बात उन दिनों की है जब हम पुराने लखनऊ में रहा करते थे, हर शाम सभी अपने घरो की छतों पर पतंगे उडाया करते थे। आसमां सतरंगी पतंगों से भरा रहता था। पंछियो और पतंगों में भेद करना थोड़ा मुश्किल था, पतंगों का आकार मेरी बाहों के आकार से काफी बड़ा हुआ करता था, मैं छत से गिर ना जाऊं इस डर से माँ ने मुझे पतंग उड़ाने से मना किया था।
माँ की बात मान, मैं पतंग तो नही उड़ाया करता था पर मुहल्ले के बच्चो के साथ लंगड़ खेला करता था। पतंग कटने पर वो अक्सर हमारी छतों पर आ गिरा करती थी और हम उसे पकड़ने के लिए दौड़ पड़ते थे । छोटे होने के कारण पतंग तो हाथ नही लगती थी पर छीन झपटी में थोड़ा मांझा हाथ लग जाया करता था।
हम उस माँझे से अक्सर लंगड़ बांधा करते थे। एक दूसरे के माँझे में लंगड़ फसा हम माँझा काटा करते थे और दूसरो की छतों पर गिरी पतंगों और सद्दी को फ़साने के लिए हम लंगड़ फेका करते थे।
पत्थर से मांझा अक्सर खुल जाया करता था। एक दिन की बात है जब मुझे एक पत्थर मिला , जिसका आकार लंगड़ बांधने के लिए बिल्कुल उपयुक्त था । जब भी मैं लंगड़ बांधता, वो कभी नही खुलता था। उस पत्थर को मै बहुत संभाल कर अपने जेब मे रखा करता था। घर पहुचने पर उसे अच्छी जगह छुपा देता था कि मेरा छोटा भाई उसे ले न ले।
एक दिन वो लंगड़ मेरी जेब मे ही रह गया और माँ ने मेरे कपड़े भिगो दिए उसे धोने के लिए, भिगोने के बाद जब वो उसे साफ कर रही थी, तो वो पत्थर उनके हाथ लग गया।
पानी मे भीगने के बाद उस पत्थर का असली रंग दिखने लगा, फिर माँ ने उसे ठीक से देखा और झट से उसे अपने से दूर फेक दिया ...
माँ का चेहरा गुस्से से लाल हो गया और माँ ने मुझे ज़ोर से आवाज़ लगाई.... राहुल... राहुल.. राहुल... माँ की तेज़ आवाज़ सुन मैं डरा हुआ माँ के पास आया और बोला, हाँ माँ... पास आते ही दो चाटे मेरे गालो पर शुशोभित हो गए, मन ही मन मैंने पूछा ऐसा क्या हो गया जो मुझे चांटे खाने को मिले।
फिर माँ ने पूछा
ये क्या है ?
कहाँ से लाये इसे?
मुझे समझ मे नही आया इसमे ऐसा था क्या जो ये प्रश्न मुझसे किया जा रहा था।
आखिर मैन पूछ ही लिया क्या हुआ माँ ये तो सिर्फ एक पत्थर है जिससे मैं लंगड़ बांधता हूँ। फिर माँ ने ज़ोर से डाँटते हुए बोला ये पत्थर नही पागल हड्डी है... वाक्य खत्म न हुआ था कि दो और चांटे रसीद हो गए मेरे गालो पर
ha ha ha.. gazab.. !! haddi badi kaam ki thi.. :)
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