Friday, August 4, 2017

किराये की दाल

ये उन दिनों की बात है जब हम गर्मियों की छुट्टियों में दादी और नानी के पास जाया करते थे और अपनी छुट्टियां ढेला मार कर आम तोड़ने और फिर उन कच्चे आमो को नमक के साथ चटकारा मार कर बिताया करते थे। हम पढ़ते थे लखनऊ में पर छुट्टियां दादी-नानी के आंगन में बिताते थे।

ऐसे ही एक गर्मी की छुट्टियों में हम दादी के पास थे। एक दिन दादी को मुझपर बहुत प्यार आया और अपने अवधी लहज़े में बोली - आज का खाबव, जउन तुहय पसंद होए वहय बनी ।

मैंने बहुत सोंच और बोला दाल चावल बनाओ वही खाऊंगा। तभी रसोई से काकी की आवाज़ आती है कि कौन सी दाल बनाऊ, कौन सी दाल पसंद है तुम्हे, मैन कहा कोई भी बना लो काकी।

तभी दादी की आवाज़ आती है कि तुहय बोलो घर मा सारी दाल है , जउन तू कहव!! मैन कहा - कौन कौन की दाल है? फिर दादी अवधी लहज़े में बोली- अरहरिक दाल है , उरदिक दाल है और केराओक दाल है जउन खाओ वही बनाय।

तभी मुझे आखिरी वाली दाल समझ मे नही आयी कि वो कौन सी दाल है। तभी दादी बोली-केराओक दाल।
फिर मैं बोला ये कौन सी दाल होती है!!!

किराए की दाल, किराए का घर सुना था, किराए की साईकल सुनी थी पर किराए की दाल कभी नही सुनी.... क्या इस दाल को खाने के बाद किराया देना होता है या कुछ और??

इतना सुन दादी गुस्से से बोली-  अरे अंग्रेज़ के सपूत.. तुम्हारे पापा हियै पैदा भए रहा !!! यहय दाल खाय खाय बढ़वार भए अउर तू पूछत हौ की ई कउन सी दाल है, तुम्हरे पापा  तुहय नाइ  बताइन कि किराओक दाल का होत है!!!

यह सुन बड़े काका काकी और छोटे काका ज़ोर से हसने लगे, मुझे समझ मे नही आ रहा था कि ऐसा क्या हो गया!!

तभी छोटे काका मुझे बुलाते है और दबी हुई आवाज़ में मुझे बताते है कि मटर को किराओ बोलते है और उसकी भी दाल होती है।

वो बचपन की बात पर आज भी सब ठहाके लेते है जब भी घर दाल का ज़िक्र आता है और तबसे मैं अवधी शब्दो को बड़े ही ध्यान से सुनता हूँ

Monday, July 17, 2017

तुम होते कौन हो!!!

मुहल्ले कि एक चाय की दुकान पर कुछ लोग इकट्ठा थे और पति पत्नी के प्रेम पर चर्चा चल रही थी। चाय की चुस्की के साथ सब अपने अपने नायाब तरीके साझा कर रहे थे अपनी पत्नी से अपना प्रेम प्रदर्शित करने ने लिए। किसी ने कहा कभी कभी वो पत्नी पर अपना प्रेम प्रदर्शित करने के लिए उसे शॉपिंग करा देते है। कोई अपनी पत्नी को खुश करने के लिए कभी खाना बना देते है और कोई अपनी पत्नी से प्रेम को प्रदर्शित करने के लिए झाड़ू-पोछा भी लगा देते है और कोई बर्तन धुल देता है। अधिकतर लोग अपना प्रेम बेहद शांत और चारदीवारी के भीतर ही प्रदर्शित करते है।

सार्वजनिक स्थानों पर वो अपनो पत्नी से चारकोस दूर ही चलते है, हाथ पकड़ कर चलना तो दूर की बात है।

तभी एक व्यक्ति अपने मित्र से जुड़ा हुआ किस्सा सुनता है कि ... मेरा एक मित्र है जिसकी हाल ही में शादी हुई थी। जब वो एक दिन हमारे परिवार के साथ मार्केट घूमने गया तो मैंने कहा की आप अपनी पत्नी का हाथ क्यों नही थाम लेते यहां भीड़ बहुत है, कही आपकी पत्नी ग़ुम ना हो जाये!!  पति पत्नी दोनों सकुचाते हुए एक दूसरे का हाथ पकड़ चलने लगते है।

चर्चा चल ही रही थी तभी एक और सज्जन पुरुष ज़ोर से बोले मुझे हाथ पकड़ कर चलना सहज नही लगता है और भाई अगर हाथ पकड़ने वाली बात किसी ने मुझसे बोली होती तो मैं बोलता की "तुम होते कौन हो मुझे ये बोलने वाले कि मैं अपनी पत्नी का हाथ पकड़ूँ"
मेरी पत्नी है पकड़ू या न पकड़ू किसी से क्या!!!

इतना सुन दोस्त की कहानी सुनाने वाला निःशब्द हो गया।

Wednesday, July 12, 2017

लंगड़

बात उन दिनों की है जब हम पुराने लखनऊ में रहा करते थे, हर शाम सभी अपने घरो की छतों पर पतंगे उडाया करते थे। आसमां सतरंगी पतंगों से भरा रहता था। पंछियो और पतंगों में भेद करना थोड़ा मुश्किल था, पतंगों का आकार मेरी बाहों के आकार से काफी बड़ा हुआ करता था,  मैं छत से गिर ना जाऊं इस डर से माँ ने मुझे पतंग उड़ाने से मना किया था।

माँ की बात मान,  मैं पतंग तो नही उड़ाया करता था पर मुहल्ले के बच्चो के साथ लंगड़ खेला करता था।  पतंग कटने पर वो अक्सर हमारी छतों पर आ गिरा करती थी और हम उसे पकड़ने के लिए दौड़ पड़ते थे । छोटे होने के कारण पतंग तो हाथ नही लगती थी पर छीन झपटी में  थोड़ा मांझा हाथ लग जाया करता था।

हम उस माँझे से अक्सर लंगड़ बांधा करते थे। एक दूसरे के माँझे में लंगड़ फसा हम माँझा काटा करते थे और दूसरो की छतों पर गिरी पतंगों और सद्दी को फ़साने के लिए हम लंगड़ फेका करते थे।

पत्थर से मांझा अक्सर खुल जाया करता था। एक दिन की बात है जब मुझे एक पत्थर मिला , जिसका आकार लंगड़ बांधने के लिए बिल्कुल उपयुक्त था । जब भी मैं लंगड़ बांधता,  वो कभी नही खुलता था। उस पत्थर को मै बहुत संभाल कर अपने जेब मे रखा करता था। घर पहुचने पर उसे अच्छी जगह छुपा देता था कि मेरा छोटा भाई उसे ले न ले।

एक दिन वो लंगड़ मेरी जेब मे ही रह गया और माँ ने मेरे कपड़े भिगो दिए उसे धोने के लिए, भिगोने के बाद जब वो उसे साफ कर रही थी, तो वो पत्थर उनके हाथ लग गया।

पानी मे भीगने के बाद उस पत्थर का असली रंग दिखने लगा, फिर माँ ने उसे ठीक से देखा और झट से उसे अपने से दूर फेक दिया ...

माँ का चेहरा गुस्से से लाल हो गया और माँ ने मुझे ज़ोर से आवाज़ लगाई....  राहुल... राहुल.. राहुल... माँ की तेज़ आवाज़ सुन मैं डरा हुआ माँ के पास आया और बोला, हाँ माँ...  पास आते ही दो चाटे मेरे गालो पर शुशोभित हो गए, मन ही मन मैंने पूछा ऐसा क्या हो गया जो मुझे चांटे खाने को मिले।

फिर माँ ने पूछा
ये क्या है ?
कहाँ से लाये इसे?

मुझे समझ मे नही आया इसमे ऐसा था क्या जो ये प्रश्न मुझसे किया जा रहा था।

आखिर मैन पूछ ही लिया क्या हुआ माँ ये तो सिर्फ एक पत्थर है जिससे मैं लंगड़ बांधता हूँ। फिर माँ ने ज़ोर से डाँटते हुए बोला ये पत्थर नही पागल हड्डी है... वाक्य खत्म न हुआ था कि दो और चांटे रसीद हो गए मेरे गालो पर

Saturday, June 24, 2017

चिरौंजी लाल की पत्नी और उनकी गर्लफ्रैंड

चिरौंजी लाल हमारे कॉलेज के दिनों के मित्र है, कॉलेज में वो अपनी खामोशी के लिए प्रसिद्ध थे, इश्क़ हो या मुश्क सारा काम को अपनी खामोशी से निपटा देते थे।

कॉलेज में वो जिस लड़की से प्यार करते थे कभी उससे अपनी मोहब्बत का इज़हार न किया। बस ठंडी आहे भरते रहे , उसके सामने आने पर उनके चेहरे पर गजब की मुस्कान छा जाती।

छुट्टी के दिनों में वो उसकी एक झलक पाने को  गर्ल्स हॉस्टल के बाहर खड़े रहते थे। उसे देखने के बाद ही घर वापस आता,  कॉलेज खत्म होते होते दोनों में अच्छी दोस्ती तो हो गयी थी पर भाई ने कभी अपनी मोहब्बत ज़ाहिर नही की उसके सामने।

कॉलेज खत्म हुआ हम नौकरी की तलाश में भटकने लगे , नौकरी लगी फिर हम सबके समझाने पर उससे मोहब्बत का इज़हार करने का मन बनाया। चिरौंजी ने उसे बुलाया मिलने के लिए, बस वो मोहब्बत का इज़हार करने को था, कि लड़की ने अपनी शादी का कार्ड उसे थमा दिया। कार्ड ले वो वो घर आ गया।

कार्ड देख चिरौंजी लाल हम सबसे लिपट कर खूब रोया। उसके हालात देख हमसे रहा नही जा रहा था। बहुत समझने के बाद भाई कुछ संभला ही था कि उसकी शादी की डेट आ गयी। चिरौंजी लाल का हौसला भी गजब का था। उसकी शादी में जाने को भी तैयार हो गया,  कार्ड हमे भी आया था इसलिए  हम भी साथ हो लिए।

उसके घर पहुचने पर हमारे ठहरने की अच्छी व्यवस्था थी। हम उससे मिलने भी उसके घर गए, बहुत खुश थी वो अपनी शादी में , दूल्हा जो उसकी ही पसंद का था।  जैसे तैसे शादी निपटी। वक्त बिदाई का भी आया। लड़की को रोता देख चिरौंजी लाल के आंखों से आंसू छलक उठे जैसे उसके सामने से उसकी दुनिया जा रही हो,  हम उसे सबकी नजरों से बचते हुए घर के लिए ट्रेन पकड़ने के लिए निकल लिए।

धीरे धीरे उसकी यादे भी ओझल हो गयी। सब अपनी नौकरी में व्यस्त हो गए। चरौंजी लाल भी अब एक अच्छी कंपनी में जॉब करने लगा था, पर खामोशी की आदत अभी में नही गयी थी। हमारे हर विवाद में वो बस खामोशी से ही काम लेता था।

घर वालो ने भी उसकी शादी तय कर दी। लड़की छोटे शहर से बड़े तेज़ दिमाग वाली मिली थी, सगाई में भी वो खूब पटर पटर बोल रही थी, उसे देख हमे लगने लगा था कि ये लड़की चिरौंजी लाल की खामोशी तोड़ेगी।

शादी हुई हम खूब नाचे, दुल्हन ले वो घर आया। चिरौंजी लाल भी बहुत खुश था, दोनों जीवन का आनंद ले ही रहे थे कि एक दिन चिरौंजी लाल के फ़ोन पर एक दिन घंटी बजती है और उधर से आवाज़ आती है , पहचानो कौन, चिरौंजी लाल तुरंत खड़े हो बालकनी में निकल लेते है, फिर अंदर से आवाज़ आती है, किसका फ़ोन है, चिरौंजी आवाज़ को इग्नोर कर फोन में व्यस्त हो जाता है, खूब ढेर सारे गेस करने के बाद उधर से वो अपना  नाम सुमन बताती है, नाम सुन चिरौंजी का सर फिर से चकरा जाता है। कॉलेज का प्यार फिर से आंखों के सामने आ जाता है, चेहरे के हाव भाव चिरौंजी लाल की पत्नी देख लेती है और पूछती है कि, कौन है? किसका फ़ोन है? चिरौंजी बिना कुछ बताए फ़ोन काट देते है और बोलते है ऐसे की किसी दोस्त का फ़ोन था।

अब सुमन और चिरौंजी दोनों व्हाट्सएप्प पर चैट करने लगते थे अपनी पत्नी से छुपकर, एक दिन उसकी पत्नी उसका फ़ोन पा जाती है और दोनों की बाते पढ़ लेती है उसमें सुमन ने लिखा था कि

तुम मुझे याद नही करते, मैं तो तुम्हे बहुत याद करती हूं। कॉलेज के आखिरी दिनों में हम कितना साथ रहते थे, मैं तुम्हे अपनी सारी बात बताती थी, हम दोनो कितना हँसते थे, तुम मेरे सबसे अच्छे दोस्त थे अगर मेरी ज़िंदगी मे आदित्य नही आते तो मैं तुमसे शादी कर लेती। आई लव यू .........

इतना पढ़ते ही चिरौंजी की पत्नी का रौद्र रूप देखने लायक था। जिस चिरौंजी की आवाज़ सुनने को दुनिया तरसती थी और आजकल चिरौंजी के कराहने की आवाज़ दो घर आगे और दो घर पीछे तक आती है। 
चिरौंजी की इस बेवकूफी पर हम भी कुछ बोल न पाए और जो खामोशी चिरौंजी ने अपनाई थी आजकल हमने अपना ली है।

Thursday, May 11, 2017

हैप्पी मदर्स डे

प्रिय दोस्तों ,

मै अपने जीवन की एक प्रमुख घटना आप सबसे साझा करना चाहता हूँ , बात मेरे छुटपन की है , गर्मी की छुट्टिया चल रही थी, हमारे दिन कैरमबोर्ड़, शाम क्रिकेट और रात छुपन छुपाई खेल बीत रहे थे।  हम खेल में इतने व्यस्त रहते थे की अक्सर माँ द्वारा पुकारा जाना हमे सुनाई ही नहीं देता था।  माँ जब तक डंडा लेकर खुद नहीं आती थी तब तक हमे साफ़ सुनाई नहीं देता था। वो डंडा मारती कम थी पटकती ज़्यादा थी, हमे चोट कम लगती थी और चिल्लाते ज़्यादा थे,  एक दिन की बात है जब माँ ने हमे फिर से आवाज़ लगायी पर हमे सुनाई नहीं दी, थक कर हम जब घर पहुंचे तो माँ डंडा लेकर बैठी हुई थी।  माँ ने फिर से हमे डांट लगायी फिर इस बार न जाने क्या हुआ मेरे मुँह से शायद कोई गाली निकल गयी।  फिर क्या था , माँ का वो रौद्र रूप मुझे आज भी याद है, वो मर्दानी बन मुझे दबोच लिया और पास में रखी हरी मिर्च मेरे मुँह में लगा दी, और बोली मुझे बिलकुल भी पसंद नहीं है की मेरा बेटा किसी को गाली दे।  मेरे मुँह में लगी मिर्च देख पुरे मोहल्ले वाले आ गए।  कोई मुझे पानी से मुँह धुला रहा था तो कोई देसी घी लगा रहा था।  माँ मेरे पास बिल्कुल भी नहीं आयी।  कुछ घंटो के बाद जब मिर्च की जलन शांत हुई तो मैं जब माँ के पास आया तो देखा, माँ किचन में बैठी रो रही थी।  पता नहीं, माँ के उस रुदन का मेरे दिल पर बहुत असर हुआ।  माँ ने गले लगा मुझसे वादा लिया की मै कभी भी किसी को गाली नहीं दूंगा।  उस दिन के बाद से मैंने उस वादे को निभाया है।


Wednesday, March 8, 2017

महिला दिवस

आज महिला दिवस है , आप सभी महिलाओ को मेरी तरफ से इसकी ढेर सारी बधाई,
मैं अक्सर अपने आपसे पूछता हूँ क्या महिलाए पूजनीय है, क्या हमें उनकी पूजा करनी चाहिए। 

फिर अंदर से एक जवाब आता है नहीं !!!
वो पूजनीय तो बिल्कुल भी नहीं है।  हम उन्हें देवी कह कर उन्हें महान नहीं बना सकते। 
मेरे जीवन में अलग अलग पड़ाव पर अलग अलग महिलाओ का प्रभाव रहा है। 

माँ......
- जब मैं छोटा था तो मेरी माँ ने मुझे जो ममता दी, उससे क्या मैं अपनी माँ को देवी की उपाधि दे सकता हूँ।  एक तरफ मेरा यह मन करता है कि हाँ मैं उसे देवी की उपाधि दे सकता हूँ , पर दूसरा मन ये बोलता है नहीं !!!!! वो कोई देवी नहीं सिर्फ मेरी माँ है और कुछ भी नहीं। देवी बना दूँ तो उससे झगडूंगा कैसे।  जिद कैसे करूँगा।  नाराज़ तो कभी कर ही नहीं पाउँगा तो मनाऊंगा कैसे।

बहन....
- थोड़ा बड़ा हुआ तो जीवन पर बड़ी बहन का प्रभाव बढ़ा, उसने जो कहा वो करता गया और सफलता पायी जीवन में।  तो क्या मैं उसे देवी का दर्ज दूँ, फिर वही आवाज़ आती है नहीं !!!  बचपन में दीदी ने बहुत पीटा है, मुझे। मैंने उसे देवी बना दिया तो मेरी बहन नहीं रहेगी।  रोज़ उसकी पूजा नहीं कर सकता सिवाए रक्षाबंधन  के दिन ।

दोस्त .....
- दोस्त तो सिर्फ दोस्त होते है।  उन्हें क्या देवी स्वरूप समझना। जीवन का नगीना है दोस्त। सुख दुख सबकुछ तो साझा करते है। 

पत्नी.....
- वो तो देवी बिल्कुल भी नहीं है। वो तो मेरी प्रिया है। जीवन को एक उद्देश्य देने वाली है। देवी नहीं ।

बेटी....
- अगर बेटी को देवी बना दिया तो उसका पालन कैसे करूँगा। देवी से हम हमेशा कुछ मांगते है पर बेटी को तो सबकुछ देते है। 

मेरे जीवन में जितनी भी महिलाएं है उनमें से सिर्फ मेरी माँ देवत्व के सबसे करीब है। बाकी कोई नहीं। 

बाकियो को महिलाये रहने देते है और अपने बराबर ही समझते है। वो हम जैसे ही थोड़ी सीधी, सच्ची, कुटिल और बेईमान है। 
कोई माने या न माने इन सबमे हमारे जीवन को सुखी और खूबसूरत बनाने की शक्ति जरूर है। 

Sunday, February 12, 2017

एक चोरनी ऐसी भी

बात 10 फरवरी की है, पापा का जन्मदिन मनाने के लिए हम केक, पनीर और नमकीन लाये थे , घर पंहुचा तो स्वाति ने बोला की मैं एक चक्कर लगा आती हूँ स्कूटर से, स्वाति स्कूटर ले चक्कर लगाने निकल गयी, हमने सामान घर के दरवाजे से लगे चबूतरे पर रख दिया। फिर आदि भी जिद करने लगा की वो पार्क में टहलने के लिए जायेगा। हम दोनों घर के सामने वाले पार्क में चले गए यह सोचकर की, कौन चोरी करेगा इस सामान को। स्वाति स्कूटी से चक्कर लगाने के बाद एक और चक्कर लगाने के लिए गयी। हम भी आदि के साथ पार्क में ही थे। स्वाति के दूसरा चक्कर लगाने के बाद हम घर के अंदर जाने के लिए सामान उठाने के लिए जैसे ही गए देखा की एक थैला गायब था उसमे ही सारा खाने का सामान था। हमने इधर उधर हर जगह देखा थैला कही नही था। ऊपर नीचे सबसे पूछा की कहीं गलती से उन्होंने तो नहीं उठा लिया थैला। सबने मना कर दिया। हम हैरान थे की कौन ले गया थैला। फिर हमने अपने आपको समझने की कोशिशें करना शुरू किया, की कोई बात नहीं कोई भी ले गया होगा। चलो आज उसका पेट भर जायेगा। ये दिन आ गए की खाना भी घर के सामने से चोरी होने लगा। मैंने भी अपने आपको समझाया और सारा सामान दोबारा लेने के लिए निकल पड़ा। बेकरी से केक और नमकीन, फिर डेरी पर पनीर लेने गया और बोला भाई पैकेट चोरी हो गया है भाई फिर से पनीर पैक कर दो। दुकानदार बोला भाई चोरी नहीं हुआ होगा । कोई कुत्ता उठा ले गया होगा। मुझे यकीन नहीं हो रहा था फिर भी पनीर ले हम घर की तरफ निकले। फिर देखता क्या हूँ घर के पास केक और नमकीन का पैकेट पड़ा हुआ था। थोड़ी दूर पर ब्रेड का पैकेट भी सही सलामत पड़ा हुआ था। फिर मैं आगे का सामान ढूंढने के लिए पार्क में गया। और कुत्तों को देख की रहा था कि कही पनीर भी सही सलामत मिल जाये। कुत्तो के पास जैसे ही पंहुचा देखता क्या हूँ, एक कुत्ता अचानक मुझे देख कर भाग़ गया। उसका व्यवहार भी कुछ अलग सा था। जैसे मैं उसके पीछे गया वो और तेज़ भागने लगा। झुण्ड के पास देखा की पनीर का पैकेट चाट किया जा चूका था। पास में ही ड्राई केक का पैकेट भी खुला पड़ा हुआ था। मैं उस कुत्ते के पीछे लग लिया देखता क्या हूँ वो एक कार के पीछे चुप गया। मैंने उससे पूछा क्यों की चोरी। उसके पीछे गया। वो कार के गोल गोल चक्कर काटने लगी मेरे साथ । कभी मै आगे तो वो पीछे। कभी मैं  पीछे तो वो आगे। स्वाति भी घर से सारा नज़ारा देख रही थी । बाद में स्वाति ने बताया वो कुत्ता नहीं कुतिया थी और उम्मीद से थी।
यह जानकर दिल को सकूँ मिला की चलो खाना किसी जरुरत मंद के काम आया। व्यर्थ नहीं गया।