Friday, February 8, 2019

अनुषा

अनुजा का आठवां महीना पूरा होने को था, हम सब अक्सर इकट्ठा हो छोटे से बेबी की बातें किया करते थे। छोटा सा बेबी किस पर जाएगा शैलेंद्र पर या अनुजा पर। हम शैलेंद्र और अनुजा से पूछा करते थे कि वह बेटी चाहते हैं या बेटा, दोनों बस एक ही बात बोलते थे कोई भी हो पर स्वस्थ हो। इसके अलावा हमें कुछ और नहीं चाहिए। मुझे अक्सर लगता था कि शायद बेटी ही होगी,  पता नहीं अंदर से कुछ आवाज सी आती थी।

अनुजा को जब नवा महीना लगा । शैलेंद्र के मम्मी-पापा और बहन, अनुजा की देखभाल करने के लिए उसके घर आ चुके थे। वीकेंड में हम साथ बैठे बात कर रहे थे कि हमें कभी भी अनुजा को हॉस्पिटल ले जाना पड़ सकता है। एक रात में हम गहरी नींद में थे कि, फ़ोन की घंटी बजती है, बड़ी मुश्किल से रजाई के बीच से कही फ़ोन हाथ लगा और देखता क्या हूँ शैलेंद्र का फ़ोन आ रहा था। फोन की घंटी सुनते ही स्वाति भी उठ कर बैठ गई थी।  फ़ोन उठाते ही शैलेंद्र कि आवाज़ आयी, राहुल सो कर उठ जाओ, अनुजा को दर्द शुरू हो गया है और उसे  होस्पिटल ले जाने का वक्त आ गया है।

हम झट से उठे और सामान समेटकर जाने के लिए तैयार हो गए। आदि को उसके मामा के साथ छोड़ कर हम अनुजा को लेकर कैलाश हॉस्पिटल निकल लिए। गाड़ी हम धीरे-धीरे चला रहे थे कि,  कहीं अनुजा को कोई समस्या ना हो जाए। हम हॉस्पिटल पहुंचे और वहां की फॉर्मेलिटी पूरी की।  अनुजा को लेबर रूम ले जाया गया। डॉक्टरों ने नॉर्मल डिलीवरी की कोशिश शुरू कर दी।  तभी अनुजा की एक चीख ने, हम सब को डरा दिया । शैलेंद्र भागा-भागा अनुजा के पास पहुंचा और बोला क्या हुआ? सब ठीक तो है ना? अनुजा को लेबर पेन इतना ज्यादा था कि वो बेचैन थी, अनुजा की हालत देख, शैलेंद्र की आंखों में भी आंसू, बस छलकने को ही थे। बड़ी मुश्किल से शैलेंद्र ने अपने आप को कंट्रोल किया। अनुजा की स्थिति को देखकर, शैलेंद्र ने निर्णय लिया कि वह ऑपरेशन के लिए जाएगा।

शैलेंद्र की हामी भरने के बाद डॉक्टरों ने डिलीवरी की तैयारी शुरू की, हम सभी ने अनुजा का हौसला बढ़ाया और अनुजा ऑपरेशन थिएटर के लिए निकल गई । बाहर शैलेंद्र हाथ बांधे खड़ा हुआ था, बहुत देर खड़े होने के बाद हम सब ने शैलेंद्र से कहा कि तुम बैठ जाओ, पर वह बैठ नहीं रहा था और बोल रहा था कि, जब तक अनुजा बाहर नहीं आती वह नहीं बैठेगा और ना ही कुछ खाएगा- पिएगा। थोड़ी देर के बाद डॉक्टर ने हमें बताया एक सुंदर सी बेटी ने जन्म लिया है, यह खबर सुन सभी बहुत खुश हुए और सुंदर सी बिटिया के फूफा खुशी के मारे मिठाई का डब्बा लेकर आए, मिठाइयां सब में बांटी गई और शैलेंद्र को भी खूब ढेर सी बधाई दी गई। दादी, बाबा, बुआ सब बहुत खुश थे।

अनुजा अभी लेबर रूम से बाहर नहीं आई थी,  शैलेंद्र वहीं खड़ा अनुजा का इंतजार कर रहा था । एक घंटा बीतने के बाद भी जब, अनुजा की कोई खबर नहीं आई तो वह दौड़ा - दौड़ा डॉक्टर के पास गया और बोला अनुजा कैसी है। डॉक्टरों ने शैलेंद्र को बताया की अनुजा अच्छी है और उसे थोड़ी देर में रूम में शिफ्ट कर देंगे। अभी उसे ऑब्जर्वेशन में रखा है। डॉक्टरों के बताने के बाद भी शैलेंद्र ऑपरेशन थियेटर के बाहर ही खड़ा रहा, थोड़ी देर के बाद जब अनुजा बाहर आई, अनुजा को देखने के बाद,  वह अपनी प्यारी सी बेटी से मिलने बेबी रूम में गया और वहां उसका वीडियो बनाकर हम सबको दिखाया। बिटिया बहुत छोटी और प्यारी थी और हम सब भी बहुत खुश थे की, अनुजा और छोटी सी बिटिया दोनों ही स्वस्थ हैं।

दोपहर होते-होते अनुजा को रूम में शिफ्ट कर दिया हम सब वही थे धीरे-धीरे करके सारी मित्र मंडली इकट्ठा हो गई। 3 दिन हॉस्पिटल में रहने के बाद अनुजा घर आई और जश्न की तैयारी शुरू हो गई। छठी में हम झूम कर नाचे। उसके बाद बिटिया का नाम रखने की प्रक्रिया शुरू हो गई। सभी लोगों ने अपने हिसाब से छोटी सी बिटिया के लिए नाम चुने, आखिर में बुआ ने उसका नाम शिवांशी सेलेक्ट किया, सर्वसम्मति से छोटी सी बिटिया का नाम शिवांशी फाइनल हो गया। प्यार से हम शिवांशी को शिवि भी बुलाते हैं।

जब शिवांशी 12 दिन की हुई तो हमने खूब जश्न मनाया,  शैलेंद्र ने सबको बुलाया। पुराने सारे दोस्त आए थे,  रिश्तेदारों का भी तांता लगा था। वह पार्टी यादगार रही दादी-दादा, बुआ-फूफा, मामा-मामी, मौसी और नानी सब झूम कर नाचे।

अब वह 6 महीने की होने को है,  शिवि ने शरारते शुरू कर दी है। वाह अक्सर पलट जाती है और जोर जोर से चिल्लाती है। मैं अक्सर उसे अनुशा कह कर बुलाता हूं। उसके इस नाम में अनुजा का अनु और शैलेंद्र क श है।

मैं  शिवि के सुंदर भविष्य की, ईश्वर से कामना करता हूं ईश्वर उससे अच्छी बुद्धि, संस्कार और अच्छा स्वास्थ्य प्रदान करें । मेरा और स्वाति का आशीर्वाद उसके साथ हमेशा रहेगा।  वाह मंडली की सबसे प्यारी बिटिया है और हम सब उसे खूब सारा प्यार देंगे।

Monday, January 28, 2019

गौरैया


हम कुछ ही दिन पूर्व ही शहर की घनी आबादी वाले इलाके से निकल उसी शहर की बाहरी इलाके में एक बहुमंजिला ईमारत में शिफ्ट हुए है।  शरू के कुछ दिन  में हमने बिलकुल भी अच्छे नहीं लगे। उस इलाके में हमारा कोई जानने वाला भी ना था।  एक सुबह देखता क्या हूँ एक नन्ही से गौरैया हमारे कमरे में दाखिल होती है। गर्मियों के दिन थे इसलिए हमने पंखा चला रखा था। गौरैया के आता देख हम झट से पंखे को ऑफ करने के लिए बढे। की कही चिड़िया को पंखे से चोट न लग जाये।

पंखा बंद तो हो गया पर चिड़िया बहार जाने का नाम ही नहीं ले रही थे, कभी परदे की रोड पर बैठ जाती तो कभी बंद पंखे के पारो पर।  भगाये तो कैसे भगाये  फिर हमने कमरे की सारी लाइट्स बंद की और सिर्फ एक ही दरवाज़ा खोला। अचानक चिड़िया फुर से उस गयी।


चिडियो को देख कर ना जाने क्यों हमे बहुत अच्छा सा लगा।  शहर की उस घनी आबादी में लोग तो बहुत थे बार कोई भी गौरैया नहीं थी।  हर जगह से गौरैया ख़त्म सी हो गयी है।  चहचहाने की की आवाज़े तो हमने बरसो बाद सुनी थी।  मानो ऐसा लग रहा था की हम किसी जीवित जगह आ गए है।

अब हम रोज़ चिडियो को अपनी बालकनी में दाना डालते है और जिस दिन भी हम भूल जाते थे चिडियो का चहचहाना बहुत ही बढ़ जाता है।  कुछ तो घर के अंदर आकर मानो हमे बताने का प्रयाश कर रही होती है की हम दाना डालना भूल गए हो।  हम झट से दरवाज़ा खोल दाना डालते है।  साथ में कुछ कबूतर भी दानो का मज़ा लेते है।




Monday, January 7, 2019

सनीलियोनि चाप


नए साल की शुरुवात हुए बस कुछ ही दिन हुए थे, हम अपनी पत्नी के साथ,अपने मुहल्ले की मार्केट की सैर कर  रहे थे कि, हमे एक दुकान दिखाई दी, जिसमे बड़ी भीड लगी हुई थी, हमारा भी मन किया कि हम जा कर देखे की क्या बिक रहा है। नज़दीक जा कर हमने देखा की दुकान में तरह तरह की चाप बिक रही थी। 
दुकानदार से हमने पूछा की चाप शाकाहारी ही होती है या नही? दुकानदार ने बोला सर् ये शाकाहारी होती है और इस दुकान में सबकुछ शाकाहारी ही है। पूछना थोड़ा जरूरी था क्योंकि चाप दिखने में मुर्गे की टांग की तरह लग रही थी। पत्नी भी साथ थी इसलिए पूछना थोड़ा ज्यादा जरूरी था। हमने कभी भी चाप नही खाई थी इसलिए मेरा मन किया कि चलो एक बार ट्राय किया जाए। पत्नी को हमने मनाया और उसने बड़ी हिम्मत की और चाप खाने के लिए तैयार हो गयी।
दुकानदार से हमने बोला, भाई चाप कैसे दे रहे हो? दुकानदार बोला सर् आप कौन सी चाप खाना पसंद करेंगे? बताइये। मैंने बोला, भाई, मुझे नही पता की हम कौन सी चाप खाए। आप ही बताओ कि हमे कौन सी चाप खानी चाहिए। आपके पास कौन सी मशहूर चाप है जिसे  लोग ज़्यादा पसंद करते है।
दुकानदार ने हमें बताया की, उसके पास एक स्पेशल चाप है, जिसका नाम सनीलियोनि चाप है।  सनीलियोनि का नाम सुन हमदोनो को हँसी आ गयी, थोड़ा हसने के बाद हमने बोला की ऐसी भी कोई चाप होती है क्या? मुस्कुराते हुए हमने अपनी पत्नी की तरफ देखा। हमारी पत्नी ने भी मुस्कुराते हुए सनीलियोनि चाप खाने के लिए तैयार हो गयी।
सनीलियोनि चाप सार्वजनिक जगह पर खाने की जगह हमने तय किया की हम घर जाकर सकून से इसका आनंद लेंगे। हम घर आये। मेरी पत्नी, एक सुंदर सी थाली में सनीलियोनि चाप परोसकर ले आयी। हमने पूरा आनंद लेकर चाप का सेवन किया। चाप खाने में बहुत चटपटी थी और छूने पर मख़मली ।  हमने अपने साले को भी चाप खिलायी। मेरे साले को सनीलियोनि चाप अच्छी लगी और उसने भी अपने हिस्से की चाप बड़े आनंद से खाई, बस उसे हमने चाप का नाम नही बताया।

Tuesday, October 30, 2018

करवाचौथ


मेरी शादी को सात साल होने को है और इस बरस हमारा सातवां करवाचौथ था। शादी के बाद जब पहला करवाचौथ पड़ा, तो मैं नोएडा से लखनऊ सुबह लगभग 3 बजे घर पहुंचा, सोते सोते सुबह के 5 बज गए थे । नींद खुली तो देखा दोपहर के 12 बज गए। मेरी पत्नी का यह पहला व्रत था वो भी बिना पानी और खाना के, वो थोड़ा डरी सहमी सी थी,  स्वाति की हालत अक्सर भूख लगने पर घायल शेरनी जैसी हो जाती थी और आज वो पूरा दिन बिना कहे पिये रहेगी, उसके लिए ये एक बड़ी बात थी। हमने अपनी पत्नी का हौसला बढ़ाया और बोला चलो आज मैं भी कुछ नही खाऊंगा । 
अचानक मेरी पत्नी बोली कि क्या आप मेरे लिए भी व्रत रहोगे । मैंने बोला जब तक व्रत रह पाऊंगा रहूंगा नही तो कुछ खा लूंगा। इतना बोल मैं कुछ देर और सो लिया।
दोपहर के दो बजने को थे तभी फिर मेरी पत्नी भागते हुए आये और बोली मुझे बहुत तेज़ प्यास लगी है मन कर रहा है चार-पाँच गिलास पानी पी लूं, तभी मैंने बोला पी लो, कुछ नही होगा। व्रत रह सकती हो, तो रही नही तो कोई बात नही। पर करवाचौथ का व्रत, व्रत नही परंपरा है उसे निभाना भी है।
गुस्से में स्वाति कमरे से बाहर चली गयी, फिर अचानक आती है और बोली कुछ आपको खाना है तो खा लो मैं चाय बना देती हूं, आपके लिए। दोपहर  हो गयी थी, मन ही मन सोंच रहा था कि मैं भी व्रत रह जाऊं पर रहूं कैसे, क्या कहूंगा माँ और दीदी से, की मैं भी करवचौत का व्रत हूँ। मेरे परिवार में आज तक कोई मर्द यह व्रत नही रहा है।
कहीं मुझे पर "जोरू का गुलाम" का तमगा तो नही लग जायेगा और दूसरी तरफ से सोंच रहा था कि अगर स्वाति के व्रत रहने पर मेरी उम्र बढ़ती है तो मेरे व्रत रहने पर उसकी भी तो उम्र बढ़ेगी।
यही सोंच मैंने माँ और दीदी से बोला कि सोंच रहा हूँ कि मैं भी व्रत रह जाऊं। तभी माँ बोली रह जाओ अगर रह सकते हो तो। माँ के सहमति मिलते ही मैंने भी ठान लिया की मैं भी व्रत रह ही जाऊंगा।
स्वाति कान लगाकर ये सारी बात सुन रही थी और मेरे इस फैसले से मन ही मन बहुत खुश हो गयी। इसी खुशी में अपनी भूख प्यास भी कुछ पल के लिए भूल गयी। व्रत रहने का फैसला लिए कुछ ही पल बीते ही थे कि ये खबर पूरे परिवार ने जंगल की आग की तरह फैल गयी।
शाम होने को थी, मैं भी तैयार था पत्नी का साथ देने के लिए। शाम हुई पर चंद्रमा का कोई नामोनिशान नही था । थोड़ी थोड़ी देर पर हम छत के चक्कर लगा रहे थे कि शायद चन्द्रमा के दर्शन हो जाये और हम कुछ खाए, पर चाँद आज अपने ही घमंड में था।
थोड़ी देर में पूजा की तैयार हो गयी और सब पूजा के लिए ऊपर आये। कथा कही और सुनी गई । विधि विधान से पूजा हुई, चलनी से मेरा चेहरा देख गया और हम दोनों के एक दूसरे का व्रत तोड़ा।
स्वाति ने यह बात अपने मायके में बताई कि आज राहुल। ने भी करवाचौथ का व्रत रखा था, यह सुन सास-ससुर जी भी बहुत खुश थे।
दूसरे दिन हमे नोएडा वापस आना था। हम तैयार हो नोएडा आ गए। आफिस पहुँचा तो साथ के लोगो ने मेरा हाल चाल पूछा और मजे लेने के लिए कुछ  ने पूछा क्या तुम भी व्रत थे। तब मैंने जवाब दिया,  हाँ, मैं भी व्रत था। इतना सुनते ही सबने कहा, क्या???? क्या????,  सच मे तुम व्रत थे। मैन बोला, क्या हुआ। हाँ मैं व्रत था..  कुछ दोस्तों ने मेरा हौसला बढ़ाया की ग्रेट मैन।
फिर चर्चा शरू हुई कि उनके जान पहचान के कुछ लोग भी व्रत रहते है अपनी पत्नी के लिए। मुझे उन कुछ लोगो मे शामिल होने पर अंदर से गर्व महसूस हो रहा था। कि मैंने कुछ स्पेशल किया है।
उस व्रत का असर मेरी पत्नी पर पूरे साल भर रहता है। स्वाति अपने दोस्तों से बताए नही थकती की मैं भी उसके लिए व्रत रखता हूँ। इन सात सालों में ज़्यादा कुछ नही बदला है पर कुछ और नाम जुड़ गए है जो अपनी पत्नी का साथ देने के लिए अपनी पत्नी के साथ करवाचौथ का व्रत रखते है। जानकर बहुत खुशी होती है।
पुरुष वादी समाज मे पुरुष द्वारा स्त्री के लिए व्रत रखना एक स्पेशल घटना है।
मेरे विचार से पति पत्नी का रिश्ता बराबरी का रिश्ता है। ना कोई छोटा और न कोई बड़ा।
इसलिए करवाचौथ में भी पैर छूने की रस्म को भी मैंने तिलांजलि दे दी है इस बरस से।

एक अजनबी

प्रिय ज्वेल,
तुम्हे तुम्हारे जन्मदिन की हार्दिक बधाई, ईश्वर तुम्हे अच्छा स्वास्थ्य एवं ज्ञान प्रदान करे। तुम अपना और अपने परिवार का नाम रौशन करो यही आशिर्वाद देता हूँ, तुम्हारे लिए मैं एक अजनबी हूँ पर तुम मेरे लिए नही। तुम्हे तस्वीरों में मैंने बड़ा होते देखा है। तुम्हारे छुटपन के किस्से अक्सर मेरे कानों में होकर गुजरे है पर मैं उसका साक्षी नही रहा हूँ। एक दिन आएगा, जब मैं तुम्हारे लिए अजनबी नही रहूंगा। तब मैं तुम्हे अपने बारे में विस्तार से बताऊंगा। तुम अपना ध्यान रखना और अच्छे से पढ़ाई करना।  तुम्हे ढेर सारा प्यार एवं आशीर्वाद।
                                       तुम्हारा एक अजनबी चाचा

Wednesday, October 24, 2018

एक घटना Meetoo

जबसे मिटू हैश टैग आया है और लोगो ने अपने ऊपर हुए अत्याचार की घटनाओं को शेयर किया है, मुझे भी लगा कि मैं भी कुछ लिखूं। लोगो से शेयर करू अपना भी अनुभव जिसमे मैं या मेरे जान पहचान दे लोग शामिल रहे हों।

मैं अपने भाई बहनों में मझला हूँ। घर मे मेरी बड़ी बहन का ही वर्चस्व रहा । कभी भी हमने उनसे तेज़ आवाज़ में बात नही की थी। कभी दीदी से पंगा भी हुआ तो दबी हुई
आवाज़ में ही हमने उनका विरोध किया।

किस्सा उन दिनों का है जब हम नौंवी क्लास में पढ़ते थे। स्कूल घर से बहुत दूर था। स्कूल हम स्कूल बस से जाते थे और बस घर से लगभग एक किलोमीटर दूर मिलती थी। सुबह हम अक्सर भाग भाग कर बस पकड़ते थे और शाम आराम से टहलते हुए आते थे। एक दिन की बात है,  जब मैं बस से उतरा तो मेरे सीनियर ने कहा कि, तुम इतनी दूर पैदल क्यों जाते हो, मेरा घर पास मे है, मैं रिक्शा कर के जाता हूँ। एक काम करो मेरे साथ चला करो और मैं अपने घर पर उतर जाऊंगा और तुम रिक्शा लेकर अपने घर चले जाना । पैसे मैं दे दूंगा, रिक्शे वाला पैसे तो उतना ही लेगा जितना मेरे घर के लिए लेता है।

मैंने उन्हें मना कर दिया यह सोचकर कि दीदी को पता लगा कि मैं रिक्शे से आया हूँ और पैसे किसी और ने दिए है तो मेरी अच्छे से धुलाई हो जाएगी।

ऐसे ही किसी दिन स्कूल से जल्दी छुट्टी होने पर मैं बस से उतरा और फिर मेरे सीनियर ने कहा आज चल मेरे साथ रोज़ तो जाता नही है, मैंने सोंचा की चलो चलते है एक ही दिन की तो बात है।

हम रिक्शे पर बैठे और घर की तरफ निकले । तभी देखता हूँ एक लड़की जो किसी और रिक्शे पर थी, स्कूल से घर जा रही थी। तभी मेरा सीनिय,  रिक्शे वाले से बोलता है कि इसका पीछा करो और उसके रिक्शे के बराबर लेकर आओ। मैं तुम्हे दुगने पैसे दूंगा। तभी रिक्शे वाले ने तेज से रिक्शा चलाया और लड़की के रिक्शे के पास जैसे ही पहुँचा, मेरे सीनियर ने बोला अपना रिक्शा उसके रिक्शे से लड़ा दो, मैं तुम्हे और भी पैसे दूंगा। मेरा माथा ठनका और मैंने बोला सर रहने दो। फिर उसने बोला अभी मज़ा आएगा। तभी रिक्शे वाले ने अपना रिक्शा लड़की के रिक्शे से लड़ा दिया और वो बोला , Hi Sweety, How are you? You are very beautiful. In which class do you read?

लड़की ने पीछे देखा और सहम गईं। तभी वो फिर बोला और लड़ाओ रिक्शा। लड़की के रिक्शे वाले ने शायद हालात को समझा और वो रिक्शा तेज़ी से निकाल ले गया। तब तक मेरे सीनियर का घर आ गया था। वो घर नही हवेली थी। उसने उस रिक्शे वाले को 50 रुपये की नोट पकड़ाई और बोला, इसे घर छोड़ देना जहां भी हो। मैं सहम सा दोबारा उसके साथ न आने का प्रण लिए घर आ गया। उस घटना ने मेरे दिल पर काफी गहरा असर डाला और उसे मैं कभी भूल नही पाया।
फिर किसी रोज़ मैंने उस लड़की को अपने ही मुहल्ले के पास के घर मे देखा। डर के मारे मेरी फिर कभी हिम्मत नही हुई उस गली में जाने की, कि कही किसी रोज़ उसने मुझे पहचान लिया और ये बात मेरे घर तक पहुच गयी तो मेरी बहन मुझे इतना पीटेंगी की दुनिया का कोई भी इंसान मुझे बचा नही पायेगा।

Friday, August 24, 2018

प्रेम का पहला ख़त

यह किस्सा तब का है जब हम स्कूल में पढ़ा करते थे। स्कूल की सबसे बातूनी क्लासेज में हमारी क्लास का पहला स्थान था ।  कोई भी टीचर हमारे क्लास में आती तो कुछ बच्चो को बिना कुछ बोले ही क्लास से बाहर निकाल देती या क्लास में सबसे पीछे खड़ा कर देतीं थीं और बोलती थीं  की तुम लोग वही से पढ़ो। इन सबके बावजूद हमारी क्लास का शोर पूरे स्कूल के शोर पर हावी रहता था। 

जब कभी भी टीचर के क्लास में आने में थोड़ी सी देरी हो जाती थी, तो क्लास की मॉनिटर चॉक से ब्लैक बोर्ड पर उनके नाम लिख देती थी।  अक्सर टीचर के आने से पहले ब्लैक बोर्ड साफ़ कर दिया जाता था। कभी शोर जब हद से ज़्यादा गुजर जाता था तो उन बच्चो का नाम कॉपी पर  लिख लिया जाता था और वो नाम टीचर तक पहुँच जरूर जाते थे।  फिर आगे क्या होता था इसकी अंदाज़ा लगाया ही जा सकता है। डंडे बरसते थे, तशरीफ़ पर, पर गिने नही जाते थे। 

शोर के अलावा हमारे क्लास के टॉपर भी पूरे स्कूल पर हावी थे। हमारी क्लास के कुछ बच्चे हमारी प्रिंसिपल के चहेते भी थे। अक्सर उनका उदाहरण हमारे सामने पेश किया जाता था। हमारे क्लास के दो टॉपर थे,  एक थी और एक था, जो थी वो थी दिव्या और जो था वो था अमित । दोनों कुछ ही नम्बरों से आगे पीछे रहते थे। टीचरों के हर सवाल का जवाब इनके पास रहता था। कभी कभी तो पूरी क्लास खड़ी रहती थी और ये दोनों बैठे रहते थे।


एक दिन की बात है हमारी क्लास टीचर तेज़ी से चलते हुए हमारी क्लास में एंटर की, चेहरे से तो बहुत गुस्से में लग रही थी, हमे लगा कुछ हुआ होगा, किसी की शिकायत किसी टीचर ने की होगी। मैं आगे से चौथी सीट पर बैठता था ।

अचानक क्लास टीचर ने गुस्से से चार बच्चो के नाम पुकारे, चारो मेरी क्लास के छटे हुए शरारती थे। टीचर के हाथ के एक कागज का टुकड़ा और दूसरे हाथ में लकड़ी के स्केल थी। चारो ब्लैक बोर्ड तक पहुँचते उससे पहले ही दो तीन रसीद हो चुके थे।


मैम का चेहरा गुस्से से लाल हो रहा था। क्लास में उनके चेहरे को देख कर सन्नाटा छा चुका था। जिसे कहते है पिन ड्राप साइलेंट। कागज़ के टुकड़े को उन्हें दिखा कर मैम गुस्से में बोली,  ये किसने लिखा है? जब किसी का कोइ जवाब नही आया तो मैम ने एक बार फिर से तेज़ आवाज़ ने फिर से पूछा कि ये किसने लिखा है, जवाब फिर नही आया। 

गुस्से में सबकी तशरीफ पर दो-दो स्केल रसीद हो जाती है। सबने एक एक कर ना कही, किसी का भी कबूलनामा नहीं आया की उस पेपर पर किसने लिखा था। 


तभी  देखता क्या हूँ दिव्या ज़ोर ज़ोर से रोने लगी, साथ में बैठी लड़कियां और टीचर उसे शांत कराने लगी और बोलने लगी की हम ढूंढ कर ही रहेंगे की यह किसने लिखा है।  तभी एक और टीचर क्लास में आती है जो पुरे स्कूल में पिटाई के लिए कुख्यात थी , आते ही सारे बच्चो को  सम्बोधित करते हुए बोली की, कौन कौन इन्वॉल्व है मुझे बताओ , अगर अभी बता दोगे तो कुछ नहीं कहूँगी, नहीं तो ऐसी मार पड़ेगी की ज़िन्दगी भर याद करोगे और स्कूल से निकाल दिए जाओगे।  क्लास में सन्नाटा अभी भी छाया था।  कोई भी आवाज़ कही से भी नहीं आ रही थी।  तभी स्कूल की घंटी बजती है और लंच टाइम हो जाताहै ।  हर तरफ से बच्चो का शोर आ रहा था पर हमारी क्लास अभी भी शांत थी।  तभी टीचर ने बोला, आज किसी को भी लंच करने को नहीं मिलेगा , जब तक वो बच्चा सामने नहीं आता जिसने यह लिखा है।  

हम सब समझ नहीं पा रहे थे की हो क्या रहा है, किसने क्या लिखा है पर डर के मारे कोई कुछ बोल नहीं रहा था। भूख के मारे सबके चेहरे उतर से गये थे, हमारे मुरझाए हुए चेहरे देख मैम ने हमे जाने दिया खाना खाने के लिए। जाने से पहले हमसब की हिंदी और इंग्लिश की कॉपी जमा कर ली गयी थी।  मन में जिज्ञाशा लिए हमसब खुसुर फुसुर कर रहे थे की हुआ क्या है।  कुछ दोस्तों से पूछा क्या हुआ उन्हें भी नहीं पता था।  

दिव्या की दोस्त से हमने पूछा की क्या हुआ।  दिव्या इतना क्यों रो रही थी, तब उसने विस्तार से बताया की दिव्या को किसी ने प्रेम पत्र लिखा है और उसे उसके घर मे डाल गया है। प्रेम पत्र,  प्रेम के अलग अलग अलंकारों से भरा हुआ है।  दिव्या के घर वालो को जब इस प्रेम पत्र के बारे में पता लगा तो दिव्या की अच्छे से पिटाई की गई है और उसके पापा ने कहा है कि तुम इतनी छोटी से उम्र में प्रेम प्रसंग के चक्कर में पड़ गयी हो और तुम्हाराआगे का भविष्य तो मानो खत्म हो गया है। उसके घर वाले उसका नाम भी स्कूल से कटवा रहे है और उसके घरवालों ने बोला है की अब वो आगे की पढ़ाई नहीं करेगी। 

दूसरे दिन दिव्या रोते हुए क्लास टीचर के पास आयी और सारी बात बतायी और वो पत्र भी दिखाया।  तभी टीचर क्लास में आयी थी और सबसे पूछ रही थी। 

इतने बड़े कांड के बाद कुछ दिन तो हमारे बिना पढ़ाई के ही गुजरे।  टीचर्स हमारी क्लास में आती तो थी पर पढ़ाती नहीं थी और बोलती थी की आप लोग खुद ही पढ़ाई कर लो, जब तक पत्र लिखने वालो का नाम सामने नहीं आता कोई टीचर आप लोगो को नही पढ़ाएगी।  

दिन ऐसे ही बीत रहे थे, मुझे न जाने क्यों ऐसा लग रहा था की टीचर्स के जासूस कोने कोने में फैले हुए है, अफवाहों का भी बाजार बहुत की गरम था , कभी खबर आती थी कि  कि प्रेम पत्र इसने लिखा है तो कभी उसने। खबर तो यहां तक आयी थी की शायद कुछ लड़कियों जो दिव्या से जलती है उन्होंने ही पत्र लिखा और दिव्या के घर डाल आयी है। जिससे उसकी पढ़ाई बंद हो जाये। 

उन दिनों स्कूल की सारी टीचर्स क्लास की लड़कियों को  मासूम समझती थी और लड़को को घूर कर देखती थीं। उनकी निगाहों में हम गिर चुके थे। कोई भी अच्छे से बात नही करता था हमसे। हमने लड़कियों की तरफ देखना ही बंद कर दिया था। सब यही सोच रहे थे कि कही किसी ने गलती से भी शिकायत कर दी तो समझो आफत आ जाएगी। 

एक दिन सारी टीचर्स फिर से हमारी क्लास में आयी, उनके आते ही क्लास में फिर से सन्नाटा छा गया, हमे लगा अब फिर से कुछ होने वाला है किसी की फिर पिटाई। एक टीचर के हाथ मे एक मोटा सा डंडा भी था।  एक एक कर उन्होंने 6 बच्चो को बाहर निकाला, उन 6 बच्चो में हमारी क्लास का टॉपर अमित भी था।  

सबसे पहले टीचर ने अमित को बुलाया और  अमित के पास आते ही टीचर का डंडा चालू हो गया।  कोई गिन नहीं रहा था बस डंडे बरस रहे थे, वो भी जम कर, पर अमित की ज़ुबान खुल ही नही रही थी। टीचर्स ने थोड़ा और ज़ोर लगाया। थोड़ी देर के बाद अमित बोलता है, मैम अब बस करो, मुझे अब मत मारो मैं बताता हूँ, इसके पीछे किसका हाथ है। आंखों में आंसू लिए अमित बोला की मैंने ये पत्र नहीं लिखा है। इसके पीछे अभिनव है उसी ने यह पत्र लिखा है। अभिनव का नाम आते ही उसके पैर काँपने लगे। फिर अभिनव की बारी आयी, ४ डंडो में ही उसकी ज़ुबान खुल गयी और बोला ये लेटर उसने आशीष के कहने पर लिखा था, और जब आशीष की बारी आयी तो, उसने बिना डंडे खाये ही सबकुछ बोलना शरू कर दिया  और पूरी कहानी सामने रख दी, की पत्र अभिनव ने लिखा था, शब्द अमित के थे,  दिव्या के घर पत्र डालने दो लोग गौरव और संतोष गए थे और रमेश ने सारा प्लान बनाया और मैनेज किया।

इस कबूलनामे के बाद सबकी धुलाई अच्छे से हुई सारी टीचर्स ने अपने हाथ उनपर साफ किये और फिर उन सबको स्कूल से निकालने के प्रक्रिया शुरी की गयी। किसी को यकीन नही आ रहा था कि अमित इस कांड में शामिल होगा। पढ़ने लिखने में सबसे अच्छा है फिर भी ऐसी हरकत की है। सबके पेरेंट्स को स्कूल में बुलाया गया और सारी बात बताई गई, कुछ के पेरेंट्स ने तो उनकी सबके सामने धुनाई की, पेरेंट्स द्वारा टीचर्स को मनाने के बाद और सबके माफी मांगे की बाद उन्हें स्कूल से निकाला नहीं गया। 

 उस दिन से हमारी क्लास में दाहिनी तरफ लड़किया और बायीं तरफ लड़के बैठने लगे। लड़का लड़की आपस मे बात नही कर सकते थे। अगली क्लास आते आते लड़का लड़की अलग अलग सेक्शन में बैठने लगे। अमित बॉयज सेक्शन का टॉपर बना और दिव्या गर्ल्स सेक्शन की।