विदाई के समय मैंने उसे अपने ही हाथों से उठाकर डोली में बैठाया था। बहन विदा तो हो रही थी, लेकिन मेरे दिल से वह कभी विदा नहीं हुई। मैंने हमेशा उसे अपने घर का हिस्सा माना।
वह घर छोड़कर चली गई थी, लाख विरोध के बावजूद, लेकिन उस घर का हिस्सा बनी रही। दिन बीते, हफ्ते बीते, महीने बीते और फिर साल गुजर गए… मगर उसके लिए उस घर के दरवाज़े कभी बंद नहीं हुए।
फिर एक दिन मैंने वह घर छोड़ दिया।
धीरे-धीरे घरवालों को मेरे बिना जीने की आदत हो गई। पता ही नहीं चला कि कब मेरा अपना घर मेरे लिए पराया हो गया। घर आता था, मगर अब वह घर जैसा महसूस नहीं होता था—कुछ अजनबी-सा लगता था।
भाई का कमरा था, लेकिन मेरा नहीं था। बहन के लिए जगह थी, मेरे लिए नहीं।
वहाँ अब बहन जा बसी थी। घर में सब कुछ था—कमरे, दीवारें, रिश्ते… बस मेरे हिस्से का अपनापन नहीं था।
जिस बहन को मैंने कभी उस घर में अजनबी महसूस नहीं होने दिया, उसी घर में एक दिन मैं खुद अजनबी हो गया।
शायद बस मेरे विवाह करने की देर थी।
रिश्तों की जगह बदल गई, घर की परिभाषाएँ बदल गईं और मेरी जगह भी बदल गई। जो घर कभी मेरा था, वहाँ मेरी यादें तो थीं, मेरा कमरा भी था… मगर मेरा होना नहीं था।
मैं घर से दूर नहीं हुआ था,
बस घर वाले मुझसे दूर हो गए थे।
और सबसे अजीब बात यह थी कि घर अब भी वही था—
बस उसमें मेरा अपनापन खत्म हो गया था।