Tuesday, December 2, 2014

रणछोड़ दास चाचड़

मेरा जन्मदिन बस बीता ही था की सुबह तड़के फ़ोन आया।
मुकुल: भाई मै मुकुल बोल रहा हूँ बिलेटेड हैप्पी बर्थडे टू यू।
मै :  थैंक्स
मुकुल : भाई में दमन में हूँ।
मै: वहां क्या कर रहे हो तुम।
मुकुल : भाई,  मै बिना घर पर बताए यहाँ दमन में आ गया हूँ जॉब करने।  एक होटल है इंटरनेट पर सर्च करना दमन दा डेल्टिन  . मै वही ज्वाइन करने आया हुँ।
मै : क्यों घर में क्यों नहीं बताया।  घर वाले सब परेशान होंगे।
मुकुल: अगर  मै घर पर बता कर आता तो कोई मुझे आने नहीं देता इस लिए बिना बताए आ गया।
 मै: भाई तुम पहले घर पर फ़ोन  कर के बता दो की तुम दमन गए हो.
मुकुल :  मै बता दूंगा।
 मै: तुमने ये फैसला अचानक कैसे ले लिया, वहां क्या होगा पापा ने जो तुम्हारे लिए दुकान खोली है।  इतना इन्वेस्ट भी किया है।  नहीं करना था तो तुम पहले बता देते।  इत्ता सामान इकठ्ठा किया फिर सब कुछ छोड़ कर निकल लिए तुम।
मुकुल : वहाँ कोई ग्रोथ नहीं थी ।  मेरे फील्ड से हटकर काम हो रहा था।  मुझे पसंद नहीं है किराने की दुकान खोलना।  मेरे पास इत्ते पैसे भी नहीं थे की ठीक से जी सकूँ।  पापा मेरी शादी के लिए भी देख रहे थे।  पैसे नहीं होते तो उसे खिलता कैसे।
 मै: ये काम तुम पहले भी कर सकते थे।  लखनऊ में भी जॉब कर सकते थे।  तुम्हे ऑफर भी आए थे।  पर तुमने जॉब नहीं की क्यों।
मुकुल : मुझे लखनऊ नहीं रहना था। वहाँ कुछ नहीं है।



















Wednesday, October 15, 2014

मृत्यु के पश्चात अंगदान करने की सही कीमत मिले

यह मेरे निजी विचार है
मुझे लगता है यही किसी को  मृत्यु के पश्चात अंग दान करने की उचित कीमत मिले तो वह उत्साहित होगा  अपने अंग दान करने को,  जिससे जरुरतमंद को सही अंग उपलब्ध होगा ,  जब चाहे वो अपना अंग बदलवा ले सही कीमत दे कर।    वैसे भी गरीब आदमी के बस में नहीं है अंगप्रत्यारोपित करवाना।  बस पैसे वाले ही ऐसा करवा पाते है। एक दिन हॉस्पिटल का खर्च भी उठा एक गरीब आदमी के बस के बात नहीं है।  कम से कम  वो अपनी मृत्यु के पश्चात अपने अंग से मिले हुए पैसे से अपने परिवार का भविष्य सुरछित कर सकता है।  यह अंगदान उसके परिवार को इन्सुरेंस की तरह काम करेगा।

अंग दान करने वाले फॉर्म पर नॉमिनी का नाम होना चाहिए जैसा की वसीयत के समय होता है।  नाम गुप्त रखा जाता है उसका नाम जिसे अमुक व्यक्ति की मृत्यु के पश्चात उसकी जयजात में हिस्सा मिलेगा।

अंग की गुडवत्ता के हिसाब से उसकी कीमत का निर्धारण होगा।  जितना अच्छा अंग उतनी अच्छी कीमत।  फिर लोग अपने आपसे प्यार भी करेंगे कुछ भी ऐसा नहीं खाएंगे या पिएंगे जिसे उनके अंगो को हानि पहुंचे।  अपने अंग की कीमत बढ़ने के लिए पौस्टिक आहार लेंगे।  स्वस्थ्य सम्बन्दी सारी जानकारी रखेंगे क्या खाने से क्या लाभ होग।  अपने जीवन से साथ साथ अपनी मृत्यु का भी ध्यान रखेंगे। इंसान की कीमत बढ़ेगी।  अंगो की कमी से जूझ रहा देश अंग एक्सपोर्ट करने की स्थिति में आ जाएगा।

अंगो को दोबारा प्रयोग करने के लिए शोध होंगे उसके लिए पैसा भी इकठ्ठा हो सकेगा।  अलग अलग अंगो के लिए बैंक बनेगे।  इंसानो की कीमत होगी इंसान ऐसे ही सड़को पर भीख नहीं मागेंगे,   उनका सम्मान बढ़ेगा। 

Tuesday, October 14, 2014

बेटी ने दिया माँ को जन्म

शनिवार शाम विवेक का अचानक फ़ोन आया और बोला कहाँ हो भाई? बहुत इमरजेंसी है प्रशांत की माँ को खून की जरुरत है, उनकी दोनों किडनियां  फेल हो गयी है और किडनी ट्रांस्प्लांट करनी है इसके लिए १५ यूनिट खून चाहिए। मैंने बोला भाई मै  तो लखनऊ में हूँ और दिल्ली इतनी पास भी नहीं है की तुरंत आ सकूँ। मैंने विवेक से बोला पूरी बात बताओ क्या हुआ ऐसा अचानक तो विवेक ने बताया की आंटी की तबियत ख़राब थी वो पिछले १५ दिनों से गंगाराम में भर्ती थी,  डॉक्टर ने बोला की उनकी दोनों किडनिया फेल हो गयी है।

प्रीती जो उनकी बेटी है सिर्फ २५ बरस की है अपनी एक किडनी अपनी आंटी को दे रही है।

सुनते ही मेरा सर चकरा गया की इतनी काम उम्र में वो अपनी किडनी अपनी माँ को दे रही है, क्या होगा उसका भविष्य, कैसे शादी होगी उसकी, क्या होगा उसका भविष्य,  वैसे भी लोग आजकल शादी नहीं करने जाते है, कोई सामन खरीदने जाते है।  हर पहलू में लड़की परफेक्ट होनी चाहिए फिर बिना किडनी के उससे शादी कौन करेगा। उसके सामने तो पूरी ज़िन्दगी पड़ी है। पता नहीं मेरा सोंचना सही था की गलत मै नहीं जनता।
अपनी किडनी देने का फैसला करना उसके लिए भी आसान नहीं रहा होगा।  निःस्वार्थ भाव से उसने ये फैसला किया होगा।  बहुत है बहादुर लड़की है प्रीती।  मै तुम्हारी इस भावना को सलाम करता हूँ।  

मै  कुछ नहीं कर सकता था, यह अफ़सोस  था मुझे।  मैंने विवेक को बोला की कुछ मित्रो को फ़ोन करता हूँ  अगर वो तैयार हो गए तो गए तो खून का इंतेज़ाम हो जायेगा

हमने(विवेक और मै) अपने कुछ पुराने मित्रो को फ़ोन मिलाया और बोला भाई प्रशांत की माँ को खून की जरुरत है क्या तुम अपना खून दे सकते हो, उन मित्रो ने हमारी सुनी और अपने कुछ और मित्रो को भी लेकर आए।  १० यूनिट का तो इंतेज़ाम हो गया  हो गया,  दूसरे दिन भी मै लखनऊ में ही था।  रात मै दिल्ली के लिए चला फिर मैंने विवेक को फ़ोन करके आंटी का हाल चाल लिया तो पता चला की ५ यूनिट और चाहिए।  फिर मै सुबह सीधे गंगाराम हॉस्पिटल ही पहुंच गया।  मैंने देखा की वह मेरे बाकि मित्र भी वही पहुंचे हुए है।  टनटन, विवेक,  शैलेन्द्र और संदीप  कुल मिलकर हम ५ थे। बाकि खून की आवश्यकता भी पूरी हो गयी।

मेरा ब्लड ग्रुप AB+ था फिर प्रशांत ने बताया की तुम्हारा ब्लड नहीं प्लेटलेट्स चाहिए।  मै तैयार हो गया, फॉर्म भरा और प्राथमिक जाँच के लिए गया, जाँच पूरी होने के बाद मेरा नाम पुकारा गया,  मै गया तोनर्स ने मुझे बोला की मेरी नसे काफी गहराई में है साफ़ दिख नहीं रही है प्लेटलेट्स के लिए जरुरी है की नसे साफ़ दिखे ।  प्लेटलेट्स के लिए १ घंटा लगता है, आप सिर्फ अपना रक्त दान कर दे। मै थोड़ा निराश था पर काम से काम मै अपना खून दान कर सका इसका सकूँ था।  

आंटी और प्रीती का ऑपरेशन चल ही रहा था,  १८ घंटे का ऑपरेशन है। खून दे कर हम ऑफिस के लिए चल दिए।   देर रात पता चला की प्रीती तो ठीक है और अब होश में भी आ गयी है पर आंटी ७२ घंटे के बाद होश में आएंगी तब पता चलेंगे की प्रीती की किडनी को आंटी के शरीर ने एक्सेप्ट किया है की नहीं हम इंतज़ार कर रहे है शुभ समाचार का। ईश्वर सब अच्छा करे और मेरी सारी संकाओ को दूर करे।

Thursday, October 9, 2014

कौन है ये महाशय

अंश के होने के बाद स्वाति पहली बार अपने मायके गयी थी तबसे लगभग २ महीने हो गए मै दोनों से नहीं मिला था।  कुछ दिन पहले गांधी जयंती और विजयदशमी की छुट्टी में मै फैज़ाबाद गया और अंश से मिला।  वो मुझे ऐसे देख रहा था जैसे कभी देखा ही न हो।  मेरा चेहरा देखता फिर स्वाति का।  कोई भाव नहीं था उसके चेहरे पर।  थोड़ी देर बाद उसके चेहरे पर रोने का भाव देख मैंने झट से उसे स्वाति को पकड़ा दिया।

थोड़ा बड़ा हो गया है अब, पहचानने लगा है सबको, कई चीज़े सीख ली है अंश ने।  खूब तेज़ तेज़ चिल्लाता है, घूमने का उसे भी काफी शौक है हमारी तरह।
पेट के बल लेटना सीख लिया है , उल्टा होता है फिर सीधा, यही खेल दिन भर चलता है।   ३ दिन रहा मै वहाँ , पहले दिन तो मेरे पास आने पर रोने लगता।  हम दुर्गापूजा देखे गए।  पूरा शहर सजा हुआ था हर तरफ माँ की मुर्तिया ही  मुर्तिया थी , हर दस कदम पर भंडारा चल रहा था।  हमने स्वाति की नज़रो से उसका पूरा शहर देखा मनो ये एक अनोखा शहर हो।  अनोखा था भी, भीड़ नियंत्रित भी थी ऐसी कोई धक्का मुक्की नहीं थी जो हमें रस्ते में चलने पर परेशानी हो।  हम अंश को लेकर घूम रहे थे वो सो गया था सीने से चिपका हुआ था।  बहुत आनंद आ रहा था उसे अपने सीने से लगा कर।  रात १२ बजे वापस आए।  बहुत अच्छा लगा इस मौके पर जा कर. स्वाति भी   बहुत खुश थी मुझे अपने साथ पाकर ।

दूसरे दिन मेरा सामना हुआ अंश का।  धीरे धीरे वो मेरी गोद में रुक रहा था।  हल्का सा मुस्कुराता जब मै उसे पुचकारता।  स्वाति बोल रही थे लग रहा है दोस्ती हो  रही है, पूरा दिन अंश के आस पास ही गुजरा।

तीसरा दिन आया मेरे जाने का वक्त था जब जाने के लिए मैंने अंश को अपनी गोद में लिया तो वो मुस्कुरा रहा था।  मेरा उसे छोड़ कर जाने का बिलकुल भी मन नहीं कर रहा था।  पर मज़बूरी थी जाना तो था ही दिल पर पत्थर रख अंश और स्वाति से मैंने विदा ली।  रास्ते भर मेरा ध्यान दोनों पर ही था।

जल्दी ही वो दोनों लखनऊ आ जायेंगे फिर दिवाली है और उसके बाद दोनों नॉएडा मेरे पास।



Wednesday, October 8, 2014

याददाश्त

एग्ज़ाम हॉल में बैठकर हम यही सोचते हैं कि हमारी याददाश्त बहुत कमजोर है... लेकिन, जिससे कभी प्यार किया हो और उसे भूलना चाहो....
तो लगता है कि जैसे सारी दुनिया के काजू-बादाम हमने ही खा रखे हे ..!

हम भारतीय कितना थूकते है

मै अपने स्कूटर से रोज़ घर से ऑफिस जाता हूँ रास्ते भर बड़ी सावधानी से इधर उधर देखता रहता हूँ कही थूक का शिकार न हो जाऊ और मेरा नहाना बर्बाद न हो जाए।

कोई पान खा कर थूकता है,
कोई गुटका खा कर,
कोई कुछ न हो तो ऐसे ही थूकता है।

चाहे वो कार से हो,  पैदल हो, साइकिल से हो , बस में हो, सच मानो कही भी हो. बस थूक देते है।
इसमें औरत और मर्द में कोई भेद नहीं है दोनों खूब जम कर थूकते है।

" कभी कभी मुझे वो थूक वाला संवाद याद आ जाता है की अगर हम सवा सौ करोड़ लोग थूके तो पूरा पाकिस्तान डूब जायेगा"

शायद हम उसी दिन के इंतज़ार में है की एक दिन पाकिस्तान पर थूकने का मौका मिलेगा इसलिए हम अपनी आदत बनाए  रखना चाहते है।

आज एक साइकिल पर सवार एक सज्जन इधर देखा न उधर थूक दिया।  पीछे मै थे।  बाल-बाल बचा,  नहीं तो आज नहाना व्यर्थ हो जाता।  भाई को मैंने समझाया की भाई ऐसा मत किया करो  और आगे से ध्यान रखे।
ये बोल मै ऑफिस से लिए निकला लिया।

कभी कभी मेरा मन करता है की मै इन महानुभावो को सम्मान दू।

  

Tuesday, September 30, 2014

आम आदमी पार्टी- कब अक्ल आएगी

दिल्ली के चुनावो के दौरान मै आम आदमी पार्टी का घर समर्थक हुआ करता था ऑफिस में लोगो से उनके लिए वाद विवाद किया करता था दिल्ली में उनकी सरकार बनी, फिर गिरी, मै फिर भी उनके साथ था,  मगर समय के साथ मैंने देखा की वो हर वो चीज़ जो पहले से चली आ रही है उसका विरोध करने लगते है।  अभी तक जैसे कुछ अच्छा हुआ ही न हो।  पुरानी सरकारों का विरोध तो ठीक था।  बीजेपी का भी विरोध ठीक था।  धीरे धीरे जनतंत्र का भी विरोध।  बस अपने आपको ही सही बोलना बाकि सबका विरोध।  देश के आम चुनावो में उन्होंने कई खुलासे किये , चाहे वो नितिन गडकरी हो या प्रियंका की पति देव का ,   पर सबूत मांगने पर कुछ न दिया।  मानहानि के केस में जेल गए तो बांडभरने की जगह हाई कोर्ट का भी विरोध की सब कुछ बेकार हो. निरंकुश लोग है कोई अंकुश बर्दास्त ही नहीं करता चाहते है।  विरोधी राजनैतिक न हुआ व्यतिगत हो गया।  देश में सबको साथ ले कर चलना होता है न की सिर्फ अकेले अकेले।

उम्मीद करता हूँ की वक्त के साथ साथ इनको भी अक्ल आएगी और देश के लिए कुछ करेंगे।


हर अहसान की एक अंतिम तिथि होती है।



हर अहसान की एक अंतिम तिथि होती है। कुछ वक्त बाद उसका असर खत्म हो जाता है पर अहसान करने वाला अहसान को समय-समय पर याद दिलाता रहता है की उसने कभी कोई अहसान किया था।
मेरी पत्नी सच ही बोलती है की दर्द या दुःख सिर्फ चन्द दिनों के होते  है पर अहसान उम्र भर का होता है।


इस बात का अहसास कुछ दिनों पहले हुआ जब किसे ने फ़ोन किया की उन्होंने कभी किसी के लिए कुछ त्याग किया था और आज उन्हें उस त्याग का बदला चाहिए और दूसरी तरफ जिनके लिए उन्होंने त्याग किया था वो सब भूल कर अपना जीवन हर्षोल्लास के साथ जी रहे है।





Friday, September 26, 2014

पत्नी से माफ़ीनामा


सेवा में,
            पत्नी जी
             श्रीमती स्वाति शर्मा
             माता अंश राहुल शर्मा
महोदया ,
             सविनय निवेदन है की मै , राहुल शर्मा , पुत्र श्री राम कैलाश शर्मा एवं श्रीमती कृष्णावती शर्मा, आपसे  निवेदन करता हूँ की  मेरे द्धारा अतीत में की गयी सारी गलतियों के लिए माफ़ी  मांगता हूँ जिससे आपके ह्रदय को घात पंहुचा है।  मै आपसे ये वादा करता हूँ की मै वो गलतिया दोबारा नहीं करूँगा। कृपया नीचे लिखी पंक्तियों पर  ध्यान देने की कृपा करे जो मेरे भावनाओ को व्यक्त करती है जो ये दर्शाता की मै आपको  कितना अटूट प्रेम करता हूँ।



“मैं तुमसे और सिर्फ़ तुमसे प्यार करता हूँ. मेरी हर साँस, मेरी हर धड़कन, मेरे हर पल में तुम हो और सिर्फ़ तुम . मुझे यकीन है कि मैं सिर्फ़ इसलिए जन्मा हूँ कि तुमसे प्यार कर सकूँ और तुम सिर्फ़ इसलिए कि एक दिन मेरी बन जाओ. तुम मेरी हो, और अगर तुम अपने दिल से पूछोगी तो जान लोगी कि मैं सच कह रहा हूँ.”


अतः आपसे अनुरोध है की आप मुझे माफ़ करके मुझे असीम प्रेम की अनुभूति कराएगी ।
आपका आज्ञाकरी पति 
राहुल शर्मा 
आदि का बाप 

Sunday, September 21, 2014

सात्विक स्वाति राहुल शर्मा

स्वाति की प्रेग्नेंसी को नौ महीने हो चुके थे, उसका बीपी काफी बढ़ा हुआ था। फिर डॉक्टर ने कहा कि स्वाति को एडमिट कर दो, हम उसका बीपी सामान्य करने की कोशिश करेंगे, उसके बाद हम सामान्य डिलीवरी का प्रयास करेंगे। हमने कुछ ऐसा ही किया, मैं शनिवार को लखनऊ गया और डॉक्टर से मिलकर स्वाति को एडमिट करा दिया। उसे तीन टाइम एक छोटी-सी टेबलेट देनी थी और हर चार घंटे बीपी नापने कोई न कोई आता रहता था। उनके जाते वक्त मैं हर बात उनसे पूछता कि बीपी सामान्य है कि नहीं। वे बोलती थीं कि ठीक है। मैं स्वाति को बताता कि सब ठीक है, हिम्मत मत हारो, सब ठीक हो जाएगा। एक दिन बीता, फिर दूसरा दिन भी बीता, फिर आया सोमवार, डॉक्टर से मिलने का वक्त आ गया।

डॉक्टर के पास हम स्वाति को लेकर गए। डॉक्टर ने बोलीं, "हम डिलीवरी का प्रयास करने जा रहे हैं, आप काउंटर पर जाकर औपचारिकताएँ पूरी कर लें।" स्वाति घबराते हुए मैटर्निटी रूम में गई। हमने दीदी और माँ को फ़ोन किया और वे सब आ गए। थोड़ी देर बाद डॉक्टर ने हमें बुलाया और बोलीं कि बीपी काफी बढ़ा हुआ है, हम सामान्य डिलीवरी नहीं करा सकते, ऑपरेशन करना पड़ेगा। हमने डॉक्टर से कहा कि जैसा आपको सही लगे। "स्वाति और बच्चा दोनों सुरक्षित रहें, मुझे बस यही चाहिए।" थोड़ी देर के बाद स्वाति को ऑपरेशन थिएटर ले जाने के लिए मैटर्निटी रूम से बाहर निकाला। मैं वहीं स्वाति का इंतज़ार कर रहा था। तभी मुझे अपने भांजे आराव के जन्म का समय याद आया। उस रात मैं तो आराम से सो रहा था, पर मेरे जीजा (दीदी के पति) बेचैन थे और जैसे-जैसे प्रेग्नेंसी का समय बढ़ रहा था, दीदी की तकलीफ उनके चेहरे पर साफ नजर आ रही थी। उस समय मेरी भी हालत कुछ वैसी ही थी। बाकी सब बच्चे का इंतज़ार कर रहे थे, और मैं सिर्फ स्वाति का। बच्चा तो अपनी जगह सबसे कीमती होता ही है, पर उसे जन्म देने वाली सबसे ज़्यादा। मैंने स्वाति का हौसला बढ़ाया और स्वाति ऑपरेशन के लिए चली गई। हम वहीं बाहर इंतज़ार करने लगे। हम मन में स्वाति के सुरक्षित रहने की दुआ माँग रहे थे। बच्चे का ख्याल मन में कम और स्वाति का ज़्यादा था। बाकी घरवालों क्या सोच रहे थे, इसका अंदाज़ा हम नहीं लगा सकते थे।

थोड़ी देर के बाद एक नर्स आई और बोलीं, "राहुल शर्मा कौन हैं?" दीदी पास ही खड़ी थीं, वह झट से उनके पास गईं और देखा कि उनके हाथ में एक बच्चा है। दुनिया का सबसे ख़ूबसूरत सात्विक उनके हाथ में था। मुझे अंदर बुलाया और बच्चे को दिखाया और एक पेपर पर सिग्नेचर करने को बोलीं। वे बोलीं, "बेटा हुआ है। दो बजकर दो मिनट पर हुआ है।" मैंने पूछा, "स्वाति कैसी हैं?" उन्होंने बोला, "वह ठीक है, उन्हें आईसीयू में स्थानांतरित कर रहे हैं, आप वहीं मिल सकते हैं।" थोड़ी देर के बाद उन्होंने हमें बुलाया और बच्चे को हमारे हवाले कर दिया। उसे देखकर हम बहुत खुश थे। दीदी बेबी को लेकर कमरे में गईं। डॉक्टर ने बोला था कि उसे हर दो घंटे पर दूध पिलाती रहना। बच्चे की माँ अभी आईसीयू में ही रहेगी। शाम को हम स्वाति से मिलने गए। स्वाति ठीक थीं, उन्होंने बच्चे की झलक ही देखी थी। हमने बोला, "बच्चा ठीक है, बस तुम जल्दी से ठीक होकर आ जाओ।" फिर मैं वापस कमरे में आ गया। थोड़ी देर बाद बच्चे की नानी और मां भी आ गईं। वे भी बहुत खुश थे, मिठाई लेकर आए थे। नीलम बुआ भी आईं। मुकुल के डूबे हुए पैसे भी वापस मिल गए, सात्विक के होते ही वह भी मिठाई लेकर आया सबके लिए। धीरे-धीरे लोग आते रहे और बच्चे को देखने लगे, पर मेरा मन स्वाति में ही लगा हुआ था। उसे देखने को मेरा मन कर रहा था। रात आँखों-आँखों में ही चली गई। सुबह खबर आई कि कुछ देर के बाद स्वाति को कमरे में ला रहे हैं। हम दोनों को एक साथ देखने के लिए बहुत खुश थे। वह वक्त भी आ गया जब स्वाति, मैं और हमारा सात्विक एक साथ थे। स्वाति को गले लगाने का मन कर रहा था और यह बोलने का मन कर रहा था कि वह दुनिया की सबसे ख़ूबसूरत लड़की है और उसने मुझे दुनिया का सबसे ख़ूबसूरत उपहार दिया है।

हम तीन दिन वहीं रहे, रोज़ सुबह पाँच बजे हम सात्विक को धूप में ले जाते। थोड़ी देर रहते फिर आ जाते। मैंने कुछ और बच्चों को भी देखा, उनकी नानी या दादी बच्चे को लेकर धूप दिखाने आती थीं। स्वाति की माँ के पैरों का ऑपरेशन हुआ था, इसलिए वह नहीं आ सकती थीं। इस कारण मुझे आना पड़ता था।

जब हम सात्विक को धूप दिखाने के लिए आते थे, तो हमें यह पता लगा कि एक ही दिन में लगभग पाँच बच्चे हुए थे, वह भी सारे लड़के। हमने देखा कि एक छोटे से बच्चे के मुँह में तो दो दाँत थे। हम देखकर अचंभित थे। वह कैसे दूध पिएगा?

वह दिन आ गया जब हम स्वाति को घर ले जा सकें। डॉक्टर ने बोलीं, "अब हम स्वाति को डिस्चार्ज कर रहे हैं, आप औपचारिकताएँ पूरी कर लें।" मैंने सारी औपचारिकताएँ पूरी कीं और कार से स्वाति को ले जाने के लिए तैयार हुए। हम घर पहुँचे, माँ ने आरती की, फिर हम सात्विक को घर ले आए। साथ में सात्विक की नानी भी थीं। उन्होंने सात्विक और स्वाति का दिन-रात ख्याल रखा। सात्विक दिनभर सोता और रात भर जागता था। नानी रात भर जागकर उसे चुप करातीं और मैं चुपचाप यह देखता कि कैसे चुप कराते हैं। सात्विक को नानी के हवाले करके मैंने खूब चैन की नींद भी ली। असली मज़ा उनके जाने के बाद ही पता लगा कि बच्चा संभालना बच्चों का काम नहीं है।

सात्विक की छठी आई। हम घरवाले ही थे - दीदी, निशि, नेहा, सात्विक की नानी और बाकी पूरा परिवार। पूरा देसी खाना बना - उड़द की दाल, दही बड़े, पूरी, खीर, मिक्स्ड सब्ज़ी और चावल। हमने खूब जमकर खाया। स्वाति ने भी खाया। फिर बाद में पता लगा कि स्वाति जो कुछ भी खाएगी, उसका असर सात्विक पर होगा। गरिष्ठ भोजन बच्चे को नुकसान कर सकता है।

मैं एक हफ़्ते स्वाति और सात्विक के साथ लखनऊ में रहा और लगा कि जीवन का असली मज़ा यही है। नोएडा आना मेरे लिए काफी कष्टकारी रहा। दोनों की याद बहुत आती रही। हर पंद्रह दिन पर लखनऊ जाता रहूँगा।

सवा महीने में हमने बरही की दावत की। पूरा परिवार साथ था - नानी-नाना, मौसा-मौसी, मामा, चाचा, दादी-दादा, बुआ-फूफा, सब थे। हमने मज़े से दावत की, मेहमानों का स्वागत हुआ, खान-पान हुआ। हर्षोल्लास के साथ सात्विक का पहला फंक्शन हुआ। सुबह कथा हुई थी। पापा और माँ ने सात्विक को लेकर कथा सुनी। सात्विक की सारी बुआओं को हमने उपहार दिए।

सात्विक, मेरा और मेरी पत्नी स्वाति का सात्विक। सात्विक का जन्म 19 मई, 2014 को लखनऊ के सेंट जोज़फ़ हॉस्पिटल में दोपहर दो बजकर दो मिनट पर हुआ। कुछ एहसास बयान नहीं किए जा सकते हैं। अचानक खुशी और ज़िम्मेदारी का एहसास होने लगा। पहली बार किसी के लिए रात-रात भर जागना कोई काम नहीं, बल्कि एक ज़िम्मेदारी है। सात्विक को हुए दो दिन ही हुए थे। सबने कहा कि यह दिन में सोएगा तो रात को जागेगा। फिर मैंने उसे जगाने की कोशिश की। वह जागा और रोने लगा। साँसें रुक सी गई थीं, दिल धक-धक करने लगा। फिर माँ ने उसे अपने सीने से लगाया, तब जाकर वह ठीक हुआ। तब से मैंने यह फ़ैसला किया कि मैं इसे सोते हुए कभी नहीं जगाऊँगा।

मेरे गुमशुदा भाई- तेरे बिना कुछ कमी सी है !!!


मेरे गुमशुदा भाई ,
एक वक्त था , जब हम दिन-रात, सुबह -शाम सातो दिन एक साथ रहने के लिए बहाना ढूंढा करते थे। मैं अपनी हर छोटी बड़ी बात तुमसे साझा करने पर, कितना सकून मिलता था, इसका तो कोई अंदाज़ा ही नहीं। आप मेरी ख़ामोशी भी पढ़ लेते थे। मैंने जो कुछ भी सीखा है अपनी ज़िन्दगी में, तुमसे ही सीखा। आपने मुझे एक नजरिया दिया जो आज भी मुझे हर पल अपने आपको पहचाने में सहायता करता है और मैंने अपने आप को प्यार करने की कला भी आपसे ही सीखी। कोई ऐसा दिन शायद न आया हो जिस दिन आपको न याद करु, मै इसलिए आपको याद नहीं करता की आपसे बहुत प्यार करता हूँ। बल्कि इस लिए की आपको जीता हूँ।

मुझे अंदाज़ा तो है की आप मुझसे क्यों रूठे, आज करीब २ साल होने को है, हमने बात नहीं की, नाराज़गी का कारण भी हमने शेयर नहीं किया, हमने वो सरे रस्ते बंद कर दिए जिस के द्धारा हम एक दूसरे से संपर्क कर सकते थे। मुझे आगे आने वाले वक्त में भी उम्मीद नहीं है की हम कभी एक साथ बैठ कर बात करेंगे।
मै सिर्फ एक बात जनता हूँ आगे आने वाले वक्त में भी मै आपको जीता रहूँगा, मेरे ज़िन्दगी में आपकी छवि हमेश दिखेगी। आप मेरे नज़दीक रहो या दूर। आप कही भी रहो। मुझे इससे फर्क नहीं पड़ता। 

 तू इस तरह से मेरी ज़िन्दगी में शामिल है॥

जहाँ भी जाऊँ ये लगता है तेरी महफिल है "

Saturday, September 20, 2014

जन्मास्टमी में श्री कृष्ण के दर्शन - स्कॉन टेम्पल


इस जन्मास्टमी हम अपने भाई और भाभी के साथ श्री कृष्ण जी के दर्शन करने की लिए स्कॉन टेम्पल गए। भीड़ देख हमने ये फैसला किया की हम बाहर से ही दर्शन कर लेंगे और फिर भाभी अपना व्रत तोड़ देंगी और हमे ये सन्तुस्टी मिल जाएगी की हमने उनके दर्शन किये, पर हमारी किस्मत कहाँ  इतने तेज़ थी। हम बहार से दर्शन तो क्या मंदिर के पास तक न भटक सके, इतनी भीड़ थी की देख मन विचलित होने लग।

 गार्ड भाई से हमने हज़ारो बार  मिन्नतें की कि वो हमे पास जाने दे, पर उनसे ये हो न सका। फिर मेरे मन में विचार आया यदि भगवन को सबके लिए सबके सामने लाया जाये वो सबके लिए उपलब्ध हो. की सभी दर्शन कर सके बिना लाइन लगाये बिना धक्का मुक्की किये। हर मंदिर में ये सुविधा हो की कोई भी कभी भी दर्शन कर सकते। फिर चाहे कोई भी त्यौहार हो। श्री राम का जन्म हो या श्री कृष्णा है। हर भक्त दर्शन पाये वो भी बिना किसी तकलीफ के। हम ये विचार ले कर वापस आए और एक छोटे से मंदिर में जी भर के अपने भगवन के  दर्शन किये,  भाभी ने व्रत तोडा और हम अपने भगवन से संवाद कर के खुश हुए।

टनटन की ऑनलाइन शॉपिंग - कूपन लगाया है-


मेरा मित्र टनटन,
 हम एक साथ हम बड़े हुए,   कॉलेज में पढ़े, एक ही शहर में नौकरी करते है। टनटन ऑनलाइन शॉपिंग में काफी आगे रहता है। अक्सर जब मै उसके पास जाता हूँ,  तो वो बोलता है, देखो मैंने उस साइट से खरीदा है। अंदाज़ा लगाओ कितने का होगा, फिर हम अंदाज़ा लगाने में जुट जाते। अंदाज़े से अगर मैंने बोला की ये सारा सामान १५०० रुपया का है. तब वो बोलता है, न रे ये तीनो सामान ३००० रुपए के है पर मैंने कूपन लगाया और ये सारा सामान मात्र ७५० रुपए में मिल गाय। हमारी आँखे खुली रह जाती। एक दिन मैंने भी बोला भाई मेरे लिए भी कुछ ले दो और उसमे कूपन लगा देना फिर वो मुझे भी सस्ता सामान मिल जायेगा। फिर वो बोलता है की तुम्हे नहीं मिलेगा इतना सस्ता। बस ये जुगाड़, कूपन पे कूपन लगाने पड़ते है तब जा करे इतना सस्ता मिलता है।

 कूपन कहाँ से मिलता है ये रहस्य आज भी मेरे मन मस्तिस्क में है। मै भी सस्ता सामान खरीदू ऑनलाइन कूपन लगा के। कुछ जुगाड़ कोई हमें भी बताए। यदि आपको इस रहस्य का तोड़ पता हो तो कृपया मेरे इस पोस्ट पर कमेंट करे और इस रहस्य का पर्दा फास करे।
 धन्यवाद

Friday, September 19, 2014

दीपिका का क्लीवेज


ये खबर मैं गूगल न्यूज़ पे पढ़ रहा है तो मुझे समझ में नहीं आया की माजरा क्या है ऐसा क्या बोला टाइम्स ऑफ़ इंडिया न्यूज़ पेपर वालो ने क्योंकि क्लीवेज का मतलब ही नहीं पता था। मुझे, मैंने शब्दकोष की मदत ली फिर पता लगा असल में माजरा क्या है। दीपिका जा जवाब बिलकुल सटीक और संतुलित था। यदि हम ठान ले की हम हर उस व्यक्ति की बातो का ऐसे ही जवाब देंगे तो किसी की हिम्मत नहीं होगी किसी भी महिला को कुछ भी बोलने को।

माँ बहन की गालियां


कॉलेज में था तब लोग जम कर एक दूसरे को गालिया देते है। जितनी गालिया उठनी गहरी दोस्ती। गलियो से कही दोस्ती होती है। यही प्रवत्ति आगे चल कर उनके चरित्र शामिल हो जाती है। फिर जब वो ऑफिस में जाते है. शादी हो जाती है। गालिया भरपूर बहार निकलती है। असली गालिया तो चौराहो पे निकलती है जब उनकी गाड़ी की टक्कर किसे गाड़ी से हो जाती है।

दो प्रेमी - चिपक कर बैठो

आज मेरे एक मित्र ने कुछ ऐसा कहा जिसपर मुझे बहुत गुस्सा आया.
 वो बोला देखो वो दोनों (लड़का और लड़की ) कितने चिपक बैठे है गाड़ी पर। प्रेम का प्रदर्शन करना है तो घर पर करे। फिर मेरे मन में विचार आया की पता नहीं लोगो को क्यों परेशानी होती है अगर दो प्रेम करने वाले चिपक कर बैठे है। मैंने बोला मोहदय तुम अभी अपनी पत्नी के साथ ऐसा क्यों नहीं करते, तुम दोनों भी चिपक पर बैठा करो अपनी बाइक पर। वो बोला मेरे पास तो बाइक ही नहीं है। मैंने बोला कोई बात नहीं ये प्रयाश तुम नगर बस में कर सकते हो तुम अपनी पत्नी के साथ, पीछे वाली सीट पर हाथ पकड़ कर बैठो. और थोड़ा नज़दीक नज़दीक बैठो और प्रेम वार्ता करो। मेरे इस बात पर वो असहज हो रहा था। की जैसे मैंने कोई बहुत बड़ी बात बोल दी हो . अपनी पत्नी के साथ प्रेम का प्रदर्शन करने में शर्म आती है और यदि कोई और प्रेम प्रदर्शित करता है तो तकलीफ होती है और फिकरे कसे जाते है. वो शांत रहा और कुछ न बोल. मैंने बोला मै ऐसा करता हुँ. अपनी पत्नी को बोलता हूँ वो चिपक कर बैठे जैसा मै चाहता था की कोई लड़की मेरे साथ चिपक कर बैठे मेरे बाइक पर।