इस ब्लॉग में मेरे निजी विचार है। मैं इस ब्लॉग में अपने विचार व्यक्त करता हूँ और दुनिया से अपना विचार शेयर करता हूँ।
Friday, January 17, 2020
सवाल ए बेगम
Thursday, January 9, 2020
दूध के दांत
Tuesday, October 29, 2019
ट्रेन का स्वच्छ भारत अभियान
Wednesday, October 2, 2019
रमई काका और बहिरे बाबा
मैं आजकल हिमांशु वाजपेई की किताब किस्सा किस्सा लखनउवा पढ़ रहा हूं। इसी किताब में रमई काका और बहिरे बाबा का किस्सा भी है । उनका ज़िक्र आते ही, बचपन की याद आ गई। बचपने में मां द्वारा गोहराए जाने पर, उन्हें ना सुन पाने की इस्थिती में , वो अक्सर मुझे बहीरे बाबा कह कर बुलाती थी। रमई काका नाम इस इस्तेमाल हम अक्सर अपने काका को चिढ़ाने में करते थे। आज समझ में आया कि रमई काका और बहीरे बाबा का नाम कहां से आया।
Wednesday, September 18, 2019
यदि गाड़ी का आविष्कार ना होता तो?
इनदिनों हर तरफ गाड़ियों के चालान की ही बात हो रही है।
किसी को १.५ लाख का चालान लगा तो किसी को २ लाख का। चालान के भय की पराकाष्ठा इतनी है कि, कुछ लोग टोप पहन कर सो रहे है तो कोई कुर्सी पेटी पहन कर शौचालय जा रहा है। बिना वहां के पंजीकरण प्रमाण पत्र, वाहन बीमा एवं प्रदूषण प्रमाण पत्र के लोग अपना वहां सड़क पर निकाल ही नहीं रहे है। जब भी हम किसी को बिना टोप के वाहन चलाते हुए देखते है तो उसकी बहादुरी की प्रशंशा किए रहा नहीं जाता।
इसी बीच हम अपने मित्र के साथ, गाड़ी से अपने कार्यालय जा रहे थे, तभी हमे एक भैंसागाड़ी दिखी, भैसागाड़ी पर किसान, चारा लेकर जा रहा था। किसान चारे को गद्दा बना कर, उसके ऊपर चैन से लेटा हुआ था और भैंसा अपने सहज ज्ञान का प्रयोग कर के व्यस्त सड़क पर चला जा रहा था। तभी हमने सोंचा की यदि गाड़ी का अविष्कार न हुआ होता तो हम कार्यालय जाने के लिए घोड़े या गधो का प्रयोग कर रहे होते।
हम अपनी-अपनी आर्थिक स्थिती के हिसाब से अपना वाहन चुनते। हमारे प्रबंधक महोदय कार्यालय आने में हाथी का प्रयोग करते और हमारे सी.ई.ओ शायद हाथी और घोड़ो के लश्कर लेकर चलते।
कार्यालय में पार्किंग की जगह अस्तबल होते, पेट्रोल के जगह हम घोड़े को अपनी आर्थिक स्थिती के हिसाब से चारा खिलाते ।
हमारे साथ काम करने वाली महिलाये झाँसी की रानी की तरह घोड़े पर सवार होकर आती या पालकी में अपने अंगरक्षकों के साथ कार्यालय में प्रवेश करती।
गजब तो तब होता जब कोई प्रशिक्षु, गधे पर सवार होकर , सी.ई.ओ के लश्कर से किड़बिक- किड़बिक करते आगे निकल जाता। फिर प्रबंधक शान में गुस्ताख़ी समझ, उसे खरी खोटी सुनाते और शिष्टाचार का पाठ पढ़ाते । यदि प्रशिक्षु क्षमा मांग लेता तो शायद माफ़ कर दिया जाता। नहीं तो उसे बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता।
कार्यालय में घोड़ो के नस्लों के बारे में चर्चा की जाती। अच्छी नस्ल का घोडा खरीदने के लिया बैंक ऋण देती। घोड़े का भी बीमा कराया जाता और उसके स्वास्थ्य की समय समय पर जांच कराई जाती। घोड़ा के लीद के प्रबंधन का अलग से विभाग बनाया जाता।
सरकार स्वदेशी घोड़े को प्रोत्साहित करती और विदेशी घोड़ो पर अलग से कर लगाती। घोड़ो के बिक्री के हिसाब से हम अपनी जी.डी.पी के विकास की गणना करते। देश की तरक्की अच्छे नस्ल के घोड़ो पर निर्भर करती। जिस देश में अच्छे नस्ल के घोड़े होते, वो देश विकसित होता। जिस देश में गधे ज्यादा होते वो देश गरीब होता। खच्चरों वाले देश को हम विकासशील देश बोलते।
घोड़े डिजिटल उपकरण पहनते। मालिक के आँखों की पुतली के इशारे पर घोड़ा चलता। घोड़ा प्रशिक्षण केंद्र खुलते। घोड़ों को शहर का मानचित्र याद कराया जाता।
घोड़े का स्वामी जगह का नाम लेता और घोड़ा तैयार हो जाता स्वामी को गंतव्य स्थान तक पहुंचाने को। हर घोड़े पर उसके स्वामी का नाम अंकित होती। गलती से कोई और स्वामी घोड़े पर चढ़ जाता तो घोड़ा उसे हिन् हिना कर अपनी पीठ से गिरा देता।
घोड़ों की संख्या बढ़ने पर सरकारें घोड़ों के रंग के हिसाब नियम बनती की अमुक रंग का घोड़ा, अमुक शहर में, अमुक दिन प्रवेश करेगा ।
नियम तोड़ने पर घोड़े के स्वामी को आर्थिक दंड सहना पड़ता।
नाबालिक अगर घोड़े की सवारी करते हुए पाए जाते तो उनके अभिभावकों को कारागार की सजा दी जाती।
अपनी आर्थिक स्थिति से अधिक मंहगा घोड़ा खरीदने पर आयकर के छापे पड़ते।
एक आयोग भी बनता जो घोड़ों और गधों के अधिकारों की बात करता। उनका शोषण करने पर दंड का प्रावधान होता।
हम गप्पे मार ही रहे थे कि कार्यालय आ गया, गाड़ी पार्किंग में लगा हम अपने काम पर लग गए।
Saturday, September 7, 2019
दलमोठ
यह किस्सा बचपन के दिनों का है,जब हम अक्सर मेहमानों के आने पर बहुत खुश हुआ करते थे। खुशी उनके आने की नहीं, पर उनके सामने परोसे जाने वाली अलग अलग तरह की दालमोठ की होती थी। अलमारी में रखा दलमोठ, मम्मी अक्सर मेहमानों के लिए ही निकाला करती थी।
जब हम उन्हें नमस्ते करने जाते थे, तो कभी-कभी वे मुझे कह देते थे कि बेटा तुम भी तो, लो । बस इन शब्दों के इंतजार में ही तो हम रहते थे। हम एक दो चिम्मच पर रुकते ही कहां थे। मुंह भर भर के खा लेते थे।
उनके जाने के बाद हम, उस डालमोट की कटोरी को अलमारी में रखने के लिए तेजी से भागते थे और भागे भी क्यों ना। उसे रखते रखते एकाद मुट्ठी मुंह में जो भर लेते थे। मम्मी अक्सर हम पर नजर गड़ाए रहती थी कि कहीं हम उस दलमोठ को चट ना कर जाएं पर हम भी कम होशियार ना थे। मम्मी की आंख इधर से उधर हुई नहीं कि एक मुट्ठी भर हम छत की तरफ निकल जाते थे।
गजब तो तब होता था जब हम मेहमान बन किसी और के घर जाते थे। गलती से भी अगर किसी अंकल या आंटी ने बोल दिया कि बेटा तुम भी लो, तो, बस हाथ रुकते ही कहां थे । मां की आंखें बस हम पर ही होती थी । शिष्टाचार के नाते वह हमें कुछ बोल भी नहीं पाती थी।
घर वापस आते ही मां हर बार यही बोलती थी कि अब तुम्हें किसी के भी घर नहीं ले जाऊंगी।
अब हम बड़े हो गए है। हम आज खुद दलमोठ खरीद कर लाते है, पर वो चोरी चुप दलमोठ खाने का मजा आज कहां।
Monday, August 19, 2019
कहानी मेरी जान की
आम दिनों की तरह ही, मै आज सुबह तैयार होकर ऑफिस जाने के लिए उठा, तो सोचा मोबाइल पर मेसेज चेक कर लूं। एक एक कर मेसेज चेक ही कर रहा था कि, देखता क्या हूं, ऑफिस के एक ग्रुप में ढेर से मैसेज आए हुए है। मैंने सोचा इतने मैसेज, कुछ खास हुए है क्या?आज। ग्रुप में देखा तो सिर्फ मेरी ही चर्चा हो रही थी। मुझे लगा कुछ बवाला हो गया, मेरे नाम से। लोग सिर्फ जान की बात कर रहे थे। प्रश्नों का अंबार लगा हुआ था।
कोई बोला राहुल कल ज्यादा चढ़ गई थी क्या?
किसी ने बोला यह मैसेज किस जान को किया है तुमने?
कौन जान है तुम्हारी?
स्वाति को खबर करूं की तुम्हारी कोई और भी जान है।
स्क्रॉल किया तो देखता क्या हूं, जो मैसेज मैंने कल रात को अपनी पत्नी को किया था, वो पता नहीं कैसे इस ग्रुप में दिख रहा था। मेरे दिमाग में कल रात की सारी बात याद आ गई।
कल रात स्वाति जो कि अभी अपने मायके में है से बात हो रही थी। सोने से पहले स्वाति ने एक प्यार भरा मैसेज भेजा था। उसका जवाब मैंने "आई लव यू मेरी जान" लिख कर दिया था पर ना जाने वो मैसेज ऑफिस के ग्रुप ने कैसे चला गया पता नहीं।
मैंने उस मैसेज को झट से रिमूव किया, पर काफी देर हो चुकी थी। सबने पढ़ लिया था। मै यही सोंच रहा था कि, ऑफिस में आज तो सब मेरा खूब मज़ाक उड़ाएंगे । खैर डरते डरते मै ऑफिस पहुंचा। चेयर पर बैठा भी ना था कि दोस्तो की आवाज़ आ गई।
भाई जान आ गए!!!
भाई जान, तुम्हारी जान कैसी है?
कौन है तुम्हारी जान?
हम भी जाने कौन है वो?
मैंने उन्हें पूरी घटना विस्तार से बताई कि, भाई गलती से वो मैसेज ग्रुप में चला गया था, पर कोई भी मेरे मजे लेने का मौका हाथ से कैसे जाने देता। क्योंकि आज उनका दिन था। मेरा नहीं।
सब एक दूसरे से बात भी कर रहे थे तो बस जान शब्द का प्रयोग ज्यादा कर रहे थे। जब भी जान शब्द वाक्य में आता तो तेज बोलते।
दिन भर जान पर ही बात होती रही।
उनमें से कुछ वाक्य है।
- आज मेरी जान में जान आ गई।
- मेरी बहुत लोगो से जान पहचान है।
- मै अनजान लोगो से बात नहीं करती।
- तुम्हारी बातें तो जानलेवा है।
- तुम्हें जाना हो तो जाओ।
- भाई जान, ऐसा मत कर , नहीं तो जान से जाओगे।
- जानेदो जान।
- जाने वालो को जाने दो।
- बच्चे की जान लोगे क्या?
- कोई जान से खिलवाड़ नहीं करेगा।
- मै जान पे खेलता हूं।
- हम जान हथेली पर लेकर चलते है।
- ये काम जान बूझ कर मत करना।
- जान दे भाई।
- आज मै सब कुछ जान गया।
- जाने दो।
- जानते हैं हम सब।
- जानदार काम किया है भाई जान।
- बेजान सा हो गया है जानवर।
एक दोस्त ने कहा कि तुम आज ट्रेन से जा रहे हो तो, अनजान लोगो से जान पहचान मत बढ़ाना, नहीं तो जान को खतरा हो जाएगा।
होशियार रहना, क्योंकि जान है तो जहान है।
शाम ढली, तो मेरी भी जान में जान आई। मै भी अपने जान पहचान वाले लोगों के साथ बस में जाने का मौका मिला । अपनी जान से बात करते करते अनजानी जगह पहुंचा। फिर अनजाने लोगो की मदद से जानी पहचानी जगह नई दिल्ली आ गया। अनजाने में ही सही लोगो को जान पर बात करने का मौका मिला।