पहले प्यार की खुशबू
यह उस दौर की बात है जब दिल्ली-एनसीआर की आईटी दुनिया में दिन कोड, बग्स और सख्त डेडलाइन्स के बीच बीतते थे, और शामें कंप्यूटर स्क्रीन पर टिमटिमाती जीटॉक (GTalk) की उस हरी बत्ती के इंतज़ार में।
राघव उन दिनों नोएडा की एक टेक कंपनी में अपने करियर की शुरुआती सीढ़ियां चढ़ रहा था। नया-नया शहर, ऑफिस के लंबे घंटे और एक अदद पहचान बनाने की जद्दोजहद। इन्हीं आपाधापी भरे दिनों में उसकी ज़िंदगी में अवनि आई। अवनि उसके कॉलेज के एक पुराने दोस्त के ऑफिस में काम करती थी।
राघव ने उसे पहली बार एक कॉमन फ्रेंड की शादी के रिसेप्शन में देखा था।
हल्की गुलाबी साड़ी, चेहरे पर सादगी से भरी सौम्यता और जब वह हंसती, तो ऐसा लगता मानो उस शोर-शराबे वाले हॉल में अचानक कोई मधुर सा साज बज उठा हो। राघव उस शाम जैसे किसी सम्मोहन में बंध गया था। उम्र का वो अल्हड़पन ही कुछ ऐसा था कि बिना आगे-पीछे का सोचे, उसी शाम लॉन के एक किनारे उसने अवनि से अपने दिल की बात कह दी—बिल्कुल साफ, सीधा और बेबाक प्रपोजल।
अवनि ने उस वक्त हैरान होकर देखा, फिर उसके चेहरे पर एक बेहद शालीन, कोमल सी मुस्कान तैर गई। उसने बहुत नर्मी से सिर हिलाते हुए मना कर दिया। न कोई गुस्सा, न कोई बनावटी तेवर—बस एक सीधा, गरिमामयी इनकार।
राघव का दिल टूटा ज़रूर, लेकिन उसके मन में अवनि के लिए इज़्ज़त सौ गुना बढ़ गई। राघव को हमेशा से यह भली-भांति अहसास था कि अवनि उसकी दुनिया से कहीं आगे थी। उसका आत्मविश्वास, उसका बात करने का सलीका और ज़िंदगी को देखने का नज़रिया—सब कुछ ऐसा था जिसे देखकर राघव को लगता कि वह शायद कभी उसके काबिल नहीं बन पाएगा। अवनि उसके लिए रात के आकाश में चमकते उस ध्रुव तारे की तरह थी, जिसे सिर्फ दूर से देखकर मुस्कुराया जा सकता है, अपनी हथेलियों में समेटा नहीं जा सकता।
मगर दिल की मासूमियत तर्कों की भाषा कहाँ समझती है? इनकार के बाद भी राघव के दिल में अवनि के लिए कोई कड़वाहट नहीं आई। वह उसका पहला, बेदाग और खूबसूरत क्रश बन चुकी थी।
शादी के कुछ दिनों बाद दोनों जीटॉक पर जुड़ गए।
कंपनी के फायरवॉल और रिस्ट्रिक्टेड इंटरनेट के बीच, ऑफिस के डेस्क से राघव के मैसेज जाने लगे। कभी वह प्रोजेक्ट की डेडलाइन का रोना रोता, तो कभी बेतुकी बातों पर 'LOL' का मतलब समझाते हुए चैट बॉक्स को ठहाकों से भर देता। बातों-बातों में राघव अपनी उस छुपी हुई चाहत की खुशबू बिखेरना कभी नहीं भूलता था। वह जब-तब अपनी अधकचरी शायरी छेड़ देता:
“कांटों से दामन उलझाना मेरी आदत है...
जिनको दुनिया ने ठुकराया, ऐसे लोगों को अपनाना मेरी आदत है।”
अवनि स्क्रीन के उस पार से हंसती और पलटकर कोई दो टूक शेर सुना देती। वह राघव की मासूमियत से वाकिफ थी। वह जानती थी कि इस लड़के के मन में उसके लिए एक बेहद पवित्र और कोमल जगह है। इसलिए वह बड़ी नज़ाकत से, बिना उसका दिल दुखाए, बातचीत को हमेशा एक सुरक्षित दोस्ताना दायरे में समेटे रखती।
नए साल के आसपास जब राघव को पता चला कि अवनि किसी और के साथ डेट पर गई थी, तो एक पल के लिए उसके सीने में टीस ज़रूर उठी। उसने जज़्बात में बहकर एक लंबा मैसेज भी लिखा, पर अवनि के एक समझदारी भरे जवाब ने उसे ज़मीन पर ला खड़ा किया। उस दिन राघव ने जाना कि मोहब्बत का मतलब किसी को पा लेना या बांध लेना नहीं होता। उसने अवनि की आज़ादी और उसकी प्राथमिकताओं का दिल से सम्मान किया।
धीरे-धीरे वक्त के साथ प्रोजेक्ट्स बदले, जिम्मेदारियां बढ़ीं और एक दिन वह जीटॉक की हरी बत्ती हमेशा के लिए शांत हो गई। दोनों की राहें अपनी-अपनी दिशाओं में मुड़ गईं।
पंद्रह साल गुज़र गए।
राघव अब पहले वाला अल्हड़ लड़का नहीं था। उसने अपनी मेहनत से करियर में एक मजबूत मुकाम बना लिया था। उसकी ज़िंदगी में एक प्यारा सा परिवार था, अपनी खुशियां थीं और दिल में एक गहरा, शांत समंदर जैसा ठहराव। मगर उन शुरुआती दिनों की वह पहली धड़कन, वह पहला एकतरफ़ा अहसास, उसके ज़हन में किसी पुरानी डायरी के सूखे गुलाब की तरह महफूज़ था—जिसकी खुशबू कभी फीकी नहीं पड़ी थी।
सर्दियों की एक सुनहरी शाम, दिल्ली के कनॉट प्लेस के एक शांत और एस्थेटिक कैफ़े में राघव अपनी मीटिंग खत्म करके बैठा था। बाहर हल्की धूप ढल रही थी और वह अपनी ब्लैक कॉफी की चुस्की ले रहा था।
तभी काउंटर की तरफ से एक जानी-पहचानी आवाज़ कानों में पड़ी:
"एक कैपुचीनो, प्लीज़... विद एक्स्ट्रा सिनेमन।"
राघव का हाथ ठहर गया। उसने नज़र उठाई।
वह अवनि थी।
वक्त ने उसके चेहरे पर एक ग्रेसफुल, मैच्योर चमक जोड़ दी थी। आंखों के कोनों पर हल्की बारीक लकीरें थीं, जो बता रही थीं कि उसने ज़िंदगी को बहुत करीब से जिया है। राघव एक पल के लिए मुस्कुराया, फिर अपनी कुर्सी से उठकर हौले से उसके पास पहुंचा।
"अवनि?"
अवनि ने पलटक़र देखा। पहले एक लम्हे के लिए उसकी नज़रों में पहचान की धुंध आई, और फिर वही खूबसूरत, खनकती हुई मुस्कान उसके होंठों पर बिखर गई।
"राघव! अरे... तुम? यहाँ?"
"हाँ, एक मीटिंग थी... और तुम्हारी यह सिनेमन वाली कॉफी की फरमाइश ने बरसों पुरानी याद ताज़ा कर दी," राघव ने सहजता से कहा।
दोनों खिड़की के पास वाली मेज़ पर बैठ गए। पंद्रह सालों का फासला महज़ पंद्रह सेकंड में सिमट गया। कोई झिझक नहीं थी, कोई बनावटी औपचारिकता नहीं।
अवनि ने बताया कि वह अब एक ग्लोबल फर्म में डायरेक्टर है, उसका अपना एक खुशहाल संसार है। राघव ने भी अपने काम, अपनी ज़िंदगी और अपनी दुनिया की बातें साझा कीं।
बातों के बीच जब एक पल का ठहराव आया, तो अवनि ने उसकी आँखों में झांकते हुए बड़ी नर्मी से कहा, "राघव, तुम बिल्कुल नहीं बदले। वही सादगी, वही आंखों की चमक।"
राघव हल्के से हंसा, "शायद थोड़ा संभल गया हूँ अवनि। याद है तुम्हें, जब मैंने उस शादी में बिना सोचे-समझे तुम्हें प्रपोज कर दिया था? आज सोचता हूँ तो लगता है कि मैं कितना नादान था। मैं हमेशा जानता था कि तुम मुझसे बहुत बेहतर थीं, मेरे लिए तुम उस आसमान की तरह थीं जिसे मैं ज़मीन पर रहकर सिर्फ देखा करता था।"
अवनि की आँखें एक पल के लिए भीगीं, फिर उसने बहुत आत्मीयता से राघव के हाथ पर अपना हाथ रखा।
"तुम कभी कम नहीं थे, राघव। उस वक्त मैं शायद करियर और ज़िंदगी के दूसरे मोड़ पर थी। लेकिन तुम्हारी उस मासूमियत ने, तुम्हारी उस एकतरफ़ा चाहत ने मुझे हमेशा एक चीज़ सिखाई—कि दुनिया में ऐसे लोग भी होते हैं जो बिना किसी शर्त के किसी की खुशी की दुआ मांगते हैं। तुमने हमेशा मेरी स्पेस की कद्र की। उस दोस्ती और उस प्यार के लिए... थैंक यू।"
राघव के चेहरे पर एक असीम सुकून की मुस्कान खिल उठी। वह जो एक अधूरापन कभी सीने के किसी कोने में दबा रह गया था, वह आज पूरी तरह मुकम्मल हो गया था। उसे अवनि को न पाने का कोई मलाल नहीं था; बल्कि उसे इस बात का फख्र था कि उसने अपनी ज़िंदगी में सबसे पहला और सबसे सच्चा प्यार अवनि से किया था—एक ऐसा प्यार जिसमें पाने की लालसा नहीं, सिर्फ दूसरे की सलामती और खुशी की चाह थी।
कॉफी खत्म हुई। दोनों कैफ़े से बाहर निकले। दिल्ली की शाम अब हल्की गुलाबी ठंड में तब्दील हो चुकी थी।
"ख्याल रखना अपना, राघव... बहुत अच्छा लगा तुमसे मिलकर," अवनि ने गर्मजोशी से हाथ मिलाते हुए कहा।
"तुम भी अपना ख्याल रखना, अवनि। हमेशा खुश रहो," राघव ने कहा।
दोनों ने एक-दूसरे को आखिरी बार देखा और मुस्कुराते हुए अपनी-अपनी राहों पर आगे बढ़ गए। राघव ने जब अपनी कार की तरफ कदम बढ़ाए, तो उसके दिल में एक हल्की, रूहानी सी ठंडक थी।
उसे पता था कि अब ज़िंदगी के किसी भी मोड़ पर जब भी अवनि का नाम आएगा या उसकी याद गुज़रेगी, तो दिल में कोई दर्द या टीस नहीं उठेगी। राघव का चेहरा हर बार उसी तरह खिल उठेगा—उस पहले प्यार की भीनी-भीनी, अमर खुशबू की तरह।