बात उन दिनो की है जब हम पुराने लखनऊ में रहा करते थे और पापा पान खाया करते थे। संडे हम अक्सर घर के पास की ही पान की दुकान से पापा के लिए पान लाया करते थे। पापा के लिए पान लाना हमारे लिए गर्व की बात थी और हो भी क्यों ना, शायद पान खाना उस समय के फैशन में था । जितने भी बड़े लोग थे वो पान खाया करते थे। सबके पान की दुकान और उनका कांफ़्रिग्रशन फिक्स होता था, किसी और कि दुकान और किसी और के कांफ़्रिग्रशन का पान खाना किसी को पसंद नही आता था। पापा के पान का कांफ़्रिग्रशन था "एक सौ बत्तीस इलायची रसरंजन" हमने रट्टा मार रखा था कि पापा कौन सा पान खाते है, पर हमे यह नही पता था कि उसमें क्या-क्या पड़ता है। अगर गलती से भी कांफ़्रिग्रशन हिल जाए तो पान बेस्वाद हो जाता था।
अक्सर हम भी सोंचते थे कि बड़े होने पर हम पान खाएंगे, जैसे कि पापा खाते है, जब भी हम किसी की शादी की दावत में जाते थे, तो अक्सर फ्री का पान खा लिया करते थे और जब भी पापा, मम्मी या दीदी को पता चलता था कि हमने पान खाया है तो वो नाराज़ हो जाया करते थे और हमे अच्छे से डाट पड़ती थी और बोलते थे कि पान खाना अच्छी बात नही होती है।
एक दिन की बात है जब हम अपने बड़े चाचा की बारात लेकर गोरखपुर गए। बारात धर्मशाला पहुची, थोड़ा आराम करने के बाद हमे नास्ता परोसा गया , हमने नास्ता किया थोड़ी देर के बाद पापा ने बोला कि धर्मशाला के बाहर एक पान की दुकान है वही से मेरे लिए पान ले आओ। पान लेने के लिए हम पान की दुकान पर पहुंचे और हमने पान वाले अंकल से बोला कि अंकल मेरे पापा के लिए एक पान बना देना, फिर पान वाले अंकल ने बोला कि कौन सा पान खाते है? तुम्हारे पापा , फिर हमने झट से रटा रटाया समीकरण बोला दिया "एक सौ बत्तीस इलायची रसरंजन" वाला पान फिर वो पान वाले अंकल पान लगाने लगे । पान लगाते लगाते पान वाले अंकल ने मुझसे पूछते है कि जर्दा पड़ेगा क्या?? मुझे समझ मे नही आया कि उन्होंने क्या बोला, मैंने फिर पूछा क्या? क्या पड़ेगा? उन्होंने बोला जर्दा... ये शब्द मैने पहली बार सुना था। मैने पान वाले अंकल से बोला कि, मैं पापा से पूँछ कर आता हूँ , पापा तक पहुँचते -पहुँचते जर्दा न जाने कैसे गर्दा हो गया मुझे नही पता। मैंने पापा से पूछा कि, पापा पान वाले अंकल पूँछ रहे है कि क्या पान में गर्दा पड़ेगा? शायद पापा के लिए भी यह शब्द नया ही था। पापा के बगल में बैठे किसी रिश्तेदार ने हमारी बात सुन ली, शायद वो गोरखपुर के ही थे , तभी उन्हें पता लग गया कि हम कंफ्यूज किस बात पर है, फिर वो मुझसे बोले बेटा, जर्दा होता है गर्दा नही। जर्दा का मतलब तम्बाकू होता है और गर्दा का मतलब धूल-मिट्टी। सोंचो अगर जर्दे की जगह गर्दा पड़ जायेगा तो पान का क्या होगा!!!
मेरी इस बात को सुन सब खूब हंसे, बाद में पापा के लिए पान लेने कोई और गया, मैं नही। आज भी, जब मुझे कोई गोरखपुर का व्यक्ति मिलता है, तो मैं ये किस्सा जरूर सुनाता हूँ।
Ha ha ha....! Aap ne bachpan yaad dila Dia.
ReplyDeleteThanks GOLU
ReplyDeleteWah bhai ...Mastt
ReplyDeleteThanks dear,🤡😀😀😀
ReplyDeleteBhai hum Apne nanaji ke liye lane jate the, unka configuration tha Bhola 132, mahiin Patti. Purane din taaze ho Gaye.
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