आज महिला दिवस है , आप सभी महिलाओ को मेरी तरफ से इसकी ढेर सारी बधाई,
मैं अक्सर अपने आपसे पूछता हूँ क्या महिलाए पूजनीय है, क्या हमें उनकी पूजा करनी चाहिए।
फिर अंदर से एक जवाब आता है नहीं !!!
वो पूजनीय तो बिल्कुल भी नहीं है। हम उन्हें देवी कह कर उन्हें महान नहीं बना सकते।
मेरे जीवन में अलग अलग पड़ाव पर अलग अलग महिलाओ का प्रभाव रहा है।
माँ......
- जब मैं छोटा था तो मेरी माँ ने मुझे जो ममता दी, उससे क्या मैं अपनी माँ को देवी की उपाधि दे सकता हूँ। एक तरफ मेरा यह मन करता है कि हाँ मैं उसे देवी की उपाधि दे सकता हूँ , पर दूसरा मन ये बोलता है नहीं !!!!! वो कोई देवी नहीं सिर्फ मेरी माँ है और कुछ भी नहीं। देवी बना दूँ तो उससे झगडूंगा कैसे। जिद कैसे करूँगा। नाराज़ तो कभी कर ही नहीं पाउँगा तो मनाऊंगा कैसे।
बहन....
- थोड़ा बड़ा हुआ तो जीवन पर बड़ी बहन का प्रभाव बढ़ा, उसने जो कहा वो करता गया और सफलता पायी जीवन में। तो क्या मैं उसे देवी का दर्ज दूँ, फिर वही आवाज़ आती है नहीं !!! बचपन में दीदी ने बहुत पीटा है, मुझे। मैंने उसे देवी बना दिया तो मेरी बहन नहीं रहेगी। रोज़ उसकी पूजा नहीं कर सकता सिवाए रक्षाबंधन के दिन ।
दोस्त .....
- दोस्त तो सिर्फ दोस्त होते है। उन्हें क्या देवी स्वरूप समझना। जीवन का नगीना है दोस्त। सुख दुख सबकुछ तो साझा करते है।
पत्नी.....
- वो तो देवी बिल्कुल भी नहीं है। वो तो मेरी प्रिया है। जीवन को एक उद्देश्य देने वाली है। देवी नहीं ।
बेटी....
- अगर बेटी को देवी बना दिया तो उसका पालन कैसे करूँगा। देवी से हम हमेशा कुछ मांगते है पर बेटी को तो सबकुछ देते है।
मेरे जीवन में जितनी भी महिलाएं है उनमें से सिर्फ मेरी माँ देवत्व के सबसे करीब है। बाकी कोई नहीं।
बाकियो को महिलाये रहने देते है और अपने बराबर ही समझते है। वो हम जैसे ही थोड़ी सीधी, सच्ची, कुटिल और बेईमान है।
कोई माने या न माने इन सबमे हमारे जीवन को सुखी और खूबसूरत बनाने की शक्ति जरूर है।
अच्छा है
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