Tuesday, October 30, 2018

करवाचौथ


मेरी शादी को सात साल होने को है और इस बरस हमारा सातवां करवाचौथ था। शादी के बाद जब पहला करवाचौथ पड़ा, तो मैं नोएडा से लखनऊ सुबह लगभग 3 बजे घर पहुंचा, सोते सोते सुबह के 5 बज गए थे । नींद खुली तो देखा दोपहर के 12 बज गए। मेरी पत्नी का यह पहला व्रत था वो भी बिना पानी और खाना के, वो थोड़ा डरी सहमी सी थी,  स्वाति की हालत अक्सर भूख लगने पर घायल शेरनी जैसी हो जाती थी और आज वो पूरा दिन बिना कहे पिये रहेगी, उसके लिए ये एक बड़ी बात थी। हमने अपनी पत्नी का हौसला बढ़ाया और बोला चलो आज मैं भी कुछ नही खाऊंगा । 
अचानक मेरी पत्नी बोली कि क्या आप मेरे लिए भी व्रत रहोगे । मैंने बोला जब तक व्रत रह पाऊंगा रहूंगा नही तो कुछ खा लूंगा। इतना बोल मैं कुछ देर और सो लिया।
दोपहर के दो बजने को थे तभी फिर मेरी पत्नी भागते हुए आये और बोली मुझे बहुत तेज़ प्यास लगी है मन कर रहा है चार-पाँच गिलास पानी पी लूं, तभी मैंने बोला पी लो, कुछ नही होगा। व्रत रह सकती हो, तो रही नही तो कोई बात नही। पर करवाचौथ का व्रत, व्रत नही परंपरा है उसे निभाना भी है।
गुस्से में स्वाति कमरे से बाहर चली गयी, फिर अचानक आती है और बोली कुछ आपको खाना है तो खा लो मैं चाय बना देती हूं, आपके लिए। दोपहर  हो गयी थी, मन ही मन सोंच रहा था कि मैं भी व्रत रह जाऊं पर रहूं कैसे, क्या कहूंगा माँ और दीदी से, की मैं भी करवचौत का व्रत हूँ। मेरे परिवार में आज तक कोई मर्द यह व्रत नही रहा है।
कहीं मुझे पर "जोरू का गुलाम" का तमगा तो नही लग जायेगा और दूसरी तरफ से सोंच रहा था कि अगर स्वाति के व्रत रहने पर मेरी उम्र बढ़ती है तो मेरे व्रत रहने पर उसकी भी तो उम्र बढ़ेगी।
यही सोंच मैंने माँ और दीदी से बोला कि सोंच रहा हूँ कि मैं भी व्रत रह जाऊं। तभी माँ बोली रह जाओ अगर रह सकते हो तो। माँ के सहमति मिलते ही मैंने भी ठान लिया की मैं भी व्रत रह ही जाऊंगा।
स्वाति कान लगाकर ये सारी बात सुन रही थी और मेरे इस फैसले से मन ही मन बहुत खुश हो गयी। इसी खुशी में अपनी भूख प्यास भी कुछ पल के लिए भूल गयी। व्रत रहने का फैसला लिए कुछ ही पल बीते ही थे कि ये खबर पूरे परिवार ने जंगल की आग की तरह फैल गयी।
शाम होने को थी, मैं भी तैयार था पत्नी का साथ देने के लिए। शाम हुई पर चंद्रमा का कोई नामोनिशान नही था । थोड़ी थोड़ी देर पर हम छत के चक्कर लगा रहे थे कि शायद चन्द्रमा के दर्शन हो जाये और हम कुछ खाए, पर चाँद आज अपने ही घमंड में था।
थोड़ी देर में पूजा की तैयार हो गयी और सब पूजा के लिए ऊपर आये। कथा कही और सुनी गई । विधि विधान से पूजा हुई, चलनी से मेरा चेहरा देख गया और हम दोनों के एक दूसरे का व्रत तोड़ा।
स्वाति ने यह बात अपने मायके में बताई कि आज राहुल। ने भी करवाचौथ का व्रत रखा था, यह सुन सास-ससुर जी भी बहुत खुश थे।
दूसरे दिन हमे नोएडा वापस आना था। हम तैयार हो नोएडा आ गए। आफिस पहुँचा तो साथ के लोगो ने मेरा हाल चाल पूछा और मजे लेने के लिए कुछ  ने पूछा क्या तुम भी व्रत थे। तब मैंने जवाब दिया,  हाँ, मैं भी व्रत था। इतना सुनते ही सबने कहा, क्या???? क्या????,  सच मे तुम व्रत थे। मैन बोला, क्या हुआ। हाँ मैं व्रत था..  कुछ दोस्तों ने मेरा हौसला बढ़ाया की ग्रेट मैन।
फिर चर्चा शरू हुई कि उनके जान पहचान के कुछ लोग भी व्रत रहते है अपनी पत्नी के लिए। मुझे उन कुछ लोगो मे शामिल होने पर अंदर से गर्व महसूस हो रहा था। कि मैंने कुछ स्पेशल किया है।
उस व्रत का असर मेरी पत्नी पर पूरे साल भर रहता है। स्वाति अपने दोस्तों से बताए नही थकती की मैं भी उसके लिए व्रत रखता हूँ। इन सात सालों में ज़्यादा कुछ नही बदला है पर कुछ और नाम जुड़ गए है जो अपनी पत्नी का साथ देने के लिए अपनी पत्नी के साथ करवाचौथ का व्रत रखते है। जानकर बहुत खुशी होती है।
पुरुष वादी समाज मे पुरुष द्वारा स्त्री के लिए व्रत रखना एक स्पेशल घटना है।
मेरे विचार से पति पत्नी का रिश्ता बराबरी का रिश्ता है। ना कोई छोटा और न कोई बड़ा।
इसलिए करवाचौथ में भी पैर छूने की रस्म को भी मैंने तिलांजलि दे दी है इस बरस से।

एक अजनबी

प्रिय ज्वेल,
तुम्हे तुम्हारे जन्मदिन की हार्दिक बधाई, ईश्वर तुम्हे अच्छा स्वास्थ्य एवं ज्ञान प्रदान करे। तुम अपना और अपने परिवार का नाम रौशन करो यही आशिर्वाद देता हूँ, तुम्हारे लिए मैं एक अजनबी हूँ पर तुम मेरे लिए नही। तुम्हे तस्वीरों में मैंने बड़ा होते देखा है। तुम्हारे छुटपन के किस्से अक्सर मेरे कानों में होकर गुजरे है पर मैं उसका साक्षी नही रहा हूँ। एक दिन आएगा, जब मैं तुम्हारे लिए अजनबी नही रहूंगा। तब मैं तुम्हे अपने बारे में विस्तार से बताऊंगा। तुम अपना ध्यान रखना और अच्छे से पढ़ाई करना।  तुम्हे ढेर सारा प्यार एवं आशीर्वाद।
                                       तुम्हारा एक अजनबी चाचा

Wednesday, October 24, 2018

एक घटना Meetoo

जबसे मिटू हैश टैग आया है और लोगो ने अपने ऊपर हुए अत्याचार की घटनाओं को शेयर किया है, मुझे भी लगा कि मैं भी कुछ लिखूं। लोगो से शेयर करू अपना भी अनुभव जिसमे मैं या मेरे जान पहचान दे लोग शामिल रहे हों।

मैं अपने भाई बहनों में मझला हूँ। घर मे मेरी बड़ी बहन का ही वर्चस्व रहा । कभी भी हमने उनसे तेज़ आवाज़ में बात नही की थी। कभी दीदी से पंगा भी हुआ तो दबी हुई
आवाज़ में ही हमने उनका विरोध किया।

किस्सा उन दिनों का है जब हम नौंवी क्लास में पढ़ते थे। स्कूल घर से बहुत दूर था। स्कूल हम स्कूल बस से जाते थे और बस घर से लगभग एक किलोमीटर दूर मिलती थी। सुबह हम अक्सर भाग भाग कर बस पकड़ते थे और शाम आराम से टहलते हुए आते थे। एक दिन की बात है,  जब मैं बस से उतरा तो मेरे सीनियर ने कहा कि, तुम इतनी दूर पैदल क्यों जाते हो, मेरा घर पास मे है, मैं रिक्शा कर के जाता हूँ। एक काम करो मेरे साथ चला करो और मैं अपने घर पर उतर जाऊंगा और तुम रिक्शा लेकर अपने घर चले जाना । पैसे मैं दे दूंगा, रिक्शे वाला पैसे तो उतना ही लेगा जितना मेरे घर के लिए लेता है।

मैंने उन्हें मना कर दिया यह सोचकर कि दीदी को पता लगा कि मैं रिक्शे से आया हूँ और पैसे किसी और ने दिए है तो मेरी अच्छे से धुलाई हो जाएगी।

ऐसे ही किसी दिन स्कूल से जल्दी छुट्टी होने पर मैं बस से उतरा और फिर मेरे सीनियर ने कहा आज चल मेरे साथ रोज़ तो जाता नही है, मैंने सोंचा की चलो चलते है एक ही दिन की तो बात है।

हम रिक्शे पर बैठे और घर की तरफ निकले । तभी देखता हूँ एक लड़की जो किसी और रिक्शे पर थी, स्कूल से घर जा रही थी। तभी मेरा सीनिय,  रिक्शे वाले से बोलता है कि इसका पीछा करो और उसके रिक्शे के बराबर लेकर आओ। मैं तुम्हे दुगने पैसे दूंगा। तभी रिक्शे वाले ने तेज से रिक्शा चलाया और लड़की के रिक्शे के पास जैसे ही पहुँचा, मेरे सीनियर ने बोला अपना रिक्शा उसके रिक्शे से लड़ा दो, मैं तुम्हे और भी पैसे दूंगा। मेरा माथा ठनका और मैंने बोला सर रहने दो। फिर उसने बोला अभी मज़ा आएगा। तभी रिक्शे वाले ने अपना रिक्शा लड़की के रिक्शे से लड़ा दिया और वो बोला , Hi Sweety, How are you? You are very beautiful. In which class do you read?

लड़की ने पीछे देखा और सहम गईं। तभी वो फिर बोला और लड़ाओ रिक्शा। लड़की के रिक्शे वाले ने शायद हालात को समझा और वो रिक्शा तेज़ी से निकाल ले गया। तब तक मेरे सीनियर का घर आ गया था। वो घर नही हवेली थी। उसने उस रिक्शे वाले को 50 रुपये की नोट पकड़ाई और बोला, इसे घर छोड़ देना जहां भी हो। मैं सहम सा दोबारा उसके साथ न आने का प्रण लिए घर आ गया। उस घटना ने मेरे दिल पर काफी गहरा असर डाला और उसे मैं कभी भूल नही पाया।
फिर किसी रोज़ मैंने उस लड़की को अपने ही मुहल्ले के पास के घर मे देखा। डर के मारे मेरी फिर कभी हिम्मत नही हुई उस गली में जाने की, कि कही किसी रोज़ उसने मुझे पहचान लिया और ये बात मेरे घर तक पहुच गयी तो मेरी बहन मुझे इतना पीटेंगी की दुनिया का कोई भी इंसान मुझे बचा नही पायेगा।

Friday, August 24, 2018

प्रेम का पहला ख़त

यह किस्सा तब का है जब हम स्कूल में पढ़ा करते थे। स्कूल की सबसे बातूनी क्लासेज में हमारी क्लास का पहला स्थान था ।  कोई भी टीचर हमारे क्लास में आती तो कुछ बच्चो को बिना कुछ बोले ही क्लास से बाहर निकाल देती या क्लास में सबसे पीछे खड़ा कर देतीं थीं और बोलती थीं  की तुम लोग वही से पढ़ो। इन सबके बावजूद हमारी क्लास का शोर पूरे स्कूल के शोर पर हावी रहता था। 

जब कभी भी टीचर के क्लास में आने में थोड़ी सी देरी हो जाती थी, तो क्लास की मॉनिटर चॉक से ब्लैक बोर्ड पर उनके नाम लिख देती थी।  अक्सर टीचर के आने से पहले ब्लैक बोर्ड साफ़ कर दिया जाता था। कभी शोर जब हद से ज़्यादा गुजर जाता था तो उन बच्चो का नाम कॉपी पर  लिख लिया जाता था और वो नाम टीचर तक पहुँच जरूर जाते थे।  फिर आगे क्या होता था इसकी अंदाज़ा लगाया ही जा सकता है। डंडे बरसते थे, तशरीफ़ पर, पर गिने नही जाते थे। 

शोर के अलावा हमारे क्लास के टॉपर भी पूरे स्कूल पर हावी थे। हमारी क्लास के कुछ बच्चे हमारी प्रिंसिपल के चहेते भी थे। अक्सर उनका उदाहरण हमारे सामने पेश किया जाता था। हमारे क्लास के दो टॉपर थे,  एक थी और एक था, जो थी वो थी दिव्या और जो था वो था अमित । दोनों कुछ ही नम्बरों से आगे पीछे रहते थे। टीचरों के हर सवाल का जवाब इनके पास रहता था। कभी कभी तो पूरी क्लास खड़ी रहती थी और ये दोनों बैठे रहते थे।


एक दिन की बात है हमारी क्लास टीचर तेज़ी से चलते हुए हमारी क्लास में एंटर की, चेहरे से तो बहुत गुस्से में लग रही थी, हमे लगा कुछ हुआ होगा, किसी की शिकायत किसी टीचर ने की होगी। मैं आगे से चौथी सीट पर बैठता था ।

अचानक क्लास टीचर ने गुस्से से चार बच्चो के नाम पुकारे, चारो मेरी क्लास के छटे हुए शरारती थे। टीचर के हाथ के एक कागज का टुकड़ा और दूसरे हाथ में लकड़ी के स्केल थी। चारो ब्लैक बोर्ड तक पहुँचते उससे पहले ही दो तीन रसीद हो चुके थे।


मैम का चेहरा गुस्से से लाल हो रहा था। क्लास में उनके चेहरे को देख कर सन्नाटा छा चुका था। जिसे कहते है पिन ड्राप साइलेंट। कागज़ के टुकड़े को उन्हें दिखा कर मैम गुस्से में बोली,  ये किसने लिखा है? जब किसी का कोइ जवाब नही आया तो मैम ने एक बार फिर से तेज़ आवाज़ ने फिर से पूछा कि ये किसने लिखा है, जवाब फिर नही आया। 

गुस्से में सबकी तशरीफ पर दो-दो स्केल रसीद हो जाती है। सबने एक एक कर ना कही, किसी का भी कबूलनामा नहीं आया की उस पेपर पर किसने लिखा था। 


तभी  देखता क्या हूँ दिव्या ज़ोर ज़ोर से रोने लगी, साथ में बैठी लड़कियां और टीचर उसे शांत कराने लगी और बोलने लगी की हम ढूंढ कर ही रहेंगे की यह किसने लिखा है।  तभी एक और टीचर क्लास में आती है जो पुरे स्कूल में पिटाई के लिए कुख्यात थी , आते ही सारे बच्चो को  सम्बोधित करते हुए बोली की, कौन कौन इन्वॉल्व है मुझे बताओ , अगर अभी बता दोगे तो कुछ नहीं कहूँगी, नहीं तो ऐसी मार पड़ेगी की ज़िन्दगी भर याद करोगे और स्कूल से निकाल दिए जाओगे।  क्लास में सन्नाटा अभी भी छाया था।  कोई भी आवाज़ कही से भी नहीं आ रही थी।  तभी स्कूल की घंटी बजती है और लंच टाइम हो जाताहै ।  हर तरफ से बच्चो का शोर आ रहा था पर हमारी क्लास अभी भी शांत थी।  तभी टीचर ने बोला, आज किसी को भी लंच करने को नहीं मिलेगा , जब तक वो बच्चा सामने नहीं आता जिसने यह लिखा है।  

हम सब समझ नहीं पा रहे थे की हो क्या रहा है, किसने क्या लिखा है पर डर के मारे कोई कुछ बोल नहीं रहा था। भूख के मारे सबके चेहरे उतर से गये थे, हमारे मुरझाए हुए चेहरे देख मैम ने हमे जाने दिया खाना खाने के लिए। जाने से पहले हमसब की हिंदी और इंग्लिश की कॉपी जमा कर ली गयी थी।  मन में जिज्ञाशा लिए हमसब खुसुर फुसुर कर रहे थे की हुआ क्या है।  कुछ दोस्तों से पूछा क्या हुआ उन्हें भी नहीं पता था।  

दिव्या की दोस्त से हमने पूछा की क्या हुआ।  दिव्या इतना क्यों रो रही थी, तब उसने विस्तार से बताया की दिव्या को किसी ने प्रेम पत्र लिखा है और उसे उसके घर मे डाल गया है। प्रेम पत्र,  प्रेम के अलग अलग अलंकारों से भरा हुआ है।  दिव्या के घर वालो को जब इस प्रेम पत्र के बारे में पता लगा तो दिव्या की अच्छे से पिटाई की गई है और उसके पापा ने कहा है कि तुम इतनी छोटी से उम्र में प्रेम प्रसंग के चक्कर में पड़ गयी हो और तुम्हाराआगे का भविष्य तो मानो खत्म हो गया है। उसके घर वाले उसका नाम भी स्कूल से कटवा रहे है और उसके घरवालों ने बोला है की अब वो आगे की पढ़ाई नहीं करेगी। 

दूसरे दिन दिव्या रोते हुए क्लास टीचर के पास आयी और सारी बात बतायी और वो पत्र भी दिखाया।  तभी टीचर क्लास में आयी थी और सबसे पूछ रही थी। 

इतने बड़े कांड के बाद कुछ दिन तो हमारे बिना पढ़ाई के ही गुजरे।  टीचर्स हमारी क्लास में आती तो थी पर पढ़ाती नहीं थी और बोलती थी की आप लोग खुद ही पढ़ाई कर लो, जब तक पत्र लिखने वालो का नाम सामने नहीं आता कोई टीचर आप लोगो को नही पढ़ाएगी।  

दिन ऐसे ही बीत रहे थे, मुझे न जाने क्यों ऐसा लग रहा था की टीचर्स के जासूस कोने कोने में फैले हुए है, अफवाहों का भी बाजार बहुत की गरम था , कभी खबर आती थी कि  कि प्रेम पत्र इसने लिखा है तो कभी उसने। खबर तो यहां तक आयी थी की शायद कुछ लड़कियों जो दिव्या से जलती है उन्होंने ही पत्र लिखा और दिव्या के घर डाल आयी है। जिससे उसकी पढ़ाई बंद हो जाये। 

उन दिनों स्कूल की सारी टीचर्स क्लास की लड़कियों को  मासूम समझती थी और लड़को को घूर कर देखती थीं। उनकी निगाहों में हम गिर चुके थे। कोई भी अच्छे से बात नही करता था हमसे। हमने लड़कियों की तरफ देखना ही बंद कर दिया था। सब यही सोच रहे थे कि कही किसी ने गलती से भी शिकायत कर दी तो समझो आफत आ जाएगी। 

एक दिन सारी टीचर्स फिर से हमारी क्लास में आयी, उनके आते ही क्लास में फिर से सन्नाटा छा गया, हमे लगा अब फिर से कुछ होने वाला है किसी की फिर पिटाई। एक टीचर के हाथ मे एक मोटा सा डंडा भी था।  एक एक कर उन्होंने 6 बच्चो को बाहर निकाला, उन 6 बच्चो में हमारी क्लास का टॉपर अमित भी था।  

सबसे पहले टीचर ने अमित को बुलाया और  अमित के पास आते ही टीचर का डंडा चालू हो गया।  कोई गिन नहीं रहा था बस डंडे बरस रहे थे, वो भी जम कर, पर अमित की ज़ुबान खुल ही नही रही थी। टीचर्स ने थोड़ा और ज़ोर लगाया। थोड़ी देर के बाद अमित बोलता है, मैम अब बस करो, मुझे अब मत मारो मैं बताता हूँ, इसके पीछे किसका हाथ है। आंखों में आंसू लिए अमित बोला की मैंने ये पत्र नहीं लिखा है। इसके पीछे अभिनव है उसी ने यह पत्र लिखा है। अभिनव का नाम आते ही उसके पैर काँपने लगे। फिर अभिनव की बारी आयी, ४ डंडो में ही उसकी ज़ुबान खुल गयी और बोला ये लेटर उसने आशीष के कहने पर लिखा था, और जब आशीष की बारी आयी तो, उसने बिना डंडे खाये ही सबकुछ बोलना शरू कर दिया  और पूरी कहानी सामने रख दी, की पत्र अभिनव ने लिखा था, शब्द अमित के थे,  दिव्या के घर पत्र डालने दो लोग गौरव और संतोष गए थे और रमेश ने सारा प्लान बनाया और मैनेज किया।

इस कबूलनामे के बाद सबकी धुलाई अच्छे से हुई सारी टीचर्स ने अपने हाथ उनपर साफ किये और फिर उन सबको स्कूल से निकालने के प्रक्रिया शुरी की गयी। किसी को यकीन नही आ रहा था कि अमित इस कांड में शामिल होगा। पढ़ने लिखने में सबसे अच्छा है फिर भी ऐसी हरकत की है। सबके पेरेंट्स को स्कूल में बुलाया गया और सारी बात बताई गई, कुछ के पेरेंट्स ने तो उनकी सबके सामने धुनाई की, पेरेंट्स द्वारा टीचर्स को मनाने के बाद और सबके माफी मांगे की बाद उन्हें स्कूल से निकाला नहीं गया। 

 उस दिन से हमारी क्लास में दाहिनी तरफ लड़किया और बायीं तरफ लड़के बैठने लगे। लड़का लड़की आपस मे बात नही कर सकते थे। अगली क्लास आते आते लड़का लड़की अलग अलग सेक्शन में बैठने लगे। अमित बॉयज सेक्शन का टॉपर बना और दिव्या गर्ल्स सेक्शन की। 



Wednesday, June 27, 2018

चिकेन पॉक्स

कुछ दिन पहले की ही बात है। स्वाति और आदि गर्मियों की छुट्टियाँ मनाने अपनी नानी और दादी के घर गए हुए थे। वापस आने में बस चंद ही दिन बचे थे। रात सोने से पहले, स्वाति से फ़ोन पर पैकिंग के बारे बात कर ही रहा था, की अचानक कुछ बुखार सा महसूस हुआ। मैं उठा और इसे बुरा ख्याल समझ सोने चला गया। रात करवटे बदलने में गुजरी। सुबह जाकर थोड़ा ठीक से नींद आयी। आफिस में मैसेज कर दिया कि थोड़ा लेट आऊंगा। फिर थोड़ी देर के बाद उठा कुछ बनाया, खाया और निकल लिए आफिस के लिए। चिलचिलाती गर्मी से होते हुए आफिस पहुँचा। थोड़ी देर के बाद तबियत फिर बिगड़ने लगी। मैने क्रोसिन खाया और काम पर लग गया। सबने बोला भी की आफिस क्यों आ गए, आज छुट्टी ले लेते। मैंने बोला घर पर क्या करता, कोई है ही नही, अकेले रहने पर आराम करना भी अच्छा नही लगता है, इसलिए आफिस ही आ गया। दवा खाने के बाद तबियत कुछ ठीक लगी और मैं अपने काम पर लग गया।
शाम को घर आया तो टेम्परेचर देखा तो 99 के आस पास ही था। मुझे लगा शायद थकावट के कारण होगा । स्वाति और आदि घर पर नही थे इसलिए मैंने थोड़ा ज्यादा ही वक्त आफिस को दे दिया। दवा खा कर सोया, तो नींद भी ठीक ही आयी। शनिवार का दिन था, तो देर तक सोया और आराम किया । रविवार को दोनों के आने का दिन था इसी खुशी में दोनों की जरूरत का सामान भी बाज़ार से ले आया था । घर थोड़ा अस्त-व्यस्त था, उसे भी ठीक किया। थक गया था तो सो गया पर हरारत बनी हुई थी। स्वाति अपने छोटे भाई के साथ ट्रेन से आई थी। तीनो को स्टेशन लेने गया, खुशी में तबियत का कुछ ज़्यादा ख्याल ही नही रहा ।
शाम होते होते चेहरे पर कुछ दाने से पड़ने लगे। वैसे ही दाने हाथों और कंधों पर ही दिखाई देने लगे। मुझे लगा कही क्रोसिन एक्सपायर तो नही हो गयी थी उसी का रिएक्शन हो। स्वाति को पूरी बात बताई तो तय हुआ कि कल सुबह हम हॉस्पिटल में जा कर डॉक्टर से मुलाकात कर समस्या के बारे में बताएंगे।

सुबह भी तबियत ठीक नही लग रही थी। डॉक्टर से अपॉइंटमेंट लिया। 9:30 पर हॉस्पिटल गया और नंबर आया 1:30 बजे। इतनी देरी में ही दानों की संख्या बढ़ती जा रही थी। डॉक्टर ने देखते थे बोला, तुम्हे तो चिकेन पॉक्स हुआ है। मेज़ पर हाथ मत रखो, नही तो मुझे भी हो सकता है इतनी बड़ी छूत की बीमारी है। चिकेन पॉक्स का नाम सुन मुझे आश्चर्य हुआ, अरे ये मुझे कैसे हो सकती है। डॉक्टर ने मुझसे ज़्यादा कुछ नही पूछा और मुझे जल्दी से चलता किया।

दवा ले घर आये ही थे कि स्वाति ने गूगल पर सर्च करना स्टार्ट किया कि चिकेन पॉक्स होता क्या है। सर्च में हमे पता लगा कि इसे आम भाषा मे इसे छोटी माता कहते है। हमने घर पर फ़ोन किया और माँ को बताया कि मुझे छोटी माता निकली है । माँ यह सुन सकते में थी, फिर छोटी माता के उपचार की देसी विधि समझाई। खुद को सबसे अलग करने की बात बोली । खाने में कुछ भी तला या भुना न खाने,  नीम के पत्ते अपने पास रखने और नीम के पानी से नहाने को कहा।

चंद मिनटों में मुझे समझ मे आने लगा था कि ये कोई बड़ी बीमारी है जो जल्दी फैलती है। उपचार शरू हुआ। बच्चे से महीने भर बाद मिला और उसे गले भी नही लगा पाया कि उसे दूर रखने की विवशता सामने आ गयी। विकास, आदि को मुझेसे दूर रखने की कोशिश कर रहा है और स्वाति मेरी सेवा करने में। होम्योपैथी की दवा भी स्वाति ले आयी कि घर मे किसी और को ना फैले। दवा मुझे भी दी जा रही है कि मैं जल्दी रिकवर कर लूं।  दिन बस इसी उधेड़ भुन में गुजर गया और रात बुखार में करवाटे बदलने में।

सुबह देखता क्या हूँ शरीर का कोई हिस्सा नही बचा होगा जहां दाने न निकले हो। अपना चेहरा खुद से देखा नही जा रहा था। एकांत में लेटे लेटे कमर टूट गयी है। आज तीसरा दिन है। दाने कुछ कम होने लगे है। उम्मीद है जल्दी ही ठीक हो जाऊंगा फिर अपने बीबी-बच्चे से दिल खोल कर मिलूंगा।

Tuesday, May 22, 2018

सुल्ताना डाकू की कहानी माँ की जुबानी

स्कूल के दिनों में, जब मेरे या मेरे भाई के बैग से कभी भी गलती से किसी और का इरेज़र, कटर या पेंसिल निकल आये, तो उस रात माँ सुल्ताना डाकू की कहानी ज़रूर सुनाती थी।

माँ की सुल्ताना डाकू की कहानी में वह एक खूंखार डाकू हुआ करता था । बड़े बड़े राजा, महाराजा  और शहर के अमीर लोग उससे खौफ खाते थे। जिस घर मे वो डकैती डालता था उसे पहले ही बता देता था, इस दिन उसके घर डकैती डालने आएगा। लोग डर के मारे अपना सारा कीमती सामान उसके हवाले कर देते थे। अगर गलती से भी किसी ने उससे कुछ छुपाने की कोशिश करता तो उसे जान से मारने में सुल्ताना ज़रा सा भी नही सोचता था। जिधर भी वो निकल जाता डर के मारे सारे लोग अपने घरों में कैद हो जाते थे। हर तरफ सन्नाटा पसर जाता था। लाखो कोशिशें करने के बाद, जब एक दिन पुलिस ने उसे पकड़ा और अदालत ने पेश किया गया, तब गवाहों और सबूतों के आधार पर अदालत ने उसे मौत की सज़ा सुनाई।

उसे फांसी पर चढ़ाने से पहले जब जेलर ने उससे उसकी अंतिम इच्छा के बारे में पूछा गया, तब सुल्ताना ने अपनी अंतिम इच्छा में अपनी माँ से मिलने की इच्छा जाहिर की। जेलर ने सुल्ताना की माँ को बुलवाया और सुल्ताना से मिलवाया।

जब सुल्ताना अपनी माँ से मिला, तब वह माँ के गले लग कर रोने लगा, मौत का डर उसकी आँखों मे साफ नजर आ रहा था। माँ से बात करते समय भी उसकी ज़ुबान  लड़खड़ा रही थी। सुल्ताना की माँ भी अपने बेटे को फाँसी की सज़ा से काफी दुखी थी। फूट फूट कर रो रही थी और जेलर से माफी की गुहार कर रही थी।  माँ बेटे का विलाप देख जेलर भी भावविभोर हो रहा था।

मिलने का जब वक्त पूरा हुआ और जेलर ने सुल्ताना की माँ को जाने के लिए कहा, इतना सुन माँ बेटे की रूदन और तेज़ हो गया। जब अंतिम बार सुल्ताना अपनी माँ के गले लगा, तो उसने अपनी माँ के कान काट लिए। साथ ही खड़े जेलर ने उसकी माँ को सुल्ताना से छुड़ाया।

सभी यह देख कर दंग थे कि सुल्ताना ने ऐसा क्यों किया। अभी कुछ ही पल पहले सुल्ताना अपनी माँ के गले लगकर रो रहा था, उसके क्यों अपनी माँ के कान काट लिए।  तभी सुल्ताना ने अपनी माँ से बोला , जिस दिन मैंने अपने बचपन मे अपने दोस्त की पेंसिल चराई थी अगर उस दिन खुश होने की जगह, मुझे थप्पड़ मारा होता। मेरी छोटी मोटी चोरियों पर मुझे सज़ा दी होती। तो आज मैं यूँ फाँसी के तख़्ते पर झूलने नही जा रहा होता। 

अपनी माँ को ऐसा बोल कर सुल्ताना फाँसी पर चढ़ने के लिए निकल जाता है।

Thursday, May 3, 2018

एक झलक

कॉलेज को शुरु हुए कुछ ही दिन हुए थे,  रैगिंग से डरे सहमे हुए हम लोग क्लास में ही कैद रहते थे। ऐसे ही किसी रोज़ अचानक, पहले लेक्चर में एक लड़की लड़खड़ाते और हाँफते हुए, दरवाज़े पर दस्तक देती है मानो कही से भाग कर आई हो,और टीचर से पूछती है की, क्या ये सेक्शन "ऐ " है?  इतना सुन सब की नज़र उस लड़की पर जा टिकी।  तीखे नैन नक्स वाली, उस लड़की ने अपने सिर पर तेल तो ऐसे लगाया था जैसे की वो तेल की पूरी बोतल ही उड़ेल कर आयी हो। उसके कपडे को देखकर ऐसा लग रहा था जैसे वो किसी से मांग कर लायी हो। लम्बी सी वह लड़की टीचर की इज़ाज़त लेकर क्लास में अंदर आती है और बाकी लड़कियों के साथ जा कर बैठ जाती है।  टीचर के पूछने पर वो अपना नाम बताती है और टीचर अपने विषय को आगे बढ़ाते है।

क्लास ख़त्म होने के बाद हमे पता चला की वो हॉस्टल में रह रही है और हॉस्टल के प्रोटोकॉल के हिसाब से ही, ऐसे कपड़ें और सिर में तेल लगा कर आयी थी। सीनियर्स अक्सर रैगिंग के नाम पर उससे तरह तरह की एक्टिविटी कराते थे।  कभी गाना गाने को बोलते, तो कभी कविता सुनाने को।  वो हर चीज़ में पारंगत थी जैसे को कोई ट्रेनिंग ले कर आयी हो। धीरे धीरे उसकी फैन फोल्लोविंग भी बढ़ती जा रही थी। अब हमारी क्लास की पहचान अब उसके नाम से होने लगी थी।  फ्रेशर पार्टी में मिस फ्रेशर के ख़िताब की वो प्रबल दावेदार थी।  कॉलेज में रैगिंग पर सख्ती होने के साथ हमारी रैगिंग भी कम हो गयी और सीनियर्स अब हमसे दोस्ताना व्यवहार करने लगे थे, उसी के साथ साथ, हम सब के अपने रंग में कॉलेज आने लगे।  हम सबके कपड़े भी स्टाइलिश होते जा रहे थे पर, उसकी बात ही निराली थी, फैशन क्या होता है उसे देख कर पता लगने लगा।

फ्रेशर पार्टी का भी दिन आया सबने एक मत से उसे "मिस फ्रेशर" का ख़िताब दे दिया।  अब वो कॉलेज के हर दिल पर राज  करने लगी थी , उसके बात करने का अंदाज़ ही कुछ ऐसा था की वो एक पल में किसी को भी अपना बना लेती थी,  हर किसी को यह अहसास होने में ज़्यादा वक्त नहीं लगता था की वो उसकी ड्रीम गर्ल है। कभी भी  उसका ज़िक्र आता तो लड़के मंद मंद मुस्कुराने लगते और कुछ की तो ज़ुबान ही लड़खड़ा जाती थी, उसका नाम लेते और जब भी वो कॉलेज आती तो सबकी नजरें उन्ही को फॉलो करती रहती थी। मानो नज़रो ने बरसो से उनका दीदार ही न किया हो।
जब भी वो किसी लड़के के साथ घूमती हुई नजर आयी, बस कुछ दिनों में ही उसका पिटना तय था। लड़के आपस मे ही लड़ मरने को तैयार थे। बाकी कॉलेज की किसी लड़की को, कभी इतना भाव नही मिला। लड़कियां उसकी खूब बुराइयां करती थी, जी भर भर के कोसती थी, वो उसे देख कर जलती जो थी।  कॉलेज में उसके दोस्त कम ही थे।

जिस दिन वो कॉलेज में नही दिखाई देती थी , उस दिन कॉलेज में मनहूसियत सी छा जाती थी।  क्लास सूनी सूनी नज़र आती थी। न जाने कितने दबंग भाइयो ने उससे,अपने प्रेम का इज़हार किया पर  कुछ न हो पाया।  दिन यूँ ही बीत रहे थे।  सेमिस्टर बीतते जा रहे थे  और उनकी चर्चाएँ बढ़ती जा रही थी, एक साल बीता, हमारे जूनियर्स भी आये, फिर उनके जूनियर्स भी आये पर उनका जलवा काम न हुआ।

लम्बी छुट्टी के बाद एक दिन वो कॉलेज में दिखाई दी तो लोगो में ख़ुशी के लहर दौड़ गयी, पर साथ में ये किसी अज़नबी को भी लायी थी।  लड़के आपस में तो यही बोल रहे थे की शायद उसका भाई है, जिसे कॉलेज दिखाने लायी है, पर उसने अपने दोस्तों को उस लड़के को अपने मंगेतर की तरह मिलवाया।  ये खबर की उसकी सगाई हो गयी है जंगल की आग की तरह पूरे कॉलेज में फ़ैल गयी।  उस दिन कॉलेज में मातम मनाया गया। हर लड़का उन्हें बधाई तो देने आया, पर निगाहों में अश्क भरे हुए था। कोई किसी को ज़ाहिर नही करना चाह रहा था कि उसे दिल को आघात लगा है या ग़मज़दा है। सीने में जज्बात भरे हर बन्दा लोगो  को दिखा रहा था कि जैसे कुछ हुआ ही नही।

वो दिन भी आया जब वो शादी कर विदेश जा बसी, अब सबकी निगाहें फेसबुक पर टिक गई, फ्रेंड रिक्वेस्ट भेजी गई।  वो खुशकिस्मत थे, जिनकी रिक्वेस्ट एक्सेप्ट हुई और वो बदकिस्मत जिनकी रिक्वेस्ट एक्सेप्ट नही हुई, वो दूसरो के प्रोफाइल पर जा जा कर निहारते थे, शायद कोई टैग हो। वो मोहतरमा भी कम न थी। फेसबुक पर वो  अक्सर कम ही आया करती थी, अपनी प्रोफाइल फोटो में सिर्फ उन्होंने अपने हाथ की फ़ोटो लगा रखी थी। एक पोस्ट में उन्होंने  अपनी परछाई डाली । फिर फेसबुक पर कॉम्प्लिमेंट्स की  झड़ी लग जाती। वो साल में एक या दो पोस्ट ही करती थी।

पिछले साल जब दीवाली पर उन्होंने अपनी पूरी तस्वीर लगाई, तो उनके चाहने वालो ने कॉम्प्लिमेंट्स के सारे रिकार्ड्स तोड़ डाले।ऐसा लगा मनो लोगो ने दीवाली फेसबुक पर ही मनाई। किसी ने कमेंट में कविताएँ लिखी किसी ने मोतियों जैसे शब्द चुने उन्हें कॉम्प्लिमेंट्स के लिए।

शादी के इतने सालो के बाद भी उन्हें देखकर ऐसा नहीं  लगता है की उनमे कोई बदलाव आया है।
आज भी जब हम पुराने दोस्त इकट्ठा होते है तो उनके ज़िक्र के बिना बात खत्म नही होती। हमारे दोस्तो में एक ऐसा शख्स  भी है जिसका दिल खूब धड़का था उसके लिए। अब दोस्त की शादी हो गयी, बच्चे भी हो गए पर, आज भी उसका ज़िक्र आते ही उसकी आंखों में अलग सी चमक आ जाती है पर वो डरता है कि ये बात अगर उसकी पत्नी को पता लगी तो हंगामा हो जाएगा।

Tuesday, March 6, 2018

तलाश

यह कहानी एक ऐसे लड़के की है जो बचपन से ही काफी अंतर्मुखी का था । घर मे वो अपने भाई बहनों में मझिला था । बड़ा उसे छोटा नही समझता था और छोटा उसे बड़ा नही समझता था । अपने भाव अपने तक ही सीमित रखने का गुण वक्त ने उसे सीखा दिया था। माँ बाप ने उसका नाम रोहित रखा था ।

जैसे तैसे बारहवीं पास करने के बाद रोहित ने दिल्ली के नामी कॉलेज में अपना दाखिला ले लिया। रैगिंग के डर से उसने कॉलेज जाना कुछ देर से शरु किया। जब वो पहले दिन डरा-सहमा, अपने कॉलेज पहुँचा, तो मानो उसके सीनियर उसका इंतज़ार कर रहे थे । रोहित को देखते ही उसके सीनियर्स ने उसे पकड़ लिया। खूब रैगिंग हुई, उसका पहला दिन अठन्नी, चवन्नी, एक रुपया, दो रुपया में ही गुजर गया।

क्लास में किसी का नाम जान पाता, उससे पहले ही दिन खत्म हो गया। कुछ दिन तो रैगिंग में ही निकल गए , क्लास के कुछ ही बच्चो को वो जान पाया था। क्लास में एक से एक धुरंधर भरे थे । कोई टॉप करके आया था, तो कोई सुपर टॉप करके आया था। रोहित की मिसाल ही क्या थी क्लास में । 12वी में तो वो तो सिर्फ पास ही हुआ था। धीरे धीरे वो क्लास की अगली लाइन से सबसे पिछली लाइन पर पहुच गया।

क्लास की पिछली लाइन में वहां उसकी मुलाकात दो ऐसे बंदों से हुई, जो सिर्फ अपने मे ही मस्त रहते थे। उनमे से एक लड़का था और एक लड़की। एक दूसरे के कान में न जाने क्या खुसुर-फुसुर करते रहते थे और न जाने किस बात पर मुस्कुरा देते थे। वो बात सिर्फ उन्हें ही पता रहती थी। अगल बगल वाले तो सिर्फ उन दोनों का मुँह ही देखते रहते थे। क्लास की अटेंडेंस रजिस्टर से उन दोने का नाम पता लगा । लड़के का नाम शेखर और लड़की का नाम गौरा था ।

दोनों पढ़ने में बहुत तेज़ थे। टीचर के हर प्रश्न का जवाब उनके पास रहता था। ऐसे ही किसी दिन रोहित को टीचर ने खड़ा कर,एक प्रश्न पूछ लिया, जिसका जवाब उसके पास नही था। रोहित थोड़ा घबराया और इधर उधर देखने लगा, तभी शेखर ने चुपके से प्रश्न का जवाब कॉपी के आखिरी पन्ने पर लिख दिया और रोहित ने टीचर के प्रश्न का जवाब दे दिया। रोहित शर्मिंदा होने से बच गया।

वक्त गुजरता गया,  रोहित और शेखर कभी कभी हाय बाय कर लेते थे पर गौरा सिर्फ शेखर तक ही सीमित थी। एक दिन शेखर और रोहित आपस मे बात करते करते अपने स्कूल के दिनों की बाते करने लगे ।  बाद में दोनों को पता चला कि वो दोनों एक ही शहर से है। फिर होना क्या था,  धीरे धीरे दोनों में छनने लगी। गौरा भी उसी के शहर से थी, बातो-बातो में पता चला कि,गौरा भी उसी स्कूल से थी जिस स्कूल में रोहित पढ़ा करता था पर ब्रांच अलग अलग थी।
  वक्त के साथ अब तीनो में अच्छी दोस्ती हो गयी, तीनों अपने शहर की खास बातों को साझा कर खूब हँसा करते थे। शेखर ने रोहित को बताया कि वो और गौरा बचपन के दोस्त है और एक दूसरे से बहुत प्यार करते है।

एक दिन की बात है जब गौरा, रोहित के पास आयी और उसके सिर पर हाथ फेरते हुए बोली "जो तुम दिखते हो, वो तुम हो नही" रोहित का सिर, यह बात सुन चकरा गया। अभी तक वो अंतर्मुखी था , अपनी भावनाओं को उसने कभी भी किसी के सामने प्रकट नही किया था, फिर गौरा ये कैसे जान सकती थी, कि मैं जो दिखता हूँ मैं वो हूँ नही।

यह बात रोहित के दिमाग मे काफी दिनों तक रही पर वक्त से साथ, जाती रही। तीनो अब अच्छे दोस्त बन चुके थे । गौरा और शेखर अपनी प्रेम कहानी अक्सर रोहित को सुनाया करते थे। कैसे दोनों में प्यार हुआ । कब दोनों के एक दूसरे को पहली बार अपने प्रेम का अहसास कराया। कहाँ कहाँ वो एक दूसरे से छुप कर मिला करते थे। कैसे दोनों ने एक ही कॉलेज में कैसे दाखिल लिया। इन सबके बाद भी दोनों के घर वालो को उनके प्रेम के बारे में कुछ नही पता चला।

धीरे-धीरे रोहित को उन दोनो के प्रेम से प्रेम हो गया और रोहित भी दोनों के एक हो जाने की दुआएं भगवान से मांगने लगा ।  गौरा स्वभाव से थोड़ी चुलबुली और हसमुख लड़की थी । वो जल्दी से किसी को दोस्त नही बनाती थी और जब वो बनाती थी तो खूब खुल कर बात करती थी। उसकी बातों में बनावटी पन नही था।  शेखर थोड़ा गम्भीर लड़का था । जल्दी से किसी के बारे में कोई राय नही बनाता था बहुत जल्दी खुश और नज़र नही होता था पर गौरा को बहुत प्यार करता था ।

गौरा की ज़रा से तबियत खराब हो जाने पर या चोट लग जाने पर वो बहुत घबरा जाता था।गौरा एक दिन अगर कॉलेज न आये तो दिन भर बस गौरा गौरा करते बीतता था।
गौरा भी शेखर को अपने हाथ से खाना खिलाती थी, वो शेखर की हर छोटी बड़ी बात का ध्यान रखती थी।

क्लास के सारे लोग उन्हें लैला मजनूं बोलते थे , पर शेखर इस बात पर चिढ़ता था कि लैला मजनूं कभी एक दूसरे के नही हो पाए।

जैसे जैसे कॉलेज के दिन बीत रहे थे,  तीनो एक दूसरे के काफी करीब आते जा रहे थे। रोहित भी, अब अंतर्मुखी से बहिर्मुखी होता जा रहा था। दोस्ती के साथ साथ तीनो साथ ही पढ़ाई भी करते थे, रोहित के भी अब अच्छे नंबर आने लगे थे । तीनो मिलजुल कर पढ़ाई और एसाइनमेंट करते थे।

कॉलेज खत्म होते होते गौरा और शेखर ने सोंचा की वो अपने घर वालो से अपने रिश्ते के बारे में बात करेंगे, पर गौरा अपने घर मे शेखर के बारे में बात करने से डरती थी। उसे डर था कि कही उसके घर वाले उसके प्रेम के बारे में सुन उसकी शादी किसी और से न करा दे।

गौरा और शेखर दोनों अलग अलग सामाजिक परिवेश से जो आते थे । शेखर ने सोंचा की जब दोनों की जॉब लग जायेगी तब वो गौरा के घर जाकर उसके घर वालो से उसका हाथ मांगेगा।

कॉलेज खत्म भी हो गया और तीनों का प्लेसमेंट भी एक अच्छी से कंपनी में हो गया । जोइनिंग लेटर लेने के बाद गौरा और शेखर दोनों ने अपने अपने घर पर बात की एक दूसरे से बारे में । दोनों के घर वाले एक दूसरे की शादी के खिलाफ थे। दोनों के घर वालो ने गौरा और शेखर में लाख कमियां निकल दी और किसी भी शर्त पर शादी ना करने देने की बात पर अड़ गए।

गौरा अपने की घर मे कैद हो गयी, उसका मोबाइल भी उससे छीन लिया गया , अब वो किसी से बात नही कर सकती थी। शेखर की भी हालत कुछ ठीक नही थी। शेखर भी पागल से हो गया था गौरा के बिना। दिन रात शेखर के आंखों में आंसू रहते थे, फिर शेखर ने वो किया जो कोई भी सोंच नही सकता था ।
उसने अपनी जान देने की कोशिश की,पर वक्त रहते उसकी बहन ने उसे हॉस्पिटल पहुँच उसकी जान बचाई। हफ़्तों हॉस्पिटल में रहने के बाद जब वो घर आया तो उसके माता पिता तैयार हो गए दोनों की शादी कराने के लिए।

शेखर अपने माता पिता को लेकर गौरा के घर पहुंचा तो नज़ारा कुछ और ही था । गौरा के घर वालो ने शेखर के घर वालो से बात ही नही की और न ही घर मे घुसने दिया। गौरा के भाइयो ने शेखर और उसके माता पिता से हाथा पाई तक कि नौबत आ गयी। घर की छत से उन्होंने गौरा से बुलवाया और कहलवाया की तुम यहाँ से चले जाओ मुझे तुमसे शादी नही करनी है।

शेखर और मुरझा गया । तीनो घर आ गए और धीरे धीरे शेखर डिप्रेशन में चला गया पर अब गौरा से बात करने की कोई जुगत ही नही सूझ रही थी। जब रोहित को ये सारी बात पता लगी तो उसने गौरा से बात करने की कोशिश की पर, कुछ न हुआ । एक दिन रोहित ने गौरा के घर फ़ोन किया तो , गौरा की भाभी ने फ़ोन उठाया और बताया गौरा घर पर नही है।

कुछ दिनों ने बाद गौरा ने रोहित को  ईमेल किया कि रोहित अब सबकुछ खत्म हो चुका है। मेरा भरोशा अब किसी चीज़ पर नही रहा है। ना दोस्ती पर और ना ही प्यार पर, तुम भूल जाओ मुझे, और फिर कभी मुझे फ़ोन मत करना और न ही कभी मिलने की कोशिश करना। तुम बहुत ही भावुक व्यक्ति हो , तुम्हे थोड़ी तकलीफ भी होगी, पर वक्त की यही मांग है। अपने दिल को मजबूत करो और ज़िन्दगी में आगे बढ़ो और अपने भविष्य को बेहतर बनाओ।

गौरा का यह मेल देख रोहित थोड़ा दुखी तो था पर निराश नही। रोहित ने फिर गौरा को रिप्लाई किया कि, किसी को
भूल जाना या याद रखना ये किसी के बस में नही है। क्या तुम मुझे बता सकती हो ऐसा क्या हुआ । जिससे तुम्हारा दिल यूँ टूट गया। मैं कभी भी किसी को भूलता नही , तुम कही भी जाओ एक दिन आएगा जब मैं तुम्हे ढूंढ लूंगा।

फिर कभी गौरा ने मेल का रिप्लाई नही किया। रोहित भी अब अपनी जॉब और ज़िन्दगी में व्यस्त हो गया पर उसके दिल के किसी कोने में गौरा से मिलने की ख्वाहिश बाकी थी।
शेखर को उसके माँ बाबू जी ने बहुत समझाया फिर शेखर भी अपनी ज़िंदगी मे आगे बढ़ने का फैसला किया। वो भी नौकरी की तलाश शुरू की।

एक दिन रोहित , शेखर को अपने रूम पर ले गया और सारा माजरा समझे कि कोशिश करने लगा । जैसे ही गौरा के बारे में शेखर से रोहित ने पूछा कि, कुछ खबर है उसकी की वो कहाँ है। गौरा का ज़िक्र आते ही शेखर बहुत असहज से होने लगा , उसकी तबियत बिगड़ने लगी।  शेखर को शांत करने के बाद रोहित बिना कुछ बात किये सो गया। सुबह शेखर जल्दी ही रोहित के घर से निकल लिया। उस दिन के बाद दोनों की मुलाकात नही हुई।

अपने दो जिगरी दोस्तो से बिछड़ने का गम अक्सर रोहित को सताता था। शेखर उसके फेसबुक के फ्रेंड लिस्ट में था पर कभी बात नही होती थी। सिर्फ जन्म दिन की बधाई के अलावा कोई और बात नही ।

गौरा को वो अक्सर फेसबुक पर रोहित ढूंढता रहता था पर वो वहां भी कभी नही दिखी। शेखर ने भी अब अपनी नई ज़िंगदगी शरु कर ली थी । नौकरी लगने के बाद उसने उसके साथ ही काम करने वाली लड़की से शादी कर ली। रोहित, शेखर की शादी में नही गया।

रोहित ने भी घर वालो की पसंद की एक लड़की से विवाह कर अपनी ज़िंदगी मे व्यस्त हो गया।  ज़िन्दगी हर्षोल्लास से साथ बीत ही रही कि की एक दिन रोहित को गौरा दिखी पूरे 11 साल बाद। 

रोहित के बचपन के दोस्त के साथ फेसबुक पर। पहले तो वो समझ ही नही पर की वो गौरा है या उसकी हमशक्ल। जब वो उसकी प्रोफाइल पर गया तो देखा कि वो सच मे गौरा ही थी। उसकी एक बेटी भी है बिल्कुल गौरा की तरह। रोहित के खुशी का ढिकाना ही नही था उसका मन झूम कर नाचने लगा । इस खुशी का इज़हार वो किससे करे समझ मे नही आ रहा था।
इस बात का ज़िक्र वो अपनी पत्नी से कैसे करता, वो तो कुछ जानती ही नही थी उसके बारे में पर फिर भी रोहित ने उसे बताया पर वो समझ ही नही पाई की अगर आपने किसी को फेसबुक पर ढूंढ लिया है तो भी इसमें इतना खुश होने की क्या बात है।

रोहित शून्य सा चेहरा ले फेसबुक पर वापस आ गया। शेखर को वो क्या बताए , अब वो अपनी ज़िंदगी मे व्यस्त है। उसे बताने से कही उसकी ग्रहस्ती पर असर न पड़े। बताए तो वो किसे बताए। कोई क्या उसके ज़ज़्बात समझेगा।

एक दिन रोहित का मन किया कि वो जाए अपने बचपन के दोस्त के पास और वहां गौरा से भी मुलाकात हो जाएगी। कुछ प्रश्न उसके ज़हन में अचनाक आए।

गौरा से बात क्या करँगा।
गौरा का क्या रिएक्शन होगा उसे को देखकर।
एक अजनबी सा व्यवहार करेगी या एक बिछड़े दोस्त की तरह।
गौरा से शिकायतें करूँगा या कुछ बात नही करूँगा।
उसका पति क्या सोंचेगा की मैं किससे मिलने आया हूँ।

इतना सोंच उसके कदम रुक गए और रोहित से यह फैसला लिया कि अब वो कभी कोशिश नही करेगा गौरा से मिलने की । वक्त ने जब हम सब का बिछड़ना ही लिखा था तो ऐसा ही सही।

कभी किसी रोज़ वो अचानक मिल गयी तो देखा जाएगा।

Monday, March 5, 2018

मैं बच्चा हूँ उल्लू नही

आदि अब चार साल का होने को है, उसके के खिलौनों के तोड़ने की रफ्तार , उसके नए खिलौनों के आने की रफ्तार से कही ज़्यादा है। एक समझदार और कंजूस पिता होने के नाते,  मैं टूटे खिलौनों को जोड़ने के लिए ग्लू गन खरीद कर लाया । एक-एक कर मैने उसके कई टूटे खिलौने जोड़ कर सही कर दिए और फिर आदि उन जुड़े हुए खिलौनों से खेलने लगा , जुड़े हुए खिलौनो से खेलता देख, मुझे लगा कि चलो, कुछ खर्च तो कम हुआ, उसके नए खिलौनो पर।

एक हफ्ता बीता ही था,  कि वो फिर से कुछ और खिलौने ले आया और बोला, पापा ग्लू गन से जोड़ दो ना। मैंने फिर से खिलौनों को जोड़ दिया, पर मुझे क्या मालूम था कि अब आदि के खिलौनो के टूटने की रफ्तार और बढ़ जाएगी। अब उसका सारा ध्यान खिलौनो को तोड़ने पर लग गया,  मुझे धीरे धीरे अहसास होने लगा कि अगर मैं डाल डाल हूँ तो वो पात पात है। खिलौनो के टूटने और जोड़ने का सिलसिला जारी रहा।

एक दिन की बात है, जब आदि अपना सबसे ज़्यादा टूटा हुआ खिलौना मेरे पास लेकर आया और बोला, पापा क्या आप यह खिलौना जोड़ पाओगे। मैंने पूरी तरह से टूटा हुआ खिलौना देखा और बोला, हाँ, बेटा, मैं इसे जोड़ दूँगा। फिर आदि बोलता है, नही पापा,  आप नही जोड़ पाओगे, फिर मैंने बोला कि , नही बेटा,  मैं जोड़ दूँगा।  तभी  थोड़ी सी खामोशी के बाद आदि के कुछ बोलने के आवज़ सुनाई दी की "मैं बत्ता हूँ उलू नही" । पहली बार तो मैं समझ ही नही पाया कि वो क्या बोल रहा है। मैंने आदि को दोबारा बोलने को कहा,  तो फिर उसने बोला कि, "मैं बत्ता हूँ उलू नही"।

तभी स्वाति की आवाज़ आ गयी कि वो बोल रहा है कि "मैं बच्चा हूँ उल्लू नही "। मैं ये बात सुन आश्चर्य में था कि यह वाक्य इसने सीखा कहाँ से। मैंने आदि से पूँछ की तुमने यह कहाँ से सीखा, आदि ने कुछ जवाब नही दिया। तभी स्वाति बोलती है कि एक विज्ञापन आता है, उसमे एक बच्चा ये वाक्य बोलता है, वही से आदि ने सीखा है।