Saturday, December 16, 2023

मृतुभोज और रिश्तेदार



 शहर से दूर किसी कस्बे में तीन भाई- बहन अपनी माँ के साथ खुशहाल ज़िन्दगी जी रहे थे।  पिता लंबी बीमारी के चलते पहले ही जा चुके थे।  पिता के जाने के बाद  माँ ने तीनों को संभाला, और तीनो ने माँ को। 

एक दिन माँ की अचानक तबियत खराब हो जाने के कारण, जब तीनो माँ को लेकर डॉक्टर के पास गए तो पता चला कि उन्हें एक अनुवांशिक बीमारी है। जिससे उनकी किडनी खराब हो गयी है, जो कभी ठीक नही हो सकती। 

इलाज के लिए तीनो माँ को बड़े शहर ले कर आये,  आनुवंशिकी बीमारी के कारण उनकी शारीरिक स्थिति दिन पर दिन खराब होती जा रही थी।  तीनो डॉक्टर्स  के चक्कर लगा रहे थे की उनकी किडनी की बीमारी ठीक हो सके। जहाँ भी उम्मीद की कोई किरण दिखाई देती, तब झट से तीनो दौड़ पड़ते।  

डायलिसिस के लिए तीनो रोज़ चक्कर लगते की जहाँ भी अच्छे से हो जाये, बस करा दे।  इलाज में पैसे पानी की तरह बह रहे थे, आर्थिक इस्थिति अच्छी ना होने के बाद भी हर संभव प्रयाश कर रहे थे की माँ को अच्छे से अच्छा इलाज मिल जाये।  कोशिश करते करते वो माँ को लेकर तीनो पी.जी.आई पहुंचे।  रिश्तेदारों को पता लगा तो एक एक कर के आए और अपनी व्यहारिकता पूरी करते हुए अपने घर को वापस निकल लिए।  किसी ने उनसे आर्थिक सहयोग के बारे में कुछ नहीं किया। फिर भी तीनो ने पैसो का जुगाड़ कर, माँ का हर सम्भव इलाज कराया।

माँ का संघर्ष काफी दिन चला, और कुछ सगे रिश्तेदार जो उनके घर के आस पास ही रहते थे वो आये ही नही मिलने ।  
अस्पताल में माँ के अंतिम सांस लेने के बाद, तीनो अपने आपको ठगा महसूस कर रहे थे, की इतनी मेहनत के बाद भी, उन्हें बचा नहीं पाए।  

अंतिम विदाई के लिए उन्हें उनके निवास पर ले जाने का इंतज़ाम किया गया। माँ को लेकर सब देर रात घर पहुंचे।  रिश्तेदारों ने अंतिम विदाई का इंतज़ाम पहले से कर रखा था।  पूरा कार्यक्रम ठीक से निपटा।  शोक में डूबे तीनो इस हालत में नहीं थे की कुछ बात कर सके।  

 दिन बीतने के बाद रिश्तेदारों ने मृत्युभोज की बात करने के लिए तीनो के पास गए, पर तीनो ने आर्थिक इस्थिति अच्छी ना होने के कारण मृत्युभोज की जगह शांति पाठ के लिए प्रस्ताव दिया, पर परंपरा के नाम पर रिश्तेदारों  ने मृत्युभोज करने की ही बात कही, और बोला की तुम जितना कर सकते हो आर्थिक सहयोग करो बाकि हम मिलकर इंतज़ाम कर लेंगे।  

सहयोग मिलने पर तीनो तैयार हो गए, यह भी कार्यक्रम ठीक से निपटा। भोज करने बहुत कम लोग आए। मुझे भी समझ नही आ रहा था कि कोई परिजन शोक में हो और उस शोक में वह सबको अपने घर भोज पर बुलाये, जो पैसा इलाज पर खर्च किया जा सकता था वह दावत में खर्च हुआ। खाना इतना बना था की रेलवे स्टेशन और बस स्टेशन जाकर ज़रूरत मंदों को बाटना पड़ा।  फिर भी खाना बच गया।  बासी खाना कौन खाता है, सो वह फेकना पड़ा। 

सबसे विकट इस्थिति तो ब्राम्हण भोज में थी, दान के लिए ऐसे बहस कर रहे थे जैसे किसी शादी समाहरोह के बाद हिजड़े आते है और नेग के लिए मोल तोल करते है। 

जो भी रिश्तेदार शोकाकुल से मिलने आये थे और रिश्तेदारों के सहियोग की बात सुन बहुत प्रसन्न थे पर मेरे मन में एक बात अंदर अंदर खटक रही थी, की इलाज में किसी ने भी आर्थिक सहियोग नही किया पर मृतुभोज के लिए सब तैयार हो गए।

कुछ दिन बीते, तीनों अपने आपको संहलते हुए आगे बढ़ रहे थे कि एक दिन रिश्तेदारों ने उन्हें बुलाया और बिल पकड़ा दिया। तीनो बिल देख समझ नही पा रहे थे कि यह क्या है?
तभी एक सज्जन व्यक्ति बोलते है कि मृतुभोज करने के लिए हमने उधार दिया था दान नही। 

रिस्तेदारो में से एक ने बोला, इतना खर्च हुआ है मृतुभोज पर कृपया इसका भुकतान कर दे हमे आगे की उधारी चुकानी है। तीनो समझ नही पा रहे थे कि क्या किया जाए। सहियोग उधार नही होता है, रिश्तेदारों को समझाने के बाद भी राशि का भुकतान जल्दी से जल्दी करने पर अडिग रहे । 

तीनो अपने आपको ठगा महसूसकर रहे थे। इलाज में कोई सामने नही आया। देखने भी नही आया पर स्वर्गवास के बाद सब आये। जिसने जो भी सहयोग किया वह भी उधार था। 

समाज मे कुछ रिश्तेदार आपके सही वक्त पर सही घाव दे जाते है बस उसे बोला नही जा सकता। बस अंदर ही अंदर घुटन दे जाते है। 



Saturday, December 9, 2023

एक अनकही मौसी और मुँह का बोला मामा


साल खत्म होने को बस एक महीना ही बचा है। आफिस की एक मीटिंग में हम चर्चा कर रहे थे कि नए साल में  क्या लक्ष्य साधा जाए,  AI का प्रभाव हमारे आने वाले भविष्य पर क्या होगा, चैट जी.पी.टी और गूगल बार्ड अब हमारे जीवन का हिस्सा बनते जा रहे है और आगे आने वाले भविष्य में AI क्या परिवर्तन लाएगा, अभी इसका अंदाज़ा भी नही लगा सकते। AI अब ऐसे ऐसे काम सेकंडों में कर रहा है कि बीते कल में उसी काम में घंटो या महीनों लग रहे थे। 

चर्चा चल ही रही थी कि पापा का फ़ोन आया, मीटिंग में होने के कारण मैंने फ़ोन नही उठाया। मीटिंग खत्म होने के बाद जब मैंने उन्हें कॉल किया तो पता चला कि, हमारे नाना नानी द्वारा बनाये गए उनके घर, उनके ही रिश्तेदार जबरदस्ती कब्ज़ा कर के उसपर मकान बनाने की तैयारी कर रहे है। 

तभी हमारे दिमाग मे यह विचार आया कि हम एक वर्चुअल वर्ड में रह रहे है। दिमागी बाहुबल और शारीरिक बाहुबल में बहुत अंतर है। पढ़ लिख कर हम भविष्य बुन रहे है और कोई बिना पढ़े अतीत खाये जा रहा है और जड़े खोखली कर रहा है। 

पिता जी के अनुसार, कल हमे तड़के ही घर से ननिहाल जाना है। रात भर इसी तनाव में की कोई हमारे घर पर जबरदस्ती कब्ज़ा कर रहा है। नाना नानी उम्र भर आभाव में रह कर तिनका तिनका जोड़ कर घर बनाया, और आज उनके स्वर्गवास के बाद उनकी जमीन पर एक अनाधिकृत व्यक्ति कब्ज़ा कर रहा है। 

रात आंखों में कटी, सुबह हम तैयार होकर निकल पड़े ननिहाल। रास्ते भर हम पापा से नाना-नानी और माँ की चर्चा करते रहे। तीन-चार घंटो की यात्रा करने के बाद हम ननिहाल पहुचे। कार से उतरते ही हम देखते क्या है कि उन्होंने हमारे घर का लगभग आधा हिस्सा कब्ज़े में कर लिया है। छत डालने के पूरी तैयारी है। वक्त रहते हमे पता चल गया नही तो पूरा भी कब्ज़ा हो जाता।  माँ की बहन के पति ने पापा को फ़ोन किया था और कब्ज़े की जानकारी दी थी। 

मैंने अपनी माँ की बहन को उनके रिश्ते से कभी नही बुलाया। मेरे पैदा होने से पहले से ही हमारे परिवारों में अनबन थी। कानूनी तौर पर ननिहाल की संपत्ति, माँ के नाम पर थी और उनके जाने के बाद हम भाइयो में बटी। 
जिनके बेटे ने हमारी ननिहाल की संपत्ति पर कब्ज़ा किया था उन्हें हम मामा बुलाते है। 

पापा ने जब मामा से बात की, कि तुमने ऐसा क्यों किया। हम तो आप पर विश्वास करते थे कि मेरी संपत्ति आपके सामने कोई और कब्ज़ा नही कर सकता है। दुसरो की बात छोड़िये आप ही ने कब्जा कर लिया है। 

पुत्र मोह से ग्रसित मामा का जवाब आता है कि कभी कभी नियत में खोट आ जाता है। लोग एक दूसरे की संपत्ति कब्ज़ा कर लेते है, समझ लीजिए, वैसे ही मैंने भी कब्ज़ा कर लिया है आइये हम समझौता कर लेते है। थोड़े बहुत पैसे बनते है इस जमीन के, वह ले लीजिए और मामला खत्म करिए। 

पापा ने जवाब किया कि अगर हमे बेचना ही होता तो बरसो पहले बेच दिया होता पर यह संपत्ति बच्चो की नानी की निशानी है, यह दोनों बेचना नही चाहते है। तभी मेरी माँ की बहन आकर मामा से भिड़ जाती है कि यह संपत्ति मेरी माँ की है। हम आपस मे कितना भी लाडे यह हमारे घर का मुद्दा है। हम दोनों की लड़ता देख आपने हमारा हिस्सा की हड़प लिया। 

हम भी भवचक्के रह गए। पर बात तो सही ही कह रही थी। समय मिलने पर हमने पापा से बात की कि उन्हें भी संपत्ति में बराबर का हिस्सा दे कर अपने दिल का बोझ हल्का करो। परिवार से चर्चा कर हमने उन्हें बोला कि आधा हिस्सा तुम्हारा और आधा हमारा। 

चेहरे पर खुशी का अहसास साफ दिखाई दे रहा था। एक ही पल में मानो 47 साल की गिले शिकवे खत्म हो गए । ज़िन्दगी में पहली बार उस अनकही मौसी हो हमने मौसी कहा और पैर छुए। 

हमदोनो का समझौता देख मामा के पैरों तले जमीन खिसक गई हो हमने  ऐसा प्रतीत हो रहा था। मकान बनाने का काम रुकवाया गया। फिर शरू हुआ पुलिश और अदालत का सिलसिला।

मामा और उनका पुत्र हमसे कही आगे थे। पुलिस को पहले से ही जानकारी थी। कि क्या होने वाला है। हमारी ज़मीन को अपना बता पहले से तैयार थे। 

SDM को भी एप्लीकेशन दे कर आर्डर निकलवा लिया था। हमारे पीठ पीछे सारा खेल हो चुका था। अब हमे दर दर भटकना पड़े, इसका पूरा खेल रचा जा चुका था ।अपनी ही संपत्ति पर दावा करने के लिए सारे रास्ते पहले से ही बंद हो चुके थे। 

पुलिस और प्रशासन ने निवेदन करने पर भी कोई सुनवाई नही की। कुछ लोगो के सहयोग से हमने स्टे मिला। 
मौसी को घर छोड़ गया। उनका घर हमारे पैतृक निवास से 500 मीटर भी नही होगा, गाँव एक ही है। इतनी से दूरी तय करने में चार दशक लग गए।  माँ के जाने के बाद उनके जैसा पहली बार कोई मिला जो उनके जैसा है। जिन्हें हम ज़िन्दगी भर मामा बोलते रहे और समझते रहे, उन्होंने अपना अलग ही रंग दिखाया।


Wednesday, October 11, 2023

पत्नी का जन्मदिन

आज तुम्हारा जन्मदिन है, आज का दिन, मेरे लिए यह एक अवसर है तुम्हे बताने और जताने के लिए , की तुम मेरे लिए क्या हो। मैं हर संभव प्रयास करूँगा, जिससे तुम्हारे मुख पर मुस्कुराहट बनी रहे।  तुम्हारी मुस्कुराहट मुझे प्रतिपल यह अहसास कराती है कि ईश्वर मेरे द्वारा किये गए कर्मो से  प्रसन्न है। 
जैसे चंद्रमा, अपनी चांदनी के बिना कुछ नही, सूरज अपनी रौशनी के बिना कुछ नही। वैसे ही मैं, तुम्हारे बिना कुछ नही। 
ईश्वर तुम्हे अच्छा स्वास्थ्य प्रदान करे और तुम्हे सदैव प्रसन्नचित्त रखे। 

जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएं। 


 

Thursday, September 21, 2023

एक शायर की ग़ज़ल



रोहित को  ग़ज़लों का नया नया शौक़ चढ़ा था, दिन भर वह जगजीत सिंह जी द्वारा गायी गज़ले सुनता रहता था और  गुनगुनाता रहता था , उर्दू के लब्जो का मतलब पता हो या न हो, बस अपनी धुन में रहता था और हर सीधी बात जवाब भी घुमा कर शेरोशायरी से करता था। 

ग़ज़लों का असर रोहित पर कुछ ऐसा हुआ कि अब वह किसी से निगाहे मिलाना चाहता था।  निगाहों की तलाश उसकी निगाहे उसके साथ में पढ़ने वाली दिव्या पर जा कर टिकी, निगाहे मिलने के बाद वह उसे अपना दिल दे बैठा, अब्दुल हमीद अदम की एक ग़ज़ल जबसे उसने जगजीत सिंह जी की आवाज़ में सुनी थी तब से वह उसी ग़ज़ल के नशे में था। 

ग़ज़ल कुछ यूँ है। 

हँस के बोला करो बुलाया करो। 
आप का घर है आया जाया करो। 

मुस्कुराहट है हुस्न का ज़ेवर। 
मुस्कुराना ना भूल जाया  करो। 

हद से बढ़ कर हसीन लगते हो। 
झूटी क़स्में ज़रूर खाया करो।


दिव्या को देख कर रोहित को ना जाने कितनी गज़ले उसे एक साथ याद आ जाती थी।  

उसमे से कुछ है।  

तेरे आने की जब ख़बर महके। 
तेरी ख़ुशबू से सारा घर महके। 

तुम को हम दिल में बसा लेंगे, तुम आओ तो सही ।
सारी दुनिया से छुपा लेंगे, तुम आओ तो सही ।

रोहित अपनी मोहब्बत का इज़हार इन ग़ज़लों से करना चाहता था, पर कमबख्त दिव्या को ग़ज़लों में कोई रुचि ही नही थी। उसे गज़ले बोर करती थी और दूसरी तरफ रोहित की तो रूह बसती थी, ग़ज़लों में।  दिव्या को तो पंजाबी गाने और हनी सिंह पसंद थे और उन्ही  की भाषा भी समझती थी। ग़ज़लों में कही गयी बाते, उसे समझ ही नहीं आती थी। 

दिव्या और रोहित अच्छे दोस्त भी थे। वो अक्सर साथ बैठकर पढ़ाई करते थे, दोनों साथ लंच भी करते थे।  दिव्या अक्सर उसकी पसंदीदा सब्जी भिंडीलाती  थी। दोनों अक्सर लाईब्रेरी में साथ बैठ असैगनमेंट्स पूरा किया करते थे। दिव्या गणित में तेज़ थी और रोहित कम्प्यूटर्स में।  दोनों एक दूसरे से सीखते थे।  दिव्या के साथ रहने का वह कोई भी मौका नही छोड़ता था। रोहित दिव्या की आँखों में खो जाता था और यही गुनगुना देता। 

तेरी आँखों में हम ने क्या देखा। 
कभी क़ातिल कभी खुदा देखा। 

जब भी दिव्या कॉलेज आती तो रोहित उसे हाय नहीं बोलता था वो बोलता था।  

देखकर तुमको यकीं होता है। 
कोई इतना भी हसीं होता है। 

देख पाते हैं कहाँ हम तुमको। 
दिल कहीं होश कहीं होता है। 

दिव्या साथ चलते चलते कभी आगे बढ़ जाये, तो वह रुक कर उसे देखने लगती,  तो वह दौड़ता हुआ उसके पास आता और बोलता : 

हाए अंदाज़ तेरे रुकने का। 
वक़्त को भी रुका रुका देखा। 

कॉलेज के फेस्ट के दौरान दोनों ने साथ मे कुछ इवेंट्स में काम किया , और कुछ में भाग भी लिया। दोनों की केमिस्ट्री देखते ही बनती थी। हर जगह रोहित की आंखे बस दिव्या को ही ढूंढती रहती थी। रोहित बस एक ही काम था दिव्या के ख्यालो में दिन रात रहना और गज़ले सुनना।  सोने से पहले अक्सर रोहित ये ग़ज़ल जरूर सुनता था। 

बहुत पहले से उन क़दमों की आहट जान लेते हैं। 
तुझे ऐ ज़िंदगी हम दूर से पहचान लेते हैं। 

तबियत अपनी घबराती है जब सुनसान रातों में। 
हम ऐसे में तेरी यादों की चादर तान लेते हैं। 

दूसरी तरफ दिव्या, उसे तो कुछ समझ नही आता था कि रोहित क्या कहना चाहता है।  उसने रोहित के प्रेम भरी भावनाओ पर कभी भी कोई भी प्रतिक्रिया नही दी , हमेशा अनजान बनी  रही। जैसे कुछ जानती ही न हो। 
उसकी सुंदरता और प्रेम से भरी ग़ज़लों पर प्रतिक्रिया न पाकर अक्सर रोहित यही बोलता था।  

जान के सबकुछ कुछ न जाने
हैं कितने अनजाने लोग। 


रोहित का मानना था की मोहब्बत की ज़ुबान नहीं होती है , इसे निगाहों  से बयां किया जाता है।  

कौन कहता है मुहब्बत की ज़ुबाँ होती है
ये हक़ीक़त तो निगाहों से बयाँ होती है

रोहित  सीधे सीधे मोहब्बत का इज़हार करना, अपनी मोहब्बत की तौहीन समझता, वो चाहता था कि दिव्या उसकी भावनाओं को खुद ही समझे और उसकी हमेशा उसके साथ रहे। 

एक दिन रोहित का जन्मदिन था। जिसके बारे में सिर्फ दिव्या को ही पता था। रात 12 बजे फ़ोन की घंटी बजती है और उधर से  दिव्या जन्मदिन की ढेरों बधाईयां देती है। रोहित का यह सबसे खूबसूरत पल था। उसकी रात आँखों में कटी,  अगली सुबह रोहित जब कॉलेज आया तो दिव्या बाहर ही उसका इंतजार करती मिल गयी, दिव्या ने रोहित को जन्मदिन की ढेरो बधाइयाँ  फिर से  दी। रोहित बैग भर के टॉफियाँ लाया था, क्लास में बांटने के लिए। 

दोनों क्लास में घुसे और दिव्या ने पूरी क्लास को रोहित के बर्थडे के बारे में बताया, फिर शरू हुआ बर्थडे का जश्न। तभी टीचर का क्लास में आना हुआ, सब शांत होकर अपनी सीट पर बैठ गए, दोनों क्लास में सबसे पीछे जा बैठे, चलती क्लास ने टॉफियाँ पास की जा रही थी, टीचर को भनक भी नही लगी  की क्या हो रहा है। टॉफियों के साथ साथ एक पेपर भी घूम रहा था। सबने उस पर रोहित को जन्मदिन की बधाइयाँ लिख रहे थे।  जैसे ही वो पेपर सबसे आगे बैठी निधि के हाथ लगा तब तक टीचर ने पूछा। क्या हो रहा है यह?  पेपर अपने हाथ में उठाया और मुस्कुरा दिए।  लास्ट में उन्होंने भी शुभकामनाये लिखीं , पेपर रोहित को बुलाकर उसे पकड़ा दिया।  

टीचर के जाते ही  शोर शरू हुआ। लंच पार्टी के लिए सब कैंटीन में इकट्ठा हुए, बबलू भाई के परांठे, प्लेट में सजाएं गए, परांठे बनाने की स्पीड और खाने की स्पीड में ज़मीन और आसमान का अंतर था। पराठे आते और गुम हो जाते। खूब मज़ा आया पार्टी में। पूरे दिन दिव्या रोहित के साथ रही, देर शाम तक दोनों साथ रहे है।  

घर जाने से पहले रोहित बार बार यही गुनगुना रहा था।  

एक वादा करो अब हम से न बिछड़ोगे कभी। 
नाज़ हम सारे उठा लेंगे तुम आओ तो सही। 

उस दिन के बाद क्लास के लोगो को लगने लगा कि दोनों के बीच मे कुछ चक्कर है , जब यह बात रोहित को पता लगी तो वह बहुत खुश था, कि उसका नाम दिव्या से जुड़ा। मन की मन रोहित दिन भर  इस  ग़ज़ल की इन लाइनों को गुनगुना रहा था।  

क्या जाने किस अदा से लिया तू ने मेरा नाम। 
दुनिया समझ रही है कि सब-कुछ तेरा हूँ मैं। 

शफ़क़, धनुक, महताब, घटाएँ, तारे, नग़मे, बिजली, फूल। 
उस दामन में क्या कुछ है, वो दामन हाथ में आए तो। 

दिव्या के व्यव्हार में कोई परिवर्तन ही नही आया था, रोहित के साथ नाम जुड़ने पर वह सिर्फ खामोश रही । दिन यूँ ही बीत रहे थे, इम्तेहान आये और चले गए। कॉलेज की लम्बी छुट्टियाँ हुई। सब कुछ दिनों के लिए बिछड़ गए , दिव्या को छुट्टियों की शुभकामनाऐ देकर कर रोहित निकल पड़ा, यह गुनगुनाते हुए। 

थक गया मैं करते करते याद तुझ को। 
अब तुझे मैं याद आना चाहता हूँ। 

छुट्टियों के बीच में ही प्रथम वर्ष का रिजल्ट आया।  विकास ने क्लास में टॉप किया था।  दिव्या चौथे नंबर पर थी।  रोहित के नंबर्स तो ठीक थे  पर टॉपर्स की लिस्ट में नहीं था। रोहित खुश था अपने नम्बरों से। वह तो पढ़ाई के साथ साथ ज़िन्दगी भी जी रहा था। 

छुट्टियाँ खत्म हुई, रोहित ने कुछ दिनों के बाद कॉलेज जॉइन किया। कॉलेज में घुसते ही वह दिव्या को ढूंढने लगा, पर दिव्या तो क्लास में थी ही नही। दोस्तो ने बताया कि वह कॉलेज तो आयी है, पर क्लास में नही है।  रोहित ने दिव्या को ढूंढता हुआ कॉलेज की कैंटीन में जा पहुँचा। तो वह देखता क्या है। 

दिव्या विकास के साथ बैठी थी, ख़ामोशी से, रोहित भी चाय और समोसा लेकर उन्ही के पास जा कर बैठ गया। दिव्या और विकास दोनों अपनी बातों में इतना व्यस्त थे कि उन्हें अहसास ही नही हुआ कि रोहित पास आ कर बैठ गया है। 

दोनों आपस में अपनी अपनी पसंदीदा चीज़ों की चर्चा कर रहे थे। तभी दिव्या बोलती है कि मेरा पसंदीदा एक्टर जॉन अब्राहिम है, उसका एक्शन और उसकी बॉडी मुझे बहुत पसंद है। रोहित जो कि पास ही बैठा था और बोला

मैं जॉन अब्राहम जैसा लगता हूँ न। 

तभी पूरी कैंटीन में बैठे सरे लोग हँसने लगे , पूरा माहौल ही बदल गया। सब रोहित को ही देख रहे थे। दिव्या ने रोहित को देखा और मुस्कुरा दी । दिव्या के आँखों में जो चमक पहले दिखती थी अब वह दिख नहीं रही थी।  उसके बाद दिव्या ने मानो रोहित को इग्नोर कर, वह विकास से साथ चली गयी। रोहित आचंभित रह गया। उसे समझ नहीं आ रहा था की क्या हुआ।  फिर उसके मुँह से अचानक निकल गया।  

किया है प्यार जिसे हम ने ज़िंदगी की तरह। 
वो आश्ना भी मिला हम से अजनबी की तरह। 

बढ़ा के प्यास मेरी  उस ने हाथ छोड़ दिया। 
वो कर रहा था मुरव्वत भी दिल-लगी की तरह। 

रोहित उठा और क्लास में जा बैठा। दिव्या ने कोई क्लास नही की,दोनों की ठीक से बात भी नही हुई ,देर शाम वह अपने घर जाती हुई दिखी।

दिव्या अक्सर क्लास से गायब ही रहती थी, और कभी आती भी थी तो विकास के साथ ही बैठती थी। रोहित से दिव्या की बात अब ना के बराबर होती थी और गलती से भी उसकी नज़र मिल भी जाये तो निगाहे पलट लेती थी।
गुस्से में रोहित के मुँह से निकल गया।

हम को दुश्मन की निगाहों से न देखा कीजिये।
प्यार ही प्यार हैं हम, हम पे भरोसा कीजिये।


कुछ दिनों के बाद रोहित को पता लगा कि विकास ने दिव्या को अपना प्रेम प्रस्ताव भेजा है और दिव्या ने उसे स्वीकार भी कर लिया है। रोहित को कुछ समझ नही आ रहा था कि वह क्या करे? दिव्या से बात करने की बहुत कोशिश की पर बात न हो पाई,  दो दिन उसने  ग़म में बिताए,  उसका उतरा  हुआ चेहरा देख उसकी बड़ी बहन ने बोला, लड़कियों को सब पता होता है कि कौन किस निगाह से देख रहा है। उन्हें कोई प्यार करता है इसका अंदाज़ा हो जाता है, कोई किसी पर अपना प्रेम थोप नही सकता है। तभी दीदी ने उसे इस ग़ज़ल से उसे समझाया। 

जिस की आवाज़ में सिलवट हो निगाहों में शिकन।

ऐसी तस्वीर के टुकड़े नहीं जोड़ा करते।

लग के साहिल से जो बहता है उसे बहने दो।

ऐसे दरिया का कभी रुख़ नहीं मोड़ा करते।

जागने पर भी नहीं आँख से गिरतीं किर्चें।

इस तरह ख़्वाबों से आँखें नहीं फोड़ा करते।

शहद जीने का मिला करता है थोड़ा थोड़ा।

जाने वालों के लिए दिल नहीं थोड़ा करते।


अगर दिव्या, विकास से प्रेम करती है तो वह कुछ नही कर सकता। किसी को चाहना तो उसके बस में है पर किसी से प्रेम करवाना उसके बस में नही। अब रोहित ग़म से भरी गज़ले सुनाता था।  

सदमा तो है मुझे भी कि तुझसे जुदा हूँ मैं। 
लेकिन ये सोचता हूँ कि अब तेरा क्या हूँ मैं। 

सितम तो ये है कि वो भी न बन सका अपना। 
क़ुबूल हम ने किए जिस के ग़म ख़ुशी की तरह। 

दीदी के कहने पर रोहित, सामान्य जीवन जीने की कोशिश करने लगा। किसी हद तक वो सफल भी हो रहा था। जब आप किसी से प्रेम करे तब उसके साथ आपके रिश्ते सामान्य नही रहते, विशेष हो जाते है। 

ग़मज़दा रहने की जगह उसने ज़िन्दगी को चुना।  

फिर भी अपने आपको सामान्य रखते हुए, कॉलेज के सुनहरे दिन बीत रहे थे। दिव्या अब विकास की हो चुकी थी, उनके प्रेम की चर्चा हर तरफ थी । जिसे भी देखो उन्ही कें चक्कर पर चर्चा में व्यस्त था। 

डेट पर जाने की कौन कौन सी जगहे ठीक है , यह चर्चा भीसामान्य थी।  रोहित, विकास से जब भी मिला, तो उसे यह अहसास ही नहीं होने देता की वो दिव्या से प्रेम करता है।  अब रोहित, दिव्या जब भी मिलता तो उसे गज़ले नहीं सुनाता था।  कुछ ही शब्दों में बात पूरी हो जाती थी।  

इसी आपाधापी में 3 बरस कैसे बीत गए पता ही नही चला। तभी कॉलेज खत्म होने को आया। आखिरी एग्जाम  दिया सबने। एक दूसरे को विदाई दी और सभी संपर्क में रहेंगे यह वादा किया।   दिव्या अपने ही रंग में झूमती लहराती हुई कॉलेज से बाहर जा रही थी। थोड़ी ही दूर विकास अपने दोस्तो से बात कर रहा था। 

तभी मेरे ही कॉलेज का एक लड़का अपने हाथो में गुलाबो का गुलदस्ता  लिए उसकी तरफ बढ़ा चला आ रहा था। जैसे ही वह दिव्या के पास पहुँचा, गुलदस्ता दिव्या की तरफ बढ़ा दिया और अपने प्रेम का इज़हार करने लगा। विकास भी दूर से सब देख रहा था, पर कुछ कर नहीं रहा था।  

दिव्या सहम गई, और उसने गुलदस्ता लेने से मना कर दिया, और आगे बढ़ गयी। थोड़ी दूर और चली तो उसे किसी और लड़के ने अपना प्रेम प्रस्ताव दिया वही गुलदस्ता देखर। दिव्या कुछ और सहम गयी, वह इधर उधर देख रही थी मानो वो विकास को ढूंढ रही हो, पर विकास दूर खड़ा सब देख रहा था। कॉलेज से बाहर निकलते निकलते उसे 5 प्रेम प्रस्ताव मिल चुके थे। पांचो विकास के परम मित्रो में थे।  



तभी दिव्या की नज़र रोहित की तरफ भी गयी, रोहित खामोशी से सब देख रहा था। दिव्या की आंखे आंसुओ से भर गई थी। रोहित का मन किया उसे अपने बाहों में भर ले और उसे इन सबसे दूर ले जाये। 

किस किस का नाम लाऊँ ज़बाँ पर कि तेरे साथ। 
हर रोज़ एक शख़्स नया देखता हूँ मैं। 

पहुँचा जो तेरे दर पे तो महसूस ये हुआ। 
लम्बी सी एक क़तार में जैसे खड़ा हूँ मैं। 

कॉलेज खत्म हुआ, डिग्री लेने हम सब दोबारा कॉलेज में इकट्ठा हुए। रोहित की आंखे दिव्या को ढूंढ रही थी कि उसे एक बार और देख ले। पर वो कही नही थी, तभी किसी ने बताया कि अब विकास और दिव्या में ब्रेकअप हो गया है। विकास ने दिव्य को बोला है कि उन दोनों का रिश्ता सिर्फ कॉलेज तक ही था। विकास ने दिव्या को बोला कि उसके घरवाले दिव्या को कभी भी स्वीकार नही करेंगे। इसलिए अब दोनों के रास्ते अलग अलग है। 

इतना सब होने के बाद दिव्या गुम हो गयी। वह फिर कभी दिखाई नही दी, ना किसी सोसल मीडिया पर और ना ही कभी अपने घर पर। उसके साथ बाद में क्या हुआ, कभी पता नही लगा। बरसो बाद रियूनियन में भी उसकी कोई खबर नही थी। 

सब अपनी ज़िंदगी मे व्यस्त हो गए, रोहित अब एक बड़ी कंपनी में काम करने लगा था, वह अपने माँ बाप के साथ एक बड़े शहर में रहने लगा था। एक  स्टैंड उप कॉल  उसे पता लगा कि अमरीका में उसकी कंपनी में उसके प्रोजेक्ट में एक लड़की ने जॉइन किया है उसका नाम दिव्या है। 

टीम कॉल पर जब वो अपना इंट्रोडक्शन दे रही थी तो रोहित को उसकी आवाज़ कुछ जानी पहचानी सी लगी। वीडियो कॉल तो थी नही की वह झट से पहचान लेता, तो रोहित ने इग्नोर कर दिया, दूसरे दिन जब कॉल हुई तो बात थोड़ी और हुई, रोहित को शक होने लगा कि कही ये वो तो नही, तभी ने दिव्या को कॉल रिक्वेस्ट भेजी, दिव्य कॉल पर जैसे ही आयी रोहित ने उसे पूछा कि तुम इस कॉलेज से हो?
दिव्या के हाँ कहते ही रोहित ने झट से बोला कि वो रोहित है। उसका क्लास मेट। 

दिव्या भी पहचान गयी, फिर दोनों में पर्सनल नंबर पर बात होना शरू हुई, तब दिव्या ने बताया कि कॉलेज खत्म होने के बाद अमेरिका आ गयी यही। यही उसने जॉब करना शरू कर दिया था। विकास से ब्रेकअप के बाद वह टूट गयी थी, उसके अपने घरवालों को पूरी बात बताई थी, उसके पापा ने उसका हौसला बढ़ाया और अमरीका में अपने भाई के पास भेज दिया। तबसे वह यही रह रही है। 

कुछ दिन बाद रोहित को मौका मिला अमरीका जाने का, रोहित के अंदर दिव्या मिलने की इच्छा चरम पर थी। वह उससे मिलने चाहता था पर इस बार वह सामान्य रहकर मिलना चाहता था। अब नही चाहता था कि उससे मिलकर वो फिर से ग़ज़लों में बात करे। 

वह घंटो का सफर तय कर अमरीका पहुचा, दिव्या उसे लेने एयरपोर्ट पर आई थी। दिव्या को देख कर अंदर ही अंदर रोहित खुश तो बहुत था पर चेहरे पर कोई भाव नही आने देना चाह रहा था। दिव्या ने उसे होटल में छोड़ा और अपने घर चली गयी। 
दूसरे दिन दोनों आफिस में मिले, दोनों एक ही टीम में थे, तो पास ही बैठे। ऑफिस में तो मौका नही मिलता था पर्सनल बात करने को, दिव्या घर जाते उसे होटल छोड़ दिया करती थी। धीरे धीरे दोनों एक दूसरे के साथ फिर से सहज होने लगे थे। वीकेंड में अक्सर दिव्या उसे शहर घुमाती थी। और वीक डेज में दोनों साथ काम करते थी। 

दिव्या ने एक दिन रोहित से बोला कि अब तुम पहले जैसे नही रहे, स्मार्ट हो गए हो। अब तुम गज़ले भी नही सुनते हो, तुम्हारे काम की चर्चा यहां बहुत होती है। सारे मैनेजर तुम्हारे फैन है। दिव्या ने रोहित के तारीफों के पुल बांध दिए। 

रोहित को अहसास हो रहा था कि अब दिव्या में उसके लिए कुछ प्रेम भाव बढ़ रहा है।

ऐसे ही किसी वीकेंड में रोहित ने हिम्मत जुटा कर दिव्या से  पूछ ही लिया कि,

क्या उसे पता था कि वह उससे प्यार करता था?
गज़ले क्या सच मे उसे समझ नही आती थी? 
उसकी तरफ से क्या कभी भी कुछ नही था?

दिव्या इस विषय पर बात नहीं करना चाहती थी, बात को टाल वह घर वापस चली गयी।  एक वीकेंड फिर वो मिली तब रोहित ने बोला की आज नहीं तो कल मेरे प्रश्नो का जवाब देना ही पड़ेगा। 

तभी दिव्या बोलती है कि उसे सब पता था, की वह उससे प्यार करता था। उसे प्यार जताने का अंदाज़ पसंद तो था,  पर वो आउटडेटेड था। सिर्फ प्यार से ज़िन्दगी नहीं कटती है, तुम एक एवरेज लड़के थे, तुमसे मुझे प्यार मिलता और बस प्यार ही मिलता।  विकास में सबकुछ था, वह टॉपपर होने के साथ साथ एक संपन्न परिवार से भी था। ज़िन्दगी को लेकर उसके भी कुछ ख्वाब थे , वो सिर्फ विकास ही पूरा कर सकता था न की तुम।  

फिर दिव्या बोलती है : विकास ने जब टॉप करने  के बाद वह उसे पसंद करने लगी थी। छुट्टियों के बाद जब हम कॉलेज वापस आये तो ज़यादा लोग नहीं थे क्लास में।  उसी दौरान विकास में मेरी बाते होना शरू हुई थी और नज़दीक आए ।   विकास ने नही, उसने खुद ही विकास को प्रपोज किया था, फिर कुछ दिन बाद उसने एक्सेप्ट कर लिया था। हमने अपने सुख दुःख साझा किये।  ताउम्र साथ रहने की कसमें खाई।  मैंने तो अपने घर में भी बता दिया था की हम एक दूसरे को पसंद करते है और उम्र साथ बिताने का फैसला किया।  विकास के बारे में जानकर मेरे पिता जी भी रिश्ते के लिए राज़ी हो गए थे।  

फिर अचानक एग्जाम के आखिरी दिन क्या हुआ पता नहीं।  उसके साथ के सरे लोगो ने उसे एक एक कर प्रोपोज़ किया।  विकास बस देखता ही रहा मुझे रोता हुआ देख मेरे पास नहीं आया मुझे संभालने।  मैं रोते हुए वहां से निकली।  मैंने तुम्हे भी देखा था, तुम्हारे अंदर का गुस्सा समझ सकती थी।  

रास्ते भर मै विकास को फ़ोन करती रही पर उसने फ़ोन नहीं उठाया।  ना ही दोबारा फ़ोन किया उठाया।  मैंने जब यह बात अपने माता पिता को बताई तो उन्होंने मुझे संभाला और कहा की तुम आगे अपनी ज़िन्दगी अमेरिका में गुज़ारो अपने चाचा  चाची के साथ।  फिर मै अमेरिका आ गयी।  तब से यही हूँ।  


रोहित चुपचाप सब सुनता रहा।  जब दिव्या की बात पूरी  हुई, तो दिव्या देखती क्या है, रोहित की आंखे आंसुओ से भरी थी, पर वह कुछ बोल नहीं रहा था, दिव्या बोली अब तुम पुराने रोहित नहीं रहे, बदल चुके हो।  आंखेमलता  हुआ रोहित उठा और वहां से चला गया। 

रोहित ने अगले ही दिन भारत की टिकट कराई और वापस आ गया।  दिव्या उसे कॉल करती रही पर उसने नहीं उठाया।  घर आकर रोहित ने अपने माँ बाप से उसके लिए रिश्ता ढूंढने की बात कही और बोला की अब वह तैयार है नयी ज़िन्दगी के लिए।  

रोहित भारत आते ही नयी नौकरी की तलाश में जुट गया और कुछ दिनों क बाद उसे मिल भी गयी।  शादी की तैयारियाँ ज़ोरो पर थी, जिस लड़की से उसकी शादी तय हुई थी उसे वह पहले से नहीं जानता था। वह उसके पापा के दोस्त के भाई की बेटी थी। उसका नाम रोहिणी था। सगाई होने के बाद दोनों की बात  होना शरू हुई थी।  वह भी एक टीचर थी, शहर के बड़े स्कूल में पढ़ाती  थी। ज़िन्दगी से उसे ज़्यादा चाहते नहीं थी, वह बस प्रेम और शांति से भरी ज़िन्दगी जीना चाहती थी।  

 शादी की तैयारियों के बीच एक दिन रोहित के दरवाज़े की घंटी बजती है और बड़ी बहन आकर रोहित को बोलती है की दिव्या आयी है उमसे मिलने, दरवाज़े पर ही खड़ी है।  

रोहित चौंक  जाता है,  और बोलता है दिव्या आयी है , कौन दिव्या ?
बहन बोलती है कितनी दिव्या को तुम जानते हो। 

रोहित दरवाज़े की तरफ जाता है और बोलता है की तुम ?

तभी दिव्या बोलती है तुम बिना बताये अचानक भारत आ गए, उसके बाद तुमने कभी मुझसे बात ही नहीं की।  मैंने सोंचा खुद जा कर देखती हम क्या हाल है तुम्हारा।  रोहित दिव्या को घर के अंदर बुलाता है पर हो अंदर नहीं आती है।  बोलती है मुझे तुमसे कुछ बात करनी है थोड़ा वाक पर चले।  

रोहित बोलता है अभी ?
दिव्या : हाँ अभी नहीं तो कभी नहीं। 

घर में  बता कर दोनों बहार  निकल पड़ते है।  

थोड़ी दूर चलने के बाद दिव्या , रोहित से बोलती है, उसने उसके साथ जो कुछ भी किया वह उसके लिए माफ़ी मांगती है। तुम्हारा प्यार समझ कर भी मै नासमझ  बानी रही।  तुम्हे जो कुछ भी तकलीफ हुई है उसके लिए मुझे माफ़ कर दो।  

जब से तुम अमरीका से वापस आये हो तब से मै तुम्हारे बारे में ही सोंच रही हूँ।  दिन रात बस तुम्हारे बारे में सोंचती रहती हूँ। अब मुझे तुमसे प्यार हो गया है, मै अब तुम्हारी बन कर रहूंगी। आज मुझे अहसास हुआ है की तुम्हे कितनी तकलीफ हुई होगी जब मैंने तुमसे अजनबियों जैसा व्यवहार किया था।  पर अब मै बदल गयी हूँ।  पुरानी दिव्या मर चुकी है।  अब मुझे तुमसे प्यार है, बस तुम मेरे हो जाओ। 

तभी रोहित के कानो में रोहित -रोहित की आवाज़ उसके कानो में पड़ती है।   जैसे कोई उसे दूर से बुला रहा हो।  जैसे ही रोहित पीछे मूड़ कर देखता है, गोल चश्मा पहने उसकी मंगेतर रोहिणी भागते हुए उसकी तरफ आ रही है। पास आते ही रोहित उसे अपनी बाहों  में भर ले लेता है।  रोहिणी दिव्या को देखकर उसे पहचान जाती है और उसे उसके नाम से बुलाती है।  रोहिणी उसे अपनी शादी में शामिल होने का इनविटेशन देती है।  

फिर रोहित रोहिणी के साथ निकल जाता है अपनी नयी ज़िन्दगी से साथ नए रंग भरने को।   

चलो बाँट लेते हैं अपनी सज़ाएं। 
ना तुम याद आओ ना हम याद आएं।  

सभी ने लगाया है चेहरे पे चेहरा। 
किसे याद रखें किसे भूल जाएं। 

Tuesday, August 8, 2023

श्राद्ध- माता का

धीरे धीरे करके न जाने कब 2 बरस बीत गए, माँ का स्वर्गवास हुए, पता ही नही चला। माँ जब भी सपनो में आती है, ऐसा लगता है, माँ पास ही है,  बस मैं ही कही दूर रह रहा हूँ। माँ के होने के अहसास भर से, न जाने कितना सुरक्षित महसूस करता हूँ, शब्दो मे बयान करना नामुमकिन है। 

स्वाति के मायके जाने पर जब मैं अकेला घर पर होता हूँ तो अब कोई नही पूछता की कुछ खाया की नही।

इस बार के श्रद्धा अक्टूबर में पड़ रहे है, धर्म के हिसाब से अपने पूर्वजों को श्रद्धांजलि देने का सबसे उचित काल होता है, पर इस बार का श्राद्ध कुछ अलग सा होगा। कोई नही होगा माँ को भोजन परोसने के लिए। 

सुनते थे कि माँ को बच्चे भूल जाते है, पर यहां कहानी ही कुछ और है, पति ही अपनी पत्नी को भूल पर हिमालय की कंदराओं में जा रहे है। 

नियम बनाने वालों पर कोई नियम लागू नही होते है। बस कमज़ोरों और मासूमो पर की नियम थोपे जाते है। 

बटरफ्लाई इफ़ेक्ट के बारे में सुना था। आज हम जो कुछ भी कर रहे है उसकी वजह से दुनिया मे कभी न कभी, तूफान आता है। 

आज का किया कभी किसी रोज़ सामने आएगा। तब इन्ही नियमो की दुहाई दी जाएगी, सब जनता हूँ। 



Wednesday, June 28, 2023

गुंजा एक प्रेम कहानी -1

साधारण सा दिखने वाला, असाधारण सा एक लड़का, जो मोहब्बत के जज्बात दिल मे लिए, एक कॉलेज में दाखिल होता है। वो एक लड़की जिसे वो मन ही मन बहुत प्यार करता था, जिसको पाने के लिए कुछ भी कर गुजरने को तैयार था, वो लड़का, उसका पीछा करते हुए, घर से मीलो दूर किसी अनजान शहर के एक कॉलेज तक आ पहुँचा और उसी क्लास में प्रवेश लेता है जिसमे वो पढ़ा करती थी।

इश्क का जज़्बा इतना कि क्लास के हर लड़के को, ये बता बैठा की वो उस लड़की पर मरता है, उसे दिलोजान से चाहता है और क्लास के हर लड़के की वो भाभी है, सब उसे भाभी की नज़र से ही देखे न कि अपनी संभावित प्रियसी के रूप में।

वो लड़का जो  एक लड़की का पीछा करते हुए आया था उसका नाम अमित था और वो लड़की जिसका पीछा करते हुए अमित आया था उसका नाम प्रज्ञा था।
क्लास के ज़्यादातर लड़के प्रज्ञा को अमित के सामने भाभी ही बुलाते थे और वो बड़ा खुश होता था। वो धीरे-धीरे पूरे कॉलेज में उसके प्रेम के चर्चे होने लगी, वो प्रेम का ब्रांड एंबेसडर बन गया।पूरे कॉलेज में, उसके प्रेम के कसीदे सुनाए जाते थे ।

वीकेंड की एक रात, जब हॉस्टल के सारे लड़के इकठ्ठा थे और माहौल पूरी तरह गर्म था.. जश्न में सब सराबोर थे तभी कुछ लोगो ने अमित से बोला की, तुम जब उसे, इतना प्यार करते हो और  हमेशा बस उसके बारे में सोंचते हो, उसके बारे में बात करते हो, उसी को जीते हो और उसी पर मरते हो, तो तुम उससे अपनी मोहब्बत का इज़हार क्यों नही करते?? जाकर उसे अपने दिल का हाल क्यों नही सुनाते?? जाओ और बोल दो जो कुछ भी ज़ज्बात है तुम्हारे अंदर उसके लिए, फिर अमित शर्माते हुए बोला, कि वो कहना तो बहुत कुछ चाहता है उससे, पर कह नही सकता,  वो दुनिया मे बस एक ही चीज़ से डरता है। वो है प्रज्ञा के इनकार से, अगर उसने गलती से भी इनकार कर दिया तो शायद, वो इस दुनिया से रुखसती ले लेगा।

सबने अमित का हौसला बढ़ाया, उसे दुनिया भर की कसमें खिलाई गई और कुछ ने बोला कि यदि तुम मर्द हो, तो प्रज्ञा को प्रोपोज़ कर के दिखाओ। मर्द की बात सुन, अमित ने फ़ोन उठाया और प्रज्ञा को फ़ोन मिलाया, फ़ोन करते समय अमित के हाथ कांप रहे थे और चेहरे पर घबराहट साफ नजर आ रही थी, फ़ोन की घंटी बजी और प्रज्ञा ने फ़ोन उठाया, उधर से एक आवाज़ आयी, हाय अमित, बोलो क्या बात है??  इतनी देर रात फ़ोन किया , कुछ समस्या है क्या?? इतना सुनते ही अमित ने एक ही साँस में, प्रज्ञा से अपनी मोहब्बत का इज़हार कर डाला और बोला ना मत कहना, नही तो वो  ये बर्दास्त नही कर पाऊंगा।

अमित की पूरी बात सुनते ही प्रज्ञा ने उससे बोला कि उसने कभी भी उसे प्रेमी की नज़र से नही देखा है, वो उससे प्यार नही करती और न ही करना चाहती है।

प्रज्ञा का इनकार सुन, उसका दिल इस कदर टूट गया, की अमित फूट फूट कर रोने लगा, तभी वो अचानक उठा और वह छत की तरफ भाग। सारे साथी उसके पीछे भागे, उसे पकड़ने के लिए, हॉस्टल की तीसरी मंजिल पर लोग उसे पकड़ पाए, वहीं पर लोगो ने अमित को समझाया की,भाई इतनी जल्दी निराश नही होते, प्रज्ञा को थोड़ा वक्त तो दो,  तुम्हारे प्यार को समझने के लिए, समझा-बुझा कर लोग उसे, उसके रूम में ले आए , लोगो ने प्रज्ञा को दोबारा अलग से फ़ोन किया और सारी बात समझाई की अमित मारने जा रहा है, हाँ बोल दो, नही तो वो मर जायेगा।

लाख समझाने के बाद प्रज्ञा ने अमित को फ़ोन किया और बोली, मैं भी तुमसे प्यार करती हूँ और कल मिलकर तुमसे बात करूंगी, इतना कह कर प्रज्ञा ने फ़ोन काट दिया।
इतना सुन कर अमित की खुशी का ठिकाना ही नही रहा। पूरे होस्टल में जश्न का माहौल था। अमित ने रात में ही पार्टी देने के लिए सब को कैंटीन बुलाया और रात भर खूब परांठे खाये गए। उस रात का सारा बिल अमित के नाम रहा।

अमित को सुबह का इंतज़ार था की, जब को कॉलेज आएगी ,तो वो उसे अपने दिल का हाल पूरे विस्तार से सुनाएगा। रात आंखों में ही काट गयी, सुबह कॉलेज खुला, प्रज्ञा आयी और सीधे क्लास में चली गई। उसने अमित की तरफ देखा ही नही, एक क्लास बीती, दो क्लास बीती पर प्रज्ञा अमित से नही मिली, अमित ने क्लास में उससे बात करना चाह, तो प्रज्ञा ने अमित को भाव ही नही दिया, लंच हुआ तो अमित, प्रज्ञा से मिला।

प्रज्ञा ने अमित को देखते ही, गुस्से से आग बबूला हो गयी , प्रज्ञा ने अमित को खूब खरी खोटी सुनाई और बोली, क्या तुमने अपनी शक्ल देखी है, कभी,आईने मे???  दुनिया की कोई भी लड़की  तुमसे बात नही करना चाहेगी, प्यार तो बहुत दूर की बात है, और कल रात मैंने हाँ, इसलिए बोला था कि तुम मरने जा रहे थे। मैं नही चाहती कोई तुम जैसा मुझ पर मरे। आज के बाद कभी भी मुझसे बात मत करना। बात तो दूर, मुझे दिखाई भी मत देना, मेरे अगल बगल। इतना बोल प्रज्ञा फिर से क्लास में जा बैठी।

इतना खरी खोटी सुन अमित की आंखे भर आयी और वो तेज़ी से होस्टल की तरफ भागा। पीछे पीछे कुछ और लोग भागे, अमित को सबने मिलकर समझाया और हौसला रखने को बोला और कहा कि "बस ट्रेन और लड़की के पीछे भागना नही चाहिए, एक जाती है, तो दूसरी आती है"।

अमित के साथ कुछ ऐसे भी लोग थे जो उसे समझाते थे कि वो प्रज्ञा को समझाएंगे की तुम उससे बहुत प्यार करते हो, दुनिया मे तुमसे ज़्यादा उसे कोई नही चाहता है, ना चाहेगा, बस तुम मेरे फ़ोन में बैलेंस डालते रहना, प्रज्ञा से फ़ोन पर बात करने के लिए। सब कुछ करने के बाद भी प्रज्ञा न मानी, अमित का ख्वाब ख्वाब ही रह गया।
अमित को हमेशा प्रज्ञा की एक बात रह-रह कर याद आती थी कि "दुनिया की कोई भी लड़की उससे प्यार नही करेगी"।

दिन यूं ही बीत रहे थे प्रज्ञा और अमित एक दूसरे से कभी भी बात नही करते थे, जहाँ अमित होता था वहां प्रज्ञा नही और जहां प्रज्ञा वहां अमित नही।
दिन बीतने के साथ साथ ज़ख्म भी भरने लगे थे, सब अपनी पढ़ाई में व्यस्त हो गए, असाइनमेंट इतने थे कि अब सभी को वक्त की कमी होने लगी थी।

एक दिन की बात है जब अमित के फ़ोन पर एक कॉल आयी और उधर से एक लड़की बोली, आप कौन बोल रहे है, तभी अमित बोला की ,  फ़ोन आपने किया है, तो आप बताओ आप कौन  बोल रहीं है, मैं क्यों बताऊं की मैं कौन हूँ, वैसे आपकी आवाज बहुत अच्छी है, इतना बोलते ही कॉल कट हो जाता है।
थोड़ी देर के बाद फिर से कॉल आती है और वो बोलती है कि आपको बात करने की तमीज़ नही है........

बाकी का हिस्सा अगली अंक में...... 

बिजली का बिल और एक अनोखा संघर्ष


किस्सा पिछलेेे साल का ही है।  रविवार का दिन था , मै परिवार के साथ इडली और सांभर का मज़ा ले रहे थे की मकान मालिक का बुलावा आया की कुछ बात करनी है आपसे। थोड़ी देर के लिए नीचे बात करने आ जाएगा।  हम भी खाना खत्म कर नीचे पहुंचे तो चर्चा शुरू हुई बिजली के बिल पर...

मकान मालिक ने चर्चा शुरू की, कि मेरे बिजली का बिल, उनके अनुसार काफी कम सा रहा है । मकान मालिक के अनुसार, मेरा बिजली का बिल AC चलाने के बाद भी कम आ रहा है। मकान मालिक के हिसाब से मेरा बिल 5000 और 6000 के आस पास रहना चाहिए।  जो की नहीं है इसलिए उन्हें शक है की मैंने शायद कोई यन्त्र लगा रखा है जिसे बिल काम आता है।  मैंने बोला की आप घर को चेक करा सकते है सबकुछ तो आपका ही है और आप ही की अंडर में है तो मै कैसे कोई डिवाइस लगा सकता हूँ और क्यों लगाऊंगा। १०००० कियारा देने के बाद १००० या २००० के लिए इतना झाम कौन करेगा। क्या यह इतनी बड़ी रकम है की जिसके लिए मै इतनी बड़ी परेशानी लूंगा। ६ साल से रह रहा हूँ तब नहीं किया तो अब क्यों करूँगा। पर भाई साहब कुछ भी सुनाने को तैयार ही नहीं हुए।  बोले आप घर खाली कर दो । अगले महीने १० तारीख तक।  हमने कहा ठीक है हम खाली कर देंगे। आपके शक का इलाज मेरे  पास नहीं है।  इतना बोल कर मै उनके यहां से निकल लिया और अपने घर आ बैठा और पूरा किस्सा मैंने अपनी पत्नी को सुनाया। 

स्वाति गुस्से से आग बबूला हो रही थी की अचानक घर खाली करने को कोई कैसे बोल सकता है।  अभी हमने कार खरीदी है कही और जायेंगे क्या हमे पार्किंग मिलेगी। इसी उधेड़बुन मे दिन निकल गया और हमने ये निर्णय लिया की घर ढूंढते है। मिलने पर जल्दी से जल्दी खाली कर देंगे। हम मकान मालिक द्वारा लगाए गए इलज़ाम का आधार अभी तक समझ नहीं पाए थे। 

तभी सोमवार पीडी सर का फोन आया कि उन्हें घर मिलनेे वाला उसकी पजेशन के लिए वह नोएडा जल्द ही आ रहे हैं। घर मिलने के बाद, वह उस घर में रहने के लिए किसी किराएदार को ढूंढ रहे थे। हमने सोचा कि वो किसी और को किराये पर देंगे इससे अच्छा है कि मैं ही ले लूं। 

बात की हमने और वो राज़ी भी हो गए। पी डी सर आये। हमने घर अपने कब्जे में ले लिया। आजके एक हफ्ते में ही घर खाली कर जाने को तैयार हो गए। माँ को भी हमने यह सारी बात बताई, माँ ने एक बात कही 

तुमने कोई चोरी नही की है। जाने से पहले मकान मालिक को बिना मिले मत आना और अपनी बात पूरी कर के ही आना। उनका आभार भी व्यक्त करके आना की अच्छा वक्त गुजर तुमने उनके घर मे पर चोरी की बार ठीक नही थी। वक्त आने पर आपको सच्चाई पता लग जएगी। 


हमने ऐसा ही किया। मूवर्स एंड पैकर्स को बुलाया । सारा सामान पैक हो गया था। बस निकलने को ही थे। मैं और स्वाति दोनो मकान मालिक और मालकिन से मिले। हमने अपनी बात कहना शरू किया।

नमस्ते किया, और बोला एक आखिरी बात आपसे करनी है, हमने आपके घर मे अपनी गृहस्थी शरू की। आदि का लालन पालन भी यही हुआ। आप सबका प्यार भी मिला। आपने एक अभिभावक की तरह हमे बहुत कुछ सिखाया। अगर मुझसे कोई भी गलती हुई हो तो उसके लिए हम माफी मांगते है पर जो चोरी का आरोप हम पर लगाया यह ठीक नही लगा हमे। वक्त आने और जब भी कोई दूसरा किराएदार आएगा सच्चाई आपके सामने आ जायेगी। 

बस इतना बोल हम दोनों वहाँ  से निकल लिए, नए घर मे नया जीवन की शरूवात करने के लिए। 

Sunday, June 25, 2023

बुआ का बबुआ


बरसो नॉएडा रहने के दौरान आदि कभी परिवार के  किसी भी सदस्य से बहुत ज्यादा घुल मिल नहीं पाया। जबसे लखनऊ में रह रहा हूँ धीरे धीरे आदि भी सबसे मिल रहा था तो उसके अंदर भी जिज्ञासा जो रही है, सबसे मिले की, कुछ दिन पहले दिव्यांश और प्रियांश हमारे साथ रहने के लिए आये हमने एन्जॉय किया, और कुछ दिन बाद वो वापस चले गए।  

पड़ोस के घर में भी बच्चे अपनी बुआ के घर गए थे गर्मी की छुट्टियों में , उन्होंने आदि को बताया की सबने खूब मज़े किये।  

आदि को भी लगा की उसके भी तो बुआ है पर वो गर्मी की छुट्टियों में उनके घर गया ही नहीं।  आदि की गर्मी की छुट्टियां, बस खत्म ही होने वाली है, 2 हफ्ते ही बचे है कि , अचानक आदि को अपनी बुआ पर बहुत प्यार आया और शुरू हुआ बुआ के घर जाने की ज़िद, दिन रात बस एक ही बात बुआ बुआ और बस बुआ।
दीदी का  घर हमारे घर से अधिकतम 20 किलोमीटर दूर है, हमने प्लान बनाया दीदी के घर जाने का, हर बार का जाना और इस बार के जाने में ज़मीन आसमान का अंतर था। 

इस बार आदि अपना सूटकेस साथ लेकर गया था, खुद ही कपड़े निकाले और ठूस लिए जैसे तैसे जितने भी समाया, बस भर लिया । बुआ के घर पहुच कर आदि का रंग ही बदल गया। बस बुआ के घर ही रहना था और कुछ नही, पुरे घर में घूम रहा था जैसे पहली बार आया हो।  

आदि को स्वाति पहली बार अकेला छोड़ रही थी , अभी तक कभी आदि, स्वाति के बिना नहीं रहा है, इसकी शरुवात दीदी के घर से हुई है । स्वाति की भी हालत ठीक नही थी, भावुक हो रही थी, पर आदि बुआ के बबुआ बन बस बुआ के घर रहना है यही रट लगाए हुए था ।  स्वाति ने बोला कैसे रहोगे मेरे बिन, तब आदि बोलता है। 

"मैं बुआ के घर मे आपको अपने दिमाग मे आंटी फीड कर लूंगा, और जब घर आऊंगा तो आपको फिर से माँ फीड कर लूंगा " 

ऐसे में मुझे आपकी याद नहीं आएगी। 

जैसे तैसे हम आदि को छोड़, घर की तरफ बढ़े, रास्ते मे आइस क्रीम देख किसी ने बोला ही नही की दिला दो। बिना किसी ना और हाँ के, और बिना शोर शराबे के हम घर आ गए। घर में फैला सन्नाटा हमे काटने को दौड़ रहा था, इतना सन्नाटा तो हमने कभी फील ही नही किया । कोई काम ही नही था हमारे पास, सोते समय भी इतनी शांति थी कि पिन भी गिरे तो शोर लगे। 

दीदी को फ़ोन किया तो पता लगा आदि थोड़ी देर प्रियांशु के साथ खेल कर घोड़े बेच कर सोने जा रहे है। आदि दिव्यांशु और प्रियांशु के साथ गले लग कर सो गए। 

रात भर आदि को हम मिस करते रहे, स्वाति काफी देर तक जगती रही, फिर हम देर से  सो कर उठे, सुबह 10 बजे जब हमने कॉल की दीदी को तो पता लगा , कि महोदय सुबह जल्दी उठ गए थे और सबको नींद से उठा भी दिया। 

जबकि आदि यहाँ घर पर छुट्टियों में मजाल है कि 12 बजे से पहले उठा हो। आदि का बुआ के घर पर 10 बजे तक नाश्ता भी हो गया था। और हमारी नींद ही खुली थी। 

बुआ का भी प्रेम चरम पर था, तरह तरह के पकवान बनाये गए थे आदि के लिए। 

आदि ने पकवानो का मज़ा लिया, भाई की बाइसिकल चलायी, एक यूटूबर की तरह वीडियोस बनाये, दिव्यांशु की ऊपर लेटकर फोटो क्लिक कराई, दिव्यांशु भी बड़ी शांति से आदि के सरे नखरे उठा रहा था , प्रियांशु भाई से पंगे भी हुए, बुआ फूफा बस आदि और प्रियांशु में समझौता कराते कराते शनिवार से रविवार आ गया पता ही नहीं लगा।

इधर हमारा दिन ही नहीं कट रहा था , इस गठरी का माल उस गठरी में और उस गठरी का माल इस गठरी में करते रहे ताकि वक्त काट सके।  शाम चाचा के घर बिताई हमने, रात में फिर घर आते ही वही सन्नाटा।

  उधर दीदी के वादा किया था की रविवार को हम तुम्हे स्विमिंग पूल में ले जायेंगे ।  किसी कारणवश यह संभव नहीं हो पाया की स्विमिंग पूल ले जाया जा सके।  फिर आदि और प्रियांशु का तांडव शरू हुआ वाटर पार्क जाने का।  आनन् फानन में वाटर पार्क का प्लान बनाया गया।  वाटर पार्क हमारे घर के पास ही था। 

दीदी जीजा, सभी को लेकर घर आये और हमे भी चलने को कहा , हम भी तैयार हुए जाने को, एक ही गाड़ी में हमने अपने आपको में एडजस्ट किया और निकल पड़ी सवारी वाटर पार्क की तरफ।  मौसम भी अच्छा था , धुप छाओ लगी हुई थी । वाटर पार्क में जाते ही हमने आनंद की प्राप्ति शुरू हुई , इतनी गर्मी में पानी में डुपकी लगाने को  मिल जाये तो जीवन का आनंद ही कुछ और है।  हम सबने खूब नहाया , अलग अलग राइड्स ली , असली मज़ा तो तीनो बच्चो ने लिए , खूब कूदे , खूब झगड़ा किये।  कोई किसी पर लद रहा था कोई किसी और पर, दोनों में समझौता भी कराया।  बस दिव्यांश शांति से सब देख रहा था सबकुछ जैसे वो अचानक बहुत बड़ा हो गया हो।  

आखिरी में हम लहरों पर सवार हुए , मज़ा आ गया, ऐसे लगा हम समंदर में आ गए हो , इतनी बड़ी बड़ी लहरे थी जिनके ज़ोर से हम  बार बार हम किनारे पर आ जा रहे थे. 

शाम ५ बजे वाटर पार्क के बंद होने का समय आया और सवारी निकल पड़ी घर की तरफ, घर पहुंचते ही स्वाति के बोला आदि को, की रुक जाओ अब मत जाओ बुआ के घर, ऐसा कहते ही तांडव मचा दिया।  रोना शरू हुआ वह भी ऊँची आवाज़ में जैसे लग रहा था किसी ने कूट दिया हो। 

सोमवार से सबका ऑफिस था और दो बच्चो आपसे में भात्र प्रेम प्रकट कर रहे हो तो कोई एक व्यक्ति का रहना जरुरी है उनकी निगरानी के लिए , तो रोक लिया गया आदि को बुआ के घर जाने से , आदि इतना रोया की दीदी जाते जाते इमोशनल हो गयी।  

बरसो बाद दीदी को अहसास हुआ की वो बुआ है और उनका एक बबुआ है।  












Wednesday, May 24, 2023

अंतिम विदाई- माँ तू अमर रहे।

मेरी मम्मी को गए दो बरस होने को आए, आज भी उनके होने का अहसाह मुझे प्रतिपल रहता है। मम्मी गयी तो मुझे  लगा, की अब मम्मी बुलाने पर कोई नही आएगा, वो प्यार कभी नही मिलेगा, अब कोई नही कहेगा कि हाँ बेटा, उस शून्य में एक व्यक्ति आया। मैने जब भी मम्मी बुलाया, वह कोई और नही, मेरी सासू माँ थी, शब्द निरर्थक नही हुए थे। उम्मीद अभी बाकी थी,  मम्मी थी, प्यार था चाहे वो मेरी पत्नी की माँ ही क्यों न हो। ससुराल जाता तो मेरे स्वागत के लिए हर संभव प्रयाश करती , बेटा यह खा लो, वह खा लो। जब भी मम्मी शब्द की ध्वनि गूंजती थी तब उधर से एक ही आवाज़ आती हाँ बेटा। 

वो जब भी घर आतीं मुझे बेटे होने का अहसास रहता था पर आज वो भी हमारे बीच नही है, कुछ दिन पूर्व वह भी चली गयी मेरी मम्मी के पास। अब मम्मी का अहसास तो है पर मम्मी बुलाने पर अब कोई प्रतिध्वनि नही है। 

सबसे कठिन समय तब होता है जब अपने एक एक कर चले जाते है। वो बस झट से नही जाते है, धीरे धीरे जाते है। रोज़ उनको खोने और होने का अहसास होता है और एक दिन अचानक एक युग समाप्त हो जाता है। 

उस दिन ऐसा ही एक युग खत्म हो गया। माँ का युग। 

ईश्वर उनकी आत्मा को शांति प्रदान करे। वो हमारे साथ एक आशीर्वाद की तरह हमेशा रहेंगी।

Saturday, May 13, 2023

ना बड़ा न छोटा और ना ही माझिल

मेरा बेटा ना तो बड़ा है और ना ही छोटा, ना माझिल और ना ही साँझील। 

"बड़ा बाप, छोट महतारी, बिच्चैक सीताराम"

अर्थात बड़े बच्चे को पिता बहुत प्रेम करते है, छोटे को माँ, पर बीच के बच्चे को कोई प्रेम नही करता है। 

बचपन से यही सुनता आया हूँ, और आज यही देख भी रहा हूँ। बड़ा मुझे छोटा नही समझता और छोटा बड़ा। 

बड़ा गलती कर तो बड़ा है, माफी नही मांगेगा, छोटा गलती करे तो माफ कर दो क्योंकि छोटा है, माफी तो वो भी नही मांगेगा। 
रहा मैं, मेरी गलतियां कभी माफ नही होती। 

सम्मान और प्यार दोनों की हिस्से में नही आते। 

इसलिए मैंने सिर्फ एक ही संतान की, वह ना वो मेरी बड़ी संतान है, और ना ही छोटी ना माझिल और ना ही साँझील। 

मैं बस इसी में खुश हूं

Wednesday, May 10, 2023

गवार औरत

ढोल गंवार शूद्र पशु नारी।

सकल ताडना के अधिकारी।।

तुलसीदास द्वारा रचित ऊपर लिखी पंक्ति उस समय और घातक हो जाती, जब कोई व्यक्ति नारी भी हो और गंवार भी उम्र भर कितना भी प्रयास करो ताडना से बच पाना असंभव है।

यह कहानी एक ऐसी नारी की है जिसे समाज के लड़का लड़की के भेद भाव मे पढ़ने नही दिया, स्कूल जाती तो थी पर गांव के लड़के पढ़ने नही देते थे, अक्सर उसे गहरे गड्ढे में धक्का दे दिया करते थे, एकलौती संतान होने के नाते घर वालो ने उसकी सुरक्षा के लिए विद्यालय जाना बंद करा दिया। 

60 के दशक की बात है, लड़कियों का विवाह भी जल्दी हो जाता था। बिट्टू पढ़ तो नही पाई थी पर घर और बाहर के काम मे बहुत तेज़ थी। घर पर माँ का हाथ बटाती और बाहर पिता के साथ खेती भी देखती, बिट्टू को कहावते और चौपाइयां मुहजुबानी याद थी। अक्सर वह अपनी बातों में इन चौपाइयों और कहावतों का प्रयोग करती थी, सामने वाला बिट्टू की बातो को सुन मंत्रमुग्ध हो जाता था, 9 बरस की होते होते उसका विवाह एक पढ़ने लिखने वाले लड़के से कर दिया गया। विवाह तो 9 की उम्र में हुआ पर गौना 18 के होने पर हुआ। 

लड़का पढ़ लिख गया और सरकारी नौकरी में भी पा गया, अब वह एक बिना पढ़ी लिखी लड़की से रिश्ता निभाए तो कैसे निभाए। अनपढ़ होने का मतलब गवार कहलाया जाने लगा, पर किसी तरह रिश्ता निभाया गया। लड़के की बहने भी अनपढ़ थी, बिट्टू को छोड़ने का मतलब भविष्य में लड़के की बहनो के पति भी उन्हें गवार कहकर छोड़ सकते थे। बिट्टू अपना पूरा प्रयाश करती की वो सबकुछ करे जो वह कर सकती है। 

पति की सरकारी नौकरी लगी थी इसलिए गांव छोड़ शहर जाना पड़ा। बड़ा घरद्वार छोड़ कर बड़े से शहर के छोटे से घर मे रहना था। बिट्टू ने पूरा प्रयाश किया अपने आपको शहरी वातावरण में ढालने के लिए। 

बच्चे हुए, उनका पालन पोषण किया , अच्छे संस्कार दिए, पर पति की नज़र में सिर्फ गवार की रही। कभी भी किसी के घर जाना हो तो पति उसे साथ नही ले जाते थे, बिट्टू को साथ ले जाने में उन्हें शर्म आती थी , शर्म आये भी तो क्यों ना? बाकी लोगो की पत्नियां पढ़ी लिखी जो थी, जिनकी पत्नियां पढ़ी लिखी नही थी, उन्होंने उन्हें त्याग कर दूसरा विवाह जो रचा लिया था। 

बिट्टू के पति ने दूसरा विवाह तो नही किया था पर बिट्टू को गवार होने का अहसास अक्सर करा दिया जाता। बिट्टू भी तो पूरी तरह से अपने पति पर निर्भर जो थी। बूढ़े माता पिता की जिम्मेदारी भी बिट्टू के सर पर ही थी। 

बच्चे बड़े हुए, एक अनपढ़ ने अपनी  बिटिया को खूब पढ़ाया, घर का काम वो खुद करती पर बिटिया को पढ़ने से कभी नही रोकती, बिटिया भी खूब पढ़ी और सरकारी नौकरी पा गयी। बिट्टू अपनी बिटिया में अपने आपको देखती थी और हर बार यही सोंचती थी कि वो ना पढ़ सकी पर उसकी बिटिया पढ़ लिख कर अफसर बन गयी। 

वक्त बदला पर बिट्टू के ऊपर से गवार होने का तमगा कभी न गया। कोई भी फैसला लेना हो उससे कभी नही पूछा जाता। बस फैसले सुनाए जाते। जब भी वो अपना विचार व्यक्त करने की कोशिश करती गवार कह कर बिट्टू को छुप करा दिया जाता। 

बिट्टू अंदर ही अंदर टूट से गयी थी, इस टूटन से उसके स्वास्थ्य पर भी अब असर दिखने लगा था।

बिट्टू अब वृद्ध हो गयी थी, नानी बानी दादी भी बनी, बहुएँ पढ़ी लिखी आयी, जितना भी कुछ सीखा जीवन मे बहुओ को सिखा दिया, एक दिन बिट्टू, लंबी बीमारी से संघर्ष करते करते दुनिया छोड़ कर चली गयी। वह कुछ लेकर नही गयी, जाते जाते बस पति से माफी मांगते हुए गयी , कि अगर उससे कोई गलती हुई हो तो माफ कर देना। 

जब भी कोई बिट्टू के दिवंगत होने पर शोक व्यक्त करने आता तो पति अक्सर चर्चा में बस यही बात दोहराता कि "गवार थी हमारा रिश्ता किसी तरह निभ गया। हमारे साथ के कई लोगो ने दूसरा विवाह किया पर मैंने नही किया"। 

बिट्टू, पूरा जीवन संघर्ष करती रही सबकुछ किया जो किसी पत्नी और माँ को करना चाहिए, पर उसके जाने के बाद भी अपने ऊपर से गवार होने का तमगा हटा नही पाई। कुछ लोगो के लिए वो सिर्फ एक गवार ही रही। 




Friday, March 31, 2023

सब रिश्ते झूठे?

कभी सोंच न था, की एक दिन, सब रिश्ते झूठे हो जाएंगे,

माँ गयी, तो बाप, भाई और बहन भी अजनबी हो जायँगे। 
हम आज उसके पहलू में जा बैठे है वह बस चंद बरसो पहले ज़िंदगी मे आया और ज़िन्दगी बन जाएगा। 

सात फेरों में ही सभी का फेरा छूट जाएगा अब हम बस उसी के फेरे में आ जाएंगे। 

माँ से हमे जो प्यार मिला उसकी कीमत उसके जाने के बाद पता लगी। 





Tuesday, March 28, 2023

मेरी एक गलत सोंच- वक्त बड़ा या पैसा


मैं समझता था कि वक्त देने से रिश्ते सुधर जाएंगे पर एक उम्र देने के बाद पता लगा कि उन्हें मेरे वक्त की नही पैसो की जरूरत थी।


कोरोना के जाने के बाद मैं अभी भी घर से ही काम कर रहा हूँ। लखनऊ में बसे 2 साल होने को आये। मुझे लगता था माँ बाप और भाई बहन को मैं अपना वक्त दूंगा तो मेरे दूर रहने से जो गिले शिकवे हुए है जल्दी ही दूर हो जाएंगे। 2 साल के अथक प्रयाश से मुझे पता चला कि जब एक बार आपके बिना किसी को जीने की आदत पड़ जाए, फिर आप कितना भी प्रयाश कर ले वो आदत फिर नही पनपती। आपका होना एक बोझ हो जाता है। 

अभी हाल ही में मुझे पता लगा है कि रिश्तों को समय की जरूरत नही होती है, पैसे की जरूरत होती है। वक्त कितना भी दे दो जब तक वह अर्थ में नही बदलता रिश्तों की कीमत नही होती।

रिश्तों को बचाना है तो वक्त नही पैसे देना चाहिए। 

आप अपनी सार्थकता सिर्फ धन से ही साबित कर सकते है।

Thursday, March 23, 2023

बेटी या बेटा- माँ बाप की सेवा


पहले कभी हुआ करता था कि बेटे के पैदा होने पर जश्न मनाया जाता था और बेटी के होने पर शोक। एक दिन बागबान फ़िल्म आयी और घर वालो ने  रो रो कर पूरी फ़िल्म देखी और फिर समाज ने करवट ली। अब बेटा वो है जो बाप को घर से निकाल देगा और उसे बुढ़ापे में दर बदर भटकने को मजबूर करेगा और अब सारी उम्मीदे बेटी पर ही जा टिकी जो माँ बाप का खयाल रखेगी। 

मुझे बेटा हुआ, उसके पैदा होने से पहले और उसके होने के बाद, मैं उसे  इसलिए नही पाल रहा हूँ कि वो मुझे एक दिन घर से निकाल देगा या मेरी संपत्ति हड़प लेगा। 

अब जब बाकी बंधुजन को बेटी हुई, तो हर तरफ जश्न का माहौल था, बेटी हुई है बेटी, बहुत बहुत बधाई । बेटियां, माँ बाप का खयाल रखती है, वही उनका बुढ़ापे का सहारा बनेंगी, वही माँ बाप को प्यार करती है । हर एक पल मुझे हीन भावना का अहसास कराना कि मुझे बेटा है, यह एक दिमागी खेल है या कुछ और । अब मैं अपने बेटे को किस नज़र से देखूं।

समझ मे नही आता है कि माँ बाप की सेवा करना बेटे या बेटी के चरित्र पर निर्भर करता है या उसके  लिंग पर। 

अगर लिंग निर्धारित करता है तो हम फिर उसी पुरातन मान्यताओ में पहुंच गए जहां पुत्र की प्राप्ति के लिए पुत्रियों की बली चढ़ा दी जाती थी और अब वही किया जाए कि पुत्री के लिए पुत्रो की बली चढ़ाई जाए। जान नही ले सकते तो उन्हें अलग घर के किसी कोने में कैद कर सुविधाओ से महरूम रखा जाए। 

अगर माँ बाप की सेवा ही मात्र कर्तव्य है और इसके लिये हमे बच्चे पैदा करना चाहिए तो उन्हें पढ़ाने की जरूरत ही क्या है। उनकी परवरिश नौकर की तरह ही की जानी चाहिए न कि बेटे या बेटी की तरह। 

एक बहू जो अपने सास-ससुर की सेवा नहीं करती है तो क्या वो अपने माँ बाप की सेवा कर पाएगी । 

मेरे खयाल से इस तरह की सोंच सिर्फ वो लोग रखते है जिन्होंने अपने माँ बाप या सास ससुर की सेवा नही की है और उन्हें सिर्फ मरने के लिए छोड़ दिया हो।  उनके अंदर का डर ही है जो उन्हें ऐसी बाते करने को मजबूर करता  है। 

मैं ईश्वर से यही कामना करता हूँ कि आज के बुजुर्ग अपने संतानों में लिंग के आधार पर भेदभाव न करे। जिन्हें सेवा करनी है वो करेंगे और जिन्हें नही करनी है वो किसी भी दबाव में नही करेंगे। 











Sunday, February 19, 2023

फाँसी- आँखों देखी

ठंड के दिन चल रहे थे, हम सब रज़ाई ओढ़े दिन काट रहे थे। स्कूल बंद थे। पूरा परिवार भी इकट्टा था,  पापा भी आज ऑफिस नही गए थे। हम सब एक साथ बैठ कर मूवी देख रहे थे ,  जिसमे अदालत मुल्ज़िम को अंत मे फाँसी देती है, और फिर मूवी का नायक उस खलनायक को सरेआम अदालत के बाहर फाँसी पर लटका देता हैऔर मूवी खत्म हो जाती है।

अब चालू होती है, उस मूवी पर चर्चा का खेल। 

अचानक पापा बोले, कितना बकवास दिखाते है मूवीज में, ऐसे कोई किसी को भी फाँसी पर चढ़ा सकता है?

पुलिस ऐसे ही देखती रहती है क्या?

इनलोगो ने कभी हकीकत में भी ऐसी फाँसी होती है, सब बकवास दिखाते है, और फिर सोंचते है कि मूवी हिट हो जाये, जरूर यह मूवी पिट गयी होगी। 

फाँसी पर चर्चा होने लगी फिर पापा बताने लगे कि कभी वो एक बार फाँसी देखने गए थे। 

सच्ची मुच्ची फाँसी, पापा कभी किसी  डिपार्टमेंट में रहे होंगे। उन्होंने किसी अधिकारी से बात की होगी, सच मे फाँसी देखने की लिए,फिर उस अधिकारी ने बोला, शर्मा जी आसान नही है फाँसी देखना। बड़े बड़ो की हालत खराब हो जाती है आप देख पाएंगे?

"हम चाहते है कि फाँसी खत्म हो जाये हो और आप फाँसी देखना चाहते है"

 तभी पापा और उनके साथियों ने बोला कि देख लेंगे इसमें कौन सी बड़ी बात है। पापा और उनके साथियों को कॉलेज से निकले बस कुछ ही दिन हुए थे। नया खून था और जोश भी भरपूर। 

तभी उनके अधिकारी ने बोला तो ठीक है, कुछ महीनों के बाद किसी व्यक्ति को फाँसी होने वाली है जिसने किसी परिवार को बड़े ही वीभत्स तरीके से खेत मे थी काट डाला था। अदालत ने उसे फाँसी की सज़ा सुनाई है।

पापा और उनके साथी बोले, तो ठीक है हम देख लेंगे हम मजबूत है, अधिकारी ने बोला मैं तुम्हे दिन तारीख बात दूंगा। फाँसी का आर्डर तुम लेकर जाना और तुम सबको तड़के जाना पड़ेगा और इस बात की चर्चा आप किसी से नही करेंगे, फाँसी कोई प्रदर्शनी नही है इसलिये, फाँसी आप एक झरोखे से देख पाएंगे ना कि सामने से। 

दिन तारीख बताई गई, रात भर कोई सोया ही नही और तड़के सब कारगर पहुँच गए। फाँसी का आर्डर जेलर को दिया गया। फिर उन्हें एक झरोखे तक ले जाया गया, सभी के अंदर उत्सुकता थी फाँसी देखने की, 1 घंटे इंतज़ार करने के बाद फाँसी के हॉल में उस कातिल को लाया गया। कोई अधिकारी उसे कुछ पूछ रहा था, इन लोगो को साफ सुनाई नही दिया। जल्लाद उसे फाँसी के तख्ते पर ले गया और मुँह पर कपड़ा बंधने और फंदा लगा लगाने से पहले उसने खुदा को याद किया और बोला। 

"ला इलाहा इल्लल्लाह मोहम्मद रसूलुल्लाह"

उस डाकू के चेहरे का भाव देख, और उसकी आवाज़ के कंपन ने पापा और उनके साथियो को अंदर से हिला दिया, इसके बाद उस हॉल में इतना सन्नाटा था की बयान नही किया जा सकता। मौत का डर उसकी आँखों मे साफ महसूस हो रहा था। 

जल्लाद ने इशारा पाते ही उसे फाँसी पर लटका दिया। फिर एक और गहरा सन्नाटा था। सबकी हालत और  खराब हों गयी। सब उठे और चल दिये। आपस मे बात करने की भी हिम्मत नही बची थी किसी मे, की फाँसी पर चर्चा कर ले। 

पापा के अनुसार कई रातो तक वो फाँसी उनके सपनों में आई। दहशत में आ जाते थे जब भी वो नज़ारा सपने में आता था। पापा के अनुसार उस फाँसी की चर्चा फिर कभी नही हुई आफिस में। 

पापा के चेहरे पर वो दहशत दिखाई दे रही थी। हम भी खामोश थे, अपनी जगह चिपक गए हो जैसे। थोड़ी देर बाद माँ ने वो सन्नाटा तोड़ा और बोला चलो खाना खाओ। 


आज भी जब मैं लिख रहा हूँ, सन्नाटा आज भी याद आ रहा है। 





Sunday, January 15, 2023

भिक्षापात्र

कई साल पहले की यह घटना है। मेरी नई नई नौकरी लगी थी, जोशोखरोश, मै रोज़ सवेरे भागता हुआ,ऑफिस की बस पकड़ता था। बस, घर से लगभग १ किलोमीटर दूर एडोबे से मिलते थी। 

एक दिन, ऐसी ही सुबह, मै बस पकड़ने के लिए जल्दी जल्दी भाग रहा था। घर से थोड़ी ही दूर पर देखता क्या हूँ, एक व्यक्ति भगवा वेश धरे दिखाई दिया, जो सबसे कुछ ना कुछ मांग रहा था। मुझे बस पकड़ने कि जल्दी थी इसलिए मै उनसे बचते हुए निकाल ही रहा था कि वो साधू मेरे सामने आ धमाका और बोला। बच्चा कुछ दान दोगे। तुम्हारा भला होगा। मैंने भी सुबह सुबह बिना नकारात्मक ऊर्जा लिए ऑफिस जाना चाह रहा था इसलिए, मैंने १० का नोट निकाला और उसके भिक्षापात्र में डाल दिया, और अपनी बस पकड़ने के लिए भगा । तभी, उसी साधू ने मेरा रास्ता फिर रोका और बोला कि यह पैसे तुम ही रख लो। मै तुम्हारे कल्याण के लिए हूं। मुझे तुम्हारे बटुए में जो सबसे बड़ा नोट है वो दो,  मै उसपर मंत्र पढ़ कर तुम्हें वापस कर दूंगा। मुझे बस पकड़ने कि जल्दी थी और मुझे वो जाने भी नहीं दे रहा था। मैंने सोचा अगर मेरी बस छूट गई तो लेने के दिन पड़ जाएंगे। 

मैंने पर्स खोला और ५० का नोट निकाला और साधू बाबा को दिया। बाबा फिर बोला क्या यह सबसे बड़ा नोट है। मैंने बोला, हां मेरे पास यह सबसे बड़ा नोट है। अंदर ही अंदर मुझे यह अहसास हो रहा था कि यह बाबा नोट लेने के बाद वापस नहीं करेगा। बाबा ने 50 का नोट अपनी हथेली पर रखा है कुछ मंत्र पढ़ने लगा, मैंने बोला बाबा मेरे पैसे। 

बाबा बोला अरे बच्चा दान किया हुआ पैसा कोई वापस मांगता है क्या। मैंने बोला बाबा रख लो 50 का नोट। तुम्हे पता नहीं है कि तुमने क्या किया है। अभी जल्दी है मुझे नही, तो मैं ठीक से बहस करता तुमसे। 

ऐसा बोल मै भगा, अपनी बस के लिए, बस उस दिन के बाद सारे फकीर या भगवा धारी बाबा मिलता है, मुझे ढोगी ही लगता है । किसी गरीब को कुछ खिला देना मुझे दान कि सार्थकता लगती है पर किसी को पैसे देना निरर्थक।