Tuesday, August 8, 2023

श्राद्ध- माता का

धीरे धीरे करके न जाने कब 2 बरस बीत गए, माँ का स्वर्गवास हुए, पता ही नही चला। माँ जब भी सपनो में आती है, ऐसा लगता है, माँ पास ही है,  बस मैं ही कही दूर रह रहा हूँ। माँ के होने के अहसास भर से, न जाने कितना सुरक्षित महसूस करता हूँ, शब्दो मे बयान करना नामुमकिन है। 

स्वाति के मायके जाने पर जब मैं अकेला घर पर होता हूँ तो अब कोई नही पूछता की कुछ खाया की नही।

इस बार के श्रद्धा अक्टूबर में पड़ रहे है, धर्म के हिसाब से अपने पूर्वजों को श्रद्धांजलि देने का सबसे उचित काल होता है, पर इस बार का श्राद्ध कुछ अलग सा होगा। कोई नही होगा माँ को भोजन परोसने के लिए। 

सुनते थे कि माँ को बच्चे भूल जाते है, पर यहां कहानी ही कुछ और है, पति ही अपनी पत्नी को भूल पर हिमालय की कंदराओं में जा रहे है। 

नियम बनाने वालों पर कोई नियम लागू नही होते है। बस कमज़ोरों और मासूमो पर की नियम थोपे जाते है। 

बटरफ्लाई इफ़ेक्ट के बारे में सुना था। आज हम जो कुछ भी कर रहे है उसकी वजह से दुनिया मे कभी न कभी, तूफान आता है। 

आज का किया कभी किसी रोज़ सामने आएगा। तब इन्ही नियमो की दुहाई दी जाएगी, सब जनता हूँ। 



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