Thursday, November 23, 2017

मेरा जन्मदिन

18 नवंबर, एक ऐसा दिन जिस दिन मेरा जन्म हुआ था , हर वर्ष, इस दिन मेरे अंदर कहीं गहराई में छुपा हुआ बचपन सामने आता है। मुझे बरसो हो गए घर और परिवार से दूर हुए , इसलिए कान फ़ोन की घंटी पर ही टिका रहता है कि कौन कौन फ़ोन कर मुझे जन्मदिन के दिन बच्चा होने का अहसास कराएगा।
हर बधाई में कहा गया, हैप्पी बर्थडे,  एक दुआ बन इस दिन मुझे स्पेशल होने का अहसास कराता है। वो सब लोग जो मुझे जन्मदिन पर विश करते है, वो मेरे लिए बहुत स्पेशल है। धन्यवाद उन सबका जिन्होंने मुझे शुभकामनाए दी और धन्यवाद मेरी  पत्नी का जिसने मेरे बर्थडे को स्पेशल बनाने के लिए सरप्राइज गिफ्ट लेकर आई। धन्यवाद उन दोस्तो का भी जो मेरे जन्मदिन पर आए और मेरे साथ डांस किया।
यह जन्मदिन मेरे बेटे को समर्पित जिसे देख मैं रोज़ बचपन जीता हूँ।
ईश्वर आपसभी को , अच्छा स्वास्थ्य और समृद्धि दे, जिससे आप भी अपना जीवन शानदार तरीके से गुजारे और मुझे यूँ ही जन्मदिन की बधाई हर वर्ष दे।

Saturday, October 14, 2017

भविष्य एक जिज्ञासा या पहेली

ऑफिस में आजकल ज़ेव फेस्ट चल रहा है, इसी फेस्ट में एक स्टॉल लगा था टैरो कार्ड रीडर का । ज़ोर शोर से हम सभी को कई दिनों पहले ही इसकी सूचना दे दी गयी थी कि ऑफिस में एक टैरो कार्ड रीडर आ रहा है। स्टॉल के आगे काफी भीड़ जुटी हुई थी। जो भी व्यक्ति अपना भविष्य जानकर बाहर आ रहा था, वो बड़ा ही खुश और चकित नज़र आ रहा था। हमने भी कुछ लोगो से पूछा कि भाई क्या बता रहीं है टैरो कार्ड रीडर। सब का एक ही जवाब था,  बहुत खूब और क्या सटीक भूत और भविष्य बता रही है। तुम सबको जाना चाहिए। लाइफ टाइम एक्सपीरियंस है।

सबकी बाते सुन हमारा भी मन करने लगा अपना भविष्य जानने के लिए, साथ मे प्रियंका और रितिका का भी मन करने लगा, अपना भी भविष्य जानने का, हम तीनों कार्ड रीडर के स्टॉल पर पहुचे और अपना नाम भी रजिस्टर करा दिया।
हम वही खड़े, अपनी बारी का इंतज़ार कर रहे थे। जो भी अपना भविष्य जानकर बाहर आता। उसका चेहरा कुछ खास चमक लिए रहता।  हमारी जिग्ज्ञासा बढ़ती ही जा रही थी और अंदर से धुक धुक भी कर रहा था कि हम क्या क्या पूछेंगे।

हम तीनों ने वर्चुअल लिस्ट बनाई की हम क्या क्या पूछ सकते है, की जब भी हम उस टैरो कार्ड रीडर के पास जाए, तो सारे जरूरी सवाल छूट न जाये। फिलहाल हम तैयार थे अंदर जाने के लिए।

जैसे जैसे हमसे पहले नंबर वाले लोग निकल रहे थे और अपना एक्सपीरियंस शेयर कर रहे थे, हमारी धुक धुक बढ़ती जा रही थी, काफी इंतज़ार के बाद मेरा नंबर आया। मैं जैसे ही अंदर जाने को तैयार हुआ, कि कोई और अंदर चला गया। खैर मेरा नंबर आ ही गया। दोस्तो से आल द बेस्ट ले हम अंदर गए।

अंदर का नज़ारा ही कुछ अलग सा था, कमरा लाल रौशनी से जगमगा रहा था, और मध्यम गति से संगीत बज रहा था। सामने देखता हूँ एक महिला जादूगरनी की वेशभूषा में सामने बैठी हुई थी। उनके सामने काले कपड़े के ऊपर कुछ टैरो कार्ड्स रखे हुए थे और बगल में चमकता हुआ ग्लोब जैसा कुछ रखा हुआ था, जिसमे से सफेद रौशनी निकल रही थी।

टैरो कार्ड रीडर ने उनके सामने रखी कुर्सी पर हमसे बैठने का आग्रह किया, नज़ारा इतना विस्मय था,  लग रहा था कि हम किसी दूसरे लोक में आ गए हो। हम उनके सामने बैठे, हम उस वातावरण में सहज महसूस करते, उससे पहले मोहतरमा ने मुझसे मेरा नाम पूछा।

टैरो कार्ड रीडर:आपका नाम क्या है?
मैं: राहुल, मेरा नाम राहुल है।

टैरो कार्ड रीडर: आप क्या जानना चाहते है अपने बारे में?
मैं: मैं अपनी समस्याओं का समाधान और अपने भविष्य जानना चाहूंगा एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर के रूप में।

टैरो कार्ड रीडर: ठीक है,  तो आप सामने रखे कार्ड्स में कोई एक कार्ड सेलेक्ट कर , मुझे दीजिए।
मैं: मैंने एक कार्ड सेलेक्ट कर उन्हें दे दिया।

कार्ड देख टैरो कार्ड रीडर थोड़ा मुस्कुराई, उन्हें मुस्कुराता देख मुझे लगा, शायद मेरा भविष्य उज्ज्वल है। फिर टैरो कार्ड रीडर ने अपना हाथ उस ग्लोब पर रख, अपनी आंखें बंद की,  उस ग्लोब की रौशनी उनके चेहरे पर ऐसे पड़ रही थी, जैसे हम अक्सर जादूगर वाली मूवीज़ में देखते है, शायद वो ध्यान मुद्रा में चली गयी थी।

एक पल ध्यान में रहने के बाद वो बोली, राहुल मैं तुम्हारे लिए कुछ देख पा रही हूँ। मेरे मन में सब जान लेने की इच्छा हुई, जो कुछ भी उन्होंने देखा था अपने ध्यान में, फिर उन्होंने बोला, आप मेरा हाथ पकड़िये , मैं कुछ और भी महसूस करना चाहती हूं, आपके बारे में, पर मुझे तो उनका हाथ ही दिखाई नही दे रहा था, जो मैं पकड़ लेता। मैंने पूछा आपके हाथ है कहाँ? जो मैं पकड़ लूं। फिर उन्होंने बोला,  मेज़ के ऊपर जिसपर कार्ड रखे है उसके नीचे जगह है, आप वही अपना हाथ डालिये, मैने अपना हाथ डाला और वही एक सिरकते हुए हाथ ने मेरा हाथ थाम लिया।

फिर उन्होंने मुझे आँख बंद कर अपने विज़न के बारे में सोंचने के लिए बोला, मैंने आंखे बंद की और अपना विज़न तलाशने लगा, अपनी बंद आँखों से। कही विज़न तलाशते हुए मैं कभी लखनऊ में अपने घर पहुंचा,  तो कभी यही नोएडा में ही रहा , एक बार तो मैं अमेरिका तक जा पहुँच गया।
साथ ही टैरो कार्ड रीडर ने मेरा हाथ कस कर पकड़ा हुआ था। मेरा ध्यान एक जगह केंद्रित होता उससे पहले मेरे कंधे पर ठप ठप सी महसूस हुई जैसे कोई मुझे गहरे ध्यान से जगाना चाह रहा हो।

मैंने आँख खोली, तो सामने वाली कुर्सी पर कोई था ही नही पर किसी ने मेरा हाथ अभी भी थाम रखा था, मेरा मन चकित था कि ये क्या है ? ये कैसा चमत्कार है? तब मेरे कानों में एक आवाज़ आई राहुल ... राहुल और जब मैंने अपने बाई तरफ देखा, तो वो टैरो कार्ड रीडर अपने हाथ में एक स्माइली लिए खड़ी थी और बोली... राहुल ये एक प्रैंक था। पहले तो मुझे समझ नही आया कि ये क्या हो रहा है...  तभी एक बच्ची मेज़ के नीचे से निकली जिसने मेरा हाथ पकड़ रखा था।

प्रैंक समझने में मुझे ज़्यादा समय नही लगा। मैं मुस्कुराते हुए बाहर निकला और सोंचने लगा कि ये सच है, शायद आपको आपकी समस्याओ और विज़न के लिए खुद ही परिश्रम करना होता है इसमें कोई भी आपकी मदद नही कर सकता।

Wednesday, October 11, 2017

पत्नी का जन्मदिन

मेरी हृदय-कनिका,
आज तुम्हारा जन्मदिन है, मैं तुम्हारे बारे में क्या लिखूं कुछ शब्द ही नही मिल रहे है, तुम मेरी प्राणेश्वरी हो , तुम ही मेरी हृदयेश्वरी हो,  तुम्हे ईश्वर सुख समृद्धि और अच्छा स्वास्थ्य प्रदान करे और तुम यूँ ही चिरायु हो मेरे जीवन को फूलो की तरह महकती रहो।
तुम्हे जन्मदिन की खूब ढेर सारी बधाई।
तुम्हारा हृदयांश
राहुल शर्मा

Thursday, September 14, 2017

हिंदी दिवस

आज हिंदी दिवस है इस अवसर पर मैं अपने जीवन मे हिंदी के महत्व पर कुछ शब्द लिखना चाहता हूं। मेरा जन्म ऐसे परिवार में हुआ जहाँ हिंदी और अवधी का बोल बाला था। अंग्रजी सिर्फ मेरे पिता जी को आती थी, वो भी इतनी की सरकारी काम आसानी से निपट जाए।

आस पास का वातावरण भी जय हिंद और जय हिंदी का ही था। पूरी कॉलोनी में शायद ही कोई अखबार अंग्रजी का आता हो। हम भी हिंदी माध्यम से पढ़ रहे थे। अंग्रेजी पढाने के लिए तो बहुत लोग थे वहां,  पर हमे यह कभी समझ नही आई।

हिंदी में अच्छे नंबर ही आते थे और अंग्रेजी में अक्सर लाल निशान वाले ही अंक मिले। जैसे तैसे,  हम बिना अंग्रेजी में पारंगत हुए ही, हमने दसवी और बारहवीं की इम्तेहान पास किये। दोनों में ही हिंदी में अच्छे अंक रहे पर अंग्रेजी में अंक बस उत्तीर्ण होने जितने ही थे।

जीवन मे एक महत्त्वपूर्ण बदलाव स्नातक में आया जहां हिंदी का नामोनिशान ही नही था। हर विषय का सिर्फ अंग्रेजी में प्रारम्भ और अंग्रेजी में ही अंत होता था। कक्षा के पहले दिन ही जब सब अपना परिचय अंग्रेजी में दे रहे थे,  तो मुझे घबराहट सी होने लगी कि, मैं अपना परिचय कैसे हिंदी में दूं। एक गहरी सांस लेने के बाद मैंने अपना परिचय हिंदी में ही दिया , पता नही क्यों मेरे मन मे हीन भावना घऱ करने लगी थी।

कक्षा के सारे बच्चे जब अघ्यापक के सारे प्रश्नों का जवाब अंग्रेजी में दे रहे थे, तब जवाब आने के बाद भी, जवाब नही दे पाना एक सामान्य से घटना हो गयी थी। अब सारी कॉपी और किताब अंग्रेजी में ही थी। अंग्रेजी की स्पेलिंग की तो चर्चा क्या करना । इसपर मेरे साथियो ने मेरी काफी मदद की।

पहले सेमिस्टर में अंग्रेजी का एक अलग विषय था, जिसे पढ़ाने के लिए जिस अध्यापिका को नियुक्त किया था, उनकी अंग्रेजी मेरे सर के ऊपर से जाती थी। इम्तेहान हुआ और जब रिजल्ट आया,  तो मैंने देखा, कुछ चुनिंदा लोगो मे मेरा नाम था, जो अंग्रजी एवं अन्य विषय मे पास थे। मेरी खुशी का तो कोई ठिकाना ही नही था।

धीरे धीरे दोस्तो के मदद मेरे अंदर का अंग्रेजी का भूत भाग और स्नातक  एवं परास्नातक,  दोनों अच्छे नम्बरों से पास हुआ, पर अभी भी हाल बहुत अच्छे नही थे अंग्रेजी में मेरे,  पर हिंदी तो थी ही नही कही की उसका दामन पकड़ मैं अपनी नैया पार लगा लूं।

अब हर काम अंग्रेजी में ही करने थे, इंटरव्यू हो या अपना सी.वी हो सब अंग्रेजी में। जैसे तैसे नौकरी का इंटरव्यू हिंग्रेजी में निकला।

आज जब मैं एक सॉफ्टवेर कंपनी में काम कर रहा हूँ, और एक सॉफ्टवेर इंजीनियर हूँ, यहां भी मेरे के.आर.ए में कम्युनिकेशन पर जोर देने की बात लिखी जाती है। अंग्रेजी सुधारने में भी यहां मेरे दोस्त काफी मदद करते है, मैं निरंतर प्रयासरत हूँ कि एक दिन अंग्रेजी पर विजय प्राप्त कर लूं।

हिंदी जो कि जीवन रेखा है, मैं इसका प्रयोग अपने दिल की बात कहने में करता हूँ। मेरा फेसबुक पर एक पेज है और एक ब्लॉग भी है जिसपर मैं हिंदी में खूब लिखता हूँ।

Saturday, August 26, 2017

बचपन की ज़िद समझौते में बदल जाती है

"ज़्यादा कुछ नही बदलता उम्र के साथ .. बस बचपन की ज़िद समझौते में बदल जाती है"

गुलज़ार की ऊपर लिखी लाइनों ने मेरी सोंच में थोड़ा परिवर्तन जरूर लाया है। मेरा 3 साल का बेटा है जिसका नाम सात्विक है, घर मे हम उसे प्यार से आदि बुलाते है। वो उम्र बढ़ने के साथ साथ ज़िद्दी और शरारती होता जा रहा है।

हर वीकेंड खिलौनों की लिस्ट मेरे सामने होती है और जब हम खिलौने की दुकान पर जाते है तब वो खिलौना नही आता है जिसकी डिमांड थी। वहां उसे कुछ और ही पसंद आ जाता है जिनका ज़िक्र घर पर नही हुआ था।  अगले हफ्ते फिर वही लिस्ट मेरे सामने आती है और वो फिर बोलता है की पापा आदि के पास पुलिस कार नही है, टैंकर ट्रक नही है या मेट्रो ट्रेन नही है।

अगर किसी हफ्ते खिलौना न दिलाओ तो ऐसे रोता है कि कुछ पूछो मत...  आदि रोते हुए बोलता है  कि " पापा प्लीज आदि को पुलिस कार दिला दो ना .... आदि के पास बिल्कुल भी नही है, ...  सब कार टूट गयी है"  आदि के पास कुछ भी नही है..

क्या करूँ बाप और माँ का दिल है,  पसीज ही जाता है..  फिर वही चक्र चलने लगता है कि लेने कुछ जाता है और लेकर कुछ और ही आता है।

एक दिन की बात है कि, मैं आफिस से आया ही था कि आदि की ज़िद शरु हो गयी कि आदि को टॉय चाहिए... चाहिए….. और बस चाहिए... थोड़ी देर तो हम टालते रहे और स्वाति  बोली कि बेटा पापा अभी आफिस से आये है, थक गए है,  वीकेंड में चलेंगे फिर तुम्हे टॉय दिलाएंगे, इस टाइम टॉय की शॉप बंद हो गयी होगी  कल चलेंगे,  पर आदि को कहां मानना था। आदि का रोना शरू हो गया। वो रोते रोते बोलने लगा कि माँ शॉप बंद नही हुई होगी , खुली होगी, चलो टॉय की शॉप...  किसी तरह हमने थोड़ा वक्त गुजरा फिर , थकहार कर स्कूटर निकाला , स्वाति और आदि को बिठाया और निकल पड़ा खिलौने की दुकान की तरफ..

आदि रास्ता बता रहा कि पापा इधर चलो टॉय की शॉप है। हमने बोला बेटा शॉप बंद हो गयी होगी पर आदि कहाँ मनाने वाला था। हम दुकान की तरफ बढ़े और देखा वो सच मे बंद थी। वहां पहुच आदि को बोला.... देखो शॉप बंद है कि नही.. फिर आदि बोला पापा कोंडली चलो वहां खुली होगी। स्वाति ने बोला वहां भी बंद हो गयी होगी बेटा अब घर चलो...

घर की तरफ निकल ही रहे थे कि आदि बोला "पापा टॉय वाले भैया सो गए है कल सुबह उठेंगे फिर शॉप खुलेगी" तब दिला देना पापा, हमने बोला ओके बेटा.. फिर आदि बोलता है कि, पापा आदि को आइसक्रीम तो दिला दो,  फिर हमने ,  स्वाति और आदि दोनों ने आइसक्रीम दिलायी और हम घर आ गए। घर आकर आदि को वो आइसक्रीम नही चाहिए है जो खुद के लिए लाया था,  उसे स्वाति वाली आइसक्रीम चाहिए। फिर स्वाति ने आदि वाली आइसक्रीम खाई और आदि ने स्वाति वाली।

पहले सोंचता था कि मैं एक सख्त पिता बनूँगा, बच्चे को अच्छे संस्कार दूँगा,  मेरे ना कहने पर वो मेरी बात मान जाए और मुझसे ज़िद न करे।

अब मैं ये सोंचता हूँ कि एक दिन तो ज़िद को समझौते में बदलना ही है तो ज़िद जबतक पूरी कर सकता हूँ पूरी करूँ।

हमारे बड़े होने के बाद , हम किसी से ज़िद तो कर नही सकते है.. समझौते की अलावा कोई और ऑप्शन तो है ही नही । बचपन जितने दिनों तक रहे उतना ही अच्छा है, आदि के साथ साथ हम भी बच्चे बने रहे ।

आपने मेरी फीस तो देखी ही होगी- डॉक्टर

पिछले हफ्ते की बात है जब मनोज का बाइक से  एक्सीडेंट हो गया। उस समय रात के लगभग 10 बजे थे...  चोट बहुत ज़्यादा तो नही आई थी पर,  हाथ और पैर छिल गए थे। मनोज किसी तरह एक छोटी सी क्लीनिक में पहुचां पर, वहां कोई डॉक्टर तो नही था पर , वहां एक नौसिखिया कम्पाउंडर ही मिला। रात काफी हो गयी थी इसलिए,  मनोज ने उसी से ड्रेसिंग कराने का फैसला लिया, और फिर भाभी को कॉल करके एक्सीडेंट के बारे में बताया, इत्तेफाक से हम मनोज के घर पर ही थे, भाभी के मुँह से एक्सीडेंट शब्द सुन हमने भाभी से पूछा कि क्या हुआ भाभी..  किसका एक्सीडेंट हो गया है।

भाभी ने घबराते हुए हमें बताया कि,  मनोज का एक्सीडेंट हो गया है, वो जैन क्लीनिक में है, हमने कहा की , हम जा कर देखते है, आप परेशान न हो, उसकी कंडीशन हम आपको फ़ोन करके आपको बताते है,  भाभी साथ चलने की ज़िद कर रही थी , उन्हें समझाने बुझाने के बाद हमने  स्वाति और अनुजा को उनका ध्यान रखने को बोला , फिर  मैं और शैलेन्द्र,  दोनों जैन क्लीनिक के लिए निकल पड़े।

हमारे पहुचने तक मनोज की ड्रेसिंग हो चुकी थी पर,  वो उसकी ड्रेसिंग से संतुष्ट नही था। उसने बोला कि,  हम किसी और क्लीनिक चलते है,  वहां फिर से ड्रेसिंग करा लेंगे।

हम दूसरी क्लीनिक ढूंढने लगे, रात काफी हो गयी थी, इसलिए सारे क्लीनिक बन्द हो चुके थे, फिर हमें एक क्लीनिक दिखी, इसमे लिखा था, 24 घंटे आपातकालीन सेवा।...  हमे लगा इसमे कोई न कोई डॉक्टर जरूर होगा। उस क्लीनिक का नाम था, "रोहिताश क्लीनिक",  हम मनोज को लेकर वही पहुचे, अंदर जाकर देखा तो वहां भी कोई डॉक्टर नही था, एक नर्स थी, उन्होंने बोला कि रुकिए,  मैं डॉक्टर को फ़ोन करके बुलाती हूँ, वो थोड़ी देर में आ जाएंगे।

हम वही इंतज़ार करने लगे डॉक्टर का .... इंतज़ार करते- करते काफी वक्त हो गया,  फिर मनोज ने बोला घर चलते है, अभी मैं ठीक हूँ, सुबह डॉक्टर को दिखा लेंगे, फिर हमने कहा, जहां इतना इंतज़ार किया है थोड़ा और कर लेते हैं। हमारा इंतज़ार कम नही हो रहा था, वो बढ़ता ही जा रहा था। अंत मे हमने निर्णय लिया कि चलते है घर,  अब सुबह दिखा लेंगे। हम वहां से निकल बाहर गेट तक पहुचे ही थे कि,  डॉक्टर साहब अपनी गाड़ी से आ पहुचे। डॉक्टर को देख हम रुक गए।

नर्स ने मनोज की तरफ इशारा करते हुए,  डॉक्टर को बोला कि, इन्हें चोट लगी है, डॉक्टर साहब ने  चोट तो नही देखी, पर अपनी रेट लिस्ट की तरफ इशारा करते हुए बोले..... आपने मेरी फीस तो देखी ही होगी... कोई 100 रुपये के लिए 200 का पेट्रोल तो नही फूंकेगा।

ये बात सुन हमारा माथा ठनक गया, रेट लिस्ट तो हमने पहले ही देख ली थी पर... डॉक्टर का यह व्यवहार हमे अजीब सा लगा.. न तो उसने दर्द पूछा और न ही चोट के बारे में,  डायरेक्ट फीस के बारे में बात करने लगा, जैसे हम उसकी फीस दे ही नही सकते । .. फिर हमने मनोज से पूछा तुम्हारी कंडीशन कैसी है ? मनोज ने बोला,  मैं ठीक हूँ, अब सुबह ही दिखाऊंगा।  फिर हम वहां से निकल लिए, दावा की दुकान से हमने पेनकिलर खरीदा और घर की तरफ निकल लिए,  रास्ते मे न जाने क्यों मुझे प्रेमचंद्र की सपेरे वाली कहानी याद आ रही थी ।

Thursday, August 24, 2017

डार्क चॉकलेट कड़वी नही है माँ

आज आफिस से आते वक्त, मैन सोंचा की स्वाति के लिए चॉकलेट लेता चलूं, चॉकलेट लेने जब दुकान पर गया, तो सोंचा डार्क चॉकलेट लेता चलूं, आदि तो खा नही पायेगा,  तो स्वाति को खाने को मिल जाएगा, घर पहुँच, स्वाति को चॉकलेट दे ही रहा था कि आदि पास आया और बोला पापा आदि के लिए चॉकलेट लाये है और मां आपके लिए नींबू लाये है। मुझे दो चॉकलेट...

हमने सोंचा आदि डार्क चॉकलेट क्या खा पायेगा। थोड़ी देर में वापस कर देगा , हम आदि के रहमोकरम पर थे कि शायद हमे खाने को मिलेगा। थोडा खाने के बाद आदि पास आया और स्वाति से बोला माँ चॉकलेट कड़वी बिल्कुल नही है।

आदि की यह बात सुनकर मेरी सारी चालाकी धरी की धरी रह गयी, और अंत मे हमे बचे हुए कुछ टुकड़े खाने को मिले हम उसी से संतुष्ट हो अपने आपको खुश किस्मत समझ रहे थे...