Monday, January 27, 2025

रिश्तों का नया अध्याय


अभी कल ही हम भांजी की शादी में शामिल हो घर आये है, रिस्तो का ताना बना भी अजीब है, अनुषा की शादी के बाद अब हम ससुर हो गए। 

अपने आंखों के सामने देखते देखते न जाने कब बच्चे बड़े हो गए। अहसास ही नही हुआ कि उनके साथ हम कब इतने बड़े हो गए। 
माँ बाप पर ससुर होने का तमगा लगा तो आम बात थी पर हम अब उसी दौर में है। अब हमारा हाथ आशीर्वाद देने के लिए अपने आप ही उठ जाता है। 

ईश्वर से बस यही कामना करता हूँ कि दोनों सदैव प्रसन्नचित रहकर अपने दाम्पत्य जीवन का निर्वाहन करे और हर संभव खुशियाँ उनके कदम चूमे। 

Monday, January 13, 2025

घर- जहाँ भीड़ नही।

कल ही भाई ने घर पर बुलाया, घर पहुँचने में मुझे थोड़ी देर हो गयी,  तब भाई ने पूछा कि इतनी देर कैसे हो गयी, आने में तो बस 20 मिनट ही लगते है। तभी मैने बोला, भाई आजकल घर से निकलो और ट्रैफिक न मिले ऐसा भी कभी हो सकता है। ना जाने कितनी जगह रुकना पड़ा बात नही सकता। 

अभी कुछ दिन पहले ही मैं घूमने गया था, वहाँ भी बस एक ही चीज़ थी, वह थी बस भीड़। ट्रेन, बाजार, बस यहां तक कि शौचालय में भी भीड़ है। 

तभी भाई बोलता है की, राहुल भीड़ बस एक ही जगह नही है, वह है.......... 

                             घर

अब सबके अपने अपने घर है। 

Tuesday, December 24, 2024

आज का अय्यार और बहरूपिया


चालाक, जासूस,, गुप्तचर,  छल करने वाला, मक्कार, धोखेबाज,  ठग, चोर ।

कभी चंद्रकांता में हमने देखा था कि एक अय्यार कैसे अलग-अलग वेश बदलकर, दूसरे राज्यों में जाकर एक-दूसरे को लड़ाने का काम करते थे। और जो अय्यार ठीक थे, बिगड़ी बना भी देते थे।

इतने बरसों के बाद आज मुझे फिर से उनकी याद आई। अय्यार अब कोई व्यक्ति नहीं जिस पर हम कंट्रोल कर सकें। वो कोई और नहीं, अभी हाल ही में जन्मा अपना AI है। अक्सर हम फेसबुक, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर AI द्वारा बनाई गई फोटो और वीडियो देखते हैं, जिसमें हमारे नायकों का ही प्रयोग कर उनसे उनकी मर्जी के बिना ही कुछ भी कहलवाया जाता है।

देखने में भेद करना मुश्किल होता जा रहा है कि कौन असली है और कौन नकली। अभी तो AI बच्चा है। भविष्य में वह क्या गुल खिलाएगा, अंदाजा लगाना बहुत मुश्किल है।

बहुत ही सावधानी से इस नए अय्यार का प्रयोग करना होगा नही तो यह हमको हमसे ही लड़ा कर स्वयं कही किनारे खड़ा होकर बस यह तमाशा देखेगा। 







Sunday, June 16, 2024

मेरे अंदर का पिता



मेरे अंदर से एक व्यक्ति हर वक्त बाहर झांकता रहता है। मैं जब भी आईना देखता हूँ, वही नज़र आता है। दाढ़ी बनाते समय मेरे चेहरे के हर भाव में, मेरे उठने , मेरे बैठने, रोने और हंसने में भी उन्ही की छवि दिखाई देती है। उन्हें मैं हर दिन अपने अंदर ही महसूस करता हूं। 


उनके जाने के बाद उनकी अच्छाइयों और बुराइयो का आंकलन समाज तो करेगा या कर रहा है और मैं ? मैं उनके जैसा बनना तो कभी नही चाहता था, पर क्या करूँ ?

 

चाह कर या ना चाहकर उन्ही के जैसा ही हूँ। उसके जाने के बाद मैं उनका ही प्रतिनिधित्व कर रहा हूँ। उन्होंने जो कमाया वही मुझे विरासत में मिल रहा है। 


अब मैं अपने आपको उनकी जगह और अपने बेटे को अपनी जगह रख कर जी रहा हूँ। जो व्यवहार उन्हें मेरे साथ करना चाहिए था , मैं बस वही कर रहा हूँ। जो गलत था उसे सुधार रहा हूँ। 


वो अब कहीं भी हो अगर वो मुझे देख सुन रहे हो तो उन्हें बताना चाह रहा हूँ कि आपका बेटा आपसे बहुत प्यार करता था, है और रहेगा।

Saturday, December 16, 2023

मृतुभोज और रिश्तेदार



 शहर से दूर किसी कस्बे में तीन भाई- बहन अपनी माँ के साथ खुशहाल ज़िन्दगी जी रहे थे।  पिता लंबी बीमारी के चलते पहले ही जा चुके थे।  पिता के जाने के बाद  माँ ने तीनों को संभाला, और तीनो ने माँ को। 

एक दिन माँ की अचानक तबियत खराब हो जाने के कारण, जब तीनो माँ को लेकर डॉक्टर के पास गए तो पता चला कि उन्हें एक अनुवांशिक बीमारी है। जिससे उनकी किडनी खराब हो गयी है, जो कभी ठीक नही हो सकती। 

इलाज के लिए तीनो माँ को बड़े शहर ले कर आये,  आनुवंशिकी बीमारी के कारण उनकी शारीरिक स्थिति दिन पर दिन खराब होती जा रही थी।  तीनो डॉक्टर्स  के चक्कर लगा रहे थे की उनकी किडनी की बीमारी ठीक हो सके। जहाँ भी उम्मीद की कोई किरण दिखाई देती, तब झट से तीनो दौड़ पड़ते।  

डायलिसिस के लिए तीनो रोज़ चक्कर लगते की जहाँ भी अच्छे से हो जाये, बस करा दे।  इलाज में पैसे पानी की तरह बह रहे थे, आर्थिक इस्थिति अच्छी ना होने के बाद भी हर संभव प्रयाश कर रहे थे की माँ को अच्छे से अच्छा इलाज मिल जाये।  कोशिश करते करते वो माँ को लेकर तीनो पी.जी.आई पहुंचे।  रिश्तेदारों को पता लगा तो एक एक कर के आए और अपनी व्यहारिकता पूरी करते हुए अपने घर को वापस निकल लिए।  किसी ने उनसे आर्थिक सहयोग के बारे में कुछ नहीं किया। फिर भी तीनो ने पैसो का जुगाड़ कर, माँ का हर सम्भव इलाज कराया।

माँ का संघर्ष काफी दिन चला, और कुछ सगे रिश्तेदार जो उनके घर के आस पास ही रहते थे वो आये ही नही मिलने ।  
अस्पताल में माँ के अंतिम सांस लेने के बाद, तीनो अपने आपको ठगा महसूस कर रहे थे, की इतनी मेहनत के बाद भी, उन्हें बचा नहीं पाए।  

अंतिम विदाई के लिए उन्हें उनके निवास पर ले जाने का इंतज़ाम किया गया। माँ को लेकर सब देर रात घर पहुंचे।  रिश्तेदारों ने अंतिम विदाई का इंतज़ाम पहले से कर रखा था।  पूरा कार्यक्रम ठीक से निपटा।  शोक में डूबे तीनो इस हालत में नहीं थे की कुछ बात कर सके।  

 दिन बीतने के बाद रिश्तेदारों ने मृत्युभोज की बात करने के लिए तीनो के पास गए, पर तीनो ने आर्थिक इस्थिति अच्छी ना होने के कारण मृत्युभोज की जगह शांति पाठ के लिए प्रस्ताव दिया, पर परंपरा के नाम पर रिश्तेदारों  ने मृत्युभोज करने की ही बात कही, और बोला की तुम जितना कर सकते हो आर्थिक सहयोग करो बाकि हम मिलकर इंतज़ाम कर लेंगे।  

सहयोग मिलने पर तीनो तैयार हो गए, यह भी कार्यक्रम ठीक से निपटा। भोज करने बहुत कम लोग आए। मुझे भी समझ नही आ रहा था कि कोई परिजन शोक में हो और उस शोक में वह सबको अपने घर भोज पर बुलाये, जो पैसा इलाज पर खर्च किया जा सकता था वह दावत में खर्च हुआ। खाना इतना बना था की रेलवे स्टेशन और बस स्टेशन जाकर ज़रूरत मंदों को बाटना पड़ा।  फिर भी खाना बच गया।  बासी खाना कौन खाता है, सो वह फेकना पड़ा। 

सबसे विकट इस्थिति तो ब्राम्हण भोज में थी, दान के लिए ऐसे बहस कर रहे थे जैसे किसी शादी समाहरोह के बाद हिजड़े आते है और नेग के लिए मोल तोल करते है। 

जो भी रिश्तेदार शोकाकुल से मिलने आये थे और रिश्तेदारों के सहियोग की बात सुन बहुत प्रसन्न थे पर मेरे मन में एक बात अंदर अंदर खटक रही थी, की इलाज में किसी ने भी आर्थिक सहियोग नही किया पर मृतुभोज के लिए सब तैयार हो गए।

कुछ दिन बीते, तीनों अपने आपको संहलते हुए आगे बढ़ रहे थे कि एक दिन रिश्तेदारों ने उन्हें बुलाया और बिल पकड़ा दिया। तीनो बिल देख समझ नही पा रहे थे कि यह क्या है?
तभी एक सज्जन व्यक्ति बोलते है कि मृतुभोज करने के लिए हमने उधार दिया था दान नही। 

रिस्तेदारो में से एक ने बोला, इतना खर्च हुआ है मृतुभोज पर कृपया इसका भुकतान कर दे हमे आगे की उधारी चुकानी है। तीनो समझ नही पा रहे थे कि क्या किया जाए। सहियोग उधार नही होता है, रिश्तेदारों को समझाने के बाद भी राशि का भुकतान जल्दी से जल्दी करने पर अडिग रहे । 

तीनो अपने आपको ठगा महसूसकर रहे थे। इलाज में कोई सामने नही आया। देखने भी नही आया पर स्वर्गवास के बाद सब आये। जिसने जो भी सहयोग किया वह भी उधार था। 

समाज मे कुछ रिश्तेदार आपके सही वक्त पर सही घाव दे जाते है बस उसे बोला नही जा सकता। बस अंदर ही अंदर घुटन दे जाते है।