की एक मीठी याद है।

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