मैं अक्सर यही सोंचता हूँ की अब अगर मैं लखनऊ से बाहर गया, तो वापस किसके लिए आऊंगा। लखनऊ वापस आने का अब कोई बहाना ही नहीं बचा है ।
माँ कहती थी की बेटा इतनी दूर मत जाना की वापस आना मुश्किल हो।
इसलिए मैं कभी इतना दूर गया ही नहीं । १४ साल से एक ही कंपनी में हूँ। हर त्यौहार माँ इंतज़ार करती थी कि मैं आऊंगा, उसका इंतज़ार देख मैं अपने आपको कभी रोक ही नहीं पाया लखनऊ आने से।
जबसे माँ का स्वर्गवास हुआ है तब से घर की चौखट भी अब मुझसे दूर हो गयी है । घर जिसे माँ ने बनाया अपने संस्कारो से उसकी नीव रखी, जिस घर में हम बड़े हुए, कभी सोंच भी नहीं सकता था की घर मिझसे इतना दूर हो जाएगा।
पिता तो है पर वो बहुत प्रैक्टिकल है। उनसे बात तो करता हूँ पर पूरा वाक्य मुश्किल से ही बनता है, घंटो की बात मिनटों में ही सिमट जाती है। याद नहीं आखिरी बार उनसे मैंने अपने दिल की बात कब की थी, उसके उलट माँ मेरी बात सुनती थी।
मेरे रोने पर माँ मुझे चुप कराती थी, मेरे कष्ट को सुनती थी और उसके उलट पिता मेरे रोने को कमज़ोरी समझते है। माँ के जाने के बाद अब मैं रोता नहीं बस गला भर आता है, मेरे आँसू आँखों तक तो आते है पर छलक नहीं पाते। अब मैं अपने कष्ट को पी जाता हूँ।
माँ के चरण छूता था, साथ में गले भी मिलता था और माँ माथा चूम लेती थी , पिता के तो बस चरण ही छू पाता हूँ, वो गले नहीं मिलते और न ही कभी माथा चूमते है ।
पिता प्रैक्टिकल जो ठहरे ।
पिता ने दिन रात मेहनत कर पैसे कमाए। घर की नीव डलवाई , दीवारे खड़ी करवाई और छत भी पड़वाई, पर घर माँ ने बनाया। बस उसके जाने से घर चला गया , अब वो बस मकान है। घर का बटवारा नहीं होता, मकान का होता है।
माँ मेरे घर आने के दिन गिनती थी, जब भी मेरे घर आने के दिन नज़दीक आते तो वह, मेरे लिए मेरी पसंदीदा चीज़ बचा कर रखती थी, खिलाने के लिए। मेरे आते ही मेरा पसंदीदा खाना तैयार मिलता था।
और आज उसी के घर का पानी भी नसीब में नहीं।
अब उसी माँ के घर में जब भी दावते होती है, तो उसमे मेरा होना अब जरुरी नहीं। मेरे बिना अब सब काम हो जाते है।
मैं एक पंछी था, गगन में उन्मुक्त विचरण कर रहा था, पर पता था कि शाम होते ही माँ मेरी राह तक रही होगी, मुझे हर हाल में माँ के बनाये घोसले में वापस आना है। अब माँ ही नही रही और ना ही रहा कोई राह तकने वाला, विडंबना भी ऐसी अब उस घोसले पर मेरा अधिकार भी नही रहा।
माँ अब मेरे पास, मेरा इंतज़ार करने वाला कोई बचा नहीं।
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