Saturday, August 26, 2017

आपने मेरी फीस तो देखी ही होगी- डॉक्टर

पिछले हफ्ते की बात है जब मनोज का बाइक से  एक्सीडेंट हो गया। उस समय रात के लगभग 10 बजे थे...  चोट बहुत ज़्यादा तो नही आई थी पर,  हाथ और पैर छिल गए थे। मनोज किसी तरह एक छोटी सी क्लीनिक में पहुचां पर, वहां कोई डॉक्टर तो नही था पर , वहां एक नौसिखिया कम्पाउंडर ही मिला। रात काफी हो गयी थी इसलिए,  मनोज ने उसी से ड्रेसिंग कराने का फैसला लिया, और फिर भाभी को कॉल करके एक्सीडेंट के बारे में बताया, इत्तेफाक से हम मनोज के घर पर ही थे, भाभी के मुँह से एक्सीडेंट शब्द सुन हमने भाभी से पूछा कि क्या हुआ भाभी..  किसका एक्सीडेंट हो गया है।

भाभी ने घबराते हुए हमें बताया कि,  मनोज का एक्सीडेंट हो गया है, वो जैन क्लीनिक में है, हमने कहा की , हम जा कर देखते है, आप परेशान न हो, उसकी कंडीशन हम आपको फ़ोन करके आपको बताते है,  भाभी साथ चलने की ज़िद कर रही थी , उन्हें समझाने बुझाने के बाद हमने  स्वाति और अनुजा को उनका ध्यान रखने को बोला , फिर  मैं और शैलेन्द्र,  दोनों जैन क्लीनिक के लिए निकल पड़े।

हमारे पहुचने तक मनोज की ड्रेसिंग हो चुकी थी पर,  वो उसकी ड्रेसिंग से संतुष्ट नही था। उसने बोला कि,  हम किसी और क्लीनिक चलते है,  वहां फिर से ड्रेसिंग करा लेंगे।

हम दूसरी क्लीनिक ढूंढने लगे, रात काफी हो गयी थी, इसलिए सारे क्लीनिक बन्द हो चुके थे, फिर हमें एक क्लीनिक दिखी, इसमे लिखा था, 24 घंटे आपातकालीन सेवा।...  हमे लगा इसमे कोई न कोई डॉक्टर जरूर होगा। उस क्लीनिक का नाम था, "रोहिताश क्लीनिक",  हम मनोज को लेकर वही पहुचे, अंदर जाकर देखा तो वहां भी कोई डॉक्टर नही था, एक नर्स थी, उन्होंने बोला कि रुकिए,  मैं डॉक्टर को फ़ोन करके बुलाती हूँ, वो थोड़ी देर में आ जाएंगे।

हम वही इंतज़ार करने लगे डॉक्टर का .... इंतज़ार करते- करते काफी वक्त हो गया,  फिर मनोज ने बोला घर चलते है, अभी मैं ठीक हूँ, सुबह डॉक्टर को दिखा लेंगे, फिर हमने कहा, जहां इतना इंतज़ार किया है थोड़ा और कर लेते हैं। हमारा इंतज़ार कम नही हो रहा था, वो बढ़ता ही जा रहा था। अंत मे हमने निर्णय लिया कि चलते है घर,  अब सुबह दिखा लेंगे। हम वहां से निकल बाहर गेट तक पहुचे ही थे कि,  डॉक्टर साहब अपनी गाड़ी से आ पहुचे। डॉक्टर को देख हम रुक गए।

नर्स ने मनोज की तरफ इशारा करते हुए,  डॉक्टर को बोला कि, इन्हें चोट लगी है, डॉक्टर साहब ने  चोट तो नही देखी, पर अपनी रेट लिस्ट की तरफ इशारा करते हुए बोले..... आपने मेरी फीस तो देखी ही होगी... कोई 100 रुपये के लिए 200 का पेट्रोल तो नही फूंकेगा।

ये बात सुन हमारा माथा ठनक गया, रेट लिस्ट तो हमने पहले ही देख ली थी पर... डॉक्टर का यह व्यवहार हमे अजीब सा लगा.. न तो उसने दर्द पूछा और न ही चोट के बारे में,  डायरेक्ट फीस के बारे में बात करने लगा, जैसे हम उसकी फीस दे ही नही सकते । .. फिर हमने मनोज से पूछा तुम्हारी कंडीशन कैसी है ? मनोज ने बोला,  मैं ठीक हूँ, अब सुबह ही दिखाऊंगा।  फिर हम वहां से निकल लिए, दावा की दुकान से हमने पेनकिलर खरीदा और घर की तरफ निकल लिए,  रास्ते मे न जाने क्यों मुझे प्रेमचंद्र की सपेरे वाली कहानी याद आ रही थी ।

Thursday, August 24, 2017

डार्क चॉकलेट कड़वी नही है माँ

आज आफिस से आते वक्त, मैन सोंचा की स्वाति के लिए चॉकलेट लेता चलूं, चॉकलेट लेने जब दुकान पर गया, तो सोंचा डार्क चॉकलेट लेता चलूं, आदि तो खा नही पायेगा,  तो स्वाति को खाने को मिल जाएगा, घर पहुँच, स्वाति को चॉकलेट दे ही रहा था कि आदि पास आया और बोला पापा आदि के लिए चॉकलेट लाये है और मां आपके लिए नींबू लाये है। मुझे दो चॉकलेट...

हमने सोंचा आदि डार्क चॉकलेट क्या खा पायेगा। थोड़ी देर में वापस कर देगा , हम आदि के रहमोकरम पर थे कि शायद हमे खाने को मिलेगा। थोडा खाने के बाद आदि पास आया और स्वाति से बोला माँ चॉकलेट कड़वी बिल्कुल नही है।

आदि की यह बात सुनकर मेरी सारी चालाकी धरी की धरी रह गयी, और अंत मे हमे बचे हुए कुछ टुकड़े खाने को मिले हम उसी से संतुष्ट हो अपने आपको खुश किस्मत समझ रहे थे...

Friday, August 18, 2017

जर्दा या गर्दा

बात उन दिनो की है जब हम पुराने लखनऊ में रहा करते थे  और पापा पान खाया करते थे। संडे हम अक्सर घर के पास की ही पान की दुकान से पापा के लिए पान लाया करते थे। पापा के लिए पान लाना हमारे लिए गर्व की बात थी और हो भी क्यों ना, शायद पान खाना उस समय के फैशन में था । जितने भी बड़े लोग थे वो पान खाया करते थे। सबके पान की दुकान और उनका कांफ़्रिग्रशन फिक्स होता था, किसी और कि दुकान और किसी और के कांफ़्रिग्रशन का पान खाना किसी को पसंद नही आता था। पापा के पान का कांफ़्रिग्रशन था "एक सौ बत्तीस इलायची रसरंजन"  हमने रट्टा मार रखा था कि पापा कौन सा पान खाते है, पर हमे यह नही पता था कि उसमें क्या-क्या पड़ता है।  अगर गलती से भी  कांफ़्रिग्रशन हिल जाए तो पान बेस्वाद हो जाता था।

अक्सर हम भी सोंचते थे कि बड़े होने पर हम पान खाएंगे, जैसे कि पापा खाते है, जब भी हम किसी की शादी की दावत में जाते थे, तो अक्सर फ्री का पान खा लिया करते थे और जब भी पापा, मम्मी या दीदी को पता चलता था कि हमने पान खाया है तो वो नाराज़ हो जाया करते थे और हमे अच्छे से डाट पड़ती थी और बोलते थे कि पान खाना अच्छी बात नही होती है।

एक दिन की बात है जब हम अपने बड़े चाचा की बारात  लेकर गोरखपुर गए। बारात धर्मशाला पहुची, थोड़ा आराम करने के बाद हमे नास्ता परोसा गया , हमने नास्ता किया थोड़ी देर के बाद पापा ने बोला कि धर्मशाला के बाहर एक पान की दुकान है वही से मेरे लिए पान ले आओ। पान लेने के लिए हम पान की दुकान पर पहुंचे और हमने पान वाले अंकल से बोला कि अंकल मेरे पापा के लिए एक पान बना देना, फिर पान वाले अंकल ने बोला कि कौन सा पान खाते है?  तुम्हारे पापा , फिर हमने झट से रटा रटाया समीकरण बोला दिया  "एक सौ बत्तीस इलायची रसरंजन"  वाला पान फिर वो पान वाले अंकल पान लगाने लगे । पान लगाते लगाते पान वाले अंकल ने मुझसे पूछते है कि जर्दा पड़ेगा क्या?? मुझे समझ मे नही आया कि उन्होंने क्या बोला, मैंने फिर पूछा क्या? क्या पड़ेगा? उन्होंने  बोला जर्दा...  ये शब्द मैने पहली बार सुना था। मैने पान वाले अंकल से बोला कि, मैं पापा से पूँछ कर आता हूँ , पापा तक पहुँचते -पहुँचते जर्दा न जाने कैसे गर्दा हो गया मुझे नही पता। मैंने पापा से पूछा  कि,  पापा पान वाले अंकल पूँछ रहे है कि क्या पान में गर्दा पड़ेगा? शायद पापा के लिए भी यह शब्द नया ही था।  पापा के बगल में बैठे  किसी रिश्तेदार ने हमारी बात सुन ली, शायद वो गोरखपुर के ही थे , तभी उन्हें पता लग गया कि हम कंफ्यूज किस बात पर है,  फिर वो मुझसे बोले बेटा, जर्दा होता है गर्दा नही। जर्दा का मतलब तम्बाकू होता है और गर्दा का मतलब धूल-मिट्टी। सोंचो अगर जर्दे की जगह गर्दा पड़ जायेगा तो पान का क्या होगा!!!

मेरी इस बात को सुन सब खूब हंसे, बाद में पापा के लिए पान लेने कोई और गया, मैं नही। आज भी,  जब मुझे कोई गोरखपुर का व्यक्ति मिलता है, तो मैं ये किस्सा जरूर सुनाता हूँ।

Friday, August 4, 2017

किराये की दाल

ये उन दिनों की बात है जब हम गर्मियों की छुट्टियों में दादी और नानी के पास जाया करते थे और अपनी छुट्टियां ढेला मार कर आम तोड़ने और फिर उन कच्चे आमो को नमक के साथ चटकारा मार कर बिताया करते थे। हम पढ़ते थे लखनऊ में पर छुट्टियां दादी-नानी के आंगन में बिताते थे।

ऐसे ही एक गर्मी की छुट्टियों में हम दादी के पास थे। एक दिन दादी को मुझपर बहुत प्यार आया और अपने अवधी लहज़े में बोली - आज का खाबव, जउन तुहय पसंद होए वहय बनी ।

मैंने बहुत सोंच और बोला दाल चावल बनाओ वही खाऊंगा। तभी रसोई से काकी की आवाज़ आती है कि कौन सी दाल बनाऊ, कौन सी दाल पसंद है तुम्हे, मैन कहा कोई भी बना लो काकी।

तभी दादी की आवाज़ आती है कि तुहय बोलो घर मा सारी दाल है , जउन तू कहव!! मैन कहा - कौन कौन की दाल है? फिर दादी अवधी लहज़े में बोली- अरहरिक दाल है , उरदिक दाल है और केराओक दाल है जउन खाओ वही बनाय।

तभी मुझे आखिरी वाली दाल समझ मे नही आयी कि वो कौन सी दाल है। तभी दादी बोली-केराओक दाल।
फिर मैं बोला ये कौन सी दाल होती है!!!

किराए की दाल, किराए का घर सुना था, किराए की साईकल सुनी थी पर किराए की दाल कभी नही सुनी.... क्या इस दाल को खाने के बाद किराया देना होता है या कुछ और??

इतना सुन दादी गुस्से से बोली-  अरे अंग्रेज़ के सपूत.. तुम्हारे पापा हियै पैदा भए रहा !!! यहय दाल खाय खाय बढ़वार भए अउर तू पूछत हौ की ई कउन सी दाल है, तुम्हरे पापा  तुहय नाइ  बताइन कि किराओक दाल का होत है!!!

यह सुन बड़े काका काकी और छोटे काका ज़ोर से हसने लगे, मुझे समझ मे नही आ रहा था कि ऐसा क्या हो गया!!

तभी छोटे काका मुझे बुलाते है और दबी हुई आवाज़ में मुझे बताते है कि मटर को किराओ बोलते है और उसकी भी दाल होती है।

वो बचपन की बात पर आज भी सब ठहाके लेते है जब भी घर दाल का ज़िक्र आता है और तबसे मैं अवधी शब्दो को बड़े ही ध्यान से सुनता हूँ

Monday, July 17, 2017

तुम होते कौन हो!!!

मुहल्ले कि एक चाय की दुकान पर कुछ लोग इकट्ठा थे और पति पत्नी के प्रेम पर चर्चा चल रही थी। चाय की चुस्की के साथ सब अपने अपने नायाब तरीके साझा कर रहे थे अपनी पत्नी से अपना प्रेम प्रदर्शित करने ने लिए। किसी ने कहा कभी कभी वो पत्नी पर अपना प्रेम प्रदर्शित करने के लिए उसे शॉपिंग करा देते है। कोई अपनी पत्नी को खुश करने के लिए कभी खाना बना देते है और कोई अपनी पत्नी से प्रेम को प्रदर्शित करने के लिए झाड़ू-पोछा भी लगा देते है और कोई बर्तन धुल देता है। अधिकतर लोग अपना प्रेम बेहद शांत और चारदीवारी के भीतर ही प्रदर्शित करते है।

सार्वजनिक स्थानों पर वो अपनो पत्नी से चारकोस दूर ही चलते है, हाथ पकड़ कर चलना तो दूर की बात है।

तभी एक व्यक्ति अपने मित्र से जुड़ा हुआ किस्सा सुनता है कि ... मेरा एक मित्र है जिसकी हाल ही में शादी हुई थी। जब वो एक दिन हमारे परिवार के साथ मार्केट घूमने गया तो मैंने कहा की आप अपनी पत्नी का हाथ क्यों नही थाम लेते यहां भीड़ बहुत है, कही आपकी पत्नी ग़ुम ना हो जाये!!  पति पत्नी दोनों सकुचाते हुए एक दूसरे का हाथ पकड़ चलने लगते है।

चर्चा चल ही रही थी तभी एक और सज्जन पुरुष ज़ोर से बोले मुझे हाथ पकड़ कर चलना सहज नही लगता है और भाई अगर हाथ पकड़ने वाली बात किसी ने मुझसे बोली होती तो मैं बोलता की "तुम होते कौन हो मुझे ये बोलने वाले कि मैं अपनी पत्नी का हाथ पकड़ूँ"
मेरी पत्नी है पकड़ू या न पकड़ू किसी से क्या!!!

इतना सुन दोस्त की कहानी सुनाने वाला निःशब्द हो गया।

Wednesday, July 12, 2017

लंगड़

बात उन दिनों की है जब हम पुराने लखनऊ में रहा करते थे, हर शाम सभी अपने घरो की छतों पर पतंगे उडाया करते थे। आसमां सतरंगी पतंगों से भरा रहता था। पंछियो और पतंगों में भेद करना थोड़ा मुश्किल था, पतंगों का आकार मेरी बाहों के आकार से काफी बड़ा हुआ करता था,  मैं छत से गिर ना जाऊं इस डर से माँ ने मुझे पतंग उड़ाने से मना किया था।

माँ की बात मान,  मैं पतंग तो नही उड़ाया करता था पर मुहल्ले के बच्चो के साथ लंगड़ खेला करता था।  पतंग कटने पर वो अक्सर हमारी छतों पर आ गिरा करती थी और हम उसे पकड़ने के लिए दौड़ पड़ते थे । छोटे होने के कारण पतंग तो हाथ नही लगती थी पर छीन झपटी में  थोड़ा मांझा हाथ लग जाया करता था।

हम उस माँझे से अक्सर लंगड़ बांधा करते थे। एक दूसरे के माँझे में लंगड़ फसा हम माँझा काटा करते थे और दूसरो की छतों पर गिरी पतंगों और सद्दी को फ़साने के लिए हम लंगड़ फेका करते थे।

पत्थर से मांझा अक्सर खुल जाया करता था। एक दिन की बात है जब मुझे एक पत्थर मिला , जिसका आकार लंगड़ बांधने के लिए बिल्कुल उपयुक्त था । जब भी मैं लंगड़ बांधता,  वो कभी नही खुलता था। उस पत्थर को मै बहुत संभाल कर अपने जेब मे रखा करता था। घर पहुचने पर उसे अच्छी जगह छुपा देता था कि मेरा छोटा भाई उसे ले न ले।

एक दिन वो लंगड़ मेरी जेब मे ही रह गया और माँ ने मेरे कपड़े भिगो दिए उसे धोने के लिए, भिगोने के बाद जब वो उसे साफ कर रही थी, तो वो पत्थर उनके हाथ लग गया।

पानी मे भीगने के बाद उस पत्थर का असली रंग दिखने लगा, फिर माँ ने उसे ठीक से देखा और झट से उसे अपने से दूर फेक दिया ...

माँ का चेहरा गुस्से से लाल हो गया और माँ ने मुझे ज़ोर से आवाज़ लगाई....  राहुल... राहुल.. राहुल... माँ की तेज़ आवाज़ सुन मैं डरा हुआ माँ के पास आया और बोला, हाँ माँ...  पास आते ही दो चाटे मेरे गालो पर शुशोभित हो गए, मन ही मन मैंने पूछा ऐसा क्या हो गया जो मुझे चांटे खाने को मिले।

फिर माँ ने पूछा
ये क्या है ?
कहाँ से लाये इसे?

मुझे समझ मे नही आया इसमे ऐसा था क्या जो ये प्रश्न मुझसे किया जा रहा था।

आखिर मैन पूछ ही लिया क्या हुआ माँ ये तो सिर्फ एक पत्थर है जिससे मैं लंगड़ बांधता हूँ। फिर माँ ने ज़ोर से डाँटते हुए बोला ये पत्थर नही पागल हड्डी है... वाक्य खत्म न हुआ था कि दो और चांटे रसीद हो गए मेरे गालो पर

Saturday, June 24, 2017

चिरौंजी लाल की पत्नी और उनकी गर्लफ्रैंड

चिरौंजी लाल हमारे कॉलेज के दिनों के मित्र है, कॉलेज में वो अपनी खामोशी के लिए प्रसिद्ध थे, इश्क़ हो या मुश्क सारा काम को अपनी खामोशी से निपटा देते थे।

कॉलेज में वो जिस लड़की से प्यार करते थे कभी उससे अपनी मोहब्बत का इज़हार न किया। बस ठंडी आहे भरते रहे , उसके सामने आने पर उनके चेहरे पर गजब की मुस्कान छा जाती।

छुट्टी के दिनों में वो उसकी एक झलक पाने को  गर्ल्स हॉस्टल के बाहर खड़े रहते थे। उसे देखने के बाद ही घर वापस आता,  कॉलेज खत्म होते होते दोनों में अच्छी दोस्ती तो हो गयी थी पर भाई ने कभी अपनी मोहब्बत ज़ाहिर नही की उसके सामने।

कॉलेज खत्म हुआ हम नौकरी की तलाश में भटकने लगे , नौकरी लगी फिर हम सबके समझाने पर उससे मोहब्बत का इज़हार करने का मन बनाया। चिरौंजी ने उसे बुलाया मिलने के लिए, बस वो मोहब्बत का इज़हार करने को था, कि लड़की ने अपनी शादी का कार्ड उसे थमा दिया। कार्ड ले वो वो घर आ गया।

कार्ड देख चिरौंजी लाल हम सबसे लिपट कर खूब रोया। उसके हालात देख हमसे रहा नही जा रहा था। बहुत समझने के बाद भाई कुछ संभला ही था कि उसकी शादी की डेट आ गयी। चिरौंजी लाल का हौसला भी गजब का था। उसकी शादी में जाने को भी तैयार हो गया,  कार्ड हमे भी आया था इसलिए  हम भी साथ हो लिए।

उसके घर पहुचने पर हमारे ठहरने की अच्छी व्यवस्था थी। हम उससे मिलने भी उसके घर गए, बहुत खुश थी वो अपनी शादी में , दूल्हा जो उसकी ही पसंद का था।  जैसे तैसे शादी निपटी। वक्त बिदाई का भी आया। लड़की को रोता देख चिरौंजी लाल के आंखों से आंसू छलक उठे जैसे उसके सामने से उसकी दुनिया जा रही हो,  हम उसे सबकी नजरों से बचते हुए घर के लिए ट्रेन पकड़ने के लिए निकल लिए।

धीरे धीरे उसकी यादे भी ओझल हो गयी। सब अपनी नौकरी में व्यस्त हो गए। चरौंजी लाल भी अब एक अच्छी कंपनी में जॉब करने लगा था, पर खामोशी की आदत अभी में नही गयी थी। हमारे हर विवाद में वो बस खामोशी से ही काम लेता था।

घर वालो ने भी उसकी शादी तय कर दी। लड़की छोटे शहर से बड़े तेज़ दिमाग वाली मिली थी, सगाई में भी वो खूब पटर पटर बोल रही थी, उसे देख हमे लगने लगा था कि ये लड़की चिरौंजी लाल की खामोशी तोड़ेगी।

शादी हुई हम खूब नाचे, दुल्हन ले वो घर आया। चिरौंजी लाल भी बहुत खुश था, दोनों जीवन का आनंद ले ही रहे थे कि एक दिन चिरौंजी लाल के फ़ोन पर एक दिन घंटी बजती है और उधर से आवाज़ आती है , पहचानो कौन, चिरौंजी लाल तुरंत खड़े हो बालकनी में निकल लेते है, फिर अंदर से आवाज़ आती है, किसका फ़ोन है, चिरौंजी आवाज़ को इग्नोर कर फोन में व्यस्त हो जाता है, खूब ढेर सारे गेस करने के बाद उधर से वो अपना  नाम सुमन बताती है, नाम सुन चिरौंजी का सर फिर से चकरा जाता है। कॉलेज का प्यार फिर से आंखों के सामने आ जाता है, चेहरे के हाव भाव चिरौंजी लाल की पत्नी देख लेती है और पूछती है कि, कौन है? किसका फ़ोन है? चिरौंजी बिना कुछ बताए फ़ोन काट देते है और बोलते है ऐसे की किसी दोस्त का फ़ोन था।

अब सुमन और चिरौंजी दोनों व्हाट्सएप्प पर चैट करने लगते थे अपनी पत्नी से छुपकर, एक दिन उसकी पत्नी उसका फ़ोन पा जाती है और दोनों की बाते पढ़ लेती है उसमें सुमन ने लिखा था कि

तुम मुझे याद नही करते, मैं तो तुम्हे बहुत याद करती हूं। कॉलेज के आखिरी दिनों में हम कितना साथ रहते थे, मैं तुम्हे अपनी सारी बात बताती थी, हम दोनो कितना हँसते थे, तुम मेरे सबसे अच्छे दोस्त थे अगर मेरी ज़िंदगी मे आदित्य नही आते तो मैं तुमसे शादी कर लेती। आई लव यू .........

इतना पढ़ते ही चिरौंजी की पत्नी का रौद्र रूप देखने लायक था। जिस चिरौंजी की आवाज़ सुनने को दुनिया तरसती थी और आजकल चिरौंजी के कराहने की आवाज़ दो घर आगे और दो घर पीछे तक आती है। 
चिरौंजी की इस बेवकूफी पर हम भी कुछ बोल न पाए और जो खामोशी चिरौंजी ने अपनाई थी आजकल हमने अपना ली है।