Wednesday, October 21, 2026

पहले प्यार की खुशबू

 

पहले प्यार की खुशबू

यह उस दौर की बात है जब दिल्ली-एनसीआर की आईटी दुनिया में दिन कोड, बग्स और सख्त डेडलाइन्स के बीच बीतते थे, और शामें कंप्यूटर स्क्रीन पर टिमटिमाती जीटॉक (GTalk) की उस हरी बत्ती के इंतज़ार में।

राघव उन दिनों नोएडा की एक टेक कंपनी में अपने करियर की शुरुआती सीढ़ियां चढ़ रहा था। नया-नया शहर, ऑफिस के लंबे घंटे और एक अदद पहचान बनाने की जद्दोजहद। इन्हीं आपाधापी भरे दिनों में उसकी ज़िंदगी में अवनि आई। अवनि उसके कॉलेज के एक पुराने दोस्त के ऑफिस में काम करती थी।

राघव ने उसे पहली बार एक कॉमन फ्रेंड की शादी के रिसेप्शन में देखा था।

हल्की गुलाबी साड़ी, चेहरे पर सादगी से भरी सौम्यता और जब वह हंसती, तो ऐसा लगता मानो उस शोर-शराबे वाले हॉल में अचानक कोई मधुर सा साज बज उठा हो। राघव उस शाम जैसे किसी सम्मोहन में बंध गया था। उम्र का वो अल्हड़पन ही कुछ ऐसा था कि बिना आगे-पीछे का सोचे, उसी शाम लॉन के एक किनारे उसने अवनि से अपने दिल की बात कह दी—बिल्कुल साफ, सीधा और बेबाक प्रपोजल।

अवनि ने उस वक्त हैरान होकर देखा, फिर उसके चेहरे पर एक बेहद शालीन, कोमल सी मुस्कान तैर गई। उसने बहुत नर्मी से सिर हिलाते हुए मना कर दिया। न कोई गुस्सा, न कोई बनावटी तेवर—बस एक सीधा, गरिमामयी इनकार।

राघव का दिल टूटा ज़रूर, लेकिन उसके मन में अवनि के लिए इज़्ज़त सौ गुना बढ़ गई। राघव को हमेशा से यह भली-भांति अहसास था कि अवनि उसकी दुनिया से कहीं आगे थी। उसका आत्मविश्वास, उसका बात करने का सलीका और ज़िंदगी को देखने का नज़रिया—सब कुछ ऐसा था जिसे देखकर राघव को लगता कि वह शायद कभी उसके काबिल नहीं बन पाएगा। अवनि उसके लिए रात के आकाश में चमकते उस ध्रुव तारे की तरह थी, जिसे सिर्फ दूर से देखकर मुस्कुराया जा सकता है, अपनी हथेलियों में समेटा नहीं जा सकता।

मगर दिल की मासूमियत तर्कों की भाषा कहाँ समझती है? इनकार के बाद भी राघव के दिल में अवनि के लिए कोई कड़वाहट नहीं आई। वह उसका पहला, बेदाग और खूबसूरत क्रश बन चुकी थी।

शादी के कुछ दिनों बाद दोनों जीटॉक पर जुड़ गए।

कंपनी के फायरवॉल और रिस्ट्रिक्टेड इंटरनेट के बीच, ऑफिस के डेस्क से राघव के मैसेज जाने लगे। कभी वह प्रोजेक्ट की डेडलाइन का रोना रोता, तो कभी बेतुकी बातों पर 'LOL' का मतलब समझाते हुए चैट बॉक्स को ठहाकों से भर देता। बातों-बातों में राघव अपनी उस छुपी हुई चाहत की खुशबू बिखेरना कभी नहीं भूलता था। वह जब-तब अपनी अधकचरी शायरी छेड़ देता:

“कांटों से दामन उलझाना मेरी आदत है...

जिनको दुनिया ने ठुकराया, ऐसे लोगों को अपनाना मेरी आदत है।”

अवनि स्क्रीन के उस पार से हंसती और पलटकर कोई दो टूक शेर सुना देती। वह राघव की मासूमियत से वाकिफ थी। वह जानती थी कि इस लड़के के मन में उसके लिए एक बेहद पवित्र और कोमल जगह है। इसलिए वह बड़ी नज़ाकत से, बिना उसका दिल दुखाए, बातचीत को हमेशा एक सुरक्षित दोस्ताना दायरे में समेटे रखती।

नए साल के आसपास जब राघव को पता चला कि अवनि किसी और के साथ डेट पर गई थी, तो एक पल के लिए उसके सीने में टीस ज़रूर उठी। उसने जज़्बात में बहकर एक लंबा मैसेज भी लिखा, पर अवनि के एक समझदारी भरे जवाब ने उसे ज़मीन पर ला खड़ा किया। उस दिन राघव ने जाना कि मोहब्बत का मतलब किसी को पा लेना या बांध लेना नहीं होता। उसने अवनि की आज़ादी और उसकी प्राथमिकताओं का दिल से सम्मान किया।

धीरे-धीरे वक्त के साथ प्रोजेक्ट्स बदले, जिम्मेदारियां बढ़ीं और एक दिन वह जीटॉक की हरी बत्ती हमेशा के लिए शांत हो गई। दोनों की राहें अपनी-अपनी दिशाओं में मुड़ गईं।

पंद्रह साल गुज़र गए।

राघव अब पहले वाला अल्हड़ लड़का नहीं था। उसने अपनी मेहनत से करियर में एक मजबूत मुकाम बना लिया था। उसकी ज़िंदगी में एक प्यारा सा परिवार था, अपनी खुशियां थीं और दिल में एक गहरा, शांत समंदर जैसा ठहराव। मगर उन शुरुआती दिनों की वह पहली धड़कन, वह पहला एकतरफ़ा अहसास, उसके ज़हन में किसी पुरानी डायरी के सूखे गुलाब की तरह महफूज़ था—जिसकी खुशबू कभी फीकी नहीं पड़ी थी।

सर्दियों की एक सुनहरी शाम, दिल्ली के कनॉट प्लेस के एक शांत और एस्थेटिक कैफ़े में राघव अपनी मीटिंग खत्म करके बैठा था। बाहर हल्की धूप ढल रही थी और वह अपनी ब्लैक कॉफी की चुस्की ले रहा था।

तभी काउंटर की तरफ से एक जानी-पहचानी आवाज़ कानों में पड़ी:

"एक कैपुचीनो, प्लीज़... विद एक्स्ट्रा सिनेमन।"

राघव का हाथ ठहर गया। उसने नज़र उठाई।

वह अवनि थी।

वक्त ने उसके चेहरे पर एक ग्रेसफुल, मैच्योर चमक जोड़ दी थी। आंखों के कोनों पर हल्की बारीक लकीरें थीं, जो बता रही थीं कि उसने ज़िंदगी को बहुत करीब से जिया है। राघव एक पल के लिए मुस्कुराया, फिर अपनी कुर्सी से उठकर हौले से उसके पास पहुंचा।

"अवनि?"

अवनि ने पलटक़र देखा। पहले एक लम्हे के लिए उसकी नज़रों में पहचान की धुंध आई, और फिर वही खूबसूरत, खनकती हुई मुस्कान उसके होंठों पर बिखर गई।

"राघव! अरे... तुम? यहाँ?"

"हाँ, एक मीटिंग थी... और तुम्हारी यह सिनेमन वाली कॉफी की फरमाइश ने बरसों पुरानी याद ताज़ा कर दी," राघव ने सहजता से कहा।

दोनों खिड़की के पास वाली मेज़ पर बैठ गए। पंद्रह सालों का फासला महज़ पंद्रह सेकंड में सिमट गया। कोई झिझक नहीं थी, कोई बनावटी औपचारिकता नहीं।

अवनि ने बताया कि वह अब एक ग्लोबल फर्म में डायरेक्टर है, उसका अपना एक खुशहाल संसार है। राघव ने भी अपने काम, अपनी ज़िंदगी और अपनी दुनिया की बातें साझा कीं।

बातों के बीच जब एक पल का ठहराव आया, तो अवनि ने उसकी आँखों में झांकते हुए बड़ी नर्मी से कहा, "राघव, तुम बिल्कुल नहीं बदले। वही सादगी, वही आंखों की चमक।"

राघव हल्के से हंसा, "शायद थोड़ा संभल गया हूँ अवनि। याद है तुम्हें, जब मैंने उस शादी में बिना सोचे-समझे तुम्हें प्रपोज कर दिया था? आज सोचता हूँ तो लगता है कि मैं कितना नादान था। मैं हमेशा जानता था कि तुम मुझसे बहुत बेहतर थीं, मेरे लिए तुम उस आसमान की तरह थीं जिसे मैं ज़मीन पर रहकर सिर्फ देखा करता था।"

अवनि की आँखें एक पल के लिए भीगीं, फिर उसने बहुत आत्मीयता से राघव के हाथ पर अपना हाथ रखा।

"तुम कभी कम नहीं थे, राघव। उस वक्त मैं शायद करियर और ज़िंदगी के दूसरे मोड़ पर थी। लेकिन तुम्हारी उस मासूमियत ने, तुम्हारी उस एकतरफ़ा चाहत ने मुझे हमेशा एक चीज़ सिखाई—कि दुनिया में ऐसे लोग भी होते हैं जो बिना किसी शर्त के किसी की खुशी की दुआ मांगते हैं। तुमने हमेशा मेरी स्पेस की कद्र की। उस दोस्ती और उस प्यार के लिए... थैंक यू।"

राघव के चेहरे पर एक असीम सुकून की मुस्कान खिल उठी। वह जो एक अधूरापन कभी सीने के किसी कोने में दबा रह गया था, वह आज पूरी तरह मुकम्मल हो गया था। उसे अवनि को न पाने का कोई मलाल नहीं था; बल्कि उसे इस बात का फख्र था कि उसने अपनी ज़िंदगी में सबसे पहला और सबसे सच्चा प्यार अवनि से किया था—एक ऐसा प्यार जिसमें पाने की लालसा नहीं, सिर्फ दूसरे की सलामती और खुशी की चाह थी।

कॉफी खत्म हुई। दोनों कैफ़े से बाहर निकले। दिल्ली की शाम अब हल्की गुलाबी ठंड में तब्दील हो चुकी थी।

"ख्याल रखना अपना, राघव... बहुत अच्छा लगा तुमसे मिलकर," अवनि ने गर्मजोशी से हाथ मिलाते हुए कहा।

"तुम भी अपना ख्याल रखना, अवनि। हमेशा खुश रहो," राघव ने कहा।

दोनों ने एक-दूसरे को आखिरी बार देखा और मुस्कुराते हुए अपनी-अपनी राहों पर आगे बढ़ गए। राघव ने जब अपनी कार की तरफ कदम बढ़ाए, तो उसके दिल में एक हल्की, रूहानी सी ठंडक थी।

उसे पता था कि अब ज़िंदगी के किसी भी मोड़ पर जब भी अवनि का नाम आएगा या उसकी याद गुज़रेगी, तो दिल में कोई दर्द या टीस नहीं उठेगी। राघव का चेहरा हर बार उसी तरह खिल उठेगा—उस पहले प्यार की भीनी-भीनी, अमर खुशबू की तरह।

Friday, August 14, 2026

वो घर, जो कभी मेरा था

यह वर्ज़न पहले से काफी मजबूत है। मैंने इसे ज़्यादा मानवीय, सहज और बोलचाल के भाव में थोड़ा सँवारा है—बिना दर्द को ज़्यादा साहित्यिक बनाए। खासकर आखिरी हिस्से को थोड़ा कम दोहराव वाला रखा है।

विदाई के समय मैंने उसे अपने ही हाथों से उठाकर डोली में बैठाया था। बहन विदा तो हो रही थी, लेकिन मेरे दिल से वह कभी विदा नहीं हुई। मैंने हमेशा उसे अपने घर का हिस्सा माना।

वह घर छोड़कर चली गई थी, लाख विरोध के बावजूद, लेकिन उस घर से उसका रिश्ता कभी खत्म नहीं हुआ। दिन बीते, हफ्ते बीते, महीने बीते और फिर साल गुजर गए… मगर उसके लिए उस घर के दरवाज़े हमेशा खुले रहे।

फिर एक दिन मैंने वह घर छोड़ दिया।

धीरे-धीरे घरवालों को मेरे बिना जीने की आदत हो गई। पता ही नहीं चला कि कब मेरा अपना घर मेरे लिए बदल गया। मैं घर आता था, मगर अब वहाँ पहले जैसा अपनापन महसूस नहीं होता था। सब कुछ अपना होकर भी कुछ अजनबी-सा लगता था।

भाई का कमरा था, लेकिन अब मेरा नहीं था। बहन के लिए जगह थी, मेरे लिए नहीं।

वहाँ अब बहन जा बसी थी। कमरे वही थे, दीवारें वही थीं, रिश्ते भी वही थे… बस मेरे हिस्से की जगह कहीं पीछे छूट गई थी।

जिस बहन को मैंने कभी उस घर में अजनबी महसूस नहीं होने दिया, उसी घर में एक दिन मैं खुद अजनबी हो गया।

शायद बस मेरे विवाह करने की देर थी।

रिश्तों की जगह बदल गई, घर की परिभाषाएँ बदल गईं और मेरी जगह भी बदल गई। यादें आज भी उसी घर में थीं, लेकिन अब उनमें मेरा होना नहीं था।

मैं घर से दूर नहीं हुआ था,
बस घर वालों से दूर होता चला गया।

और सबसे अजीब बात यह थी कि घर अब भी वही था.
बस उसमें मेरे लिए पहले जैसा अपनापन नहीं था।

कुछ छूटेगा, तभी कुछ नया बनेगा — ज़ेन ज़ी से एक संवाद


आज का दौर ज़ेन ज़ी का है, ऐसा लोग बताते हैं। इस आंदोलन ने पहली बार शायद उनका असली रूप हमारे सामने रखा है। मुझे खुशी इस बात की है कि वे किसी का बोझ अपने ऊपर लेकर नहीं जी रहे—न सभ्यता का, न समाज का और न ही रिश्तों का।
हमारा दौर कुछ और था। हम तो धर्मराज की तरह रिश्तों को सुलझाते-सुलझाते एक उम्र गुज़ार बैठे। सबको साथ रखने की कोशिश में खुद से ही दूर होते गए। अंत में हाथ क्या आया? न माया मिली, न राम।
ज़ेन ज़ी, तुमसे बस यही अनुरोध है—अपना और अपने देश का ख़याल रखना। जब खिड़की खुलेगी तो हवा के साथ कुछ अच्छी चीज़ें भी आएँगी और कुछ बुरी भी। लेकिन वक्त तुम्हें खुद सिखा देगा कि क्या भीतर आने देना है और क्या बाहर ही छोड़ देना है।
बिना पुराने बोझ के शायद तुम नई सोच पैदा कर पाओगे, नए रास्ते खोज पाओगे। हम तो रिश्ते सुलझाते-सुलझाते रह गए; न कुछ नया सोच पाए, न बहुत कुछ नया कर पाए।
जिस नई खोज के लिए भारत सदियों से तरसता रहा है, शायद वह तुम्हारी पीढ़ी कर पाए।
याद रखना—कुछ छूटेगा, तभी कुछ नया बनेगा।
तुम्हें मेरी शुभकामनाएँ।

Sunday, June 21, 2026

माता-पिता का साथ: जिम्मेदारी, प्रेम और एक कठिन सफर


​जीवन का एक चक्र है, जिसे समझना और स्वीकार करना हर संतान के लिए एक परीक्षा जैसा होता है। एक दिन वह समय आता है जब हमारे माता-पिता, जिन्होंने कभी हमारी उँगली पकड़कर हमें चलना सिखाया था, हम पर निर्भर हो जाते हैं। उनकी दुनिया, जो कभी हमारे इर्द-गिर्द घूमती थी, अब छोटी होकर हमारे निर्णयों पर सिमट जाती है।

​पुत्र या पुत्री होना सिर्फ एक रिश्ता नहीं है, यह एक कर्तव्य है।

​बुढ़ापे में उनके साथ खड़े होना, उनकी बीमारी की रातों में जागना, और जब उनका शरीर साथ छोड़ रहा हो, तब उनके पास मौजूद रहना—यह सब आसान नहीं है। किसी भी संतान के लिए अपने माता-पिता को कमजोर होते देखना और उनके अंतिम समय में उन्हें विदा होते देखना, जीवन का सबसे कठिन क्षण होता है।

​इस सफर में हमें अक्सर वो भूमिका निभानी पड़ती है जो कभी वे हमारे लिए निभाया करते थे। उनके फैसले हमें लेने होते हैं, जैसे कभी वे हमारे भविष्य के लिए लिया करते थे। हम उनकी भलाई के लिए जो निर्णय लेते हैं, उनमें से कौन सा 'सही' था और कौन सा 'गलत', यह तो सिर्फ वक्त ही बताता है। कभी-कभी विवशता में लिए गए फैसले हमें अंदर तक तोड़ देते हैं, हमें लगता है कि शायद हम कुछ और बेहतर कर सकते थे।

​लेकिन याद रखिए, उनके जाने के बाद मन में उठने वाले 'पछतावे' से कहीं ज्यादा सुकून इस बात का होता है कि हम उनके साथ थे। हम उनके अंतिम क्षणों तक उनकी सेवा में उपस्थित रहे। यह संतुष्टि ही उस खालीपन को भरने की ताकत देती है जो उनके जाने के बाद पीछे छूट जाता है।

​आज वे भले ही भौतिक रूप से हमारे बीच न हों, लेकिन हम उनके जाने के बाद भी उन्हीं को जी रहे हैं। उनके संस्कार, उनकी सीख और उनके दिए हुए मूल्य हमारे हर फैसले में जीवित हैं। असल में, वे कहीं गए ही नहीं, वे तो हमारे व्यक्तित्व में, हमारे व्यवहार में और हमारी यादों में हमेशा हमारे साथ हैं।

Wednesday, June 10, 2026

क्रांति या कठपुतली?

जब से बंगाल के चुनाव हुए हैं, तब से हमारी आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक गिरावट का ज़िक्र अचानक कुछ ज़्यादा ही बढ़ गया है।
क्या देश की आर्थिक हालत एक दिन में अचानक ही गिरने लगी होगी? उससे पहले इन विषयों पर इतना खुलकर कोई पॉडकास्ट भी नहीं आ रहा था और न ही देश की सरकार का इस स्तर पर इतना खुलकर विरोध हो रहा था।
समझ नहीं आ रहा कि हम किसी क्रांति की ओर बढ़ रहे हैं या फिर किसी की कठपुतली बनते जा रहे हैं। हमें खुद ही पता नहीं।
नेपाल और बांग्लादेश में जिस तरह के हालात बने, वह हम सबने देखे। सोशल मीडिया का कमाल देखिए—रातों-रात सरकार बदल गई, लेकिन फिर देश के हाथ क्या आया? एक दिशाहीन सरकार।
मैं किसी सरकार के समर्थन में नहीं लिख रहा हूँ, पर ऐसा न हो कि देश ऐसी दिशा में चला जाए जहाँ से उसे वापस लाना आसान न रहे।
सरकार को भी जिन चीज़ों को समझदारी से संभालना चाहिए था, वह भी कहीं-कहीं वही करती दिखाई दे रही है जो कभी पुरानी सरकार अपने आख़िरी दिनों में किया करती थी।
वे शिक्षक, जिन्होंने हमें लफ़्ज़ों में ज्ञान दिया, जिन्होंने न जाने कितने अनसुलझे प्रश्नों के उत्तर दिए, आज वही कटघरे में खड़े हैं।

Sunday, May 31, 2026

चाँद वहीं था

एक चकोर था, जो हर रात चाँद को निहारता था। उसकी ओर खिंचा चला जाता था। उसे लगता था कि चाँद ही उसकी दुनिया है, उसका प्रेम है, उसका जीवन है। चाँद भी यह देखकर अभिभूत था कि कोई उस पर इतना मोहित है।
समय बीता। एक रात बादल छा गए, फिर अमावस्या आई। चाँद की रोशनी गायब हो गई। लेकिन चाँद कहीं गया नहीं था। वह वहीं था, उसी आसमान में, उसी जगह। बदला केवल इतना था कि उसकी रोशनी दिखाई नहीं दे रही थी।
चकोर ने कुछ रातें प्रतीक्षा की, फिर धीरे-धीरे किसी और उजाले की ओर उड़ गया।
चाँद हैरान था। उसे लगा था कि चकोर उसका प्रेमी है। पर सच यह था कि चकोर चाँद का नहीं, उसकी रोशनी का दीवाना था। और वह रोशनी भी चाँद की अपनी कहाँ थी? वह तो सूरज से उधार ली हुई थी।
जब तक चाँद चमकता रहा, चकोर उसके इर्द-गिर्द मंडराता रहा। जैसे ही उजाला कम हुआ, उसका प्रेम भी कम हो गया।
तब चाँद को समझ आया कि चकोर को उसके होने से प्रेम नहीं था, उसके चमकने से था। क्योंकि जब चाँदनी चली गई, तब चकोर भी चला गया; जबकि चाँद तो अब भी वहीं था—उसी आसमान में, उसी जगह, अपने पूरे वजूद के साथ।

Sunday, May 10, 2026

माँ- तुम्हे Mothers Day की हार्दिक शुभकामनाएं

आज Mothers Day है।
सब अपनी माँ को इस दिन की हार्दिक शुभकामनाएँ दे रहे हैं,
पर उनका क्या जो “माँ” तो रोज़ बुलाते हैं,
पर “हाँ बेटा, मैं हूँ…” की आवाज़ अब वापस सुनाई नहीं देती।
माँ तो परमधाम चली गईं। कहते हैं, माँ कहीं भी रहे, अपने बच्चों को कभी नहीं भूलती।
पर एक सच यह भी है कि बच्चे भी माँ को हर रोज़ जीते हैं — हर पल, हर घड़ी।
आज जब मेरा बेटा अपनी माँ को Mothers Day की बधाई दे रहा था,
तो सच मानो, तुम्हारा एहसास आँखों में पानी बनकर उतर आया।
सभी को Mothers Day की हार्दिक शुभकामनाएँ।
जब तक माँ ज़िंदा रहती है, शायद उनकी अहमियत उतनी महसूस नहीं होती।
जिस दिन वो चली जाती हैं, उस दिन के बाद इंसान उनकी यादों के साथ हर रोज़ जीता है

तुम्हारा बेटा
राहुल