अंश के होने के बाद स्वाति पहली बार अपने मायके गयी थी तबसे लगभग २ महीने हो गए मै दोनों से नहीं मिला था। कुछ दिन पहले गांधी जयंती और विजयदशमी की छुट्टी में मै फैज़ाबाद गया और अंश से मिला। वो मुझे ऐसे देख रहा था जैसे कभी देखा ही न हो। मेरा चेहरा देखता फिर स्वाति का। कोई भाव नहीं था उसके चेहरे पर। थोड़ी देर बाद उसके चेहरे पर रोने का भाव देख मैंने झट से उसे स्वाति को पकड़ा दिया।
थोड़ा बड़ा हो गया है अब, पहचानने लगा है सबको, कई चीज़े सीख ली है अंश ने। खूब तेज़ तेज़ चिल्लाता है, घूमने का उसे भी काफी शौक है हमारी तरह।
पेट के बल लेटना सीख लिया है , उल्टा होता है फिर सीधा, यही खेल दिन भर चलता है। ३ दिन रहा मै वहाँ , पहले दिन तो मेरे पास आने पर रोने लगता। हम दुर्गापूजा देखे गए। पूरा शहर सजा हुआ था हर तरफ माँ की मुर्तिया ही मुर्तिया थी , हर दस कदम पर भंडारा चल रहा था। हमने स्वाति की नज़रो से उसका पूरा शहर देखा मनो ये एक अनोखा शहर हो। अनोखा था भी, भीड़ नियंत्रित भी थी ऐसी कोई धक्का मुक्की नहीं थी जो हमें रस्ते में चलने पर परेशानी हो। हम अंश को लेकर घूम रहे थे वो सो गया था सीने से चिपका हुआ था। बहुत आनंद आ रहा था उसे अपने सीने से लगा कर। रात १२ बजे वापस आए। बहुत अच्छा लगा इस मौके पर जा कर. स्वाति भी बहुत खुश थी मुझे अपने साथ पाकर ।
दूसरे दिन मेरा सामना हुआ अंश का। धीरे धीरे वो मेरी गोद में रुक रहा था। हल्का सा मुस्कुराता जब मै उसे पुचकारता। स्वाति बोल रही थे लग रहा है दोस्ती हो रही है, पूरा दिन अंश के आस पास ही गुजरा।
तीसरा दिन आया मेरे जाने का वक्त था जब जाने के लिए मैंने अंश को अपनी गोद में लिया तो वो मुस्कुरा रहा था। मेरा उसे छोड़ कर जाने का बिलकुल भी मन नहीं कर रहा था। पर मज़बूरी थी जाना तो था ही दिल पर पत्थर रख अंश और स्वाति से मैंने विदा ली। रास्ते भर मेरा ध्यान दोनों पर ही था।
जल्दी ही वो दोनों लखनऊ आ जायेंगे फिर दिवाली है और उसके बाद दोनों नॉएडा मेरे पास।
थोड़ा बड़ा हो गया है अब, पहचानने लगा है सबको, कई चीज़े सीख ली है अंश ने। खूब तेज़ तेज़ चिल्लाता है, घूमने का उसे भी काफी शौक है हमारी तरह।
पेट के बल लेटना सीख लिया है , उल्टा होता है फिर सीधा, यही खेल दिन भर चलता है। ३ दिन रहा मै वहाँ , पहले दिन तो मेरे पास आने पर रोने लगता। हम दुर्गापूजा देखे गए। पूरा शहर सजा हुआ था हर तरफ माँ की मुर्तिया ही मुर्तिया थी , हर दस कदम पर भंडारा चल रहा था। हमने स्वाति की नज़रो से उसका पूरा शहर देखा मनो ये एक अनोखा शहर हो। अनोखा था भी, भीड़ नियंत्रित भी थी ऐसी कोई धक्का मुक्की नहीं थी जो हमें रस्ते में चलने पर परेशानी हो। हम अंश को लेकर घूम रहे थे वो सो गया था सीने से चिपका हुआ था। बहुत आनंद आ रहा था उसे अपने सीने से लगा कर। रात १२ बजे वापस आए। बहुत अच्छा लगा इस मौके पर जा कर. स्वाति भी बहुत खुश थी मुझे अपने साथ पाकर ।
दूसरे दिन मेरा सामना हुआ अंश का। धीरे धीरे वो मेरी गोद में रुक रहा था। हल्का सा मुस्कुराता जब मै उसे पुचकारता। स्वाति बोल रही थे लग रहा है दोस्ती हो रही है, पूरा दिन अंश के आस पास ही गुजरा।
तीसरा दिन आया मेरे जाने का वक्त था जब जाने के लिए मैंने अंश को अपनी गोद में लिया तो वो मुस्कुरा रहा था। मेरा उसे छोड़ कर जाने का बिलकुल भी मन नहीं कर रहा था। पर मज़बूरी थी जाना तो था ही दिल पर पत्थर रख अंश और स्वाति से मैंने विदा ली। रास्ते भर मेरा ध्यान दोनों पर ही था।
जल्दी ही वो दोनों लखनऊ आ जायेंगे फिर दिवाली है और उसके बाद दोनों नॉएडा मेरे पास।
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