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Tuesday, October 30, 2018

करवाचौथ


मेरी शादी को सात साल होने को है और इस बरस हमारा सातवां करवाचौथ था। शादी के बाद जब पहला करवाचौथ पड़ा, तो मैं नोएडा से लखनऊ सुबह लगभग 3 बजे घर पहुंचा, सोते सोते सुबह के 5 बज गए थे । नींद खुली तो देखा दोपहर के 12 बज गए। मेरी पत्नी का यह पहला व्रत था वो भी बिना पानी और खाना के, वो थोड़ा डरी सहमी सी थी,  स्वाति की हालत अक्सर भूख लगने पर घायल शेरनी जैसी हो जाती थी और आज वो पूरा दिन बिना कहे पिये रहेगी, उसके लिए ये एक बड़ी बात थी। हमने अपनी पत्नी का हौसला बढ़ाया और बोला चलो आज मैं भी कुछ नही खाऊंगा । 
अचानक मेरी पत्नी बोली कि क्या आप मेरे लिए भी व्रत रहोगे । मैंने बोला जब तक व्रत रह पाऊंगा रहूंगा नही तो कुछ खा लूंगा। इतना बोल मैं कुछ देर और सो लिया।
दोपहर के दो बजने को थे तभी फिर मेरी पत्नी भागते हुए आये और बोली मुझे बहुत तेज़ प्यास लगी है मन कर रहा है चार-पाँच गिलास पानी पी लूं, तभी मैंने बोला पी लो, कुछ नही होगा। व्रत रह सकती हो, तो रही नही तो कोई बात नही। पर करवाचौथ का व्रत, व्रत नही परंपरा है उसे निभाना भी है।
गुस्से में स्वाति कमरे से बाहर चली गयी, फिर अचानक आती है और बोली कुछ आपको खाना है तो खा लो मैं चाय बना देती हूं, आपके लिए। दोपहर  हो गयी थी, मन ही मन सोंच रहा था कि मैं भी व्रत रह जाऊं पर रहूं कैसे, क्या कहूंगा माँ और दीदी से, की मैं भी करवचौत का व्रत हूँ। मेरे परिवार में आज तक कोई मर्द यह व्रत नही रहा है।
कहीं मुझे पर "जोरू का गुलाम" का तमगा तो नही लग जायेगा और दूसरी तरफ से सोंच रहा था कि अगर स्वाति के व्रत रहने पर मेरी उम्र बढ़ती है तो मेरे व्रत रहने पर उसकी भी तो उम्र बढ़ेगी।
यही सोंच मैंने माँ और दीदी से बोला कि सोंच रहा हूँ कि मैं भी व्रत रह जाऊं। तभी माँ बोली रह जाओ अगर रह सकते हो तो। माँ के सहमति मिलते ही मैंने भी ठान लिया की मैं भी व्रत रह ही जाऊंगा।
स्वाति कान लगाकर ये सारी बात सुन रही थी और मेरे इस फैसले से मन ही मन बहुत खुश हो गयी। इसी खुशी में अपनी भूख प्यास भी कुछ पल के लिए भूल गयी। व्रत रहने का फैसला लिए कुछ ही पल बीते ही थे कि ये खबर पूरे परिवार ने जंगल की आग की तरह फैल गयी।
शाम होने को थी, मैं भी तैयार था पत्नी का साथ देने के लिए। शाम हुई पर चंद्रमा का कोई नामोनिशान नही था । थोड़ी थोड़ी देर पर हम छत के चक्कर लगा रहे थे कि शायद चन्द्रमा के दर्शन हो जाये और हम कुछ खाए, पर चाँद आज अपने ही घमंड में था।
थोड़ी देर में पूजा की तैयार हो गयी और सब पूजा के लिए ऊपर आये। कथा कही और सुनी गई । विधि विधान से पूजा हुई, चलनी से मेरा चेहरा देख गया और हम दोनों के एक दूसरे का व्रत तोड़ा।
स्वाति ने यह बात अपने मायके में बताई कि आज राहुल। ने भी करवाचौथ का व्रत रखा था, यह सुन सास-ससुर जी भी बहुत खुश थे।
दूसरे दिन हमे नोएडा वापस आना था। हम तैयार हो नोएडा आ गए। आफिस पहुँचा तो साथ के लोगो ने मेरा हाल चाल पूछा और मजे लेने के लिए कुछ  ने पूछा क्या तुम भी व्रत थे। तब मैंने जवाब दिया,  हाँ, मैं भी व्रत था। इतना सुनते ही सबने कहा, क्या???? क्या????,  सच मे तुम व्रत थे। मैन बोला, क्या हुआ। हाँ मैं व्रत था..  कुछ दोस्तों ने मेरा हौसला बढ़ाया की ग्रेट मैन।
फिर चर्चा शरू हुई कि उनके जान पहचान के कुछ लोग भी व्रत रहते है अपनी पत्नी के लिए। मुझे उन कुछ लोगो मे शामिल होने पर अंदर से गर्व महसूस हो रहा था। कि मैंने कुछ स्पेशल किया है।
उस व्रत का असर मेरी पत्नी पर पूरे साल भर रहता है। स्वाति अपने दोस्तों से बताए नही थकती की मैं भी उसके लिए व्रत रखता हूँ। इन सात सालों में ज़्यादा कुछ नही बदला है पर कुछ और नाम जुड़ गए है जो अपनी पत्नी का साथ देने के लिए अपनी पत्नी के साथ करवाचौथ का व्रत रखते है। जानकर बहुत खुशी होती है।
पुरुष वादी समाज मे पुरुष द्वारा स्त्री के लिए व्रत रखना एक स्पेशल घटना है।
मेरे विचार से पति पत्नी का रिश्ता बराबरी का रिश्ता है। ना कोई छोटा और न कोई बड़ा।
इसलिए करवाचौथ में भी पैर छूने की रस्म को भी मैंने तिलांजलि दे दी है इस बरस से।