मेरी मम्मी को गए दो बरस होने को आए, आज भी उनके होने का अहसाह मुझे प्रतिपल रहता है। मम्मी गयी तो मुझे लगा, की अब मम्मी बुलाने पर कोई नही आएगा, वो प्यार कभी नही मिलेगा, अब कोई नही कहेगा कि हाँ बेटा, उस शून्य में एक व्यक्ति आया। मैने जब भी मम्मी बुलाया, वह कोई और नही, मेरी सासू माँ थी, शब्द निरर्थक नही हुए थे। उम्मीद अभी बाकी थी, मम्मी थी, प्यार था चाहे वो मेरी पत्नी की माँ ही क्यों न हो। ससुराल जाता तो मेरे स्वागत के लिए हर संभव प्रयाश करती , बेटा यह खा लो, वह खा लो। जब भी मम्मी शब्द की ध्वनि गूंजती थी तब उधर से एक ही आवाज़ आती हाँ बेटा।
वो जब भी घर आतीं मुझे बेटे होने का अहसास रहता था पर आज वो भी हमारे बीच नही है, कुछ दिन पूर्व वह भी चली गयी मेरी मम्मी के पास। अब मम्मी का अहसास तो है पर मम्मी बुलाने पर अब कोई प्रतिध्वनि नही है।
सबसे कठिन समय तब होता है जब अपने एक एक कर चले जाते है। वो बस झट से नही जाते है, धीरे धीरे जाते है। रोज़ उनको खोने और होने का अहसास होता है और एक दिन अचानक एक युग समाप्त हो जाता है।
उस दिन ऐसा ही एक युग खत्म हो गया। माँ का युग।
ईश्वर उनकी आत्मा को शांति प्रदान करे। वो हमारे साथ एक आशीर्वाद की तरह हमेशा रहेंगी।
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