Thursday, March 14, 2019

विलेज ऑफ कॉक्स

दूर किसी गांव में कुछ मुर्गे और मुर्गियां रहा करती थी। गांव के सारे जानवरो से उनकी खूब गहरी दोस्ती थी। जब भी मुर्गियां, अपने चूज़ों के साथ, गली से निकलती तो हर कोई उन्हें देखकर बहुत नाज़ करते थे। सारे चूज़े अपनी माँ को बिना परेशान किये एक ही लाइन में चला करते थे और जब चूज़ों के पापा उनके साथ जाते तो वो बिना खिलौने लिए घर वापस नही आते थे। किसी को गुड़िया पसंद आती, तो किसी को गुड्डा।

एक दिन की बात है जब गांव की कुछ मुर्गो ने बताया कि पड़ोस के गांव में एक लोमड़ी आयी है जो बच्चो को उठा ले जाती है और उन्हें खा जाती है।

गांव के सारे जानवरो ने फैसला किया कि अब वो अपने बच्चो को बाहर खेलने नही भेजेंगे। बच्चे घर के आंगन में ही खेलेंगे और रात में सारे मुर्गे पहरा देंगे। दिन यूं ही बीत रहे थे। बच्चो ने बाहर जाना बंद कर दिया, वो घर मे ही आपस मे खेलते थे।

काफी दिन बीत जाने के बाद जब लोमड़ी गांव में नही आई तो बच्चो ने धीरे धीरे घर से बाहर खेलना शुरू किया। चूज़ों के पापा ने भी रात में पहरा देना कम कर दिया।

ऐसे ही किसी रोज़, लोमड़ी ने गांव में दबे पांव प्रवेश किया और देखा कि गांव के सारे मुर्गे सो रहे है । उसने सोंचा कि अच्छा मौका है किसी एक घर मे धावा बोल कर सबको खा लिया जाए।

लोमड़ी ने अक्कड़ बक्कड़ बोलकर एक घर को चुना। और उनके आंगन में कूद गई। मुर्गे अपने परिवार से साथ आंगन में ही सो रहे थे, उनकी आंख खुल गयी और देखा लोमड़ी उनके बच्चो पर झपट्टा मारने के लिए तैयार थी। तभी मुर्गे ने लोमड़ी को सावधान किया और बोला कि वो वहां से चली जाए, पर लोमड़ी कहाँ पीछे हटने वाली थी तभी मुर्गे के बांग लगाई और गांव से सारे मुर्गे एक आवाज़ साथ आ खड़े हुए।

तभी एक मुर्गे ने लोमड़ी पर आक्रमण कर दिया। लोमड़ी ताकतवर थी उसके एक ही वार ने मुर्गे को अधमरा कर दिया। सारे मुर्गे उसकी ताकत को देख घबरा गए और फिर कुछ और मुर्गो ने कोशिश की पर वो भी उससे हार कर अधमरे से हो गए।

मुर्गो ने आपस मे बात की कि ऐसे लड़ेंगे तो एक एक कर हम सब मारे जाएंगे, हम सब एक साथ लोमड़ी पर आक्रमण करते है, फिर जो भी होगा देखा जाएगा। सभी लोमड़ी की तरफ बढ़े किसी ने उसके मुंह पर चोंच मारे तो किसी ने उसके आँख पर, भीषण युद्ध चला मुर्गे घायल हो किनारे हटाते गए पर हार नही मानी। मुर्गिया भी पीछे नही रही उन्होंने भी युद्ध मे भाग लिया। लोमड़ी घायल हो भागने की फिराक में थी तभी मुर्गियों के एक झुंड ने उसका रास्ता रोक लिया और बोला तुम्हे ज़िंदा नही जाने देंगे । फिर सबने एक साथ एक आखिरी वार किया और लोमड़ी वही धरासायी हो गयी।

दूसरे दिन लोमड़ी के मारे जाने की खबर आस पास के गांव में फैली तो सब मरी हुई लोमड़ी को देखने आए और गांव से सारे मुर्गे और मुर्गियों की वीरता की प्रसंसा करने लगे।
ये खबर जब राज्य से राजा को पता लगी, तो राजा ने उस गांव को वीरो का गांव घोषित किया है।


Friday, February 8, 2019

अनुषा

अनुजा का आठवां महीना पूरा होने को था, हम सब अक्सर इकट्ठा हो छोटे से बेबी की बातें किया करते थे। छोटा सा बेबी किस पर जाएगा शैलेंद्र पर या अनुजा पर। हम शैलेंद्र और अनुजा से पूछा करते थे कि वह बेटी चाहते हैं या बेटा, दोनों बस एक ही बात बोलते थे कोई भी हो पर स्वस्थ हो। इसके अलावा हमें कुछ और नहीं चाहिए। मुझे अक्सर लगता था कि शायद बेटी ही होगी,  पता नहीं अंदर से कुछ आवाज सी आती थी।

अनुजा को जब नवा महीना लगा । शैलेंद्र के मम्मी-पापा और बहन, अनुजा की देखभाल करने के लिए उसके घर आ चुके थे। वीकेंड में हम साथ बैठे बात कर रहे थे कि हमें कभी भी अनुजा को हॉस्पिटल ले जाना पड़ सकता है। एक रात में हम गहरी नींद में थे कि, फ़ोन की घंटी बजती है, बड़ी मुश्किल से रजाई के बीच से कही फ़ोन हाथ लगा और देखता क्या हूँ शैलेंद्र का फ़ोन आ रहा था। फोन की घंटी सुनते ही स्वाति भी उठ कर बैठ गई थी।  फ़ोन उठाते ही शैलेंद्र कि आवाज़ आयी, राहुल सो कर उठ जाओ, अनुजा को दर्द शुरू हो गया है और उसे  होस्पिटल ले जाने का वक्त आ गया है।

हम झट से उठे और सामान समेटकर जाने के लिए तैयार हो गए। आदि को उसके मामा के साथ छोड़ कर हम अनुजा को लेकर कैलाश हॉस्पिटल निकल लिए। गाड़ी हम धीरे-धीरे चला रहे थे कि,  कहीं अनुजा को कोई समस्या ना हो जाए। हम हॉस्पिटल पहुंचे और वहां की फॉर्मेलिटी पूरी की।  अनुजा को लेबर रूम ले जाया गया। डॉक्टरों ने नॉर्मल डिलीवरी की कोशिश शुरू कर दी।  तभी अनुजा की एक चीख ने, हम सब को डरा दिया । शैलेंद्र भागा-भागा अनुजा के पास पहुंचा और बोला क्या हुआ? सब ठीक तो है ना? अनुजा को लेबर पेन इतना ज्यादा था कि वो बेचैन थी, अनुजा की हालत देख, शैलेंद्र की आंखों में भी आंसू, बस छलकने को ही थे। बड़ी मुश्किल से शैलेंद्र ने अपने आप को कंट्रोल किया। अनुजा की स्थिति को देखकर, शैलेंद्र ने निर्णय लिया कि वह ऑपरेशन के लिए जाएगा।

शैलेंद्र की हामी भरने के बाद डॉक्टरों ने डिलीवरी की तैयारी शुरू की, हम सभी ने अनुजा का हौसला बढ़ाया और अनुजा ऑपरेशन थिएटर के लिए निकल गई । बाहर शैलेंद्र हाथ बांधे खड़ा हुआ था, बहुत देर खड़े होने के बाद हम सब ने शैलेंद्र से कहा कि तुम बैठ जाओ, पर वह बैठ नहीं रहा था और बोल रहा था कि, जब तक अनुजा बाहर नहीं आती वह नहीं बैठेगा और ना ही कुछ खाएगा- पिएगा। थोड़ी देर के बाद डॉक्टर ने हमें बताया एक सुंदर सी बेटी ने जन्म लिया है, यह खबर सुन सभी बहुत खुश हुए और सुंदर सी बिटिया के फूफा खुशी के मारे मिठाई का डब्बा लेकर आए, मिठाइयां सब में बांटी गई और शैलेंद्र को भी खूब ढेर सी बधाई दी गई। दादी, बाबा, बुआ सब बहुत खुश थे।

अनुजा अभी लेबर रूम से बाहर नहीं आई थी,  शैलेंद्र वहीं खड़ा अनुजा का इंतजार कर रहा था । एक घंटा बीतने के बाद भी जब, अनुजा की कोई खबर नहीं आई तो वह दौड़ा - दौड़ा डॉक्टर के पास गया और बोला अनुजा कैसी है। डॉक्टरों ने शैलेंद्र को बताया की अनुजा अच्छी है और उसे थोड़ी देर में रूम में शिफ्ट कर देंगे। अभी उसे ऑब्जर्वेशन में रखा है। डॉक्टरों के बताने के बाद भी शैलेंद्र ऑपरेशन थियेटर के बाहर ही खड़ा रहा, थोड़ी देर के बाद जब अनुजा बाहर आई, अनुजा को देखने के बाद,  वह अपनी प्यारी सी बेटी से मिलने बेबी रूम में गया और वहां उसका वीडियो बनाकर हम सबको दिखाया। बिटिया बहुत छोटी और प्यारी थी और हम सब भी बहुत खुश थे की, अनुजा और छोटी सी बिटिया दोनों ही स्वस्थ हैं।

दोपहर होते-होते अनुजा को रूम में शिफ्ट कर दिया हम सब वही थे धीरे-धीरे करके सारी मित्र मंडली इकट्ठा हो गई। 3 दिन हॉस्पिटल में रहने के बाद अनुजा घर आई और जश्न की तैयारी शुरू हो गई। छठी में हम झूम कर नाचे। उसके बाद बिटिया का नाम रखने की प्रक्रिया शुरू हो गई। सभी लोगों ने अपने हिसाब से छोटी सी बिटिया के लिए नाम चुने, आखिर में बुआ ने उसका नाम शिवांशी सेलेक्ट किया, सर्वसम्मति से छोटी सी बिटिया का नाम शिवांशी फाइनल हो गया। प्यार से हम शिवांशी को शिवि भी बुलाते हैं।

जब शिवांशी 12 दिन की हुई तो हमने खूब जश्न मनाया,  शैलेंद्र ने सबको बुलाया। पुराने सारे दोस्त आए थे,  रिश्तेदारों का भी तांता लगा था। वह पार्टी यादगार रही दादी-दादा, बुआ-फूफा, मामा-मामी, मौसी और नानी सब झूम कर नाचे।

अब वह 6 महीने की होने को है,  शिवि ने शरारते शुरू कर दी है। वाह अक्सर पलट जाती है और जोर जोर से चिल्लाती है। मैं अक्सर उसे अनुशा कह कर बुलाता हूं। उसके इस नाम में अनुजा का अनु और शैलेंद्र क श है।

मैं  शिवि के सुंदर भविष्य की, ईश्वर से कामना करता हूं ईश्वर उससे अच्छी बुद्धि, संस्कार और अच्छा स्वास्थ्य प्रदान करें । मेरा और स्वाति का आशीर्वाद उसके साथ हमेशा रहेगा।  वाह मंडली की सबसे प्यारी बिटिया है और हम सब उसे खूब सारा प्यार देंगे।

Monday, January 28, 2019

गौरैया


हम कुछ ही दिन पूर्व ही शहर की घनी आबादी वाले इलाके से निकल उसी शहर की बाहरी इलाके में एक बहुमंजिला ईमारत में शिफ्ट हुए है।  शरू के कुछ दिन  में हमने बिलकुल भी अच्छे नहीं लगे। उस इलाके में हमारा कोई जानने वाला भी ना था।  एक सुबह देखता क्या हूँ एक नन्ही से गौरैया हमारे कमरे में दाखिल होती है। गर्मियों के दिन थे इसलिए हमने पंखा चला रखा था। गौरैया के आता देख हम झट से पंखे को ऑफ करने के लिए बढे। की कही चिड़िया को पंखे से चोट न लग जाये।

पंखा बंद तो हो गया पर चिड़िया बहार जाने का नाम ही नहीं ले रही थे, कभी परदे की रोड पर बैठ जाती तो कभी बंद पंखे के पारो पर।  भगाये तो कैसे भगाये  फिर हमने कमरे की सारी लाइट्स बंद की और सिर्फ एक ही दरवाज़ा खोला। अचानक चिड़िया फुर से उस गयी।


चिडियो को देख कर ना जाने क्यों हमे बहुत अच्छा सा लगा।  शहर की उस घनी आबादी में लोग तो बहुत थे बार कोई भी गौरैया नहीं थी।  हर जगह से गौरैया ख़त्म सी हो गयी है।  चहचहाने की की आवाज़े तो हमने बरसो बाद सुनी थी।  मानो ऐसा लग रहा था की हम किसी जीवित जगह आ गए है।

अब हम रोज़ चिडियो को अपनी बालकनी में दाना डालते है और जिस दिन भी हम भूल जाते थे चिडियो का चहचहाना बहुत ही बढ़ जाता है।  कुछ तो घर के अंदर आकर मानो हमे बताने का प्रयाश कर रही होती है की हम दाना डालना भूल गए हो।  हम झट से दरवाज़ा खोल दाना डालते है।  साथ में कुछ कबूतर भी दानो का मज़ा लेते है।




Monday, January 7, 2019

सनीलियोनि चाप


नए साल की शुरुवात हुए बस कुछ ही दिन हुए थे, हम अपनी पत्नी के साथ,अपने मुहल्ले की मार्केट की सैर कर  रहे थे कि, हमे एक दुकान दिखाई दी, जिसमे बड़ी भीड लगी हुई थी, हमारा भी मन किया कि हम जा कर देखे की क्या बिक रहा है। नज़दीक जा कर हमने देखा की दुकान में तरह तरह की चाप बिक रही थी। 
दुकानदार से हमने पूछा की चाप शाकाहारी ही होती है या नही? दुकानदार ने बोला सर् ये शाकाहारी होती है और इस दुकान में सबकुछ शाकाहारी ही है। पूछना थोड़ा जरूरी था क्योंकि चाप दिखने में मुर्गे की टांग की तरह लग रही थी। पत्नी भी साथ थी इसलिए पूछना थोड़ा ज्यादा जरूरी था। हमने कभी भी चाप नही खाई थी इसलिए मेरा मन किया कि चलो एक बार ट्राय किया जाए। पत्नी को हमने मनाया और उसने बड़ी हिम्मत की और चाप खाने के लिए तैयार हो गयी।
दुकानदार से हमने बोला, भाई चाप कैसे दे रहे हो? दुकानदार बोला सर् आप कौन सी चाप खाना पसंद करेंगे? बताइये। मैंने बोला, भाई, मुझे नही पता की हम कौन सी चाप खाए। आप ही बताओ कि हमे कौन सी चाप खानी चाहिए। आपके पास कौन सी मशहूर चाप है जिसे  लोग ज़्यादा पसंद करते है।
दुकानदार ने हमें बताया की, उसके पास एक स्पेशल चाप है, जिसका नाम सनीलियोनि चाप है।  सनीलियोनि का नाम सुन हमदोनो को हँसी आ गयी, थोड़ा हसने के बाद हमने बोला की ऐसी भी कोई चाप होती है क्या? मुस्कुराते हुए हमने अपनी पत्नी की तरफ देखा। हमारी पत्नी ने भी मुस्कुराते हुए सनीलियोनि चाप खाने के लिए तैयार हो गयी।
सनीलियोनि चाप सार्वजनिक जगह पर खाने की जगह हमने तय किया की हम घर जाकर सकून से इसका आनंद लेंगे। हम घर आये। मेरी पत्नी, एक सुंदर सी थाली में सनीलियोनि चाप परोसकर ले आयी। हमने पूरा आनंद लेकर चाप का सेवन किया। चाप खाने में बहुत चटपटी थी और छूने पर मख़मली ।  हमने अपने साले को भी चाप खिलायी। मेरे साले को सनीलियोनि चाप अच्छी लगी और उसने भी अपने हिस्से की चाप बड़े आनंद से खाई, बस उसे हमने चाप का नाम नही बताया।

Tuesday, October 30, 2018

करवाचौथ


मेरी शादी को सात साल होने को है और इस बरस हमारा सातवां करवाचौथ था। शादी के बाद जब पहला करवाचौथ पड़ा, तो मैं नोएडा से लखनऊ सुबह लगभग 3 बजे घर पहुंचा, सोते सोते सुबह के 5 बज गए थे । नींद खुली तो देखा दोपहर के 12 बज गए। मेरी पत्नी का यह पहला व्रत था वो भी बिना पानी और खाना के, वो थोड़ा डरी सहमी सी थी,  स्वाति की हालत अक्सर भूख लगने पर घायल शेरनी जैसी हो जाती थी और आज वो पूरा दिन बिना कहे पिये रहेगी, उसके लिए ये एक बड़ी बात थी। हमने अपनी पत्नी का हौसला बढ़ाया और बोला चलो आज मैं भी कुछ नही खाऊंगा । 
अचानक मेरी पत्नी बोली कि क्या आप मेरे लिए भी व्रत रहोगे । मैंने बोला जब तक व्रत रह पाऊंगा रहूंगा नही तो कुछ खा लूंगा। इतना बोल मैं कुछ देर और सो लिया।
दोपहर के दो बजने को थे तभी फिर मेरी पत्नी भागते हुए आये और बोली मुझे बहुत तेज़ प्यास लगी है मन कर रहा है चार-पाँच गिलास पानी पी लूं, तभी मैंने बोला पी लो, कुछ नही होगा। व्रत रह सकती हो, तो रही नही तो कोई बात नही। पर करवाचौथ का व्रत, व्रत नही परंपरा है उसे निभाना भी है।
गुस्से में स्वाति कमरे से बाहर चली गयी, फिर अचानक आती है और बोली कुछ आपको खाना है तो खा लो मैं चाय बना देती हूं, आपके लिए। दोपहर  हो गयी थी, मन ही मन सोंच रहा था कि मैं भी व्रत रह जाऊं पर रहूं कैसे, क्या कहूंगा माँ और दीदी से, की मैं भी करवचौत का व्रत हूँ। मेरे परिवार में आज तक कोई मर्द यह व्रत नही रहा है।
कहीं मुझे पर "जोरू का गुलाम" का तमगा तो नही लग जायेगा और दूसरी तरफ से सोंच रहा था कि अगर स्वाति के व्रत रहने पर मेरी उम्र बढ़ती है तो मेरे व्रत रहने पर उसकी भी तो उम्र बढ़ेगी।
यही सोंच मैंने माँ और दीदी से बोला कि सोंच रहा हूँ कि मैं भी व्रत रह जाऊं। तभी माँ बोली रह जाओ अगर रह सकते हो तो। माँ के सहमति मिलते ही मैंने भी ठान लिया की मैं भी व्रत रह ही जाऊंगा।
स्वाति कान लगाकर ये सारी बात सुन रही थी और मेरे इस फैसले से मन ही मन बहुत खुश हो गयी। इसी खुशी में अपनी भूख प्यास भी कुछ पल के लिए भूल गयी। व्रत रहने का फैसला लिए कुछ ही पल बीते ही थे कि ये खबर पूरे परिवार ने जंगल की आग की तरह फैल गयी।
शाम होने को थी, मैं भी तैयार था पत्नी का साथ देने के लिए। शाम हुई पर चंद्रमा का कोई नामोनिशान नही था । थोड़ी थोड़ी देर पर हम छत के चक्कर लगा रहे थे कि शायद चन्द्रमा के दर्शन हो जाये और हम कुछ खाए, पर चाँद आज अपने ही घमंड में था।
थोड़ी देर में पूजा की तैयार हो गयी और सब पूजा के लिए ऊपर आये। कथा कही और सुनी गई । विधि विधान से पूजा हुई, चलनी से मेरा चेहरा देख गया और हम दोनों के एक दूसरे का व्रत तोड़ा।
स्वाति ने यह बात अपने मायके में बताई कि आज राहुल। ने भी करवाचौथ का व्रत रखा था, यह सुन सास-ससुर जी भी बहुत खुश थे।
दूसरे दिन हमे नोएडा वापस आना था। हम तैयार हो नोएडा आ गए। आफिस पहुँचा तो साथ के लोगो ने मेरा हाल चाल पूछा और मजे लेने के लिए कुछ  ने पूछा क्या तुम भी व्रत थे। तब मैंने जवाब दिया,  हाँ, मैं भी व्रत था। इतना सुनते ही सबने कहा, क्या???? क्या????,  सच मे तुम व्रत थे। मैन बोला, क्या हुआ। हाँ मैं व्रत था..  कुछ दोस्तों ने मेरा हौसला बढ़ाया की ग्रेट मैन।
फिर चर्चा शरू हुई कि उनके जान पहचान के कुछ लोग भी व्रत रहते है अपनी पत्नी के लिए। मुझे उन कुछ लोगो मे शामिल होने पर अंदर से गर्व महसूस हो रहा था। कि मैंने कुछ स्पेशल किया है।
उस व्रत का असर मेरी पत्नी पर पूरे साल भर रहता है। स्वाति अपने दोस्तों से बताए नही थकती की मैं भी उसके लिए व्रत रखता हूँ। इन सात सालों में ज़्यादा कुछ नही बदला है पर कुछ और नाम जुड़ गए है जो अपनी पत्नी का साथ देने के लिए अपनी पत्नी के साथ करवाचौथ का व्रत रखते है। जानकर बहुत खुशी होती है।
पुरुष वादी समाज मे पुरुष द्वारा स्त्री के लिए व्रत रखना एक स्पेशल घटना है।
मेरे विचार से पति पत्नी का रिश्ता बराबरी का रिश्ता है। ना कोई छोटा और न कोई बड़ा।
इसलिए करवाचौथ में भी पैर छूने की रस्म को भी मैंने तिलांजलि दे दी है इस बरस से।

एक अजनबी

प्रिय ज्वेल,
तुम्हे तुम्हारे जन्मदिन की हार्दिक बधाई, ईश्वर तुम्हे अच्छा स्वास्थ्य एवं ज्ञान प्रदान करे। तुम अपना और अपने परिवार का नाम रौशन करो यही आशिर्वाद देता हूँ, तुम्हारे लिए मैं एक अजनबी हूँ पर तुम मेरे लिए नही। तुम्हे तस्वीरों में मैंने बड़ा होते देखा है। तुम्हारे छुटपन के किस्से अक्सर मेरे कानों में होकर गुजरे है पर मैं उसका साक्षी नही रहा हूँ। एक दिन आएगा, जब मैं तुम्हारे लिए अजनबी नही रहूंगा। तब मैं तुम्हे अपने बारे में विस्तार से बताऊंगा। तुम अपना ध्यान रखना और अच्छे से पढ़ाई करना।  तुम्हे ढेर सारा प्यार एवं आशीर्वाद।
                                       तुम्हारा एक अजनबी चाचा

Wednesday, October 24, 2018

एक घटना Meetoo

जबसे मिटू हैश टैग आया है और लोगो ने अपने ऊपर हुए अत्याचार की घटनाओं को शेयर किया है, मुझे भी लगा कि मैं भी कुछ लिखूं। लोगो से शेयर करू अपना भी अनुभव जिसमे मैं या मेरे जान पहचान दे लोग शामिल रहे हों।

मैं अपने भाई बहनों में मझला हूँ। घर मे मेरी बड़ी बहन का ही वर्चस्व रहा । कभी भी हमने उनसे तेज़ आवाज़ में बात नही की थी। कभी दीदी से पंगा भी हुआ तो दबी हुई
आवाज़ में ही हमने उनका विरोध किया।

किस्सा उन दिनों का है जब हम नौंवी क्लास में पढ़ते थे। स्कूल घर से बहुत दूर था। स्कूल हम स्कूल बस से जाते थे और बस घर से लगभग एक किलोमीटर दूर मिलती थी। सुबह हम अक्सर भाग भाग कर बस पकड़ते थे और शाम आराम से टहलते हुए आते थे। एक दिन की बात है,  जब मैं बस से उतरा तो मेरे सीनियर ने कहा कि, तुम इतनी दूर पैदल क्यों जाते हो, मेरा घर पास मे है, मैं रिक्शा कर के जाता हूँ। एक काम करो मेरे साथ चला करो और मैं अपने घर पर उतर जाऊंगा और तुम रिक्शा लेकर अपने घर चले जाना । पैसे मैं दे दूंगा, रिक्शे वाला पैसे तो उतना ही लेगा जितना मेरे घर के लिए लेता है।

मैंने उन्हें मना कर दिया यह सोचकर कि दीदी को पता लगा कि मैं रिक्शे से आया हूँ और पैसे किसी और ने दिए है तो मेरी अच्छे से धुलाई हो जाएगी।

ऐसे ही किसी दिन स्कूल से जल्दी छुट्टी होने पर मैं बस से उतरा और फिर मेरे सीनियर ने कहा आज चल मेरे साथ रोज़ तो जाता नही है, मैंने सोंचा की चलो चलते है एक ही दिन की तो बात है।

हम रिक्शे पर बैठे और घर की तरफ निकले । तभी देखता हूँ एक लड़की जो किसी और रिक्शे पर थी, स्कूल से घर जा रही थी। तभी मेरा सीनिय,  रिक्शे वाले से बोलता है कि इसका पीछा करो और उसके रिक्शे के बराबर लेकर आओ। मैं तुम्हे दुगने पैसे दूंगा। तभी रिक्शे वाले ने तेज से रिक्शा चलाया और लड़की के रिक्शे के पास जैसे ही पहुँचा, मेरे सीनियर ने बोला अपना रिक्शा उसके रिक्शे से लड़ा दो, मैं तुम्हे और भी पैसे दूंगा। मेरा माथा ठनका और मैंने बोला सर रहने दो। फिर उसने बोला अभी मज़ा आएगा। तभी रिक्शे वाले ने अपना रिक्शा लड़की के रिक्शे से लड़ा दिया और वो बोला , Hi Sweety, How are you? You are very beautiful. In which class do you read?

लड़की ने पीछे देखा और सहम गईं। तभी वो फिर बोला और लड़ाओ रिक्शा। लड़की के रिक्शे वाले ने शायद हालात को समझा और वो रिक्शा तेज़ी से निकाल ले गया। तब तक मेरे सीनियर का घर आ गया था। वो घर नही हवेली थी। उसने उस रिक्शे वाले को 50 रुपये की नोट पकड़ाई और बोला, इसे घर छोड़ देना जहां भी हो। मैं सहम सा दोबारा उसके साथ न आने का प्रण लिए घर आ गया। उस घटना ने मेरे दिल पर काफी गहरा असर डाला और उसे मैं कभी भूल नही पाया।
फिर किसी रोज़ मैंने उस लड़की को अपने ही मुहल्ले के पास के घर मे देखा। डर के मारे मेरी फिर कभी हिम्मत नही हुई उस गली में जाने की, कि कही किसी रोज़ उसने मुझे पहचान लिया और ये बात मेरे घर तक पहुच गयी तो मेरी बहन मुझे इतना पीटेंगी की दुनिया का कोई भी इंसान मुझे बचा नही पायेगा।