Monday, March 5, 2018

मैं बच्चा हूँ उल्लू नही

आदि अब चार साल का होने को है, उसके के खिलौनों के तोड़ने की रफ्तार , उसके नए खिलौनों के आने की रफ्तार से कही ज़्यादा है। एक समझदार और कंजूस पिता होने के नाते,  मैं टूटे खिलौनों को जोड़ने के लिए ग्लू गन खरीद कर लाया । एक-एक कर मैने उसके कई टूटे खिलौने जोड़ कर सही कर दिए और फिर आदि उन जुड़े हुए खिलौनों से खेलने लगा , जुड़े हुए खिलौनो से खेलता देख, मुझे लगा कि चलो, कुछ खर्च तो कम हुआ, उसके नए खिलौनो पर।

एक हफ्ता बीता ही था,  कि वो फिर से कुछ और खिलौने ले आया और बोला, पापा ग्लू गन से जोड़ दो ना। मैंने फिर से खिलौनों को जोड़ दिया, पर मुझे क्या मालूम था कि अब आदि के खिलौनो के टूटने की रफ्तार और बढ़ जाएगी। अब उसका सारा ध्यान खिलौनो को तोड़ने पर लग गया,  मुझे धीरे धीरे अहसास होने लगा कि अगर मैं डाल डाल हूँ तो वो पात पात है। खिलौनो के टूटने और जोड़ने का सिलसिला जारी रहा।

एक दिन की बात है, जब आदि अपना सबसे ज़्यादा टूटा हुआ खिलौना मेरे पास लेकर आया और बोला, पापा क्या आप यह खिलौना जोड़ पाओगे। मैंने पूरी तरह से टूटा हुआ खिलौना देखा और बोला, हाँ, बेटा, मैं इसे जोड़ दूँगा। फिर आदि बोलता है, नही पापा,  आप नही जोड़ पाओगे, फिर मैंने बोला कि , नही बेटा,  मैं जोड़ दूँगा।  तभी  थोड़ी सी खामोशी के बाद आदि के कुछ बोलने के आवज़ सुनाई दी की "मैं बत्ता हूँ उलू नही" । पहली बार तो मैं समझ ही नही पाया कि वो क्या बोल रहा है। मैंने आदि को दोबारा बोलने को कहा,  तो फिर उसने बोला कि, "मैं बत्ता हूँ उलू नही"।

तभी स्वाति की आवाज़ आ गयी कि वो बोल रहा है कि "मैं बच्चा हूँ उल्लू नही "। मैं ये बात सुन आश्चर्य में था कि यह वाक्य इसने सीखा कहाँ से। मैंने आदि से पूँछ की तुमने यह कहाँ से सीखा, आदि ने कुछ जवाब नही दिया। तभी स्वाति बोलती है कि एक विज्ञापन आता है, उसमे एक बच्चा ये वाक्य बोलता है, वही से आदि ने सीखा है।

Saturday, December 2, 2017

जीजा जी का जन्मदिन

आदरणीय जीजा जी,
आपको जन्मदिन की खूब ढेर सारी बधाइयां। ईश्वर आपको सुख समृद्धि एवं अपार धन संपदा प्रदान करे, जिससे मैं अपना जीवन, आपका साला होने के नाते आनंद, हर्षो उल्लास के साथ मना सकूँ और मेरी बहना खूब शॉपिंग कर अपना और गूगल का जीवन खुशियो से भर सके।
आपको बहुत ढेर सारी शुभकामनाएं।
आपका दहेज
आपका साला

Thursday, November 23, 2017

मेरा जन्मदिन

18 नवंबर, एक ऐसा दिन जिस दिन मेरा जन्म हुआ था , हर वर्ष, इस दिन मेरे अंदर कहीं गहराई में छुपा हुआ बचपन सामने आता है। मुझे बरसो हो गए घर और परिवार से दूर हुए , इसलिए कान फ़ोन की घंटी पर ही टिका रहता है कि कौन कौन फ़ोन कर मुझे जन्मदिन के दिन बच्चा होने का अहसास कराएगा।
हर बधाई में कहा गया, हैप्पी बर्थडे,  एक दुआ बन इस दिन मुझे स्पेशल होने का अहसास कराता है। वो सब लोग जो मुझे जन्मदिन पर विश करते है, वो मेरे लिए बहुत स्पेशल है। धन्यवाद उन सबका जिन्होंने मुझे शुभकामनाए दी और धन्यवाद मेरी  पत्नी का जिसने मेरे बर्थडे को स्पेशल बनाने के लिए सरप्राइज गिफ्ट लेकर आई। धन्यवाद उन दोस्तो का भी जो मेरे जन्मदिन पर आए और मेरे साथ डांस किया।
यह जन्मदिन मेरे बेटे को समर्पित जिसे देख मैं रोज़ बचपन जीता हूँ।
ईश्वर आपसभी को , अच्छा स्वास्थ्य और समृद्धि दे, जिससे आप भी अपना जीवन शानदार तरीके से गुजारे और मुझे यूँ ही जन्मदिन की बधाई हर वर्ष दे।

Saturday, October 14, 2017

भविष्य एक जिज्ञासा या पहेली

ऑफिस में आजकल ज़ेव फेस्ट चल रहा है, इसी फेस्ट में एक स्टॉल लगा था टैरो कार्ड रीडर का । ज़ोर शोर से हम सभी को कई दिनों पहले ही इसकी सूचना दे दी गयी थी कि ऑफिस में एक टैरो कार्ड रीडर आ रहा है। स्टॉल के आगे काफी भीड़ जुटी हुई थी। जो भी व्यक्ति अपना भविष्य जानकर बाहर आ रहा था, वो बड़ा ही खुश और चकित नज़र आ रहा था। हमने भी कुछ लोगो से पूछा कि भाई क्या बता रहीं है टैरो कार्ड रीडर। सब का एक ही जवाब था,  बहुत खूब और क्या सटीक भूत और भविष्य बता रही है। तुम सबको जाना चाहिए। लाइफ टाइम एक्सपीरियंस है।

सबकी बाते सुन हमारा भी मन करने लगा अपना भविष्य जानने के लिए, साथ मे प्रियंका और रितिका का भी मन करने लगा, अपना भी भविष्य जानने का, हम तीनों कार्ड रीडर के स्टॉल पर पहुचे और अपना नाम भी रजिस्टर करा दिया।
हम वही खड़े, अपनी बारी का इंतज़ार कर रहे थे। जो भी अपना भविष्य जानकर बाहर आता। उसका चेहरा कुछ खास चमक लिए रहता।  हमारी जिग्ज्ञासा बढ़ती ही जा रही थी और अंदर से धुक धुक भी कर रहा था कि हम क्या क्या पूछेंगे।

हम तीनों ने वर्चुअल लिस्ट बनाई की हम क्या क्या पूछ सकते है, की जब भी हम उस टैरो कार्ड रीडर के पास जाए, तो सारे जरूरी सवाल छूट न जाये। फिलहाल हम तैयार थे अंदर जाने के लिए।

जैसे जैसे हमसे पहले नंबर वाले लोग निकल रहे थे और अपना एक्सपीरियंस शेयर कर रहे थे, हमारी धुक धुक बढ़ती जा रही थी, काफी इंतज़ार के बाद मेरा नंबर आया। मैं जैसे ही अंदर जाने को तैयार हुआ, कि कोई और अंदर चला गया। खैर मेरा नंबर आ ही गया। दोस्तो से आल द बेस्ट ले हम अंदर गए।

अंदर का नज़ारा ही कुछ अलग सा था, कमरा लाल रौशनी से जगमगा रहा था, और मध्यम गति से संगीत बज रहा था। सामने देखता हूँ एक महिला जादूगरनी की वेशभूषा में सामने बैठी हुई थी। उनके सामने काले कपड़े के ऊपर कुछ टैरो कार्ड्स रखे हुए थे और बगल में चमकता हुआ ग्लोब जैसा कुछ रखा हुआ था, जिसमे से सफेद रौशनी निकल रही थी।

टैरो कार्ड रीडर ने उनके सामने रखी कुर्सी पर हमसे बैठने का आग्रह किया, नज़ारा इतना विस्मय था,  लग रहा था कि हम किसी दूसरे लोक में आ गए हो। हम उनके सामने बैठे, हम उस वातावरण में सहज महसूस करते, उससे पहले मोहतरमा ने मुझसे मेरा नाम पूछा।

टैरो कार्ड रीडर:आपका नाम क्या है?
मैं: राहुल, मेरा नाम राहुल है।

टैरो कार्ड रीडर: आप क्या जानना चाहते है अपने बारे में?
मैं: मैं अपनी समस्याओं का समाधान और अपने भविष्य जानना चाहूंगा एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर के रूप में।

टैरो कार्ड रीडर: ठीक है,  तो आप सामने रखे कार्ड्स में कोई एक कार्ड सेलेक्ट कर , मुझे दीजिए।
मैं: मैंने एक कार्ड सेलेक्ट कर उन्हें दे दिया।

कार्ड देख टैरो कार्ड रीडर थोड़ा मुस्कुराई, उन्हें मुस्कुराता देख मुझे लगा, शायद मेरा भविष्य उज्ज्वल है। फिर टैरो कार्ड रीडर ने अपना हाथ उस ग्लोब पर रख, अपनी आंखें बंद की,  उस ग्लोब की रौशनी उनके चेहरे पर ऐसे पड़ रही थी, जैसे हम अक्सर जादूगर वाली मूवीज़ में देखते है, शायद वो ध्यान मुद्रा में चली गयी थी।

एक पल ध्यान में रहने के बाद वो बोली, राहुल मैं तुम्हारे लिए कुछ देख पा रही हूँ। मेरे मन में सब जान लेने की इच्छा हुई, जो कुछ भी उन्होंने देखा था अपने ध्यान में, फिर उन्होंने बोला, आप मेरा हाथ पकड़िये , मैं कुछ और भी महसूस करना चाहती हूं, आपके बारे में, पर मुझे तो उनका हाथ ही दिखाई नही दे रहा था, जो मैं पकड़ लेता। मैंने पूछा आपके हाथ है कहाँ? जो मैं पकड़ लूं। फिर उन्होंने बोला,  मेज़ के ऊपर जिसपर कार्ड रखे है उसके नीचे जगह है, आप वही अपना हाथ डालिये, मैने अपना हाथ डाला और वही एक सिरकते हुए हाथ ने मेरा हाथ थाम लिया।

फिर उन्होंने मुझे आँख बंद कर अपने विज़न के बारे में सोंचने के लिए बोला, मैंने आंखे बंद की और अपना विज़न तलाशने लगा, अपनी बंद आँखों से। कही विज़न तलाशते हुए मैं कभी लखनऊ में अपने घर पहुंचा,  तो कभी यही नोएडा में ही रहा , एक बार तो मैं अमेरिका तक जा पहुँच गया।
साथ ही टैरो कार्ड रीडर ने मेरा हाथ कस कर पकड़ा हुआ था। मेरा ध्यान एक जगह केंद्रित होता उससे पहले मेरे कंधे पर ठप ठप सी महसूस हुई जैसे कोई मुझे गहरे ध्यान से जगाना चाह रहा हो।

मैंने आँख खोली, तो सामने वाली कुर्सी पर कोई था ही नही पर किसी ने मेरा हाथ अभी भी थाम रखा था, मेरा मन चकित था कि ये क्या है ? ये कैसा चमत्कार है? तब मेरे कानों में एक आवाज़ आई राहुल ... राहुल और जब मैंने अपने बाई तरफ देखा, तो वो टैरो कार्ड रीडर अपने हाथ में एक स्माइली लिए खड़ी थी और बोली... राहुल ये एक प्रैंक था। पहले तो मुझे समझ नही आया कि ये क्या हो रहा है...  तभी एक बच्ची मेज़ के नीचे से निकली जिसने मेरा हाथ पकड़ रखा था।

प्रैंक समझने में मुझे ज़्यादा समय नही लगा। मैं मुस्कुराते हुए बाहर निकला और सोंचने लगा कि ये सच है, शायद आपको आपकी समस्याओ और विज़न के लिए खुद ही परिश्रम करना होता है इसमें कोई भी आपकी मदद नही कर सकता।

Wednesday, October 11, 2017

पत्नी का जन्मदिन

मेरी हृदय-कनिका,
आज तुम्हारा जन्मदिन है, मैं तुम्हारे बारे में क्या लिखूं कुछ शब्द ही नही मिल रहे है, तुम मेरी प्राणेश्वरी हो , तुम ही मेरी हृदयेश्वरी हो,  तुम्हे ईश्वर सुख समृद्धि और अच्छा स्वास्थ्य प्रदान करे और तुम यूँ ही चिरायु हो मेरे जीवन को फूलो की तरह महकती रहो।
तुम्हे जन्मदिन की खूब ढेर सारी बधाई।
तुम्हारा हृदयांश
राहुल शर्मा

Thursday, September 14, 2017

हिंदी दिवस

आज हिंदी दिवस है इस अवसर पर मैं अपने जीवन मे हिंदी के महत्व पर कुछ शब्द लिखना चाहता हूं। मेरा जन्म ऐसे परिवार में हुआ जहाँ हिंदी और अवधी का बोल बाला था। अंग्रजी सिर्फ मेरे पिता जी को आती थी, वो भी इतनी की सरकारी काम आसानी से निपट जाए।

आस पास का वातावरण भी जय हिंद और जय हिंदी का ही था। पूरी कॉलोनी में शायद ही कोई अखबार अंग्रजी का आता हो। हम भी हिंदी माध्यम से पढ़ रहे थे। अंग्रेजी पढाने के लिए तो बहुत लोग थे वहां,  पर हमे यह कभी समझ नही आई।

हिंदी में अच्छे नंबर ही आते थे और अंग्रेजी में अक्सर लाल निशान वाले ही अंक मिले। जैसे तैसे,  हम बिना अंग्रेजी में पारंगत हुए ही, हमने दसवी और बारहवीं की इम्तेहान पास किये। दोनों में ही हिंदी में अच्छे अंक रहे पर अंग्रेजी में अंक बस उत्तीर्ण होने जितने ही थे।

जीवन मे एक महत्त्वपूर्ण बदलाव स्नातक में आया जहां हिंदी का नामोनिशान ही नही था। हर विषय का सिर्फ अंग्रेजी में प्रारम्भ और अंग्रेजी में ही अंत होता था। कक्षा के पहले दिन ही जब सब अपना परिचय अंग्रेजी में दे रहे थे,  तो मुझे घबराहट सी होने लगी कि, मैं अपना परिचय कैसे हिंदी में दूं। एक गहरी सांस लेने के बाद मैंने अपना परिचय हिंदी में ही दिया , पता नही क्यों मेरे मन मे हीन भावना घऱ करने लगी थी।

कक्षा के सारे बच्चे जब अघ्यापक के सारे प्रश्नों का जवाब अंग्रेजी में दे रहे थे, तब जवाब आने के बाद भी, जवाब नही दे पाना एक सामान्य से घटना हो गयी थी। अब सारी कॉपी और किताब अंग्रेजी में ही थी। अंग्रेजी की स्पेलिंग की तो चर्चा क्या करना । इसपर मेरे साथियो ने मेरी काफी मदद की।

पहले सेमिस्टर में अंग्रेजी का एक अलग विषय था, जिसे पढ़ाने के लिए जिस अध्यापिका को नियुक्त किया था, उनकी अंग्रेजी मेरे सर के ऊपर से जाती थी। इम्तेहान हुआ और जब रिजल्ट आया,  तो मैंने देखा, कुछ चुनिंदा लोगो मे मेरा नाम था, जो अंग्रजी एवं अन्य विषय मे पास थे। मेरी खुशी का तो कोई ठिकाना ही नही था।

धीरे धीरे दोस्तो के मदद मेरे अंदर का अंग्रेजी का भूत भाग और स्नातक  एवं परास्नातक,  दोनों अच्छे नम्बरों से पास हुआ, पर अभी भी हाल बहुत अच्छे नही थे अंग्रेजी में मेरे,  पर हिंदी तो थी ही नही कही की उसका दामन पकड़ मैं अपनी नैया पार लगा लूं।

अब हर काम अंग्रेजी में ही करने थे, इंटरव्यू हो या अपना सी.वी हो सब अंग्रेजी में। जैसे तैसे नौकरी का इंटरव्यू हिंग्रेजी में निकला।

आज जब मैं एक सॉफ्टवेर कंपनी में काम कर रहा हूँ, और एक सॉफ्टवेर इंजीनियर हूँ, यहां भी मेरे के.आर.ए में कम्युनिकेशन पर जोर देने की बात लिखी जाती है। अंग्रेजी सुधारने में भी यहां मेरे दोस्त काफी मदद करते है, मैं निरंतर प्रयासरत हूँ कि एक दिन अंग्रेजी पर विजय प्राप्त कर लूं।

हिंदी जो कि जीवन रेखा है, मैं इसका प्रयोग अपने दिल की बात कहने में करता हूँ। मेरा फेसबुक पर एक पेज है और एक ब्लॉग भी है जिसपर मैं हिंदी में खूब लिखता हूँ।

Saturday, August 26, 2017

बचपन की ज़िद समझौते में बदल जाती है

"ज़्यादा कुछ नही बदलता उम्र के साथ .. बस बचपन की ज़िद समझौते में बदल जाती है"

गुलज़ार की ऊपर लिखी लाइनों ने मेरी सोंच में थोड़ा परिवर्तन जरूर लाया है। मेरा 3 साल का बेटा है जिसका नाम सात्विक है, घर मे हम उसे प्यार से आदि बुलाते है। वो उम्र बढ़ने के साथ साथ ज़िद्दी और शरारती होता जा रहा है।

हर वीकेंड खिलौनों की लिस्ट मेरे सामने होती है और जब हम खिलौने की दुकान पर जाते है तब वो खिलौना नही आता है जिसकी डिमांड थी। वहां उसे कुछ और ही पसंद आ जाता है जिनका ज़िक्र घर पर नही हुआ था।  अगले हफ्ते फिर वही लिस्ट मेरे सामने आती है और वो फिर बोलता है की पापा आदि के पास पुलिस कार नही है, टैंकर ट्रक नही है या मेट्रो ट्रेन नही है।

अगर किसी हफ्ते खिलौना न दिलाओ तो ऐसे रोता है कि कुछ पूछो मत...  आदि रोते हुए बोलता है  कि " पापा प्लीज आदि को पुलिस कार दिला दो ना .... आदि के पास बिल्कुल भी नही है, ...  सब कार टूट गयी है"  आदि के पास कुछ भी नही है..

क्या करूँ बाप और माँ का दिल है,  पसीज ही जाता है..  फिर वही चक्र चलने लगता है कि लेने कुछ जाता है और लेकर कुछ और ही आता है।

एक दिन की बात है कि, मैं आफिस से आया ही था कि आदि की ज़िद शरु हो गयी कि आदि को टॉय चाहिए... चाहिए….. और बस चाहिए... थोड़ी देर तो हम टालते रहे और स्वाति  बोली कि बेटा पापा अभी आफिस से आये है, थक गए है,  वीकेंड में चलेंगे फिर तुम्हे टॉय दिलाएंगे, इस टाइम टॉय की शॉप बंद हो गयी होगी  कल चलेंगे,  पर आदि को कहां मानना था। आदि का रोना शरू हो गया। वो रोते रोते बोलने लगा कि माँ शॉप बंद नही हुई होगी , खुली होगी, चलो टॉय की शॉप...  किसी तरह हमने थोड़ा वक्त गुजरा फिर , थकहार कर स्कूटर निकाला , स्वाति और आदि को बिठाया और निकल पड़ा खिलौने की दुकान की तरफ..

आदि रास्ता बता रहा कि पापा इधर चलो टॉय की शॉप है। हमने बोला बेटा शॉप बंद हो गयी होगी पर आदि कहाँ मनाने वाला था। हम दुकान की तरफ बढ़े और देखा वो सच मे बंद थी। वहां पहुच आदि को बोला.... देखो शॉप बंद है कि नही.. फिर आदि बोला पापा कोंडली चलो वहां खुली होगी। स्वाति ने बोला वहां भी बंद हो गयी होगी बेटा अब घर चलो...

घर की तरफ निकल ही रहे थे कि आदि बोला "पापा टॉय वाले भैया सो गए है कल सुबह उठेंगे फिर शॉप खुलेगी" तब दिला देना पापा, हमने बोला ओके बेटा.. फिर आदि बोलता है कि, पापा आदि को आइसक्रीम तो दिला दो,  फिर हमने ,  स्वाति और आदि दोनों ने आइसक्रीम दिलायी और हम घर आ गए। घर आकर आदि को वो आइसक्रीम नही चाहिए है जो खुद के लिए लाया था,  उसे स्वाति वाली आइसक्रीम चाहिए। फिर स्वाति ने आदि वाली आइसक्रीम खाई और आदि ने स्वाति वाली।

पहले सोंचता था कि मैं एक सख्त पिता बनूँगा, बच्चे को अच्छे संस्कार दूँगा,  मेरे ना कहने पर वो मेरी बात मान जाए और मुझसे ज़िद न करे।

अब मैं ये सोंचता हूँ कि एक दिन तो ज़िद को समझौते में बदलना ही है तो ज़िद जबतक पूरी कर सकता हूँ पूरी करूँ।

हमारे बड़े होने के बाद , हम किसी से ज़िद तो कर नही सकते है.. समझौते की अलावा कोई और ऑप्शन तो है ही नही । बचपन जितने दिनों तक रहे उतना ही अच्छा है, आदि के साथ साथ हम भी बच्चे बने रहे ।