आज यूट्यूब पर छठ मैया के गीत सुन रहा था, और हर शब्द याद आ रहा था।
जब तुम्हारे साथ छठ मैया की पूजा के लिए गया था। उस positive energy को मैं अपने कंधे पर आज भी महसूस करता हूँ। धन्यवाद मुझे इसका अहसास कराने के लिए।
इस ब्लॉग में मेरे निजी विचार है। मैं इस ब्लॉग में अपने विचार व्यक्त करता हूँ और दुनिया से अपना विचार शेयर करता हूँ।
आज यूट्यूब पर छठ मैया के गीत सुन रहा था, और हर शब्द याद आ रहा था।
जब तुम्हारे साथ छठ मैया की पूजा के लिए गया था। उस positive energy को मैं अपने कंधे पर आज भी महसूस करता हूँ। धन्यवाद मुझे इसका अहसास कराने के लिए।
कल मुझे अचानक पता चला कि प्रिंस भैया अपनी नौकरी से सेवानिवृत्त हो गए हैं और इसके उपलक्ष्य में उन्होंने एक पार्टी रखी थी। पर सबसे ज़्यादा हैरानी तब हुई जब हमें उसमें आमंत्रित नहीं किया गया। वहाँ सभी खास लोग मौजूद थे, पर हम नहीं थे। यह जानकर खुद को बहुत अकेला महसूस किया, और ऐसा लगा जैसे मैं अब उनकी ज़िंदगी का हिस्सा नहीं हूँ। रात भर यही सोचता रहा कि उन्होंने मुझे क्यों नहीं बुलाया और क्या मैं उनकी ज़िंदगी में इतना ज़रूरी नहीं हूँ कि वो मुझे अपने इस खास मौके का गवाह बनाएँ।
यह मेरे लिए एक भावनात्मक क्षति (इमोशनल लॉस) थी। जब मैंने यह बात स्वाति को बताई, तो उसे भी बुरा लगा। मुझे लगा कि शायद उसे इस बात का अंदाज़ा नहीं होगा कि प्रिंस भैया मेरी ज़िंदगी से कितने जुड़े हुए हैं। खैर, यह भी अब यादों का हिस्सा बन जाएगा और स्मृति के किसी कोने में पड़ा रहेगा, क्योंकि भविष्य तो किसी ने नहीं देखा।
अब मुझे इसकी आदत सी होने लगी है। यह पहली बार नहीं हुआ है कि मुझे ऐसा एहसास हुआ हो। जब से मैं लखनऊ आया हूँ, तब से मुझे यह महसूस होने लगा है कि ऐसी भावनाएँ भी ज़िंदगी का एक हिस्सा हैं। होता है, कभी-कभी पुरानी यादें दामन छुड़ाकर नई यादों की ओर बढ़ जाती हैं, और हमें इन सब से आगे निकल जाना चाहिए।
आज छत पर लगी लौकी और कद्दू की बेल के पास से गुजर रहा था। यह बेल काफी पुरानी है। अचानक मुझे एक ऐसी गंध महसूस हुई, जिसका रिश्ता मेरे बचपन से था। गंध नाक तक पहुंची ही थी कि उससे जुड़ी सारी यादें एक तस्वीर की तरह मेरी आँखों के सामने आ गईं।
वो गंध मिट्टी की सोंधी खुशबू जैसी थी, ठीक वैसी ही जो नानी के घर लगे पौधों के पास आती थी। शहरों में बरसों रहने के कारण, नानी का घर छोड़ने के बाद मुझे यह खुशबू फिर कभी नहीं मिली।
सच कहा जाए तो, सिर्फ सुगंध ही नहीं, हर एक महक की अपनी एक याद होती है। यह बात आज पता चली।
जिसे मैं साजिशकर्ता समझता था, वह तो सिर्फ एक संदेशवाहक निकला। असली बुद्धि तो किसी और की थी। एक सफर के दौरान, मुझे घेरकर एक ऐसा कमिटमेंट कराने की कोशिश की गई जिससे मेरा परिवार तंगी की हालत में आ जाए।
उल्टी गिनती तभी चालू हो गई थी। पर एक दिन तो अति हो गई; समय की कमी के कारण जब मैं कुछ नहीं कर पा रहा था, लोगों ने मेरे हिस्से के निर्णय खुद ही लेना शुरू कर दिया।
मेरा तो चरित्र ही बदल गया।
जिन लोगों को मैं अपने बचपन से संभालकर रखा था, उन्हें चिट्ठी-पत्री, फोन, तार सब भेजा। और जब वे मिले तो इतना मिले कि एक दिन अजनबी हो गए। अब सामने पड़ने पर रास्ते बदल लेते हैं।
वक्त-वक्त की बात है, होता है, होता रहा है, होता रहेगा।
यह एक सफर है, 'फ्रेंड लिस्ट से ब्लॉक लिस्ट की ओर'।
क्या आपने कभी सोचा है कि एक अच्छा लीडर कहाँ बनता है? किसी बड़े कॉर्पोरेट ट्रेनिंग प्रोग्राम में या किसी प्रतिष्ठित मैनेजमेंट कॉलेज में? मेरा मानना है कि इसकी नींव हमारे अपने घरों में रखी जाती है।
बात सिर्फ लीडरशिप क्वालिटी की नहीं है, बल्कि जीवन भर सही निर्णय लेने की क्षमता की है। अगर एक बच्चे को कभी भी अपने फैसले खुद लेने का मौका नहीं मिला, तो वह जिंदगी भर अपने प्रोफेशनल फैसलों में भी कमजोर रहेगा।
जब हम बच्चे के हर छोटे-बड़े फैसले में दखल देते हैं और उसे नीचा दिखाते हैं, तो हम अनजाने में उसका आत्मविश्वास तोड़ रहे होते हैं। अगर वह हिम्मत करके कोई निर्णय लेता भी है, तो लोग उसे 'असली' नहीं मानते। वे कहते हैं, "इस पर किसी का प्रभाव है," या "इसे किसी ने सिखाया है।" निजी जिंदगी में तो इससे भी बुरा होता है। घरवाले कहते हैं, "लड़के पर टोना हो गया है," या "लड़की ने उसे अपने वश में कर लिया है।"
जब कोई बच्चा ऐसी बातें सुनता है, तो उसका आत्मविश्वास पूरी तरह बिखर जाता है।
इसलिए, बच्चों को उनके फैसले लेने दीजिए। उन्हें गिरने दीजिए। हाँ, वे 10 बार गिरेंगे, पर ठीक है। जब भी वे उठेंगे, खुद से उठेंगे। वे अपनी हर असफलता से सीखेंगे कि कैसे दोबारा खड़ा होना है।
यह एक ऐसा सबक है जो उन्हें जीवन भर आगे बढ़ने में मदद करेगा। याद रखिए, मजबूत फैसले लेने वाला इंसान किसी कंपनी का अच्छा लीडर ही नहीं, बल्कि अपनी जिंदगी का भी बेहतर लीडर बनता है।
एक बार जो लड़का घर छोड़ दे, तो समझो वो मर गया।
यह बात मुझे आज समझ आई। पापा ने ऐसा क्यों कहा, शायद इसलिए कि वो सिर्फ अपने हिस्से का सच कह रहे थे, मेरे हिस्से का नहीं। मैं तो उन्हें रोज़-रोज़ जी रहा था।
बरसों बाद मुझे एहसास हुआ कि सब मेरे बिना जीना सीख चुके हैं। जब मैं वापस आया, तो मेरा सारा सामान, मेरी किताबें, मेरी अलमारी हटा दी गईं, जैसे किसी के मरने के बाद उसकी यादें मिटा दी जाती हैं। दर्द तब हुआ जब मुझे यह समझ आया कि अब मेरी किसी को ज़रूरत नहीं।
फिर भी मैं घर आता रहा। सबके अपने-अपने कमरे थे, पर मेरा कोई कमरा नहीं था। मैं जब भी आता, तो सब कहते कि उसके कमरे में सो जाओ। मेरा कुछ था ही नहीं, मानो मेरी जड़ें ही काट दी गई हों।
शादी के बाद भले एक कमरा मिला, पर वो भी मेरा नहीं था, सबका था। उसमें मैं कुछ भी अपने हिसाब से नहीं रख सकता था। अगर रखने की कोशिश करता, तो मानो गुस्ताखी हो जाती।
किसी को अंदाज़ा नहीं था कि एक दिन कोरोना आएगा और वर्क फ्रॉम होम के चलते मैं फिर घर आ जाऊँगा। उन दिनों जब सबने मान लिया था कि मैं कभी नहीं लौटूँगा, मैं वापस आ गया। और एक दिन ऐसा भी आया जब मुझे सिर्फ़ कमरे से ही नहीं, पूरे घर से निकाल दिया गया।
जिस घर में मेरा बचपन बीता, जिसकी दीवारों ने मेरी हँसी और चुप्पियों को सँभाला था, वो घर अब मेरा नहीं रहा। और जब माँ-बाप परमधाम चले गए, तो उस घर से जुड़ी बची-खुची यादें भी मेरी नहीं रहीं। धीरे-धीरे लोग कहने लगे, “वो तो यहाँ थे ही नहीं, उनका कोई हक़ कहाँ बनता है?”
तब जाकर मुझे पूरी तरह समझ आया कि पहला वाक्य सही था। कि बच्चा जब घर से निकलता है, तो वो सचमुच घर से मिट ही जाता है।