Friday, March 31, 2023

सब रिश्ते झूठे?

कभी सोंच न था, की एक दिन, सब रिश्ते झूठे हो जाएंगे,

माँ गयी, तो बाप, भाई और बहन भी अजनबी हो जायँगे। 
हम आज उसके पहलू में जा बैठे है वह बस चंद बरसो पहले ज़िंदगी मे आया और ज़िन्दगी बन जाएगा। 

सात फेरों में ही सभी का फेरा छूट जाएगा अब हम बस उसी के फेरे में आ जाएंगे। 

माँ से हमे जो प्यार मिला उसकी कीमत उसके जाने के बाद पता लगी। 





Tuesday, March 28, 2023

मेरी एक गलत सोंच- वक्त बड़ा या पैसा


मैं समझता था कि वक्त देने से रिश्ते सुधर जाएंगे पर एक उम्र देने के बाद पता लगा कि उन्हें मेरे वक्त की नही पैसो की जरूरत थी।


कोरोना के जाने के बाद मैं अभी भी घर से ही काम कर रहा हूँ। लखनऊ में बसे 2 साल होने को आये। मुझे लगता था माँ बाप और भाई बहन को मैं अपना वक्त दूंगा तो मेरे दूर रहने से जो गिले शिकवे हुए है जल्दी ही दूर हो जाएंगे। 2 साल के अथक प्रयाश से मुझे पता चला कि जब एक बार आपके बिना किसी को जीने की आदत पड़ जाए, फिर आप कितना भी प्रयाश कर ले वो आदत फिर नही पनपती। आपका होना एक बोझ हो जाता है। 

अभी हाल ही में मुझे पता लगा है कि रिश्तों को समय की जरूरत नही होती है, पैसे की जरूरत होती है। वक्त कितना भी दे दो जब तक वह अर्थ में नही बदलता रिश्तों की कीमत नही होती।

रिश्तों को बचाना है तो वक्त नही पैसे देना चाहिए। 

आप अपनी सार्थकता सिर्फ धन से ही साबित कर सकते है।

Thursday, March 23, 2023

बेटी या बेटा- माँ बाप की सेवा


पहले कभी हुआ करता था कि बेटे के पैदा होने पर जश्न मनाया जाता था और बेटी के होने पर शोक। एक दिन बागबान फ़िल्म आयी और घर वालो ने  रो रो कर पूरी फ़िल्म देखी और फिर समाज ने करवट ली। अब बेटा वो है जो बाप को घर से निकाल देगा और उसे बुढ़ापे में दर बदर भटकने को मजबूर करेगा और अब सारी उम्मीदे बेटी पर ही जा टिकी जो माँ बाप का खयाल रखेगी। 

मुझे बेटा हुआ, उसके पैदा होने से पहले और उसके होने के बाद, मैं उसे  इसलिए नही पाल रहा हूँ कि वो मुझे एक दिन घर से निकाल देगा या मेरी संपत्ति हड़प लेगा। 

अब जब बाकी बंधुजन को बेटी हुई, तो हर तरफ जश्न का माहौल था, बेटी हुई है बेटी, बहुत बहुत बधाई । बेटियां, माँ बाप का खयाल रखती है, वही उनका बुढ़ापे का सहारा बनेंगी, वही माँ बाप को प्यार करती है । हर एक पल मुझे हीन भावना का अहसास कराना कि मुझे बेटा है, यह एक दिमागी खेल है या कुछ और । अब मैं अपने बेटे को किस नज़र से देखूं।

समझ मे नही आता है कि माँ बाप की सेवा करना बेटे या बेटी के चरित्र पर निर्भर करता है या उसके  लिंग पर। 

अगर लिंग निर्धारित करता है तो हम फिर उसी पुरातन मान्यताओ में पहुंच गए जहां पुत्र की प्राप्ति के लिए पुत्रियों की बली चढ़ा दी जाती थी और अब वही किया जाए कि पुत्री के लिए पुत्रो की बली चढ़ाई जाए। जान नही ले सकते तो उन्हें अलग घर के किसी कोने में कैद कर सुविधाओ से महरूम रखा जाए। 

अगर माँ बाप की सेवा ही मात्र कर्तव्य है और इसके लिये हमे बच्चे पैदा करना चाहिए तो उन्हें पढ़ाने की जरूरत ही क्या है। उनकी परवरिश नौकर की तरह ही की जानी चाहिए न कि बेटे या बेटी की तरह। 

एक बहू जो अपने सास-ससुर की सेवा नहीं करती है तो क्या वो अपने माँ बाप की सेवा कर पाएगी । 

मेरे खयाल से इस तरह की सोंच सिर्फ वो लोग रखते है जिन्होंने अपने माँ बाप या सास ससुर की सेवा नही की है और उन्हें सिर्फ मरने के लिए छोड़ दिया हो।  उनके अंदर का डर ही है जो उन्हें ऐसी बाते करने को मजबूर करता  है। 

मैं ईश्वर से यही कामना करता हूँ कि आज के बुजुर्ग अपने संतानों में लिंग के आधार पर भेदभाव न करे। जिन्हें सेवा करनी है वो करेंगे और जिन्हें नही करनी है वो किसी भी दबाव में नही करेंगे। 











Sunday, February 19, 2023

फाँसी- आँखों देखी

ठंड के दिन चल रहे थे, हम सब रज़ाई ओढ़े दिन काट रहे थे। स्कूल बंद थे। पूरा परिवार भी इकट्टा था,  पापा भी आज ऑफिस नही गए थे। हम सब एक साथ बैठ कर मूवी देख रहे थे ,  जिसमे अदालत मुल्ज़िम को अंत मे फाँसी देती है, और फिर मूवी का नायक उस खलनायक को सरेआम अदालत के बाहर फाँसी पर लटका देता हैऔर मूवी खत्म हो जाती है।

अब चालू होती है, उस मूवी पर चर्चा का खेल। 

अचानक पापा बोले, कितना बकवास दिखाते है मूवीज में, ऐसे कोई किसी को भी फाँसी पर चढ़ा सकता है?

पुलिस ऐसे ही देखती रहती है क्या?

इनलोगो ने कभी हकीकत में भी ऐसी फाँसी होती है, सब बकवास दिखाते है, और फिर सोंचते है कि मूवी हिट हो जाये, जरूर यह मूवी पिट गयी होगी। 

फाँसी पर चर्चा होने लगी फिर पापा बताने लगे कि कभी वो एक बार फाँसी देखने गए थे। 

सच्ची मुच्ची फाँसी, पापा कभी किसी  डिपार्टमेंट में रहे होंगे। उन्होंने किसी अधिकारी से बात की होगी, सच मे फाँसी देखने की लिए,फिर उस अधिकारी ने बोला, शर्मा जी आसान नही है फाँसी देखना। बड़े बड़ो की हालत खराब हो जाती है आप देख पाएंगे?

"हम चाहते है कि फाँसी खत्म हो जाये हो और आप फाँसी देखना चाहते है"

 तभी पापा और उनके साथियों ने बोला कि देख लेंगे इसमें कौन सी बड़ी बात है। पापा और उनके साथियों को कॉलेज से निकले बस कुछ ही दिन हुए थे। नया खून था और जोश भी भरपूर। 

तभी उनके अधिकारी ने बोला तो ठीक है, कुछ महीनों के बाद किसी व्यक्ति को फाँसी होने वाली है जिसने किसी परिवार को बड़े ही वीभत्स तरीके से खेत मे थी काट डाला था। अदालत ने उसे फाँसी की सज़ा सुनाई है।

पापा और उनके साथी बोले, तो ठीक है हम देख लेंगे हम मजबूत है, अधिकारी ने बोला मैं तुम्हे दिन तारीख बात दूंगा। फाँसी का आर्डर तुम लेकर जाना और तुम सबको तड़के जाना पड़ेगा और इस बात की चर्चा आप किसी से नही करेंगे, फाँसी कोई प्रदर्शनी नही है इसलिये, फाँसी आप एक झरोखे से देख पाएंगे ना कि सामने से। 

दिन तारीख बताई गई, रात भर कोई सोया ही नही और तड़के सब कारगर पहुँच गए। फाँसी का आर्डर जेलर को दिया गया। फिर उन्हें एक झरोखे तक ले जाया गया, सभी के अंदर उत्सुकता थी फाँसी देखने की, 1 घंटे इंतज़ार करने के बाद फाँसी के हॉल में उस कातिल को लाया गया। कोई अधिकारी उसे कुछ पूछ रहा था, इन लोगो को साफ सुनाई नही दिया। जल्लाद उसे फाँसी के तख्ते पर ले गया और मुँह पर कपड़ा बंधने और फंदा लगा लगाने से पहले उसने खुदा को याद किया और बोला। 

"ला इलाहा इल्लल्लाह मोहम्मद रसूलुल्लाह"

उस डाकू के चेहरे का भाव देख, और उसकी आवाज़ के कंपन ने पापा और उनके साथियो को अंदर से हिला दिया, इसके बाद उस हॉल में इतना सन्नाटा था की बयान नही किया जा सकता। मौत का डर उसकी आँखों मे साफ महसूस हो रहा था। 

जल्लाद ने इशारा पाते ही उसे फाँसी पर लटका दिया। फिर एक और गहरा सन्नाटा था। सबकी हालत और  खराब हों गयी। सब उठे और चल दिये। आपस मे बात करने की भी हिम्मत नही बची थी किसी मे, की फाँसी पर चर्चा कर ले। 

पापा के अनुसार कई रातो तक वो फाँसी उनके सपनों में आई। दहशत में आ जाते थे जब भी वो नज़ारा सपने में आता था। पापा के अनुसार उस फाँसी की चर्चा फिर कभी नही हुई आफिस में। 

पापा के चेहरे पर वो दहशत दिखाई दे रही थी। हम भी खामोश थे, अपनी जगह चिपक गए हो जैसे। थोड़ी देर बाद माँ ने वो सन्नाटा तोड़ा और बोला चलो खाना खाओ। 


आज भी जब मैं लिख रहा हूँ, सन्नाटा आज भी याद आ रहा है। 





Sunday, January 15, 2023

भिक्षापात्र

कई साल पहले की यह घटना है। मेरी नई नई नौकरी लगी थी, जोशोखरोश, मै रोज़ सवेरे भागता हुआ,ऑफिस की बस पकड़ता था। बस, घर से लगभग १ किलोमीटर दूर एडोबे से मिलते थी। 

एक दिन, ऐसी ही सुबह, मै बस पकड़ने के लिए जल्दी जल्दी भाग रहा था। घर से थोड़ी ही दूर पर देखता क्या हूँ, एक व्यक्ति भगवा वेश धरे दिखाई दिया, जो सबसे कुछ ना कुछ मांग रहा था। मुझे बस पकड़ने कि जल्दी थी इसलिए मै उनसे बचते हुए निकाल ही रहा था कि वो साधू मेरे सामने आ धमाका और बोला। बच्चा कुछ दान दोगे। तुम्हारा भला होगा। मैंने भी सुबह सुबह बिना नकारात्मक ऊर्जा लिए ऑफिस जाना चाह रहा था इसलिए, मैंने १० का नोट निकाला और उसके भिक्षापात्र में डाल दिया, और अपनी बस पकड़ने के लिए भगा । तभी, उसी साधू ने मेरा रास्ता फिर रोका और बोला कि यह पैसे तुम ही रख लो। मै तुम्हारे कल्याण के लिए हूं। मुझे तुम्हारे बटुए में जो सबसे बड़ा नोट है वो दो,  मै उसपर मंत्र पढ़ कर तुम्हें वापस कर दूंगा। मुझे बस पकड़ने कि जल्दी थी और मुझे वो जाने भी नहीं दे रहा था। मैंने सोचा अगर मेरी बस छूट गई तो लेने के दिन पड़ जाएंगे। 

मैंने पर्स खोला और ५० का नोट निकाला और साधू बाबा को दिया। बाबा फिर बोला क्या यह सबसे बड़ा नोट है। मैंने बोला, हां मेरे पास यह सबसे बड़ा नोट है। अंदर ही अंदर मुझे यह अहसास हो रहा था कि यह बाबा नोट लेने के बाद वापस नहीं करेगा। बाबा ने 50 का नोट अपनी हथेली पर रखा है कुछ मंत्र पढ़ने लगा, मैंने बोला बाबा मेरे पैसे। 

बाबा बोला अरे बच्चा दान किया हुआ पैसा कोई वापस मांगता है क्या। मैंने बोला बाबा रख लो 50 का नोट। तुम्हे पता नहीं है कि तुमने क्या किया है। अभी जल्दी है मुझे नही, तो मैं ठीक से बहस करता तुमसे। 

ऐसा बोल मै भगा, अपनी बस के लिए, बस उस दिन के बाद सारे फकीर या भगवा धारी बाबा मिलता है, मुझे ढोगी ही लगता है । किसी गरीब को कुछ खिला देना मुझे दान कि सार्थकता लगती है पर किसी को पैसे देना निरर्थक। 

Wednesday, December 28, 2022

उधार- रिश्तो की दो धारी तलवार

सुना ही था कि लड़की की शादी और मकान के निर्माण में जितना  पैसा लगा दो कम ही है। मेरे पास बेटी तो है नही  तो मैं मकान बनाने में लग गया। पैसे कब और कहां खर्च हो गए पता ही नही लगा। एक ऐसा समय आया जब मेरे सारे पैसे खत्म और घर का काम बंद। 

बिजली का काम हो गया था, प्लास्टर भी हो गया था। हमने तय की अब काम बंद कर कर नोएडा वापस चले जाएं, पर काल चक्र के फेर में मुझे उसी आधे बने घर मे रहने का मौका मिला। मकान में ना तो खिड़की थी और ना ही दरवाज़े , दिसबंर आने को था, शीतलहर चलने को थी, ऐसे में रहना मुश्किल हो जाता। 

हमे समझ नही आ रहा था कि क्या किया जाए। सारे खाते खंगाले गए, सिर्फ आपातकालीन समय मे प्रयोग करने भर के पैसे बचे थे हमारे पास। तभी स्वाति ने बोला कि अगर किसी से कुछ समय के लिए उधार ले लिया जाए तो हम घर का थोड़ा काम करा कर रहने योग्य बना सकते है। तभी मुझे याद आया कि,

माँ ने मेरे घर से निकलते समय कहा था कि बेटा एक टाइम कम खाना पर किसी से उधार मत लेना। 

माँ की इस बात को मैने हमेशा अपने दिमाग मे रखा, हमने आभाव में जी लिया पर उधार नही लिया। उधार लेने देने का मेरा कोई तजुर्बा नही था। उधार मैंने कभी किसी को दिया भी नही की जान सकूँ की उधार लिया किससे जाए। 

मैं और स्वाति रोज़ सोने से पहले चर्चा करने लगे कि उधार लिया जाए तो किससे। कई राते तो हमने गुजार दी सिर्फ नाम ढूंढने में। कुछ नाम हमने फाइनल भी किये जिनसे उधर लिया जा सकता है। 

हमारे आगे कोई रास्ता नही था तो हमने उधर लेने की सोंची। रोज़ फेसबुक पर उधार से सम्बन्धित कोई ना कोई पोस्ट देख हमारे फैसले कमज़ोर हो जाते। 

कोरोना के बाद सबके हालात खराब थे, किसी के पास नौकरी नही, तो किसी का काम धंधा चौपट था। किसी से किसी ने पहले से ही उधार ले रखा था और वो उन्हें पैसे नही लौटा रहा था। 

कुछ लोगो से पैसे उधार मांग कर उनसे रिश्ते खराब करने का जोखिम नही लिया जा सकता था। रिश्ते मेरे लिए बहुत अहम था, उन्हें खो जाने के डर से हमने उनसे उधार ना मांगने का फैसला किया। 

बड़ी मुश्किल से दो नाम फाइनल किये हमने , उम्मीद थी तो वो तो बिल्कुल भी मना नही करेंगे पैसे देने में। हम दोनों का  कॉन्फिडेंस सातवे आसमान पर था,  पर एक डर भी था कि,
 कही उन्होंने मना किया तो हमारा उधार लेने का आत्मविश्वास टूट जाएगा। फ़ोन पर अगर वो मना करेगा तो हमे बहुत दुःख होगा,  तो हमने मैसेज पर ही अपने हालात बयान कर पैसे उधार मांगने की विवशता बताई।

मैसेज भेजा, मैसेज डिलिवर भी हुआ, रह रह कर हम मैसेज का स्टेटस देख रहे थे कि रीड भी हुआ कि नही। 2 घंटे बाद वो रीड हुआ।
 सोंच की वो फ़ोन करेगा, हमारे हालात पर चर्चा कर बोलेगा की भाई क्या हुआ। कितने चाहिए बताओ, अभी देता हूँ। 

पर ऐसा कुछ ना हुआ, घंटो बीत गया, फिर घंटो से दिन भी बन गए। हमारा उधार मांगने का हौसला पस्त हो गया। रात भर मैं और स्वाति इसी बात पर बात करते रहे कि हमारे जीवन मे एक भी ऐसा रिश्ता नही है कि जरुरत पर कुछ पैसे ले सकूँ। 
दो दिन बाद मैसेज आया, झट से हमने मैसेज पढ़ा, लिखा था सॉरी भाई, हमारे पास बहुत खर्चे है इसलिए उधार नही दे पाऊंगा। 
हमारा दिल टूट चुका था। कुछ समझ नही आ रहा था कि क्या किया जाए। मैसेज का रिप्लाई भी करना था। हमने रिप्लाई किया।

कोई बात नही भाई। 
धन्यवाद। 

सारे अरमान टूट गए। दिल मे अफसोस लिए कई राते हमने आंखों में ही गुज़ार दी। 

फिर समझ मे आया कि अगर किसी से रिश्ते खराब करने हो तो उससे उधार मांग लो, रिश्ते अपने आप ही खराब हो जाएंगे। 
 
हफ़्ते भर बाद हमने अपनी हिम्मत फिर से जुटाई अपने दूसरे मित्र से पैसे के लिए मैसेज किया। फ़ोन करने की हिम्मत अभी भी जुटा नही पाया था। उसके मैसेज पढ़ा फिर रिप्लाई भी किया, वो पैसे देने को राज़ी भी हो गया। पैसे 6 माह में वापस करने की सहमती पर उसने पैसे भेजे। 

हमने घर के दरवाज़े और खिड़कियाँ लगवाई। सीमेंट से पुताई भी करवाई और 6 माह होते होते पैसे भी लौटा दिए। सर्दियां अपने चरम पर आती उससे पहले दरवाज़े लग चुके थे और पुताई भी हो गयी थी। 

धन्यवाद मित्र, पैसे देने के लिए। 
ईश्वर से यही कामना करता हूँ कि जीवन मे दोबारा कभी भी पैसे उधार मांगने की नौबत ना आए। 


Tuesday, December 27, 2022

अब किसी को मेरा इंतज़ार नहीं, माँ

मैं अक्सर यही सोंचता हूँ की अब अगर मैं  लखनऊ से बाहर गया, तो वापस  किसके लिए आऊंगा।   लखनऊ वापस आने का अब कोई बहाना ही नहीं बचा है ।  

माँ कहती थी की बेटा इतनी दूर मत जाना की वापस आना मुश्किल हो

इसलिए मैं कभी इतना दूर गया ही नहीं । १४ साल से एक ही कंपनी में हूँ।  हर त्यौहार माँ इंतज़ार करती थी कि मैं आऊंगा, उसका इंतज़ार देख मैं अपने आपको कभी रोक ही नहीं पाया लखनऊ आने से।  

जबसे माँ का स्वर्गवास हुआ है तब से घर की चौखट भी अब मुझसे दूर हो गयी है ।  घर जिसे  माँ ने बनाया अपने संस्कारो से उसकी नीव रखी, जिस घर में हम बड़े हुए,  कभी सोंच भी नहीं सकता था की घर मिझसे इतना दूर हो जाएगा।

पिता तो है पर वो बहुत प्रैक्टिकल है।  उनसे बात तो करता हूँ पर पूरा वाक्य मुश्किल से ही बनता है, घंटो की बात मिनटों में ही सिमट जाती है।  याद नहीं आखिरी बार उनसे मैंने अपने दिल की बात कब की थी, उसके उलट माँ मेरी बात सुनती थी।

मेरे रोने पर माँ मुझे चुप कराती थी, मेरे कष्ट को सुनती थी और उसके उलट पिता मेरे रोने को कमज़ोरी समझते है।  माँ के जाने के बाद अब मैं रोता नहीं बस गला भर आता है, मेरे आँसू आँखों तक तो आते है पर छलक नहीं पाते। अब मैं अपने कष्ट को पी जाता हूँ।

माँ के चरण छूता था, साथ में गले भी मिलता था और  माँ माथा चूम लेती  थी , पिता के तो बस चरण ही छू पाता हूँ, वो गले नहीं मिलते और न ही कभी माथा चूमते है ।  

पिता प्रैक्टिकल जो ठहरे ।  

पिता ने दिन रात मेहनत कर पैसे कमाए।  घर की नीव डलवाई , दीवारे खड़ी करवाई और छत भी पड़वाई,  पर  घर माँ ने बनाया।  बस उसके जाने से घर चला गया , अब वो बस मकान है।  घर का बटवारा नहीं होता, मकान का होता है।  

 

माँ मेरे घर आने के दिन गिनती थी, जब भी मेरे घर आने के दिन नज़दीक आते तो वह,  मेरे लिए मेरी पसंदीदा चीज़ बचा कर रखती थी,  खिलाने के लिए।  मेरे आते ही मेरा पसंदीदा खाना तैयार मिलता था।

और आज उसी के घर का पानी भी नसीब में नहीं। 

अब उसी माँ के  घर में जब भी दावते होती है, तो उसमे मेरा होना अब जरुरी नहीं।  मेरे बिना अब सब काम हो जाते है। 

मैं एक पंछी था, गगन में उन्मुक्त विचरण कर रहा था, पर पता था कि शाम होते ही माँ मेरी राह तक रही होगी, मुझे हर हाल में माँ के बनाये घोसले में वापस आना है। अब माँ ही नही रही और ना ही रहा कोई राह तकने वाला, विडंबना भी ऐसी अब उस घोसले पर मेरा अधिकार भी नही रहा। 


माँ अब मेरे पास, मेरा इंतज़ार करने वाला कोई बचा नहीं।