कुछ दिन पहले की ही बात है। स्वाति और आदि गर्मियों की छुट्टियाँ मनाने अपनी नानी और दादी के घर गए हुए थे। वापस आने में बस चंद ही दिन बचे थे। रात सोने से पहले, स्वाति से फ़ोन पर पैकिंग के बारे बात कर ही रहा था, की अचानक कुछ बुखार सा महसूस हुआ। मैं उठा और इसे बुरा ख्याल समझ सोने चला गया। रात करवटे बदलने में गुजरी। सुबह जाकर थोड़ा ठीक से नींद आयी। आफिस में मैसेज कर दिया कि थोड़ा लेट आऊंगा। फिर थोड़ी देर के बाद उठा कुछ बनाया, खाया और निकल लिए आफिस के लिए। चिलचिलाती गर्मी से होते हुए आफिस पहुँचा। थोड़ी देर के बाद तबियत फिर बिगड़ने लगी। मैने क्रोसिन खाया और काम पर लग गया। सबने बोला भी की आफिस क्यों आ गए, आज छुट्टी ले लेते। मैंने बोला घर पर क्या करता, कोई है ही नही, अकेले रहने पर आराम करना भी अच्छा नही लगता है, इसलिए आफिस ही आ गया। दवा खाने के बाद तबियत कुछ ठीक लगी और मैं अपने काम पर लग गया।
शाम को घर आया तो टेम्परेचर देखा तो 99 के आस पास ही था। मुझे लगा शायद थकावट के कारण होगा । स्वाति और आदि घर पर नही थे इसलिए मैंने थोड़ा ज्यादा ही वक्त आफिस को दे दिया। दवा खा कर सोया, तो नींद भी ठीक ही आयी। शनिवार का दिन था, तो देर तक सोया और आराम किया । रविवार को दोनों के आने का दिन था इसी खुशी में दोनों की जरूरत का सामान भी बाज़ार से ले आया था । घर थोड़ा अस्त-व्यस्त था, उसे भी ठीक किया। थक गया था तो सो गया पर हरारत बनी हुई थी। स्वाति अपने छोटे भाई के साथ ट्रेन से आई थी। तीनो को स्टेशन लेने गया, खुशी में तबियत का कुछ ज़्यादा ख्याल ही नही रहा ।
शाम होते होते चेहरे पर कुछ दाने से पड़ने लगे। वैसे ही दाने हाथों और कंधों पर ही दिखाई देने लगे। मुझे लगा कही क्रोसिन एक्सपायर तो नही हो गयी थी उसी का रिएक्शन हो। स्वाति को पूरी बात बताई तो तय हुआ कि कल सुबह हम हॉस्पिटल में जा कर डॉक्टर से मुलाकात कर समस्या के बारे में बताएंगे।
सुबह भी तबियत ठीक नही लग रही थी। डॉक्टर से अपॉइंटमेंट लिया। 9:30 पर हॉस्पिटल गया और नंबर आया 1:30 बजे। इतनी देरी में ही दानों की संख्या बढ़ती जा रही थी। डॉक्टर ने देखते थे बोला, तुम्हे तो चिकेन पॉक्स हुआ है। मेज़ पर हाथ मत रखो, नही तो मुझे भी हो सकता है इतनी बड़ी छूत की बीमारी है। चिकेन पॉक्स का नाम सुन मुझे आश्चर्य हुआ, अरे ये मुझे कैसे हो सकती है। डॉक्टर ने मुझसे ज़्यादा कुछ नही पूछा और मुझे जल्दी से चलता किया।
दवा ले घर आये ही थे कि स्वाति ने गूगल पर सर्च करना स्टार्ट किया कि चिकेन पॉक्स होता क्या है। सर्च में हमे पता लगा कि इसे आम भाषा मे इसे छोटी माता कहते है। हमने घर पर फ़ोन किया और माँ को बताया कि मुझे छोटी माता निकली है । माँ यह सुन सकते में थी, फिर छोटी माता के उपचार की देसी विधि समझाई। खुद को सबसे अलग करने की बात बोली । खाने में कुछ भी तला या भुना न खाने, नीम के पत्ते अपने पास रखने और नीम के पानी से नहाने को कहा।
चंद मिनटों में मुझे समझ मे आने लगा था कि ये कोई बड़ी बीमारी है जो जल्दी फैलती है। उपचार शरू हुआ। बच्चे से महीने भर बाद मिला और उसे गले भी नही लगा पाया कि उसे दूर रखने की विवशता सामने आ गयी। विकास, आदि को मुझेसे दूर रखने की कोशिश कर रहा है और स्वाति मेरी सेवा करने में। होम्योपैथी की दवा भी स्वाति ले आयी कि घर मे किसी और को ना फैले। दवा मुझे भी दी जा रही है कि मैं जल्दी रिकवर कर लूं। दिन बस इसी उधेड़ भुन में गुजर गया और रात बुखार में करवाटे बदलने में।
सुबह देखता क्या हूँ शरीर का कोई हिस्सा नही बचा होगा जहां दाने न निकले हो। अपना चेहरा खुद से देखा नही जा रहा था। एकांत में लेटे लेटे कमर टूट गयी है। आज तीसरा दिन है। दाने कुछ कम होने लगे है। उम्मीद है जल्दी ही ठीक हो जाऊंगा फिर अपने बीबी-बच्चे से दिल खोल कर मिलूंगा।
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