Sunday, January 15, 2023

भिक्षापात्र

कई साल पहले की यह घटना है। मेरी नई नई नौकरी लगी थी, जोशोखरोश, मै रोज़ सवेरे भागता हुआ,ऑफिस की बस पकड़ता था। बस, घर से लगभग १ किलोमीटर दूर एडोबे से मिलते थी। 

एक दिन, ऐसी ही सुबह, मै बस पकड़ने के लिए जल्दी जल्दी भाग रहा था। घर से थोड़ी ही दूर पर देखता क्या हूँ, एक व्यक्ति भगवा वेश धरे दिखाई दिया, जो सबसे कुछ ना कुछ मांग रहा था। मुझे बस पकड़ने कि जल्दी थी इसलिए मै उनसे बचते हुए निकाल ही रहा था कि वो साधू मेरे सामने आ धमाका और बोला। बच्चा कुछ दान दोगे। तुम्हारा भला होगा। मैंने भी सुबह सुबह बिना नकारात्मक ऊर्जा लिए ऑफिस जाना चाह रहा था इसलिए, मैंने १० का नोट निकाला और उसके भिक्षापात्र में डाल दिया, और अपनी बस पकड़ने के लिए भगा । तभी, उसी साधू ने मेरा रास्ता फिर रोका और बोला कि यह पैसे तुम ही रख लो। मै तुम्हारे कल्याण के लिए हूं। मुझे तुम्हारे बटुए में जो सबसे बड़ा नोट है वो दो,  मै उसपर मंत्र पढ़ कर तुम्हें वापस कर दूंगा। मुझे बस पकड़ने कि जल्दी थी और मुझे वो जाने भी नहीं दे रहा था। मैंने सोचा अगर मेरी बस छूट गई तो लेने के दिन पड़ जाएंगे। 

मैंने पर्स खोला और ५० का नोट निकाला और साधू बाबा को दिया। बाबा फिर बोला क्या यह सबसे बड़ा नोट है। मैंने बोला, हां मेरे पास यह सबसे बड़ा नोट है। अंदर ही अंदर मुझे यह अहसास हो रहा था कि यह बाबा नोट लेने के बाद वापस नहीं करेगा। बाबा ने 50 का नोट अपनी हथेली पर रखा है कुछ मंत्र पढ़ने लगा, मैंने बोला बाबा मेरे पैसे। 

बाबा बोला अरे बच्चा दान किया हुआ पैसा कोई वापस मांगता है क्या। मैंने बोला बाबा रख लो 50 का नोट। तुम्हे पता नहीं है कि तुमने क्या किया है। अभी जल्दी है मुझे नही, तो मैं ठीक से बहस करता तुमसे। 

ऐसा बोल मै भगा, अपनी बस के लिए, बस उस दिन के बाद सारे फकीर या भगवा धारी बाबा मिलता है, मुझे ढोगी ही लगता है । किसी गरीब को कुछ खिला देना मुझे दान कि सार्थकता लगती है पर किसी को पैसे देना निरर्थक। 

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