Wednesday, May 24, 2023

अंतिम विदाई- माँ तू अमर रहे।

मेरी मम्मी को गए दो बरस होने को आए, आज भी उनके होने का अहसाह मुझे प्रतिपल रहता है। मम्मी गयी तो मुझे  लगा, की अब मम्मी बुलाने पर कोई नही आएगा, वो प्यार कभी नही मिलेगा, अब कोई नही कहेगा कि हाँ बेटा, उस शून्य में एक व्यक्ति आया। मैने जब भी मम्मी बुलाया, वह कोई और नही, मेरी सासू माँ थी, शब्द निरर्थक नही हुए थे। उम्मीद अभी बाकी थी,  मम्मी थी, प्यार था चाहे वो मेरी पत्नी की माँ ही क्यों न हो। ससुराल जाता तो मेरे स्वागत के लिए हर संभव प्रयाश करती , बेटा यह खा लो, वह खा लो। जब भी मम्मी शब्द की ध्वनि गूंजती थी तब उधर से एक ही आवाज़ आती हाँ बेटा। 

वो जब भी घर आतीं मुझे बेटे होने का अहसास रहता था पर आज वो भी हमारे बीच नही है, कुछ दिन पूर्व वह भी चली गयी मेरी मम्मी के पास। अब मम्मी का अहसास तो है पर मम्मी बुलाने पर अब कोई प्रतिध्वनि नही है। 

सबसे कठिन समय तब होता है जब अपने एक एक कर चले जाते है। वो बस झट से नही जाते है, धीरे धीरे जाते है। रोज़ उनको खोने और होने का अहसास होता है और एक दिन अचानक एक युग समाप्त हो जाता है। 

उस दिन ऐसा ही एक युग खत्म हो गया। माँ का युग। 

ईश्वर उनकी आत्मा को शांति प्रदान करे। वो हमारे साथ एक आशीर्वाद की तरह हमेशा रहेंगी।

Saturday, May 13, 2023

ना बड़ा न छोटा और ना ही माझिल

मेरा बेटा ना तो बड़ा है और ना ही छोटा, ना माझिल और ना ही साँझील। 

"बड़ा बाप, छोट महतारी, बिच्चैक सीताराम"

अर्थात बड़े बच्चे को पिता बहुत प्रेम करते है, छोटे को माँ, पर बीच के बच्चे को कोई प्रेम नही करता है। 

बचपन से यही सुनता आया हूँ, और आज यही देख भी रहा हूँ। बड़ा मुझे छोटा नही समझता और छोटा बड़ा। 

बड़ा गलती कर तो बड़ा है, माफी नही मांगेगा, छोटा गलती करे तो माफ कर दो क्योंकि छोटा है, माफी तो वो भी नही मांगेगा। 
रहा मैं, मेरी गलतियां कभी माफ नही होती। 

सम्मान और प्यार दोनों की हिस्से में नही आते। 

इसलिए मैंने सिर्फ एक ही संतान की, वह ना वो मेरी बड़ी संतान है, और ना ही छोटी ना माझिल और ना ही साँझील। 

मैं बस इसी में खुश हूं

Wednesday, May 10, 2023

गवार औरत

ढोल गंवार शूद्र पशु नारी।

सकल ताडना के अधिकारी।।

तुलसीदास द्वारा रचित ऊपर लिखी पंक्ति उस समय और घातक हो जाती, जब कोई व्यक्ति नारी भी हो और गंवार भी उम्र भर कितना भी प्रयास करो ताडना से बच पाना असंभव है।

यह कहानी एक ऐसी नारी की है जिसे समाज के लड़का लड़की के भेद भाव मे पढ़ने नही दिया, स्कूल जाती तो थी पर गांव के लड़के पढ़ने नही देते थे, अक्सर उसे गहरे गड्ढे में धक्का दे दिया करते थे, एकलौती संतान होने के नाते घर वालो ने उसकी सुरक्षा के लिए विद्यालय जाना बंद करा दिया। 

60 के दशक की बात है, लड़कियों का विवाह भी जल्दी हो जाता था। बिट्टू पढ़ तो नही पाई थी पर घर और बाहर के काम मे बहुत तेज़ थी। घर पर माँ का हाथ बटाती और बाहर पिता के साथ खेती भी देखती, बिट्टू को कहावते और चौपाइयां मुहजुबानी याद थी। अक्सर वह अपनी बातों में इन चौपाइयों और कहावतों का प्रयोग करती थी, सामने वाला बिट्टू की बातो को सुन मंत्रमुग्ध हो जाता था, 9 बरस की होते होते उसका विवाह एक पढ़ने लिखने वाले लड़के से कर दिया गया। विवाह तो 9 की उम्र में हुआ पर गौना 18 के होने पर हुआ। 

लड़का पढ़ लिख गया और सरकारी नौकरी में भी पा गया, अब वह एक बिना पढ़ी लिखी लड़की से रिश्ता निभाए तो कैसे निभाए। अनपढ़ होने का मतलब गवार कहलाया जाने लगा, पर किसी तरह रिश्ता निभाया गया। लड़के की बहने भी अनपढ़ थी, बिट्टू को छोड़ने का मतलब भविष्य में लड़के की बहनो के पति भी उन्हें गवार कहकर छोड़ सकते थे। बिट्टू अपना पूरा प्रयाश करती की वो सबकुछ करे जो वह कर सकती है। 

पति की सरकारी नौकरी लगी थी इसलिए गांव छोड़ शहर जाना पड़ा। बड़ा घरद्वार छोड़ कर बड़े से शहर के छोटे से घर मे रहना था। बिट्टू ने पूरा प्रयाश किया अपने आपको शहरी वातावरण में ढालने के लिए। 

बच्चे हुए, उनका पालन पोषण किया , अच्छे संस्कार दिए, पर पति की नज़र में सिर्फ गवार की रही। कभी भी किसी के घर जाना हो तो पति उसे साथ नही ले जाते थे, बिट्टू को साथ ले जाने में उन्हें शर्म आती थी , शर्म आये भी तो क्यों ना? बाकी लोगो की पत्नियां पढ़ी लिखी जो थी, जिनकी पत्नियां पढ़ी लिखी नही थी, उन्होंने उन्हें त्याग कर दूसरा विवाह जो रचा लिया था। 

बिट्टू के पति ने दूसरा विवाह तो नही किया था पर बिट्टू को गवार होने का अहसास अक्सर करा दिया जाता। बिट्टू भी तो पूरी तरह से अपने पति पर निर्भर जो थी। बूढ़े माता पिता की जिम्मेदारी भी बिट्टू के सर पर ही थी। 

बच्चे बड़े हुए, एक अनपढ़ ने अपनी  बिटिया को खूब पढ़ाया, घर का काम वो खुद करती पर बिटिया को पढ़ने से कभी नही रोकती, बिटिया भी खूब पढ़ी और सरकारी नौकरी पा गयी। बिट्टू अपनी बिटिया में अपने आपको देखती थी और हर बार यही सोंचती थी कि वो ना पढ़ सकी पर उसकी बिटिया पढ़ लिख कर अफसर बन गयी। 

वक्त बदला पर बिट्टू के ऊपर से गवार होने का तमगा कभी न गया। कोई भी फैसला लेना हो उससे कभी नही पूछा जाता। बस फैसले सुनाए जाते। जब भी वो अपना विचार व्यक्त करने की कोशिश करती गवार कह कर बिट्टू को छुप करा दिया जाता। 

बिट्टू अंदर ही अंदर टूट से गयी थी, इस टूटन से उसके स्वास्थ्य पर भी अब असर दिखने लगा था।

बिट्टू अब वृद्ध हो गयी थी, नानी बानी दादी भी बनी, बहुएँ पढ़ी लिखी आयी, जितना भी कुछ सीखा जीवन मे बहुओ को सिखा दिया, एक दिन बिट्टू, लंबी बीमारी से संघर्ष करते करते दुनिया छोड़ कर चली गयी। वह कुछ लेकर नही गयी, जाते जाते बस पति से माफी मांगते हुए गयी , कि अगर उससे कोई गलती हुई हो तो माफ कर देना। 

जब भी कोई बिट्टू के दिवंगत होने पर शोक व्यक्त करने आता तो पति अक्सर चर्चा में बस यही बात दोहराता कि "गवार थी हमारा रिश्ता किसी तरह निभ गया। हमारे साथ के कई लोगो ने दूसरा विवाह किया पर मैंने नही किया"। 

बिट्टू, पूरा जीवन संघर्ष करती रही सबकुछ किया जो किसी पत्नी और माँ को करना चाहिए, पर उसके जाने के बाद भी अपने ऊपर से गवार होने का तमगा हटा नही पाई। कुछ लोगो के लिए वो सिर्फ एक गवार ही रही। 




Friday, March 31, 2023

सब रिश्ते झूठे?

कभी सोंच न था, की एक दिन, सब रिश्ते झूठे हो जाएंगे,

माँ गयी, तो बाप, भाई और बहन भी अजनबी हो जायँगे। 
हम आज उसके पहलू में जा बैठे है वह बस चंद बरसो पहले ज़िंदगी मे आया और ज़िन्दगी बन जाएगा। 

सात फेरों में ही सभी का फेरा छूट जाएगा अब हम बस उसी के फेरे में आ जाएंगे। 

माँ से हमे जो प्यार मिला उसकी कीमत उसके जाने के बाद पता लगी। 





Tuesday, March 28, 2023

मेरी एक गलत सोंच- वक्त बड़ा या पैसा


मैं समझता था कि वक्त देने से रिश्ते सुधर जाएंगे पर एक उम्र देने के बाद पता लगा कि उन्हें मेरे वक्त की नही पैसो की जरूरत थी।


कोरोना के जाने के बाद मैं अभी भी घर से ही काम कर रहा हूँ। लखनऊ में बसे 2 साल होने को आये। मुझे लगता था माँ बाप और भाई बहन को मैं अपना वक्त दूंगा तो मेरे दूर रहने से जो गिले शिकवे हुए है जल्दी ही दूर हो जाएंगे। 2 साल के अथक प्रयाश से मुझे पता चला कि जब एक बार आपके बिना किसी को जीने की आदत पड़ जाए, फिर आप कितना भी प्रयाश कर ले वो आदत फिर नही पनपती। आपका होना एक बोझ हो जाता है। 

अभी हाल ही में मुझे पता लगा है कि रिश्तों को समय की जरूरत नही होती है, पैसे की जरूरत होती है। वक्त कितना भी दे दो जब तक वह अर्थ में नही बदलता रिश्तों की कीमत नही होती।

रिश्तों को बचाना है तो वक्त नही पैसे देना चाहिए। 

आप अपनी सार्थकता सिर्फ धन से ही साबित कर सकते है।

Thursday, March 23, 2023

बेटी या बेटा- माँ बाप की सेवा


पहले कभी हुआ करता था कि बेटे के पैदा होने पर जश्न मनाया जाता था और बेटी के होने पर शोक। एक दिन बागबान फ़िल्म आयी और घर वालो ने  रो रो कर पूरी फ़िल्म देखी और फिर समाज ने करवट ली। अब बेटा वो है जो बाप को घर से निकाल देगा और उसे बुढ़ापे में दर बदर भटकने को मजबूर करेगा और अब सारी उम्मीदे बेटी पर ही जा टिकी जो माँ बाप का खयाल रखेगी। 

मुझे बेटा हुआ, उसके पैदा होने से पहले और उसके होने के बाद, मैं उसे  इसलिए नही पाल रहा हूँ कि वो मुझे एक दिन घर से निकाल देगा या मेरी संपत्ति हड़प लेगा। 

अब जब बाकी बंधुजन को बेटी हुई, तो हर तरफ जश्न का माहौल था, बेटी हुई है बेटी, बहुत बहुत बधाई । बेटियां, माँ बाप का खयाल रखती है, वही उनका बुढ़ापे का सहारा बनेंगी, वही माँ बाप को प्यार करती है । हर एक पल मुझे हीन भावना का अहसास कराना कि मुझे बेटा है, यह एक दिमागी खेल है या कुछ और । अब मैं अपने बेटे को किस नज़र से देखूं।

समझ मे नही आता है कि माँ बाप की सेवा करना बेटे या बेटी के चरित्र पर निर्भर करता है या उसके  लिंग पर। 

अगर लिंग निर्धारित करता है तो हम फिर उसी पुरातन मान्यताओ में पहुंच गए जहां पुत्र की प्राप्ति के लिए पुत्रियों की बली चढ़ा दी जाती थी और अब वही किया जाए कि पुत्री के लिए पुत्रो की बली चढ़ाई जाए। जान नही ले सकते तो उन्हें अलग घर के किसी कोने में कैद कर सुविधाओ से महरूम रखा जाए। 

अगर माँ बाप की सेवा ही मात्र कर्तव्य है और इसके लिये हमे बच्चे पैदा करना चाहिए तो उन्हें पढ़ाने की जरूरत ही क्या है। उनकी परवरिश नौकर की तरह ही की जानी चाहिए न कि बेटे या बेटी की तरह। 

एक बहू जो अपने सास-ससुर की सेवा नहीं करती है तो क्या वो अपने माँ बाप की सेवा कर पाएगी । 

मेरे खयाल से इस तरह की सोंच सिर्फ वो लोग रखते है जिन्होंने अपने माँ बाप या सास ससुर की सेवा नही की है और उन्हें सिर्फ मरने के लिए छोड़ दिया हो।  उनके अंदर का डर ही है जो उन्हें ऐसी बाते करने को मजबूर करता  है। 

मैं ईश्वर से यही कामना करता हूँ कि आज के बुजुर्ग अपने संतानों में लिंग के आधार पर भेदभाव न करे। जिन्हें सेवा करनी है वो करेंगे और जिन्हें नही करनी है वो किसी भी दबाव में नही करेंगे। 











Sunday, February 19, 2023

फाँसी- आँखों देखी

ठंड के दिन चल रहे थे, हम सब रज़ाई ओढ़े दिन काट रहे थे। स्कूल बंद थे। पूरा परिवार भी इकट्टा था,  पापा भी आज ऑफिस नही गए थे। हम सब एक साथ बैठ कर मूवी देख रहे थे ,  जिसमे अदालत मुल्ज़िम को अंत मे फाँसी देती है, और फिर मूवी का नायक उस खलनायक को सरेआम अदालत के बाहर फाँसी पर लटका देता हैऔर मूवी खत्म हो जाती है।

अब चालू होती है, उस मूवी पर चर्चा का खेल। 

अचानक पापा बोले, कितना बकवास दिखाते है मूवीज में, ऐसे कोई किसी को भी फाँसी पर चढ़ा सकता है?

पुलिस ऐसे ही देखती रहती है क्या?

इनलोगो ने कभी हकीकत में भी ऐसी फाँसी होती है, सब बकवास दिखाते है, और फिर सोंचते है कि मूवी हिट हो जाये, जरूर यह मूवी पिट गयी होगी। 

फाँसी पर चर्चा होने लगी फिर पापा बताने लगे कि कभी वो एक बार फाँसी देखने गए थे। 

सच्ची मुच्ची फाँसी, पापा कभी किसी  डिपार्टमेंट में रहे होंगे। उन्होंने किसी अधिकारी से बात की होगी, सच मे फाँसी देखने की लिए,फिर उस अधिकारी ने बोला, शर्मा जी आसान नही है फाँसी देखना। बड़े बड़ो की हालत खराब हो जाती है आप देख पाएंगे?

"हम चाहते है कि फाँसी खत्म हो जाये हो और आप फाँसी देखना चाहते है"

 तभी पापा और उनके साथियों ने बोला कि देख लेंगे इसमें कौन सी बड़ी बात है। पापा और उनके साथियों को कॉलेज से निकले बस कुछ ही दिन हुए थे। नया खून था और जोश भी भरपूर। 

तभी उनके अधिकारी ने बोला तो ठीक है, कुछ महीनों के बाद किसी व्यक्ति को फाँसी होने वाली है जिसने किसी परिवार को बड़े ही वीभत्स तरीके से खेत मे थी काट डाला था। अदालत ने उसे फाँसी की सज़ा सुनाई है।

पापा और उनके साथी बोले, तो ठीक है हम देख लेंगे हम मजबूत है, अधिकारी ने बोला मैं तुम्हे दिन तारीख बात दूंगा। फाँसी का आर्डर तुम लेकर जाना और तुम सबको तड़के जाना पड़ेगा और इस बात की चर्चा आप किसी से नही करेंगे, फाँसी कोई प्रदर्शनी नही है इसलिये, फाँसी आप एक झरोखे से देख पाएंगे ना कि सामने से। 

दिन तारीख बताई गई, रात भर कोई सोया ही नही और तड़के सब कारगर पहुँच गए। फाँसी का आर्डर जेलर को दिया गया। फिर उन्हें एक झरोखे तक ले जाया गया, सभी के अंदर उत्सुकता थी फाँसी देखने की, 1 घंटे इंतज़ार करने के बाद फाँसी के हॉल में उस कातिल को लाया गया। कोई अधिकारी उसे कुछ पूछ रहा था, इन लोगो को साफ सुनाई नही दिया। जल्लाद उसे फाँसी के तख्ते पर ले गया और मुँह पर कपड़ा बंधने और फंदा लगा लगाने से पहले उसने खुदा को याद किया और बोला। 

"ला इलाहा इल्लल्लाह मोहम्मद रसूलुल्लाह"

उस डाकू के चेहरे का भाव देख, और उसकी आवाज़ के कंपन ने पापा और उनके साथियो को अंदर से हिला दिया, इसके बाद उस हॉल में इतना सन्नाटा था की बयान नही किया जा सकता। मौत का डर उसकी आँखों मे साफ महसूस हो रहा था। 

जल्लाद ने इशारा पाते ही उसे फाँसी पर लटका दिया। फिर एक और गहरा सन्नाटा था। सबकी हालत और  खराब हों गयी। सब उठे और चल दिये। आपस मे बात करने की भी हिम्मत नही बची थी किसी मे, की फाँसी पर चर्चा कर ले। 

पापा के अनुसार कई रातो तक वो फाँसी उनके सपनों में आई। दहशत में आ जाते थे जब भी वो नज़ारा सपने में आता था। पापा के अनुसार उस फाँसी की चर्चा फिर कभी नही हुई आफिस में। 

पापा के चेहरे पर वो दहशत दिखाई दे रही थी। हम भी खामोश थे, अपनी जगह चिपक गए हो जैसे। थोड़ी देर बाद माँ ने वो सन्नाटा तोड़ा और बोला चलो खाना खाओ। 


आज भी जब मैं लिख रहा हूँ, सन्नाटा आज भी याद आ रहा है।