Thursday, January 8, 2026

अमरनाथ — वादा जो पूरा न हुआ


कुछ बरस पहले की यह बात है, जब हम नवरात्रि के समय अपने मित्र के साथ रामकृष्ण मिशन गए थे, जो कि लखनऊ में है। दुर्गा पूजा देखने के बाद, जब हम अपने परिवार एवं मित्रों के साथ परिसर का भ्रमण कर रहे थे, तभी अचानक एक व्यक्ति सामने आता है और बोलता है कि तुम राहुल हो न।
मैंने बोला, हाँ, मैं राहुल हूँ।
फिर वह बोलता है कि अगर तुमने मुझे पहचान लिया तो ठीक है, नहीं तो मैं तुम्हारे रास्ते से हट जाऊँगा।
समझ नहीं आ रहा था कि ऐसा कौन है जो मुझे जानता है और इतने आत्मविश्वास से मिल रहा है। तभी कुछ मिनट सोचने के बाद मुझे याद आया उसका चेहरा। वह कोई और नहीं, हमारे स्कूल के दिनों का मित्र था। बीस सालों से भी ज़्यादा समय हो गया था उससे मिले। नाम याद करने में थोड़ी तकलीफ़ हो रही थी। थोड़ी जद्दोजहद करने के बाद मुझे उसका नाम याद आया।
नाम था अमरनाथ। मेरे पहचान लिए जाने के बाद वह खुश हुआ और हमने अपने नंबर एक-दूसरे से साझा किए। रास्ता तो छोड़ दिया था उसने, फिर कभी मिलने का वादा कर वह चला गया। मैं भी आगे बढ़ चला मंदिर परिसर घूमने और प्रसाद लेने के लिए।
वक़्त बीतता जा रहा था और मुझे याद ही नहीं रहा कि कभी उसे मिला था। दो बरस के बाद अचानक कॉन्टैक्ट डिटेल्स देखने पर अमरनाथ का नाम दिखा, जिससे न तो दोबारा मिलने की कोशिश की और न ही कोई संदेश भेजा।
2025 के दिसंबर के आख़िरी दिन चल रहे थे। एक दिन मैंने अपनी फटफटिया उठाई और निकल लिया उसके घर की तरफ। बीस साल पहले का मोहल्ला आज बहुत बदल गया था। एक-मंज़िला मकान अब कई-मंज़िला हो गए थे। घरों के बाहर की बनावट भी बदल चुकी थी। सभी घरों की ज्यामिति बदल जाने के कारण उसका घर मुझे नहीं मिला। मैं वापस आ गया। फिर घर से मैंने उसे फ़ोन मिलाया। एक बार में न उठा तो दोबारा फ़ोन मिलाया। फ़ोन उठा और मैंने बोला, “अमरनाथ!”
उधर से आवाज़ आई, “हाँ भाई राहुल, क्या हाल है?”
बात शुरू हुई कि हम मंदिर में मिले थे, फिर दोबारा मौका ही नहीं लगा कि मिल सकें। मैंने पूछा, “कहाँ हो तुम?”
उधर अमरनाथ बोला, “भाई, अभी तो मैं कानपुर में हूँ। कभी-कभी वीकेंड पर घर आता हूँ। इस वीक घर जाऊँगा तो कॉल करता हूँ।”
मैंने बोला, “हाँ भाई, घर पहुँचना तो कॉल करना।”
दुआ-सलाम के बाद फ़ोन रख दिया। नया साल आया, फिर मैंने मोबाइल पर संदेश भेज नए वर्ष की बधाइयाँ दीं। अमरनाथ की तरफ से कोई संदेश नहीं आया, तो आगे बात हुई ही नहीं। मैं भी नए वर्ष के बाद अयोध्या अपनी ससुराल आ गया, एक फ़ंक्शन के मौके पर।
तभी स्कूल के ग्रुप में एक मैसेज देखा—किसी का शोक संदेश। पढ़ते ही मेरी हवाइयाँ उड़ गईं। दिल बार-बार यही कह रहा था कि यह वह नहीं है, कोई और होगा। फ़ोन में उसकी फोटो देखनी चाही, तो डीपी में उसके बच्चों की फ़ोटो थी। चेहरा समझ नहीं आ रहा था। तभी मैंने अपने मित्र दिवान को कन्फ़र्म करने के लिए फ़ोन किया। दिवान भी घर से बाहर गया हुआ था। बात सुनकर वह भी चकित था। थोड़ी देर बाद फ़ोन करने को कहकर उसने फ़ोन काट दिया।
कुछ पल बीते न थे कि फ़ोन फिर आया। बोला, “भाई, यह वही है जो तुम्हें मंदिर में मिला था।” सदमे में वह भी था। “शरद से बात करने को बोल रहा हूँ,” कहकर फ़ोन काट दिया। मुझे अभी भी यक़ीन नहीं हो रहा था कि वह यही अमरनाथ है। फ़ोन हाथ में था ही, तभी मैंने काँपते हुए हाथों से फ़ोन मिलाया कि शायद अमरनाथ ही फ़ोन उठाए।
तभी उधर से एक काँपती हुई आवाज़ आई, “जी, बताइए।”
मैंने बोला, “क्या अमरनाथ से बात हो सकती है? मैं उसका बचपन का दोस्त राहुल बोल रहा हूँ।”
उधर से आवाज़ आई, “अब वो तो नहीं रहे।”
मैंने बोला, “हमने मिलने का वादा किया था…”
अभी वह जो बोली, वे शब्द आज भी मेरे कानों में गूँज रहे हैं

“अब हम ही नहीं मिल सकते हैं, आप क्या मिलोगे।”
निःशब्द हो मैंने फ़ोन रख दिया।

Saturday, January 3, 2026

अव्यक्त प्रेम की सुंदरता

मेरी समझ से, एकतरफा प्यार जिसे कभी बयान ही न किया गया हो, वह हमेशा ज़िंदा रहता है। बिना किसी उम्मीद के बोझ के, वह हमेशा खुशी का अहसास देता रहता है। जो प्यार कामयाब हो जाता है, वह शायद उतनी खुशी नहीं देता।

​इसलिए हर किसी को प्यार करना चाहिए। हमने यह भी देखा है कि प्रेम कभी सिर्फ एक से नहीं होता है। काल, स्थान और परिस्थिति पर निर्भर करता है कि आपको किससे और कितना प्यार होगा।

​प्रेम भाई, बहन, दोस्त—किसी से भी हो सकता है। प्रेम में इंसान सबकुछ लुटा सकता है और लुटाने के बाद भी उसे खुशी का ही अहसास रहता है।

Monday, December 15, 2025

ऐ दोस्त

ऐ दोस्त,
जब-जब मैं तेरे नज़दीक से गुज़रा, एक छाँव हमेशा साथ रही। ज़िंदगी की तपिश ने मुझे जितनी बार जलाने की कोशिश की, तुम हर बार एक सुकून भरी छाया बनकर खड़ी रही।

जो तुम्हारे साथ हुआ है, उससे मैं दुखी नहीं हूँ — यह तुम्हारी ज़िंदगी के एक नए दौर की शुरुआत है। तुमने अपनी हर जंग पूरी हिम्मत से लड़ी है और जीतकर ही लौटी हो। यह भी एक जंग ही है। ज़िंदगी ने तुम्हारे लिए कुछ और ही लिखा है, और मुझे यक़ीन है कि एक दिन तुम हम सबके लिए एक मिसाल बनोगी।

हौसला मत हारना। ठोकरें ही इंसान को चलना सिखाती हैं।

ज़िंदगी में न जाने कितनी कठिनाइयाँ आएँगी और चली जाएँगी। यह दौर भी गुज़र जाएगा। नया सवेरा फिर आएगा। बस अपना हौसला बनाए रखना, और याद रखना — तुम्हारे दोस्त हमेशा कंधे से कंधा मिलाकर खड़े रहेंगे।

हम हर हाल में तुम्हारे साथ हैं… तुम्हारी हर जीत और हर हार में।

Sunday, December 7, 2025

मटर छीलने का मज़ा: जब कहानियाँ वही रहती हैं, बस किरदार बदल जाते हैं

मटर छीलने का मज़ा: जब कहानियाँ वही रहती हैं, बस किरदार बदल जाते हैं


​आज मौसम की पहली मटर मेरे घर आई। प्लान बना कि सुबह का नाश्ता घुघरी से होगा और अगर मटर बची तो निमोना बनेगा।

​योजना तो बन गई पर बिना मटर छीले तो कुछ होने वाला नहीं था। सुबह उठने के बाद मेरे पास डलिया भर मटर छीलने का प्रस्ताव आया, हम भी घुघरी के लिए तैयार थे। घुघरी के लिए कुछ भी करना पड़े, करेंगे!

​मटर छीलना शुरू हुआ। तभी मैं अतीत में चला गया जब पापा और मम्मी बात करते-करते न जाने कितनी मटर छील लेते थे। वैसे पापा और मम्मी कम ही बैठते थे बात करने को, पर मटर एक ऐसी चीज़ थी जो घर को बाँध कर रखती थी। दुनिया भर की बातें मटर छीलते समय याद आती थीं।

​'फलनवा ई किहिस', 'धमकावा ऊ किहिस' (यानी 'फलाँ ने क्या कहा', 'फलाँ ने क्या किया'), सब चर्चाएँ होती थीं।

​अचानक देखता क्या हूँ कि श्रीमती जी भी स्वयं आ गईं मटर छीलने के लिए। वह कहती हैं:

कहानियाँ वही रहती हैं, बस किरदार बदल जाते हैं।


​हमने भी शुरू की मटर छीलना और बातें शुरू हुईं 'फलनवा' और 'धमकावा' की। 

किस मौसम में किसके घर बछिया बियान रही और किसका कब बियाह हुआ था—हमने कोई कोना नहीं छोड़ा होगा बात करने का।

​और मटर न जाने कब छिल गई, पता ही नहीं लगा।

​फ़्रोज़न मटर जिनके घर आती है, वो मटर छीलने का मज़ा उनकी किस्मत में नहीं है। दुनिया भर की बातें सिमट आती हैं इस मटर छीलने के छोटे से अंतराल में।

Saturday, September 13, 2025

छठ

आज यूट्यूब पर छठ मैया के गीत सुन रहा था, और हर शब्द याद आ रहा था।

​जब तुम्हारे साथ छठ मैया की पूजा के लिए गया था। उस positive energy को मैं अपने कंधे पर आज भी महसूस करता हूँ। धन्यवाद मुझे इसका अहसास कराने के लिए।

Wednesday, September 3, 2025

नानी के घर का डिब्बा


नानी के घर एक डिब्बा था,
छोटा-सा, टिन का...
ढक्कन खोलो तो लगता था
जैसे पूरा आसमान भीतर रख दिया हो।

मैंने उसमें तारे चुन–चुन रखे थे,
चाँद की एक मोड़ी हुई किरन भी थी,
और बरगद की छाँव
जिसमें गर्मियों की दोपहरी सोई रहती थी।

आम की गुठलियाँ थीं,
कंचों की चमक थी,
नानी की हँसी थी,
माँ की चोटी में बंधा लाल रिबन भी...
सब वही रखा था।

फिर एक दिन—
वो डिब्बा गुम हो गया,
शायद बटवारे के शोर में,
या बड़ों की अलमारी के हिसाब–किताब में।

अब सिर्फ़ उसकी याद बची है,
टूटे हुए सितारों की तरह—
जो हर रात पलकों पर टिमटिमाते हैं।

Tuesday, September 2, 2025

बदले हुए रिश्ते- प्रिंस भैया का रिटायरमेंट

कल मुझे अचानक पता चला कि प्रिंस भैया अपनी नौकरी से सेवानिवृत्त हो गए हैं और इसके उपलक्ष्य में उन्होंने एक पार्टी रखी थी। पर सबसे ज़्यादा हैरानी तब हुई जब हमें उसमें आमंत्रित नहीं किया गया। वहाँ सभी खास लोग मौजूद थे, पर हम नहीं थे। यह जानकर खुद को बहुत अकेला महसूस किया, और ऐसा लगा जैसे मैं अब उनकी ज़िंदगी का हिस्सा नहीं हूँ। रात भर यही सोचता रहा कि उन्होंने मुझे क्यों नहीं बुलाया और क्या मैं उनकी ज़िंदगी में इतना ज़रूरी नहीं हूँ कि वो मुझे अपने इस खास मौके का गवाह बनाएँ।

यह मेरे लिए एक भावनात्मक क्षति (इमोशनल लॉस) थी। जब मैंने यह बात स्वाति को बताई, तो उसे भी बुरा लगा। मुझे लगा कि शायद उसे इस बात का अंदाज़ा नहीं होगा कि प्रिंस भैया मेरी ज़िंदगी से कितने जुड़े हुए हैं। खैर, यह भी अब यादों का हिस्सा बन जाएगा और स्मृति के किसी कोने में पड़ा रहेगा, क्योंकि भविष्य तो किसी ने नहीं देखा।

अब मुझे इसकी आदत सी होने लगी है। यह पहली बार नहीं हुआ है कि मुझे ऐसा एहसास हुआ हो। जब से मैं लखनऊ आया हूँ, तब से मुझे यह महसूस होने लगा है कि ऐसी भावनाएँ भी ज़िंदगी का एक हिस्सा हैं। होता है, कभी-कभी पुरानी यादें दामन छुड़ाकर नई यादों की ओर बढ़ जाती हैं, और हमें इन सब से आगे निकल जाना चाहिए।