जब से बंगाल के चुनाव हुए हैं, तब से हमारी आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक गिरावट का ज़िक्र अचानक कुछ ज़्यादा ही बढ़ गया है।
क्या देश की आर्थिक हालत एक दिन में अचानक ही गिरने लगी होगी? उससे पहले इन विषयों पर इतना खुलकर कोई पॉडकास्ट भी नहीं आ रहा था और न ही देश की सरकार का इस स्तर पर इतना खुलकर विरोध हो रहा था।
समझ नहीं आ रहा कि हम किसी क्रांति की ओर बढ़ रहे हैं या फिर किसी की कठपुतली बनते जा रहे हैं। हमें खुद ही पता नहीं।
नेपाल और बांग्लादेश में जिस तरह के हालात बने, वह हम सबने देखे। सोशल मीडिया का कमाल देखिए—रातों-रात सरकार बदल गई, लेकिन फिर देश के हाथ क्या आया? एक दिशाहीन सरकार।
मैं किसी सरकार के समर्थन में नहीं लिख रहा हूँ, पर ऐसा न हो कि देश ऐसी दिशा में चला जाए जहाँ से उसे वापस लाना आसान न रहे।
सरकार को भी जिन चीज़ों को समझदारी से संभालना चाहिए था, वह भी कहीं-कहीं वही करती दिखाई दे रही है जो कभी पुरानी सरकार अपने आख़िरी दिनों में किया करती थी।
वे शिक्षक, जिन्होंने हमें लफ़्ज़ों में ज्ञान दिया, जिन्होंने न जाने कितने अनसुलझे प्रश्नों के उत्तर दिए, आज वही कटघरे में खड़े हैं।