यह किस्सा बचपन के दिनों का है,जब हम अक्सर मेहमानों के आने पर बहुत खुश हुआ करते थे। खुशी उनके आने की नहीं, पर उनके सामने परोसे जाने वाली अलग अलग तरह की दालमोठ की होती थी। अलमारी में रखा दलमोठ, मम्मी अक्सर मेहमानों के लिए ही निकाला करती थी।
जब हम उन्हें नमस्ते करने जाते थे, तो कभी-कभी वे मुझे कह देते थे कि बेटा तुम भी तो, लो । बस इन शब्दों के इंतजार में ही तो हम रहते थे। हम एक दो चिम्मच पर रुकते ही कहां थे। मुंह भर भर के खा लेते थे।
उनके जाने के बाद हम, उस डालमोट की कटोरी को अलमारी में रखने के लिए तेजी से भागते थे और भागे भी क्यों ना। उसे रखते रखते एकाद मुट्ठी मुंह में जो भर लेते थे। मम्मी अक्सर हम पर नजर गड़ाए रहती थी कि कहीं हम उस दलमोठ को चट ना कर जाएं पर हम भी कम होशियार ना थे। मम्मी की आंख इधर से उधर हुई नहीं कि एक मुट्ठी भर हम छत की तरफ निकल जाते थे।
गजब तो तब होता था जब हम मेहमान बन किसी और के घर जाते थे। गलती से भी अगर किसी अंकल या आंटी ने बोल दिया कि बेटा तुम भी लो, तो, बस हाथ रुकते ही कहां थे । मां की आंखें बस हम पर ही होती थी । शिष्टाचार के नाते वह हमें कुछ बोल भी नहीं पाती थी।
घर वापस आते ही मां हर बार यही बोलती थी कि अब तुम्हें किसी के भी घर नहीं ले जाऊंगी।
अब हम बड़े हो गए है। हम आज खुद दलमोठ खरीद कर लाते है, पर वो चोरी चुप दलमोठ खाने का मजा आज कहां।
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