आज का दौर ज़ेन ज़ी का है, ऐसा लोग बताते हैं। इस आंदोलन ने पहली बार शायद उनका असली रूप हमारे सामने रखा है। मुझे खुशी इस बात की है कि वे किसी का बोझ अपने ऊपर लेकर नहीं जी रहे—न सभ्यता का, न समाज का और न ही रिश्तों का।
हमारा दौर कुछ और था। हम तो धर्मराज की तरह रिश्तों को सुलझाते-सुलझाते एक उम्र गुज़ार बैठे। सबको साथ रखने की कोशिश में खुद से ही दूर होते गए। अंत में हाथ क्या आया? न माया मिली, न राम।
ज़ेन ज़ी, तुमसे बस यही अनुरोध है—अपना और अपने देश का ख़याल रखना। जब खिड़की खुलेगी तो हवा के साथ कुछ अच्छी चीज़ें भी आएँगी और कुछ बुरी भी। लेकिन वक्त तुम्हें खुद सिखा देगा कि क्या भीतर आने देना है और क्या बाहर ही छोड़ देना है।
बिना पुराने बोझ के शायद तुम नई सोच पैदा कर पाओगे, नए रास्ते खोज पाओगे। हम तो रिश्ते सुलझाते-सुलझाते रह गए; न कुछ नया सोच पाए, न बहुत कुछ नया कर पाए।
जिस नई खोज के लिए भारत सदियों से तरसता रहा है, शायद वह तुम्हारी पीढ़ी कर पाए।
याद रखना—कुछ छूटेगा, तभी कुछ नया बनेगा।
तुम्हें मेरी शुभकामनाएँ।
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