Sunday, June 21, 2026

माता-पिता का साथ: जिम्मेदारी, प्रेम और एक कठिन सफर


​जीवन का एक चक्र है, जिसे समझना और स्वीकार करना हर संतान के लिए एक परीक्षा जैसा होता है। एक दिन वह समय आता है जब हमारे माता-पिता, जिन्होंने कभी हमारी उँगली पकड़कर हमें चलना सिखाया था, हम पर निर्भर हो जाते हैं। उनकी दुनिया, जो कभी हमारे इर्द-गिर्द घूमती थी, अब छोटी होकर हमारे निर्णयों पर सिमट जाती है।

पुत्र या पुत्री होना सिर्फ एक रिश्ता नहीं है, यह एक कर्तव्य है।

​बुढ़ापे में उनके साथ खड़े होना, उनकी बीमारी की रातों में जागना, और जब उनका शरीर साथ छोड़ रहा हो, तब उनके पास मौजूद रहना—यह सब आसान नहीं है। किसी भी संतान के लिए अपने माता-पिता को कमजोर होते देखना और उनके अंतिम समय में उन्हें विदा होते देखना, जीवन का सबसे कठिन क्षण होता है।

​इस सफर में हमें अक्सर वो भूमिका निभानी पड़ती है जो कभी वे हमारे लिए निभाया करते थे। उनके फैसले हमें लेने होते हैं, जैसे कभी वे हमारे भविष्य के लिए लिया करते थे। हम उनकी भलाई के लिए जो निर्णय लेते हैं, उनमें से कौन सा 'सही' था और कौन सा 'गलत', यह तो सिर्फ वक्त ही बताता है। कभी-कभी विवशता में लिए गए फैसले हमें अंदर तक तोड़ देते हैं, हमें लगता है कि शायद हम कुछ और बेहतर कर सकते थे।

​लेकिन याद रखिए, उनके जाने के बाद मन में उठने वाले 'पछतावे' से कहीं ज्यादा सुकून इस बात का होता है कि हम उनके साथ थे। हम उनके अंतिम क्षणों तक उनकी सेवा में उपस्थित रहे। यह संतुष्टि ही उस खालीपन को भरने की ताकत देती है जो उनके जाने के बाद पीछे छूट जाता है।

​आज वे भले ही भौतिक रूप से हमारे बीच न हों, लेकिन हम उनके जाने के बाद भी उन्हीं को जी रहे हैं। उनके संस्कार, उनकी सीख और उनके दिए हुए मूल्य हमारे हर फैसले में जीवित हैं। असल में, वे कहीं गए ही नहीं, वे तो हमारे व्यक्तित्व में, हमारे व्यवहार में और हमारी यादों में हमेशा हमारे साथ हैं।

Wednesday, June 10, 2026

क्रांति या कठपुतली?

जब से बंगाल के चुनाव हुए हैं, तब से हमारी आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक गिरावट का ज़िक्र अचानक कुछ ज़्यादा ही बढ़ गया है।
क्या देश की आर्थिक हालत एक दिन में अचानक ही गिरने लगी होगी? उससे पहले इन विषयों पर इतना खुलकर कोई पॉडकास्ट भी नहीं आ रहा था और न ही देश की सरकार का इस स्तर पर इतना खुलकर विरोध हो रहा था।
समझ नहीं आ रहा कि हम किसी क्रांति की ओर बढ़ रहे हैं या फिर किसी की कठपुतली बनते जा रहे हैं। हमें खुद ही पता नहीं।
नेपाल और बांग्लादेश में जिस तरह के हालात बने, वह हम सबने देखे। सोशल मीडिया का कमाल देखिए—रातों-रात सरकार बदल गई, लेकिन फिर देश के हाथ क्या आया? एक दिशाहीन सरकार।
मैं किसी सरकार के समर्थन में नहीं लिख रहा हूँ, पर ऐसा न हो कि देश ऐसी दिशा में चला जाए जहाँ से उसे वापस लाना आसान न रहे।
सरकार को भी जिन चीज़ों को समझदारी से संभालना चाहिए था, वह भी कहीं-कहीं वही करती दिखाई दे रही है जो कभी पुरानी सरकार अपने आख़िरी दिनों में किया करती थी।
वे शिक्षक, जिन्होंने हमें लफ़्ज़ों में ज्ञान दिया, जिन्होंने न जाने कितने अनसुलझे प्रश्नों के उत्तर दिए, आज वही कटघरे में खड़े हैं।