ये उन दिनों की बात है जब हम गर्मियों की छुट्टियों में दादी और नानी के पास जाया करते थे और अपनी छुट्टियां ढेला मार कर आम तोड़ने और फिर उन कच्चे आमो को नमक के साथ चटकारा मार कर बिताया करते थे। हम पढ़ते थे लखनऊ में पर छुट्टियां दादी-नानी के आंगन में बिताते थे।
ऐसे ही एक गर्मी की छुट्टियों में हम दादी के पास थे। एक दिन दादी को मुझपर बहुत प्यार आया और अपने अवधी लहज़े में बोली - आज का खाबव, जउन तुहय पसंद होए वहय बनी ।
मैंने बहुत सोंच और बोला दाल चावल बनाओ वही खाऊंगा। तभी रसोई से काकी की आवाज़ आती है कि कौन सी दाल बनाऊ, कौन सी दाल पसंद है तुम्हे, मैन कहा कोई भी बना लो काकी।
तभी दादी की आवाज़ आती है कि तुहय बोलो घर मा सारी दाल है , जउन तू कहव!! मैन कहा - कौन कौन की दाल है? फिर दादी अवधी लहज़े में बोली- अरहरिक दाल है , उरदिक दाल है और केराओक दाल है जउन खाओ वही बनाय।
तभी मुझे आखिरी वाली दाल समझ मे नही आयी कि वो कौन सी दाल है। तभी दादी बोली-केराओक दाल।
फिर मैं बोला ये कौन सी दाल होती है!!!
किराए की दाल, किराए का घर सुना था, किराए की साईकल सुनी थी पर किराए की दाल कभी नही सुनी.... क्या इस दाल को खाने के बाद किराया देना होता है या कुछ और??
इतना सुन दादी गुस्से से बोली- अरे अंग्रेज़ के सपूत.. तुम्हारे पापा हियै पैदा भए रहा !!! यहय दाल खाय खाय बढ़वार भए अउर तू पूछत हौ की ई कउन सी दाल है, तुम्हरे पापा तुहय नाइ बताइन कि किराओक दाल का होत है!!!
यह सुन बड़े काका काकी और छोटे काका ज़ोर से हसने लगे, मुझे समझ मे नही आ रहा था कि ऐसा क्या हो गया!!
तभी छोटे काका मुझे बुलाते है और दबी हुई आवाज़ में मुझे बताते है कि मटर को किराओ बोलते है और उसकी भी दाल होती है।
वो बचपन की बात पर आज भी सब ठहाके लेते है जब भी घर दाल का ज़िक्र आता है और तबसे मैं अवधी शब्दो को बड़े ही ध्यान से सुनता हूँ
really??
ReplyDeleteभाई इसमे झूठ की कितनी संभावना है
ReplyDeletewaaah.. daadi kaa pyaar.. you was lucky !!
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