Tuesday, April 29, 2025

एक स्टेटस जिसने ज़िन्दगी का रुख ही बदल दिया

एक रिश्ते में टिकट क्यों नहीं हो, इतने सस्ते हो तो फिर बिकते क्यों नहीं हो, प्यार, अदब, तहज़्ज़ेब सलीका, ये ढोंग क्यों जैसे हो वैसे दिखते क्यों नहीं हो!

मेरे ही मित्र ने मेरे लिए कभी अपने व्हाट्सएप स्टेटस में लगाया था। थोड़ी नाराज़गी क्या हुई पूरा का पूरा मेरा चित्रण ही बदल गया। 
ठहर कर मुझे अपने आप के बारे में सोंचने पर मजबूर कर दिया। यदि में सरल दिखता हूँ तो क्या बाकी लोग मेरे लिए कठिन बन जाएंगे। 
आति हर चीज़ की बुरी होती है चाहे वह प्रेम हो या मित्रता। जब ज़्यादा शुद्ध मिलने लगता है तो देखा गया है कि उसे पाचन उतना ही मुश्किल हो जाता है। 

अब मैं कभी किसी के लिए इतना सुलभ नही रहूंगा। ढोंग शब्द कही मेरे दिल मे एक कील की तरह चुभ गया है। कोशिश है कि कभी यह कील मेरे दिल से निकल जाए। 

Sunday, February 16, 2025

एक प्रेम कहानी - शक्ति में भक्ति

कॉलेज के दिनों के दो दोस्त बहुत मशहूर थे अपनी दोस्ती के लिए।  वे थे, रोहित और अमित। दोनो इतने घनिष्ट मित्र थे कि एक दूसरे के बिना रह नही सकते थे। जहां अमित जाता वही रोहित भी,  दोनो भाई की तरह हमसाये थे, शोले नई नही आई थी, जय और वीरू की उपमा रोहित और अमित से की जाती थी। 
कॉलेज खत्म हुआ तो दोनों ने एक दूसरे से वादा किया कि जब भी उनकी शादी होगी, अगर किसी को लड़का हुआ और दूसरे को लड़की, तो दोनों ज़िन्दगी भर के एक रिश्तेदार बन जाएंगे। फिर वो कभी भी एक दूसरे से अलग नही होंगे। क्योंकि रिश्तेदार बिछड़ते नही है। 

कॉलेज के बाद दोनों अपनी अपनी मंज़िल की तरफ बढ़ चले, दोनो सरकारी नौकरी करने लगे, नौकरी के बाद दोनों की शादी हुई, अब दोनो को इंतज़ार करने लगे कि कौन पहले बाप बनेगा। 
रोहित ने जल्दी ही अमित को खुशखबरी दी कि वह बाप बनाने वाला है। अब दोनों ईश्वर से प्रार्थना कर रहे थे कि लड़का हो नही तो बड़ी लड़की से छोटा लड़का शादी नही करेगा। 
प्रसव के दिन आ गया, अमित पहली गाड़ी पकड़ रोहित के घर आ गया। दोनो अस्पताल के बाहर इंतज़ारकर रहे थे कि रिजल्ट क्या होगा। तभी नर्स आयी और बोली कि दिव्या के पति कौन है?
तभी अमित, रोहित हो बुलाता है कि उसे नर्स बुला रही है। रोहित को नर्स अपने साथ ले गयी, थोड़ी देर बाद जब रोहित बाहर निकल तो खुशी में चिल्लाता हुआ बोला, बेटा हुआ है। 
अमित की भी खुशी का कोई ठिकाना नही था।

अबकी बारी थी अमित की, लाख कोशिशें करने के बाद उसे संतान की प्राप्ति नही हो पा रही थी। देश के कोने कोने में घूम घूम कर थक गए थे। पर कुछ हासिल न हुआ। तभी एक आयुर्वेदिक डॉक्टर मिला जिसने उनके अंदर उम्मीद जगाई की वह कुछ कर सकता है। 

इलाज चालू हुआ। रिजल्ट आने में 6 महीनों से ज़्यादा लग गए। पर एक दिन खुशखबरी आयी की अब अमित भी बाप बनाने वाला है। रोहित मिठाई की पूरी टोकरी लेकर अमित से मिला।
अब इंतज़ार था कि लड़का होगा या लड़की?
घड़ी की सुनियाँ जैसे जैसे आगे बढ़ रही थी, दिलो की धड़कन भी उतनी ही तेज़ थी। 
तभी फिर से वही मंज़र दोहराया गया, नर्स आयी और बोली, कामना के पति कौन है। अमित भागता हुआ गया, थोड़ी देर बाद वापस आया है चिल्ला कर बोला।

बेटी हुई है.....
अब से हम समधी..
दोनो दोस्तो में खुशी का कोई ठिकाना नही रह।
मिठाइयां बटवाई गयी। 
छट्ठी बरही में क्या धूम थी बिटिया की। 
दोनो दोस्तो के परिवार वाले इकट्ठा थे, सबको बताया गया कि जब दोनों बच्चे बड़े हो जाएंगे तो हम दोनों की शादी करा देंगे और हम समाधी बन जाएंगे। 
वक्त बीत रहा था अब दोनों दोस्त अपने अपने कामो में व्यस्त हो गए, और बच्चे भी धीरे धीरे बड़े हो रहे थे। साल में एक दो बार परिवार इकट्ठा हो जाता था। 

बच्चो को अभी अहसास नही था कि दोनों की शादी पहके से तय है, दोनो दोस्त की तरह बड़े हो रहे थे। तभी अमित का ट्रांसफर कही दूर दूसरे प्रदेश में हो गया। अब दोनों का मिलना बहुत ही मुश्किल हो गया था। 
राघव जो कि लड़के का नाम था और शिखा लड़की का नाम है। राघव पढ़ने में तेज़ और होशियार था। जबकि शिखा नाज़ों से पाली थी, हर नखरे उठाये गए थे, नखरीली थी, पढ़ना तो उसके बस की बात नही थी, राजकुमारी की तरह पाली होने के कारण उसके मिज़ाज़ भी गर्म थे। 
उधर राघव तेज़ तर्रार, बुद्धिमान था , घर के सामने रहने वाले कपिल को राघव से बहुत ज़्यादा प्रतियोगिता थी। नंबर दोनो के ठीक ही आते थे, राघव अपनी पढ़ी पूरी कर रात में अपने कमरे की लाइट जल कर दूसरे कमरे में सो जाता था। कपिल को अक्सर लगता था कि राघव रात भर पड़ता है तो वो भी रात भर पड़ता था। सुबह स्कूल में कपिल को नींद आती रहती थी। और राघव बड़े आराम से दोस्तो के साथ मस्ती करते हुए क्लास करता था। 
राघव ने पढ़ाई पूरी की, और इंजीनियरिंग करने के बाद नौकरी की तलाश करने लगा, तभी रोहित ने एक दिन राघव को बताया कि उसकी शादी तय कर दी थी उसके बचपन मे ही,  लड़की का नाम शिखा है। 

तभी राघव ने बोला वही अमित अंकल की बेटी शिखा, रोहित ने बोला हाँ वही। राघव ने बोला लड़की ठीक है पर उसे पसंद नही है पत्नी के रूप में। रोहित गुस्से से आग बबूला हो गया। राघव को खूब खरी खोटी सुनाई, और बोला तुम्हारी शादी तो वही होगी, जल्दी से नौकरी ढूंढो और शादी करो। इसके अलावा कुछ नही सुनना है। 
राघव ने नौकरी की तलाश जारी की, पर नौकरी थी जो कि मिल ही नही रही थी। साल भर बीत गया नौकरी हाथ न लगी पर प्रयाश जारी रहा। 

रोहित ने अमित से मिलकर, रश्मो पर चर्चा करने के लिए उसके घर पहुँचा, साथ मे राघव की चचेरी बहन इंदिरा भी थी। जब परिवार इकट्ठा हुए तो इंदिरा ने अपनी होने वाली भाभी से कुछ प्रश्न पूछने की अनुमति मांगी, राघव ने ही प्रश्नों की लिस्ट इंदिरा को सौपी थी, जैसे जैसे इंदिरा प्रश्न पूछ रही थी शिखा का पारा चढ़ता जा रहा था। एक प्रश्न पर शिखा के सब्र का बांध टूट गया, इंदिरा को ऐसे खरी खोटी सुनाई की रोहित आश्चर्य में खड़ा हो गया। इधर इंदिरा और राघव शांत बैठे रहे। 

शिखा का यह रूप देख सब चकित थे, दूसरे ही दिन रोहित ने घर वापसी कर ली। 

घर आते ही राघव की माँ दिव्या ने मोर्चा संभाला, रोहित और दिव्या जम कर बहस शरू हुई , दिव्या ने साफ मन कर दिया शिखा को बहू बनाने से, पर रोहित के सपना था कि बच्चो की शादी करा कर रिश्तेदार बने। 

सपना जब टूटता है तो बहुत दर्द होता है।
अमित बार बार फोन कर शिखा द्वारा की गई गलती की माफी मांग रहा था। शिखा से भी माफी मनवाई गयी, पर शिखा अपने ही रंग में थी। 

रोहित ने एक बार और कोशिश करने की कोशिश के पर दिव्या अपने निर्णय से टस से मस नही हो रही थी। रिश्तेदारी को बुलाया गया कि किसी तरह दिव्या मान जाए, पर ऐसा हो न सका और अब यह आलम है कि रिश्ता टूटने की कगार पर था, बचपन की दोस्ती आज अंतिम सांस ले रही थी। 

रोहित ने राघव को पास बुलाया और उसे भी समझने की कोशिश करी, राघव ने भी मना कर दिया। तनाव में रोहित की ताभियत खराब होने लगी, समझ ने आ रहा था कि अमित को कैसे मना करे। 
महीनों चली वार्ता के बात रोहित ने थक हार कर अमित को फ़ोन पर मना किया कि हम रिश्तेदार नही बन पाएंगे। अब दोनों की दोस्ती टूट चुकी थी, बचपन का दोस्त अब बिछड़ गया था। 
रिश्ता टूटने की खबर जब राघव को लगी ना थी कि उसकी नौकरी लग गयी, एक नही दो दो। 
राघव ने ट्रेनिंग के लिए दूसरे प्रेदेश जाने की अनुमति मांगी और निकल लिया अपने घर से दूर। 

ट्रेनिंग में बिजी हो गया राघव, महीनों बीत गए राघव घर नही आया। इधर रोहित और दिव्या परेशान होने लगे। एक दिन फोन की घंटी बजती है और राघव बोलता है, माँ मेरी शादी है 10 दिन में आप आ जाना, मैं ट्रेन की टिकट भिजवा रहा हूँ। 
रोहित को काटो तो खून नही, समझ नही आ रहा था कि क्या किया जाए, अपनी ही औलाद इतना बड़ा निर्णय ले रहा है और माँ बाप को बताया ही नही। 
लड़की कौन है, किस कुल की है, किस समाज की है कुछ बताया ही नही बस शादी करने जा रहा है, यह सारे प्रश्न लेकर रोहित अपने छोटे भाई इंदिरा के पापा मोहित के पास पहुचे। उन्हें यह भी डर था कि कही किसी ने जादू टोना तो नही कर दिया है उनके बेटे पर। 
पूजा पाठ भी कराया गया कि सारा जादू टोना खत्म हो जाये। मन्नते मांगी गई, धागे बंधे गए, अलग अलग चौखटों के दरवाजे खटखटाये गए, ना जाने कहाँ कहाँ सजदे किये गए।  पर हुआ कुछ नही क्योंकि प्रेम था दोनो में। 

राघव अपने चाचा की बात सुनता था। मोहित ने फ़ोन पर बात की राघव से, और बोला पहले घर तो आओ, लड़की की फ़ोटो दिखाओ, अगर लड़की अच्छी होगी तो मैं खुद भाई से बात करूंगा की लड़की को स्वीकार कर ले। 

राघव राज़ी हो गया, छुट्टी ले राघव घर आया। साथ मे लड़की की फ़ोटो भी लाया। सारा परिवार इकट्ठा हुए, सबको फ़ोटो भी दिखाई गई, चाचा ने लड़की की फ़ोटो देखते ही कहा कि वाह!!! क्या पसंद है लड़के की !! 
नाम पूछने पर पता लगा कि लड़की का नाम शक्ति है। तभी चाचा के मुझ से निकला। 

शक्ति में भक्ति या भक्ति में शक्ति

 लड़की तो बहुत ही सुंदर है, भाई साहिब तो सात जन्मों तक ऐसी लड़की ढूँढते, तब भी नही खोज पाते। हमारी बिरादरी और जान पहचान में ऐसी कोई लड़की है ही नही। पर माँ बाप को वो पसंद नही आई, उन्हें लगता था कि लड़के को लड़की ने जाल में फसा लिया है, नौकरी लगी नही की लड़का हाथ से गया। 

इंदिरा को भी बहुत उत्सुकता हो रही थी कि भइया को भाभी मिली कैसे। तब शरू हुई प्रेम कहानी का विवरण।

किस्सा कुछ यूं है कि, 
ट्रेनिंग के दौरान उनके मित्र के पैरों में चोट लग गयी, तो उन्हें हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया, मित्र से मिलने वो हर शाम जय करते थे, उनके बेड के बगल में एक और व्यक्ति जो कि उन्ही के आफिस में काम करते थे वो भी पैरो में चोट लगने के कारण भर्ती थे, हमारी होने वाली भाभी, उनकी बहन थी, वो भी अपने भाई की देख रेख के लिए वही रहा करती थी, भाई पहली ही नज़र में लट्टू हो गए, बस क्या था, उन्हें देखने और मिलने का बहाना ढूंढने लगा, इसी बीच, भाई ने उनके बारे में सब पता लगाया, जैसे कि 
नाम क्या है।
कहाँ की रहने वाली है।
उनके परिवार में कौन कौन है। 
कितनी पढ़ी लिखी है।
कितने भाई बहन है।
कोई बॉयफ्रेंड तो पहले से नही है। 

जब सबकुछ पता लग गया और उनके भाई की हॉस्पिटल से छुट्टी हो गयी तो एक दिन उनके घर जा कर उनसे विवाह का प्रस्ताव रखा।

किसी अजनबी से कैसे कोई अपनी बहन का विवाह कर दे। फिर उन्होंने भी अपनी तरफ से तहिकीकात की, तसल्ली होने के बाद और बार बार आग्रह करने पर भाभी के घर वाले भी तैयार हो गए। 
अब वक्त आया विवाह का, कोर्ट में जाकर विवाह करना तय हुआ, दहेज में कुछ भी ना लेने का निर्णय लिया राघव ने, उधर राघव ने अपने घरवालो को बताया कि इस दिन विवाह है, आप आ जाईयेगा नही तो आपके बिना भी शादी हो जाएगी।

घर मे हलचल मच गई। 

लाख मनाने के बाद माता पिता ने माने, भाई भाभी के शामिल न होने पर चाचा ने भी अपनी असमर्थता जताई पर पूरा आशिर्वाद दिया। राघव के वापस जाने का समय हो गया था। राघव के बचपन बचपन के मित्र महेश उनके विवाह में शामिल हुए। 

जब विवाह गो गया, तस्वीरे रोहित और दिव्या के पास भिजवाई गयी, और राजीव ने विवाह कर लिया है यह खबर पूरे मोहल्ले और बिरादरी में फैल गयी, तब जा कर रोहित ने फैसला लिया कि सामाजिक तौर पर इन दोनों को स्वीकार कर लिया जाए, नही तो बिरादरी में कही भी मुँह दिखाना मुश्किल हो गायेगा। 
दिव्या ने राघव को फोन किया कि हम तुम दोनों को स्वीकार करते है, बहू को लेकर घर आओ हम बहू को सामाजिक रीति रिवाज से विवाह संपन्न कराएंगे और स्वीकार करेंगे। 

छुट्टी ले राघव, शक्ति के साथ घर आया। पूरा खानदान स्टेशन लेने गया बहू को, घर पहुचते ही बैंड बाजा बजने लगा, खुशी की लहर दौड़ गयी।
पारंपरिक तौर पर विवाह कराया गया, रिसेप्शन हुआ, सबने वर वधू हो ढेर सारी शुभकामनाये दी। 

सबकुछ अच्छे से होने के बाद भी रोहित-दिव्या, शक्ति को दिल से अपना नही पा रहे थे, दिव्या का व्यवहार तो ऐसा था जैसे शक्ति ने राघव को जादू टोने से फसा लिया है। बहू से इतनी उम्मीदे पाल रखी थी कि उसे पूरा करना बहुत ही मुश्किल था। 

शक्ति अलग परिवेश में पाली थी, घर का काम करती तो थी पर वैसे नही जैसे दिव्या चाहती थी, खाना बनाने में वो दिव्या का स्टैंडर्ड से मैच ही नही कर पा रही थी, शक्ति के हर काम पर तंज बहुत ज़्यादा ही हो रहा था। 

राघव और शक्ति के बीच मित्रवत व्यवहार भी रोहित और दिव्या को पसंद नही आ रहा था, दिव्या चाहती थी कि शक्ति पारंपरिक पत्नी जैसा व्यवहार करें। सुबह उठे, राघव और हमारे पैर छुए। घूँघट करें, पायल पहने और पैरों से छन छन की आवाज़ आये। 
शक्ति पूरा  प्रयास कर रही थी कि वह अपनी सास का दिल जीत सके पर लाख कोशिश करने के बाद भी ऐसा हो न सका, और एक दिन रागव ने हवाई जहाज का टिकट कटाया और उड़ गया अपनी पत्नी के साथ हमेशा के लिए। 







Saturday, February 15, 2025

मरीना बीच- एक बुरा अनुभव

परिवार के साथ पहला हवाई सफ़र: लखनऊ से चेन्नई

यह सुनकर बहुत अच्छा लगा! आपके परिवार का लखनऊ से चेन्नई तक का हवाई सफ़र सचमुच रोमांचक और यादगार रहा होगा। पहली बार की यात्राएँ, खासकर जब सात्विक जैसा कोई बच्चा इतना उत्साहित हो, बहुत ही स्पेशल होती हैं। चेक-इन से लेकर हवाई जहाज़ में बैठने तक का उसका उत्साह कल्पना करना भी सुखद है।

सफ़र के छोटे और ज़रूरी पल:

हैदराबाद में रुकना और दोस्तों से न मिल पाना थोड़ा निराशाजनक रहा होगा, पर लंबी यात्राओं में ऐसा होता रहता है। असली रोमांच तो चेन्नई पहुँचकर शुरू हुआ। देर रात जब भूख लगी और आपको याद आया कि इतने बड़े शहर में स्विग्गी तो ज़रूर होगी, और झट से डिनर आ गया—ये छोटे-छोटे पल ही सफ़र को खास बनाते हैं। ड्राइवर का हिंदी के कुछ शब्द जानना भी मुश्किल समय में कितनी बड़ी मदद होती है!

मरीना बीच का अविस्मरणीय अनुभव:

लेकिन मरीना बीच का अनुभव तो सबसे ख़ास रहा। समंदर का इतना विस्तार पहली बार देखना और ठंडी हवा का अहसास, सचमुच अद्भुत! जब सात्विक लहरों में नहाने की ज़िद करने लगा और फिर एक बड़ी लहर से आप डर गए, वह पल सुनकर दिल की धड़कन बढ़ गई। यह पल दिखाता है कि आप दोनों माता-पिता कितनी जल्दी और मज़बूती से अपने बेटे के लिए खड़े हुए।

चेन्नई की गर्मजोशी:

बीच पर आम पर मिर्च लगाकर खाना और फिर कुछ देर बाद भूला हुआ बैग वापस मिल जाना—यह सब चेन्नई के लोगों की गर्मजोशी और ईमानदारी को दर्शाता है। हिंदी और अंग्रेजी दोनों बोलने वाले लोगों का मिलना और आपकी मदद करना बताता है कि भारत में कहीं भी हों, लोग सहायता के लिए तैयार रहते हैं।

यह सुनकर बहुत खुशी हुई कि सात्विक आज भी मरीना बीच की यादें संजोए हुए है। ऐसी यात्राएँ हमेशा साथ रहती हैं!

Monday, February 10, 2025

पापा का जन्मदिन- बिना आपके, मगर आपके साथ

आज पापा का ऐसा जन्मदिन है जिसमे वे खुद ही नही है। यही एक दिन है जब पूरा परिवार एक साथ एक जगह इकठ्ठा हुआ करता था। 

आज आपकी याद कुछ ज़्यादा आ रही है। समझ नही आ रहा है आज के दिन, मैं, आपको याद करते हुए,  दुखी हूँ, कि आप नही हो या आपको याद कर खुशियाँ मनाऊँ। अगर कुछ भी नही करता हूँ तो आपका जन्मदिन किसी अन्य तारीख की तरह विलुप्त हो जाएगा। 

मगर मैं ऐसा नही चाहता हूं, आज की तारीख ज़िंदा रहे, अगर यह तारीख ज़िंदा रही तो आप अपने आप ज़िंदा रहेंगे। मैं आपके पोते लिए भी चाहता हूं कि वो आपको हमेशा याद रखे, मैं आपके द्वारा किये गए संघर्षो को भी आपके पोते को बताऊंगा की वह आपको याद रखे, अपने बाबा से प्रेरणा ले सके।

आप जहां भी है, निश्चिंत रहे आपका बेटा आपको याद करता है, प्रेम भी करता है।

Thursday, January 30, 2025

श्रेष्ठता का भ्रम

वाकिया कुछ दिनों पूर्व का है जब हमारा सामना एक ऐसी सज्जन दंपति से हुआ, जिन्हें अपने आपको श्रेष्ठ साबित करने का जुनून था। हर वह चीज़ जो आपके पास है वह उनके या उनके रिस्तेदारो के पास है, न सिर्फ उनके पास है वह आपसे बेहतर भी है। 

श्रेष्ठता साबित करने के लिए वो कुछ भी बोलते। सामने वाले को साफ नजर आ रहा है कि आप झूठ बोल रहे है, पर उन्हें अपनी जुबान पर कोई भी कंट्रोल नही है। 

पहला किस्सा कुछ यूं है कि एक दिन हम उदयपुर घूमकर आये थे,  सज्जन दम्पत्ति हमारे घर आये, बातो बातो में मैंने उदयपुर की सुंदरता के बारे में बताना चाहा तभी वो बोले कि हिमांचल जैसी दुनिया मे कोई जगह ही नही है, मुझे बार बार मौका मिले तो मैं वही जाना पसंद करूँगी। स्वर्ग है वो स्वर्ग। मैंने सोंचा की हिमांचल तो स्वर्ग के समान है यह माना मैंने पर धरती पर एक ही स्वर्ग नही है और भी है। जितना आप जानते हो बस वही सत्य नही है।

दूसरा किस्सा है जब मैंने कार खरीदी, मित्रवत हम उन्हें मिठाई देने उनके घर जा पहुचे, कार के बारे में जानकारी दी तो बताते है कि आई20 को की उनके परिवार के पास है, उसके जैसी गाड़ी ही नही देखी है, इतनी तेज चलती है, बस हवा में बाते करती है। इतने पहाड़ घूम डाले, कार में तो मज़ा आ गया। इन्हें कौन समझाए की जब इश्क होता है तब सिर्फ महबूब देखा जाता नही। वो कौन है कहाँ से है, यह मायने नही रखता है।

तीसरा किस्सा कुछ यूँ है कि हम दिल्ली गए हुए थे, रीगल सिनेमा के पास घड़ी बेच रहा था, तो मेरी पत्नी को एक घड़ी पसंद आई और हमने 100 ₹ में ग़रीद ली। रविवार के दिन सज्जन दम्पत्ति का आगमन हुआ तो उनकी नज़र हमारी उस घड़ी पर पड़ी। तभी उनके प्रश्नों की बौछार होने लगी। किस ब्रांड की है, कितने की है, मुझे तो इसमें कोई खास बात लग नही रही है। लोचल है लग रहा है, मेरी पति बोली हैं लोचल है 100₹ कि है, रीगल से ली है। तभी दम्पत्ति बोलते है, देखा मैंने पहचान लिया, नही तो आप लोग बताते की यह बहुत महंगी है, अमुक ब्रांड की है। जो बात हमने बोली ही नही, वे ख़ुद ही समझ गयी तो हम क्या करे। अत्यधिक ज्ञान भी बहुत खतरनाक है।

चौथा किस्सा है जब हमारे एक मित्र ने फ्लैट खरीद, सबको अपने गृह प्रवेश पर बुलाया, सब लोगो को घर देख कर प्रसन्नता हुई, सबने बधाई दी, तभी अमुक दम्पत्ति आते है और बोलते है, घर तो अच्छा है पर मैं कभी भी पुराना फ्लैट नही खरीदूंगी, मुझे फ्रेश फ्लैट ही पसंद आते है, नही तो मैं ज़मीन खरीदकर घर बनाने को अच्छा समझती हूं। अमुक दम्पत्ति को एक बार देखा और सिर झुका कर उनके विचारों का सम्मान किया और अपने मित्र को बधाई देने के लिए आगे बढ़ चला।

पांचवा किस्सा, नोएडा से लखनऊ आते समय मैंने अपनी कार की स्पीड 120 तक ले गया, बात आगरा एक्सप्रेसवे की हो रही थी कि 120 पर भी स्पीड का अहसास नही हो रहा था। तभी सज्जन दम्पत्ति बोलते है कि एक बार मैंने 140 की स्पीड में गाड़ी चलाई थी, मंत्री जी आगे चल रहे थे और मैं उनके पीछे पीछे, काफिला 140 पर चल रहा था और मैं उन्ही के पीछे लग लिया, 120 किलोमीटर मैंने 1 घंटे में तय कर डाला। इसके बाद मेरे पास कहने को कुछ नही बचा था। मन ही मन मन मैंने खुद से माफी मांगी और अपने काम मे लग लिया।

छठा किस्सा, अमुक दम्पत्ति वैष्णो देवी घूम कर आये थे, हम प्रशाद लेने उनके घर गए तो वो दिखाने लगे कि वे जम्मू से क्या क्या लाये है, तभी उन्होंने एक स्वेटर दिखाया और बोले अंदाज़ लगाओ यह कितने का है, अब हमें क्या पता कितने का हो सकता है, स्वेटर तो माँ बुन कर मुझे देती थी, खरीदने की कभी नौबत ही नही आई, कैसे अंदाज़ लगता कि कितने का है। तभी दंपति जी बोलते है देख लो प्यूमा का है, अब अंदाज़ लगाओ। मैंने जब हार मान ली,  तो बोलते है 400 का लेकर आया हूँ। तब से मैं शून्य पर हूँ, कुछ समझ नही आया कि क्या व्यक्त करूँ।

सातवां किस्सा एक विवाह समाहरोह का है जब हम अमुक दम्पत्ति के साथ विवाह की रश्मो का आनंद ले रही थी तभी अमुक दम्पत्ति बोली कि आज कल पर्स कितने महंगे हो गए है। पूरा शहर घूम डाला तब जाकर यह पर्स मिला है, पूरे 900 ₹ का है। अब मेरी पत्नी पशोपेह में पड़ गयी कि वह क्या बोले। मेरी तरफ देखते हुए इशारा किया कि क्या मैं अपने पर्स की कीमत बात दूँ। हमने शांत रहने का निर्णय लिया। 

आठवां किस्सा है जब दिल्ली की सरोजनी मार्किट में खड़े होकर अमुक दम्पत्ति मुझसे बोलते है कि देखो मेरी लेदर की जैकेट, लोग इसे देख कर मुझे बड़ा ही अमीर समझ रहे होंगे। इतनी बात सुन अचानक मुझे खाँसी आने लगी। पानी मंगाया गया। पानी पिया फिर जा कर मेरी खासी रुकी। 

नौवां किस्सा है 1000 ₹ कि सब्जी का, अमुक दम्पत्ति ने अपने घर के लिए नया नया फ्रिज लिया था, हम उनके घर की काम से गये थे, तभी अमुक दंपति मेरी पत्नी को प्रिज़ दिखाते हुए बोलते है कि देखो कितना बड़ा फ्रिज है, पूरे पूरे 1000₹ की सब्जी खरीद कर लाया हूँ और सारी की सारी सब्जी इस फ्रिज में आ गयी। मेरी पत्नी को समझ नही आ रहा था कि वह क्या प्रतिक्रिया दे। उनके घर मे आज फ्रिज आयी है, उससे बड़ी फ्रिज मेरे घर मे पिछले 11 सालों से है।






Wednesday, January 29, 2025

पनीर की सब्जी

एक किस्सा मेरी श्रीमती जुबानी

एक खूबसूरत शाम, स्वाति और आदि दोनों एक मिठाई की दुकान पर पानी के बताशे पैक करा रहे थे, तभी एक महानुभव दुकान में  पनीर खरीदने की चेष्टा लिए दुकानदार दुकान में प्रवेश करते है और उनकी और दुकानदार के बीच रोचक चर्चा की शरुवात होती है। 

चर्चा कुछ इस प्रकार है:

ग्राहक: पनीर कितने का दे रहे है भाई साब। 
दुकानदार: पनीर 320₹ में है। 
ग्राहक: मुझे तो बस 100 ग्राम ही लेना है।
दुकानदार: 35₹ का 100 ग्राम मिलेगा।
ग्राहक: क्यों 35 ₹ का क्यों? हिसाब करो तो 32₹ का होता है, आप तो 350₹ में बेच रहे है। 
दुकानदार: 100 ग्राम हम 35₹ में ही देंगे,  लेना हो तो लो नही तो जाओ।
ग्राहक: एक अकेले के लिए कोई किलो भर तो लेगा नही, आप लूट रहे है। 
दुकानदार: भाईसाहब हम लूट नही रहे है, हमारा जो नियम है वही बात रहे है। 

ग्राहक: तो 100 ग्राम दे दो। अच्छा तो यह बताइये मटर कितने की दे रहे है। 
दुकानदार: मटर 160₹ किलो है, आपको कितनी चाहिए?
ग्राहक: मुझे तो थोड़ी ही मटर चाहिए,  एक कटोरी सब्जी बनानी है बस । आप सिर्फ 5 रुपये की ही मटर दे दो।

दुकानदार: 50ग्राम से कम नही मिलेगी, इससे नीचे हम नही बेचते। 
ग्राहक: 50 ग्राम मटर कितने की हुई? 
दुकानदार: 50ग्राम मटर 8रुपये की हुई। 
 ग्राहक: दे दो फिर।
दुकानदार: ये लीजिये आपके 45 रुपये हुए।
ग्राहक: 45रुपये कैसे हुए? 
दुकानदार: 35 रुपये की पनीर और 10 रुपये की मटर।
ग्राहक: अभी तो मटर 8 रुपये की थी अब 10 रुपये की कैसे हो गई? इसका मतलब 200 रुपये किलो मटर बेंच रहे है आप। 160 रुपये में तो हर जगह मिल रही है , लूट मचा रखी है आपने तो। 
दुकानदार: अरे 200 रुपये किलो कहा दे रहे है मटर। 160रुपये किलो ही तो दे रहे है। 
ग्राहक: तो ये 50 ग्राम मटर 10 रुपये की कैसे हो गई?
दुकानदार: अरे भैया ये 50 ग्राम से ज्यादा है  मटर इसलिए 10 रुपये की हुई। 
ग्राहक, अरे मुझे तो थोड़ी सी ही चाहिए बस, एक से तो यह 200₹ किलो हुई, इतना मत लूटो ग्राहक को। 
एक बार मैंने आपके यहाँ से मटर ली थी 10₹ की, मटर पनीर की सब्जी में बस मटर ही मटर दिख रहा था, बेचारा पनीर तो दिखा नही। 
दुकानदार की पत्नी: भाई साहब हम आपको सौदा बेच रहे है कि पनीर की सब्जी, हमे क्या मतलब की आपने जो सब्जी बनाई उसमे मटर दिख रही थी या पनीर। 

आप मुझे 8₹ की ही दीजिये, नही तो ज़्यादा हो जाएगी, एक कटोरी से ज़्यादा थोड़े न खाना है मुझे। 

दुकानदार: हम सोना थोड़े न तौलते है, तौलने में थोड़ा ज्यादा ही हो जाता है। 50 ग्राम तौलो तो 60- 70 ग्राम हो जाता है। 
ग्राहक: आप मुझे 8₹ का ही मटर दो नही तो बहुत ज़्यादा हों जाएगा। 
दुकानदार अपनी पत्नी को बोलता है कि भाईसाहब के लिए 100 ग्राम पनीर और 50 ग्राम मटर तौल दो, तभी उसकी पत्नी बोली, मैं सोना नही तौल पाऊंगी, आप ही इनके लिए तौल दो। 

ग्राहक: मैडम जी आप तौल दो मुझे घर जाकर खाना भी बनाना है और खाना भी है। 


बंगाली दूल्हे की लखनवी बारात

घर की बिटिया ने अपना सुंदर सा वर चुना बंगाल से, लड़का बिल्कुल मिष्टिदोई जैसा है। बारात भी बंगाल की राजधानी कोलकाता से आई थी। दूरी इतनी थी कि कम ही बरती थे, शाम को बारात तैयार हुई निकलने के लिए, 20 लोग बरती, तो बहुत कम होते है, हमारे लखनऊ के हिसाब से। यहाँ छोटी से छोटी बारात में भी काम से कम 200 लोग होते है,   बंगाल में, जहां की रश्मो में इतना शोर शराबा होता ही नही है और ना ही इतनी झूम के बारात निकलती है। 

तय यह हुआ कि हम घराती, बारातियो के साथ बैंड बाजे के साथ जाएंगे। फिर क्या था सबको मौका मिला नाचने का, हम बारातियो के साथ झूम के नाचे। बारातियो को पकड़ पकड़ के नचाया। बाकी घर वालों को भी नचाया। 

1 घंटे लगातार नाचने के बाद हम द्वार पर पहुचे, द्वार पर पहुचे की हमारा किरदार बदल गया। अब हम जिस बारात को लेकर आये थे अब उसी बारात के स्वागत में खड़े थे। फूल माला से सबका स्वागत किया और विवाह हर्षोउल्लास के साथ संपन्न हुआ ।