कोरोना के जाने के बाद मैं अभी भी घर से ही काम कर रहा हूँ। लखनऊ में बसे 2 साल होने को आये। मुझे लगता था माँ बाप और भाई बहन को मैं अपना वक्त दूंगा तो मेरे दूर रहने से जो गिले शिकवे हुए है जल्दी ही दूर हो जाएंगे। 2 साल के अथक प्रयाश से मुझे पता चला कि जब एक बार आपके बिना किसी को जीने की आदत पड़ जाए, फिर आप कितना भी प्रयाश कर ले वो आदत फिर नही पनपती। आपका होना एक बोझ हो जाता है।
अभी हाल ही में मुझे पता लगा है कि रिश्तों को समय की जरूरत नही होती है, पैसे की जरूरत होती है। वक्त कितना भी दे दो जब तक वह अर्थ में नही बदलता रिश्तों की कीमत नही होती।
रिश्तों को बचाना है तो वक्त नही पैसे देना चाहिए।
आप अपनी सार्थकता सिर्फ धन से ही साबित कर सकते है।
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