आदि अब चार साल का होने को है, उसके के खिलौनों के तोड़ने की रफ्तार , उसके नए खिलौनों के आने की रफ्तार से कही ज़्यादा है। एक समझदार और कंजूस पिता होने के नाते, मैं टूटे खिलौनों को जोड़ने के लिए ग्लू गन खरीद कर लाया । एक-एक कर मैने उसके कई टूटे खिलौने जोड़ कर सही कर दिए और फिर आदि उन जुड़े हुए खिलौनों से खेलने लगा , जुड़े हुए खिलौनो से खेलता देख, मुझे लगा कि चलो, कुछ खर्च तो कम हुआ, उसके नए खिलौनो पर।
एक हफ्ता बीता ही था, कि वो फिर से कुछ और खिलौने ले आया और बोला, पापा ग्लू गन से जोड़ दो ना। मैंने फिर से खिलौनों को जोड़ दिया, पर मुझे क्या मालूम था कि अब आदि के खिलौनो के टूटने की रफ्तार और बढ़ जाएगी। अब उसका सारा ध्यान खिलौनो को तोड़ने पर लग गया, मुझे धीरे धीरे अहसास होने लगा कि अगर मैं डाल डाल हूँ तो वो पात पात है। खिलौनो के टूटने और जोड़ने का सिलसिला जारी रहा।
एक दिन की बात है, जब आदि अपना सबसे ज़्यादा टूटा हुआ खिलौना मेरे पास लेकर आया और बोला, पापा क्या आप यह खिलौना जोड़ पाओगे। मैंने पूरी तरह से टूटा हुआ खिलौना देखा और बोला, हाँ, बेटा, मैं इसे जोड़ दूँगा। फिर आदि बोलता है, नही पापा, आप नही जोड़ पाओगे, फिर मैंने बोला कि , नही बेटा, मैं जोड़ दूँगा। तभी थोड़ी सी खामोशी के बाद आदि के कुछ बोलने के आवज़ सुनाई दी की "मैं बत्ता हूँ उलू नही" । पहली बार तो मैं समझ ही नही पाया कि वो क्या बोल रहा है। मैंने आदि को दोबारा बोलने को कहा, तो फिर उसने बोला कि, "मैं बत्ता हूँ उलू नही"।
तभी स्वाति की आवाज़ आ गयी कि वो बोल रहा है कि "मैं बच्चा हूँ उल्लू नही "। मैं ये बात सुन आश्चर्य में था कि यह वाक्य इसने सीखा कहाँ से। मैंने आदि से पूँछ की तुमने यह कहाँ से सीखा, आदि ने कुछ जवाब नही दिया। तभी स्वाति बोलती है कि एक विज्ञापन आता है, उसमे एक बच्चा ये वाक्य बोलता है, वही से आदि ने सीखा है।
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