पहले कभी हुआ करता था कि बेटे के पैदा होने पर जश्न मनाया जाता था और बेटी के होने पर शोक। एक दिन बागबान फ़िल्म आयी और घर वालो ने रो रो कर पूरी फ़िल्म देखी और फिर समाज ने करवट ली। अब बेटा वो है जो बाप को घर से निकाल देगा और उसे बुढ़ापे में दर बदर भटकने को मजबूर करेगा और अब सारी उम्मीदे बेटी पर ही जा टिकी जो माँ बाप का खयाल रखेगी।
मुझे बेटा हुआ, उसके पैदा होने से पहले और उसके होने के बाद, मैं उसे इसलिए नही पाल रहा हूँ कि वो मुझे एक दिन घर से निकाल देगा या मेरी संपत्ति हड़प लेगा।
अब जब बाकी बंधुजन को बेटी हुई, तो हर तरफ जश्न का माहौल था, बेटी हुई है बेटी, बहुत बहुत बधाई । बेटियां, माँ बाप का खयाल रखती है, वही उनका बुढ़ापे का सहारा बनेंगी, वही माँ बाप को प्यार करती है । हर एक पल मुझे हीन भावना का अहसास कराना कि मुझे बेटा है, यह एक दिमागी खेल है या कुछ और । अब मैं अपने बेटे को किस नज़र से देखूं।
समझ मे नही आता है कि माँ बाप की सेवा करना बेटे या बेटी के चरित्र पर निर्भर करता है या उसके लिंग पर।
अगर लिंग निर्धारित करता है तो हम फिर उसी पुरातन मान्यताओ में पहुंच गए जहां पुत्र की प्राप्ति के लिए पुत्रियों की बली चढ़ा दी जाती थी और अब वही किया जाए कि पुत्री के लिए पुत्रो की बली चढ़ाई जाए। जान नही ले सकते तो उन्हें अलग घर के किसी कोने में कैद कर सुविधाओ से महरूम रखा जाए।
अगर माँ बाप की सेवा ही मात्र कर्तव्य है और इसके लिये हमे बच्चे पैदा करना चाहिए तो उन्हें पढ़ाने की जरूरत ही क्या है। उनकी परवरिश नौकर की तरह ही की जानी चाहिए न कि बेटे या बेटी की तरह।
एक बहू जो अपने सास-ससुर की सेवा नहीं करती है तो क्या वो अपने माँ बाप की सेवा कर पाएगी ।
मेरे खयाल से इस तरह की सोंच सिर्फ वो लोग रखते है जिन्होंने अपने माँ बाप या सास ससुर की सेवा नही की है और उन्हें सिर्फ मरने के लिए छोड़ दिया हो। उनके अंदर का डर ही है जो उन्हें ऐसी बाते करने को मजबूर करता है।
मैं ईश्वर से यही कामना करता हूँ कि आज के बुजुर्ग अपने संतानों में लिंग के आधार पर भेदभाव न करे। जिन्हें सेवा करनी है वो करेंगे और जिन्हें नही करनी है वो किसी भी दबाव में नही करेंगे।
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