नानी के घर एक डिब्बा था,
छोटा-सा, टिन का...
ढक्कन खोलो तो लगता था
जैसे पूरा आसमान भीतर रख दिया हो।
मैंने उसमें तारे चुन–चुन रखे थे,
चाँद की एक मोड़ी हुई किरन भी थी,
और बरगद की छाँव
जिसमें गर्मियों की दोपहरी सोई रहती थी।
आम की गुठलियाँ थीं,
कंचों की चमक थी,
नानी की हँसी थी,
माँ की चोटी में बंधा लाल रिबन भी...
सब वही रखा था।
फिर एक दिन—
वो डिब्बा गुम हो गया,
शायद बटवारे के शोर में,
या बड़ों की अलमारी के हिसाब–किताब में।
अब सिर्फ़ उसकी याद बची है,
टूटे हुए सितारों की तरह—
जो हर रात पलकों पर टिमटिमाते हैं।
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