Friday, August 14, 2026

वो घर, जो कभी मेरा था

विदाई के समय मैंने उसे अपने ही हाथों से उठाकर डोली में बैठाया था। बहन विदा तो हो रही थी, लेकिन मेरे दिल से वह कभी विदा नहीं हुई। मैंने हमेशा उसे अपने घर का हिस्सा माना।

वह घर छोड़कर चली गई थी, लाख विरोध के बावजूद, लेकिन उस घर का हिस्सा बनी रही। दिन बीते, हफ्ते बीते, महीने बीते और फिर साल गुजर गए… मगर उसके लिए उस घर के दरवाज़े कभी बंद नहीं हुए।

फिर एक दिन मैंने वह घर छोड़ दिया।

धीरे-धीरे घरवालों को मेरे बिना जीने की आदत हो गई। पता ही नहीं चला कि कब मेरा अपना घर मेरे लिए पराया हो गया। घर आता था, मगर अब वह घर जैसा महसूस नहीं होता था—कुछ अजनबी-सा लगता था।

भाई का कमरा था, लेकिन मेरा नहीं था। बहन के लिए जगह थी, मेरे लिए नहीं।

वहाँ अब बहन जा बसी थी। घर में सब कुछ था—कमरे, दीवारें, रिश्ते… बस मेरे हिस्से का अपनापन नहीं था।

जिस बहन को मैंने कभी उस घर में अजनबी महसूस नहीं होने दिया, उसी घर में एक दिन मैं खुद अजनबी हो गया।

शायद बस मेरे विवाह करने की देर थी।

रिश्तों की जगह बदल गई, घर की परिभाषाएँ बदल गईं और मेरी जगह भी बदल गई। जो घर कभी मेरा था, वहाँ मेरी यादें तो थीं, मेरा कमरा भी था… मगर मेरा होना नहीं था।

मैं घर से दूर नहीं हुआ था,
बस घर वाले मुझसे दूर हो गए थे।

और सबसे अजीब बात यह थी कि घर अब भी वही था—
बस उसमें मेरा अपनापन खत्म हो गया था।

कुछ छूटेगा, तभी कुछ नया बनेगा — ज़ेन ज़ी से एक संवाद


आज का दौर ज़ेन ज़ी का है, ऐसा लोग बताते हैं। इस आंदोलन ने पहली बार शायद उनका असली रूप हमारे सामने रखा है। मुझे खुशी इस बात की है कि वे किसी का बोझ अपने ऊपर लेकर नहीं जी रहे—न सभ्यता का, न समाज का और न ही रिश्तों का।
हमारा दौर कुछ और था। हम तो धर्मराज की तरह रिश्तों को सुलझाते-सुलझाते एक उम्र गुज़ार बैठे। सबको साथ रखने की कोशिश में खुद से ही दूर होते गए। अंत में हाथ क्या आया? न माया मिली, न राम।
ज़ेन ज़ी, तुमसे बस यही अनुरोध है—अपना और अपने देश का ख़याल रखना। जब खिड़की खुलेगी तो हवा के साथ कुछ अच्छी चीज़ें भी आएँगी और कुछ बुरी भी। लेकिन वक्त तुम्हें खुद सिखा देगा कि क्या भीतर आने देना है और क्या बाहर ही छोड़ देना है।
बिना पुराने बोझ के शायद तुम नई सोच पैदा कर पाओगे, नए रास्ते खोज पाओगे। हम तो रिश्ते सुलझाते-सुलझाते रह गए; न कुछ नया सोच पाए, न बहुत कुछ नया कर पाए।
जिस नई खोज के लिए भारत सदियों से तरसता रहा है, शायद वह तुम्हारी पीढ़ी कर पाए।
याद रखना—कुछ छूटेगा, तभी कुछ नया बनेगा।
तुम्हें मेरी शुभकामनाएँ।

Sunday, June 21, 2026

माता-पिता का साथ: जिम्मेदारी, प्रेम और एक कठिन सफर


​जीवन का एक चक्र है, जिसे समझना और स्वीकार करना हर संतान के लिए एक परीक्षा जैसा होता है। एक दिन वह समय आता है जब हमारे माता-पिता, जिन्होंने कभी हमारी उँगली पकड़कर हमें चलना सिखाया था, हम पर निर्भर हो जाते हैं। उनकी दुनिया, जो कभी हमारे इर्द-गिर्द घूमती थी, अब छोटी होकर हमारे निर्णयों पर सिमट जाती है।

पुत्र या पुत्री होना सिर्फ एक रिश्ता नहीं है, यह एक कर्तव्य है।

​बुढ़ापे में उनके साथ खड़े होना, उनकी बीमारी की रातों में जागना, और जब उनका शरीर साथ छोड़ रहा हो, तब उनके पास मौजूद रहना—यह सब आसान नहीं है। किसी भी संतान के लिए अपने माता-पिता को कमजोर होते देखना और उनके अंतिम समय में उन्हें विदा होते देखना, जीवन का सबसे कठिन क्षण होता है।

​इस सफर में हमें अक्सर वो भूमिका निभानी पड़ती है जो कभी वे हमारे लिए निभाया करते थे। उनके फैसले हमें लेने होते हैं, जैसे कभी वे हमारे भविष्य के लिए लिया करते थे। हम उनकी भलाई के लिए जो निर्णय लेते हैं, उनमें से कौन सा 'सही' था और कौन सा 'गलत', यह तो सिर्फ वक्त ही बताता है। कभी-कभी विवशता में लिए गए फैसले हमें अंदर तक तोड़ देते हैं, हमें लगता है कि शायद हम कुछ और बेहतर कर सकते थे।

​लेकिन याद रखिए, उनके जाने के बाद मन में उठने वाले 'पछतावे' से कहीं ज्यादा सुकून इस बात का होता है कि हम उनके साथ थे। हम उनके अंतिम क्षणों तक उनकी सेवा में उपस्थित रहे। यह संतुष्टि ही उस खालीपन को भरने की ताकत देती है जो उनके जाने के बाद पीछे छूट जाता है।

​आज वे भले ही भौतिक रूप से हमारे बीच न हों, लेकिन हम उनके जाने के बाद भी उन्हीं को जी रहे हैं। उनके संस्कार, उनकी सीख और उनके दिए हुए मूल्य हमारे हर फैसले में जीवित हैं। असल में, वे कहीं गए ही नहीं, वे तो हमारे व्यक्तित्व में, हमारे व्यवहार में और हमारी यादों में हमेशा हमारे साथ हैं।

Wednesday, June 10, 2026

क्रांति या कठपुतली?

जब से बंगाल के चुनाव हुए हैं, तब से हमारी आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक गिरावट का ज़िक्र अचानक कुछ ज़्यादा ही बढ़ गया है।
क्या देश की आर्थिक हालत एक दिन में अचानक ही गिरने लगी होगी? उससे पहले इन विषयों पर इतना खुलकर कोई पॉडकास्ट भी नहीं आ रहा था और न ही देश की सरकार का इस स्तर पर इतना खुलकर विरोध हो रहा था।
समझ नहीं आ रहा कि हम किसी क्रांति की ओर बढ़ रहे हैं या फिर किसी की कठपुतली बनते जा रहे हैं। हमें खुद ही पता नहीं।
नेपाल और बांग्लादेश में जिस तरह के हालात बने, वह हम सबने देखे। सोशल मीडिया का कमाल देखिए—रातों-रात सरकार बदल गई, लेकिन फिर देश के हाथ क्या आया? एक दिशाहीन सरकार।
मैं किसी सरकार के समर्थन में नहीं लिख रहा हूँ, पर ऐसा न हो कि देश ऐसी दिशा में चला जाए जहाँ से उसे वापस लाना आसान न रहे।
सरकार को भी जिन चीज़ों को समझदारी से संभालना चाहिए था, वह भी कहीं-कहीं वही करती दिखाई दे रही है जो कभी पुरानी सरकार अपने आख़िरी दिनों में किया करती थी।
वे शिक्षक, जिन्होंने हमें लफ़्ज़ों में ज्ञान दिया, जिन्होंने न जाने कितने अनसुलझे प्रश्नों के उत्तर दिए, आज वही कटघरे में खड़े हैं।

Sunday, May 31, 2026

चाँद वहीं था

एक चकोर था, जो हर रात चाँद को निहारता था। उसकी ओर खिंचा चला जाता था। उसे लगता था कि चाँद ही उसकी दुनिया है, उसका प्रेम है, उसका जीवन है। चाँद भी यह देखकर अभिभूत था कि कोई उस पर इतना मोहित है।
समय बीता। एक रात बादल छा गए, फिर अमावस्या आई। चाँद की रोशनी गायब हो गई। लेकिन चाँद कहीं गया नहीं था। वह वहीं था, उसी आसमान में, उसी जगह। बदला केवल इतना था कि उसकी रोशनी दिखाई नहीं दे रही थी।
चकोर ने कुछ रातें प्रतीक्षा की, फिर धीरे-धीरे किसी और उजाले की ओर उड़ गया।
चाँद हैरान था। उसे लगा था कि चकोर उसका प्रेमी है। पर सच यह था कि चकोर चाँद का नहीं, उसकी रोशनी का दीवाना था। और वह रोशनी भी चाँद की अपनी कहाँ थी? वह तो सूरज से उधार ली हुई थी।
जब तक चाँद चमकता रहा, चकोर उसके इर्द-गिर्द मंडराता रहा। जैसे ही उजाला कम हुआ, उसका प्रेम भी कम हो गया।
तब चाँद को समझ आया कि चकोर को उसके होने से प्रेम नहीं था, उसके चमकने से था। क्योंकि जब चाँदनी चली गई, तब चकोर भी चला गया; जबकि चाँद तो अब भी वहीं था—उसी आसमान में, उसी जगह, अपने पूरे वजूद के साथ।

Sunday, May 10, 2026

माँ- तुम्हे Mothers Day की हार्दिक शुभकामनाएं

आज Mothers Day है।
सब अपनी माँ को इस दिन की हार्दिक शुभकामनाएँ दे रहे हैं,
पर उनका क्या जो “माँ” तो रोज़ बुलाते हैं,
पर “हाँ बेटा, मैं हूँ…” की आवाज़ अब वापस सुनाई नहीं देती।
माँ तो परमधाम चली गईं। कहते हैं, माँ कहीं भी रहे, अपने बच्चों को कभी नहीं भूलती।
पर एक सच यह भी है कि बच्चे भी माँ को हर रोज़ जीते हैं — हर पल, हर घड़ी।
आज जब मेरा बेटा अपनी माँ को Mothers Day की बधाई दे रहा था,
तो सच मानो, तुम्हारा एहसास आँखों में पानी बनकर उतर आया।
सभी को Mothers Day की हार्दिक शुभकामनाएँ।
जब तक माँ ज़िंदा रहती है, शायद उनकी अहमियत उतनी महसूस नहीं होती।
जिस दिन वो चली जाती हैं, उस दिन के बाद इंसान उनकी यादों के साथ हर रोज़ जीता है

तुम्हारा बेटा
राहुल

Monday, February 16, 2026

विवाह के चौदह बरस


आज हमारे विवाह को 14 वर्ष हो गए। कहते हैं 14 वर्ष का समय बहुत बड़ा होता है। राम ने 14 वर्ष का वनवास पूर्ण कर जब अयोध्या लौटकर अपने प्रियजनों को गले लगाया होगा, तो वह मिलन कितना मधुर रहा होगा।
हमारे इन 14 वर्षों में भी कितने ही मौसम आए- कभी धूप, कभी छाँव, कभी बारिश की नमी, तो कभी सर्द सुबहों की खामोशी।
प्रेम हुआ… झगड़े भी हुए… रूठना भी आया… मनाना भी।
पर हर बार अंत में जो बचा, वह सिर्फ “हम” थे।
कहते हैं समय के साथ प्रेम कम हो जाता है, पर मुझे लगता है हमारा प्रेम बदला है- गहरा हुआ है, शांत हुआ है, समझदार हुआ है।
अब हाल कुछ ऐसा है कि मैं अगली बात क्या कहूँगा, यह उन्हें पहले से पता होता है।
मेरे तर्क, मेरे बहाने, मेरी आधी अधूरी दलीलें- सब उनकी मुस्कान के आगे हार मान लेती हैं।
कई बार बिना बोले ही बातें पूरी हो जाती हैं, जैसे दिलों के बीच कोई अदृश्य संवाद चलता हो।
इन 14 वर्षों में उन्होंने सिर्फ मेरा साथ नहीं दिया, उन्होंने मुझे समझा, सँभाला, और कई बार मुझसे बेहतर “मुझे” जाना।
उनके बिना यह सफर अधूरा था, है और रहेगा।
आज इन 14 वर्षों के बाद मैं कोई ठहराव नहीं देखता-
मैं एक नई शुरुआत देखता हूँ।
नए सपनों के साथ, नए वादों के साथ, और उसी पुराने प्रेम के साथ…
जो हर सुबह फिर से नया लगता है।
आप सभी परिवारजनों और इष्टमित्रों का आशीर्वाद यूँ ही बना रहे....
समय से परे, शब्दों से परे… सिर्फ प्रेम में।🙏