Tuesday, March 6, 2018

तलाश

यह कहानी एक ऐसे लड़के की है जो बचपन से ही काफी अंतर्मुखी का था । घर मे वो अपने भाई बहनों में मझिला था । बड़ा उसे छोटा नही समझता था और छोटा उसे बड़ा नही समझता था । अपने भाव अपने तक ही सीमित रखने का गुण वक्त ने उसे सीखा दिया था। माँ बाप ने उसका नाम रोहित रखा था ।

जैसे तैसे बारहवीं पास करने के बाद रोहित ने दिल्ली के नामी कॉलेज में अपना दाखिला ले लिया। रैगिंग के डर से उसने कॉलेज जाना कुछ देर से शरु किया। जब वो पहले दिन डरा-सहमा, अपने कॉलेज पहुँचा, तो मानो उसके सीनियर उसका इंतज़ार कर रहे थे । रोहित को देखते ही उसके सीनियर्स ने उसे पकड़ लिया। खूब रैगिंग हुई, उसका पहला दिन अठन्नी, चवन्नी, एक रुपया, दो रुपया में ही गुजर गया।

क्लास में किसी का नाम जान पाता, उससे पहले ही दिन खत्म हो गया। कुछ दिन तो रैगिंग में ही निकल गए , क्लास के कुछ ही बच्चो को वो जान पाया था। क्लास में एक से एक धुरंधर भरे थे । कोई टॉप करके आया था, तो कोई सुपर टॉप करके आया था। रोहित की मिसाल ही क्या थी क्लास में । 12वी में तो वो तो सिर्फ पास ही हुआ था। धीरे धीरे वो क्लास की अगली लाइन से सबसे पिछली लाइन पर पहुच गया।

क्लास की पिछली लाइन में वहां उसकी मुलाकात दो ऐसे बंदों से हुई, जो सिर्फ अपने मे ही मस्त रहते थे। उनमे से एक लड़का था और एक लड़की। एक दूसरे के कान में न जाने क्या खुसुर-फुसुर करते रहते थे और न जाने किस बात पर मुस्कुरा देते थे। वो बात सिर्फ उन्हें ही पता रहती थी। अगल बगल वाले तो सिर्फ उन दोनों का मुँह ही देखते रहते थे। क्लास की अटेंडेंस रजिस्टर से उन दोने का नाम पता लगा । लड़के का नाम शेखर और लड़की का नाम गौरा था ।

दोनों पढ़ने में बहुत तेज़ थे। टीचर के हर प्रश्न का जवाब उनके पास रहता था। ऐसे ही किसी दिन रोहित को टीचर ने खड़ा कर,एक प्रश्न पूछ लिया, जिसका जवाब उसके पास नही था। रोहित थोड़ा घबराया और इधर उधर देखने लगा, तभी शेखर ने चुपके से प्रश्न का जवाब कॉपी के आखिरी पन्ने पर लिख दिया और रोहित ने टीचर के प्रश्न का जवाब दे दिया। रोहित शर्मिंदा होने से बच गया।

वक्त गुजरता गया,  रोहित और शेखर कभी कभी हाय बाय कर लेते थे पर गौरा सिर्फ शेखर तक ही सीमित थी। एक दिन शेखर और रोहित आपस मे बात करते करते अपने स्कूल के दिनों की बाते करने लगे ।  बाद में दोनों को पता चला कि वो दोनों एक ही शहर से है। फिर होना क्या था,  धीरे धीरे दोनों में छनने लगी। गौरा भी उसी के शहर से थी, बातो-बातो में पता चला कि,गौरा भी उसी स्कूल से थी जिस स्कूल में रोहित पढ़ा करता था पर ब्रांच अलग अलग थी।
  वक्त के साथ अब तीनो में अच्छी दोस्ती हो गयी, तीनों अपने शहर की खास बातों को साझा कर खूब हँसा करते थे। शेखर ने रोहित को बताया कि वो और गौरा बचपन के दोस्त है और एक दूसरे से बहुत प्यार करते है।

एक दिन की बात है जब गौरा, रोहित के पास आयी और उसके सिर पर हाथ फेरते हुए बोली "जो तुम दिखते हो, वो तुम हो नही" रोहित का सिर, यह बात सुन चकरा गया। अभी तक वो अंतर्मुखी था , अपनी भावनाओं को उसने कभी भी किसी के सामने प्रकट नही किया था, फिर गौरा ये कैसे जान सकती थी, कि मैं जो दिखता हूँ मैं वो हूँ नही।

यह बात रोहित के दिमाग मे काफी दिनों तक रही पर वक्त से साथ, जाती रही। तीनो अब अच्छे दोस्त बन चुके थे । गौरा और शेखर अपनी प्रेम कहानी अक्सर रोहित को सुनाया करते थे। कैसे दोनों में प्यार हुआ । कब दोनों के एक दूसरे को पहली बार अपने प्रेम का अहसास कराया। कहाँ कहाँ वो एक दूसरे से छुप कर मिला करते थे। कैसे दोनों ने एक ही कॉलेज में कैसे दाखिल लिया। इन सबके बाद भी दोनों के घर वालो को उनके प्रेम के बारे में कुछ नही पता चला।

धीरे-धीरे रोहित को उन दोनो के प्रेम से प्रेम हो गया और रोहित भी दोनों के एक हो जाने की दुआएं भगवान से मांगने लगा ।  गौरा स्वभाव से थोड़ी चुलबुली और हसमुख लड़की थी । वो जल्दी से किसी को दोस्त नही बनाती थी और जब वो बनाती थी तो खूब खुल कर बात करती थी। उसकी बातों में बनावटी पन नही था।  शेखर थोड़ा गम्भीर लड़का था । जल्दी से किसी के बारे में कोई राय नही बनाता था बहुत जल्दी खुश और नज़र नही होता था पर गौरा को बहुत प्यार करता था ।

गौरा की ज़रा से तबियत खराब हो जाने पर या चोट लग जाने पर वो बहुत घबरा जाता था।गौरा एक दिन अगर कॉलेज न आये तो दिन भर बस गौरा गौरा करते बीतता था।
गौरा भी शेखर को अपने हाथ से खाना खिलाती थी, वो शेखर की हर छोटी बड़ी बात का ध्यान रखती थी।

क्लास के सारे लोग उन्हें लैला मजनूं बोलते थे , पर शेखर इस बात पर चिढ़ता था कि लैला मजनूं कभी एक दूसरे के नही हो पाए।

जैसे जैसे कॉलेज के दिन बीत रहे थे,  तीनो एक दूसरे के काफी करीब आते जा रहे थे। रोहित भी, अब अंतर्मुखी से बहिर्मुखी होता जा रहा था। दोस्ती के साथ साथ तीनो साथ ही पढ़ाई भी करते थे, रोहित के भी अब अच्छे नंबर आने लगे थे । तीनो मिलजुल कर पढ़ाई और एसाइनमेंट करते थे।

कॉलेज खत्म होते होते गौरा और शेखर ने सोंचा की वो अपने घर वालो से अपने रिश्ते के बारे में बात करेंगे, पर गौरा अपने घर मे शेखर के बारे में बात करने से डरती थी। उसे डर था कि कही उसके घर वाले उसके प्रेम के बारे में सुन उसकी शादी किसी और से न करा दे।

गौरा और शेखर दोनों अलग अलग सामाजिक परिवेश से जो आते थे । शेखर ने सोंचा की जब दोनों की जॉब लग जायेगी तब वो गौरा के घर जाकर उसके घर वालो से उसका हाथ मांगेगा।

कॉलेज खत्म भी हो गया और तीनों का प्लेसमेंट भी एक अच्छी से कंपनी में हो गया । जोइनिंग लेटर लेने के बाद गौरा और शेखर दोनों ने अपने अपने घर पर बात की एक दूसरे से बारे में । दोनों के घर वाले एक दूसरे की शादी के खिलाफ थे। दोनों के घर वालो ने गौरा और शेखर में लाख कमियां निकल दी और किसी भी शर्त पर शादी ना करने देने की बात पर अड़ गए।

गौरा अपने की घर मे कैद हो गयी, उसका मोबाइल भी उससे छीन लिया गया , अब वो किसी से बात नही कर सकती थी। शेखर की भी हालत कुछ ठीक नही थी। शेखर भी पागल से हो गया था गौरा के बिना। दिन रात शेखर के आंखों में आंसू रहते थे, फिर शेखर ने वो किया जो कोई भी सोंच नही सकता था ।
उसने अपनी जान देने की कोशिश की,पर वक्त रहते उसकी बहन ने उसे हॉस्पिटल पहुँच उसकी जान बचाई। हफ़्तों हॉस्पिटल में रहने के बाद जब वो घर आया तो उसके माता पिता तैयार हो गए दोनों की शादी कराने के लिए।

शेखर अपने माता पिता को लेकर गौरा के घर पहुंचा तो नज़ारा कुछ और ही था । गौरा के घर वालो ने शेखर के घर वालो से बात ही नही की और न ही घर मे घुसने दिया। गौरा के भाइयो ने शेखर और उसके माता पिता से हाथा पाई तक कि नौबत आ गयी। घर की छत से उन्होंने गौरा से बुलवाया और कहलवाया की तुम यहाँ से चले जाओ मुझे तुमसे शादी नही करनी है।

शेखर और मुरझा गया । तीनो घर आ गए और धीरे धीरे शेखर डिप्रेशन में चला गया पर अब गौरा से बात करने की कोई जुगत ही नही सूझ रही थी। जब रोहित को ये सारी बात पता लगी तो उसने गौरा से बात करने की कोशिश की पर, कुछ न हुआ । एक दिन रोहित ने गौरा के घर फ़ोन किया तो , गौरा की भाभी ने फ़ोन उठाया और बताया गौरा घर पर नही है।

कुछ दिनों ने बाद गौरा ने रोहित को  ईमेल किया कि रोहित अब सबकुछ खत्म हो चुका है। मेरा भरोशा अब किसी चीज़ पर नही रहा है। ना दोस्ती पर और ना ही प्यार पर, तुम भूल जाओ मुझे, और फिर कभी मुझे फ़ोन मत करना और न ही कभी मिलने की कोशिश करना। तुम बहुत ही भावुक व्यक्ति हो , तुम्हे थोड़ी तकलीफ भी होगी, पर वक्त की यही मांग है। अपने दिल को मजबूत करो और ज़िन्दगी में आगे बढ़ो और अपने भविष्य को बेहतर बनाओ।

गौरा का यह मेल देख रोहित थोड़ा दुखी तो था पर निराश नही। रोहित ने फिर गौरा को रिप्लाई किया कि, किसी को
भूल जाना या याद रखना ये किसी के बस में नही है। क्या तुम मुझे बता सकती हो ऐसा क्या हुआ । जिससे तुम्हारा दिल यूँ टूट गया। मैं कभी भी किसी को भूलता नही , तुम कही भी जाओ एक दिन आएगा जब मैं तुम्हे ढूंढ लूंगा।

फिर कभी गौरा ने मेल का रिप्लाई नही किया। रोहित भी अब अपनी जॉब और ज़िन्दगी में व्यस्त हो गया पर उसके दिल के किसी कोने में गौरा से मिलने की ख्वाहिश बाकी थी।
शेखर को उसके माँ बाबू जी ने बहुत समझाया फिर शेखर भी अपनी ज़िंदगी मे आगे बढ़ने का फैसला किया। वो भी नौकरी की तलाश शुरू की।

एक दिन रोहित , शेखर को अपने रूम पर ले गया और सारा माजरा समझे कि कोशिश करने लगा । जैसे ही गौरा के बारे में शेखर से रोहित ने पूछा कि, कुछ खबर है उसकी की वो कहाँ है। गौरा का ज़िक्र आते ही शेखर बहुत असहज से होने लगा , उसकी तबियत बिगड़ने लगी।  शेखर को शांत करने के बाद रोहित बिना कुछ बात किये सो गया। सुबह शेखर जल्दी ही रोहित के घर से निकल लिया। उस दिन के बाद दोनों की मुलाकात नही हुई।

अपने दो जिगरी दोस्तो से बिछड़ने का गम अक्सर रोहित को सताता था। शेखर उसके फेसबुक के फ्रेंड लिस्ट में था पर कभी बात नही होती थी। सिर्फ जन्म दिन की बधाई के अलावा कोई और बात नही ।

गौरा को वो अक्सर फेसबुक पर रोहित ढूंढता रहता था पर वो वहां भी कभी नही दिखी। शेखर ने भी अब अपनी नई ज़िंगदगी शरु कर ली थी । नौकरी लगने के बाद उसने उसके साथ ही काम करने वाली लड़की से शादी कर ली। रोहित, शेखर की शादी में नही गया।

रोहित ने भी घर वालो की पसंद की एक लड़की से विवाह कर अपनी ज़िंदगी मे व्यस्त हो गया।  ज़िन्दगी हर्षोल्लास से साथ बीत ही रही कि की एक दिन रोहित को गौरा दिखी पूरे 11 साल बाद। 

रोहित के बचपन के दोस्त के साथ फेसबुक पर। पहले तो वो समझ ही नही पर की वो गौरा है या उसकी हमशक्ल। जब वो उसकी प्रोफाइल पर गया तो देखा कि वो सच मे गौरा ही थी। उसकी एक बेटी भी है बिल्कुल गौरा की तरह। रोहित के खुशी का ढिकाना ही नही था उसका मन झूम कर नाचने लगा । इस खुशी का इज़हार वो किससे करे समझ मे नही आ रहा था।
इस बात का ज़िक्र वो अपनी पत्नी से कैसे करता, वो तो कुछ जानती ही नही थी उसके बारे में पर फिर भी रोहित ने उसे बताया पर वो समझ ही नही पाई की अगर आपने किसी को फेसबुक पर ढूंढ लिया है तो भी इसमें इतना खुश होने की क्या बात है।

रोहित शून्य सा चेहरा ले फेसबुक पर वापस आ गया। शेखर को वो क्या बताए , अब वो अपनी ज़िंदगी मे व्यस्त है। उसे बताने से कही उसकी ग्रहस्ती पर असर न पड़े। बताए तो वो किसे बताए। कोई क्या उसके ज़ज़्बात समझेगा।

एक दिन रोहित का मन किया कि वो जाए अपने बचपन के दोस्त के पास और वहां गौरा से भी मुलाकात हो जाएगी। कुछ प्रश्न उसके ज़हन में अचनाक आए।

गौरा से बात क्या करँगा।
गौरा का क्या रिएक्शन होगा उसे को देखकर।
एक अजनबी सा व्यवहार करेगी या एक बिछड़े दोस्त की तरह।
गौरा से शिकायतें करूँगा या कुछ बात नही करूँगा।
उसका पति क्या सोंचेगा की मैं किससे मिलने आया हूँ।

इतना सोंच उसके कदम रुक गए और रोहित से यह फैसला लिया कि अब वो कभी कोशिश नही करेगा गौरा से मिलने की । वक्त ने जब हम सब का बिछड़ना ही लिखा था तो ऐसा ही सही।

कभी किसी रोज़ वो अचानक मिल गयी तो देखा जाएगा।

Monday, March 5, 2018

मैं बच्चा हूँ उल्लू नही

आदि अब चार साल का होने को है, उसके के खिलौनों के तोड़ने की रफ्तार , उसके नए खिलौनों के आने की रफ्तार से कही ज़्यादा है। एक समझदार और कंजूस पिता होने के नाते,  मैं टूटे खिलौनों को जोड़ने के लिए ग्लू गन खरीद कर लाया । एक-एक कर मैने उसके कई टूटे खिलौने जोड़ कर सही कर दिए और फिर आदि उन जुड़े हुए खिलौनों से खेलने लगा , जुड़े हुए खिलौनो से खेलता देख, मुझे लगा कि चलो, कुछ खर्च तो कम हुआ, उसके नए खिलौनो पर।

एक हफ्ता बीता ही था,  कि वो फिर से कुछ और खिलौने ले आया और बोला, पापा ग्लू गन से जोड़ दो ना। मैंने फिर से खिलौनों को जोड़ दिया, पर मुझे क्या मालूम था कि अब आदि के खिलौनो के टूटने की रफ्तार और बढ़ जाएगी। अब उसका सारा ध्यान खिलौनो को तोड़ने पर लग गया,  मुझे धीरे धीरे अहसास होने लगा कि अगर मैं डाल डाल हूँ तो वो पात पात है। खिलौनो के टूटने और जोड़ने का सिलसिला जारी रहा।

एक दिन की बात है, जब आदि अपना सबसे ज़्यादा टूटा हुआ खिलौना मेरे पास लेकर आया और बोला, पापा क्या आप यह खिलौना जोड़ पाओगे। मैंने पूरी तरह से टूटा हुआ खिलौना देखा और बोला, हाँ, बेटा, मैं इसे जोड़ दूँगा। फिर आदि बोलता है, नही पापा,  आप नही जोड़ पाओगे, फिर मैंने बोला कि , नही बेटा,  मैं जोड़ दूँगा।  तभी  थोड़ी सी खामोशी के बाद आदि के कुछ बोलने के आवज़ सुनाई दी की "मैं बत्ता हूँ उलू नही" । पहली बार तो मैं समझ ही नही पाया कि वो क्या बोल रहा है। मैंने आदि को दोबारा बोलने को कहा,  तो फिर उसने बोला कि, "मैं बत्ता हूँ उलू नही"।

तभी स्वाति की आवाज़ आ गयी कि वो बोल रहा है कि "मैं बच्चा हूँ उल्लू नही "। मैं ये बात सुन आश्चर्य में था कि यह वाक्य इसने सीखा कहाँ से। मैंने आदि से पूँछ की तुमने यह कहाँ से सीखा, आदि ने कुछ जवाब नही दिया। तभी स्वाति बोलती है कि एक विज्ञापन आता है, उसमे एक बच्चा ये वाक्य बोलता है, वही से आदि ने सीखा है।

Saturday, December 2, 2017

जीजा जी का जन्मदिन

आदरणीय जीजा जी,
आपको जन्मदिन की खूब ढेर सारी बधाइयां। ईश्वर आपको सुख समृद्धि एवं अपार धन संपदा प्रदान करे, जिससे मैं अपना जीवन, आपका साला होने के नाते आनंद, हर्षो उल्लास के साथ मना सकूँ और मेरी बहना खूब शॉपिंग कर अपना और गूगल का जीवन खुशियो से भर सके।
आपको बहुत ढेर सारी शुभकामनाएं।
आपका दहेज
आपका साला

Thursday, November 23, 2017

मेरा जन्मदिन

18 नवंबर, एक ऐसा दिन जिस दिन मेरा जन्म हुआ था , हर वर्ष, इस दिन मेरे अंदर कहीं गहराई में छुपा हुआ बचपन सामने आता है। मुझे बरसो हो गए घर और परिवार से दूर हुए , इसलिए कान फ़ोन की घंटी पर ही टिका रहता है कि कौन कौन फ़ोन कर मुझे जन्मदिन के दिन बच्चा होने का अहसास कराएगा।
हर बधाई में कहा गया, हैप्पी बर्थडे,  एक दुआ बन इस दिन मुझे स्पेशल होने का अहसास कराता है। वो सब लोग जो मुझे जन्मदिन पर विश करते है, वो मेरे लिए बहुत स्पेशल है। धन्यवाद उन सबका जिन्होंने मुझे शुभकामनाए दी और धन्यवाद मेरी  पत्नी का जिसने मेरे बर्थडे को स्पेशल बनाने के लिए सरप्राइज गिफ्ट लेकर आई। धन्यवाद उन दोस्तो का भी जो मेरे जन्मदिन पर आए और मेरे साथ डांस किया।
यह जन्मदिन मेरे बेटे को समर्पित जिसे देख मैं रोज़ बचपन जीता हूँ।
ईश्वर आपसभी को , अच्छा स्वास्थ्य और समृद्धि दे, जिससे आप भी अपना जीवन शानदार तरीके से गुजारे और मुझे यूँ ही जन्मदिन की बधाई हर वर्ष दे।

Saturday, October 14, 2017

भविष्य एक जिज्ञासा या पहेली

ऑफिस में आजकल ज़ेव फेस्ट चल रहा है, इसी फेस्ट में एक स्टॉल लगा था टैरो कार्ड रीडर का । ज़ोर शोर से हम सभी को कई दिनों पहले ही इसकी सूचना दे दी गयी थी कि ऑफिस में एक टैरो कार्ड रीडर आ रहा है। स्टॉल के आगे काफी भीड़ जुटी हुई थी। जो भी व्यक्ति अपना भविष्य जानकर बाहर आ रहा था, वो बड़ा ही खुश और चकित नज़र आ रहा था। हमने भी कुछ लोगो से पूछा कि भाई क्या बता रहीं है टैरो कार्ड रीडर। सब का एक ही जवाब था,  बहुत खूब और क्या सटीक भूत और भविष्य बता रही है। तुम सबको जाना चाहिए। लाइफ टाइम एक्सपीरियंस है।

सबकी बाते सुन हमारा भी मन करने लगा अपना भविष्य जानने के लिए, साथ मे प्रियंका और रितिका का भी मन करने लगा, अपना भी भविष्य जानने का, हम तीनों कार्ड रीडर के स्टॉल पर पहुचे और अपना नाम भी रजिस्टर करा दिया।
हम वही खड़े, अपनी बारी का इंतज़ार कर रहे थे। जो भी अपना भविष्य जानकर बाहर आता। उसका चेहरा कुछ खास चमक लिए रहता।  हमारी जिग्ज्ञासा बढ़ती ही जा रही थी और अंदर से धुक धुक भी कर रहा था कि हम क्या क्या पूछेंगे।

हम तीनों ने वर्चुअल लिस्ट बनाई की हम क्या क्या पूछ सकते है, की जब भी हम उस टैरो कार्ड रीडर के पास जाए, तो सारे जरूरी सवाल छूट न जाये। फिलहाल हम तैयार थे अंदर जाने के लिए।

जैसे जैसे हमसे पहले नंबर वाले लोग निकल रहे थे और अपना एक्सपीरियंस शेयर कर रहे थे, हमारी धुक धुक बढ़ती जा रही थी, काफी इंतज़ार के बाद मेरा नंबर आया। मैं जैसे ही अंदर जाने को तैयार हुआ, कि कोई और अंदर चला गया। खैर मेरा नंबर आ ही गया। दोस्तो से आल द बेस्ट ले हम अंदर गए।

अंदर का नज़ारा ही कुछ अलग सा था, कमरा लाल रौशनी से जगमगा रहा था, और मध्यम गति से संगीत बज रहा था। सामने देखता हूँ एक महिला जादूगरनी की वेशभूषा में सामने बैठी हुई थी। उनके सामने काले कपड़े के ऊपर कुछ टैरो कार्ड्स रखे हुए थे और बगल में चमकता हुआ ग्लोब जैसा कुछ रखा हुआ था, जिसमे से सफेद रौशनी निकल रही थी।

टैरो कार्ड रीडर ने उनके सामने रखी कुर्सी पर हमसे बैठने का आग्रह किया, नज़ारा इतना विस्मय था,  लग रहा था कि हम किसी दूसरे लोक में आ गए हो। हम उनके सामने बैठे, हम उस वातावरण में सहज महसूस करते, उससे पहले मोहतरमा ने मुझसे मेरा नाम पूछा।

टैरो कार्ड रीडर:आपका नाम क्या है?
मैं: राहुल, मेरा नाम राहुल है।

टैरो कार्ड रीडर: आप क्या जानना चाहते है अपने बारे में?
मैं: मैं अपनी समस्याओं का समाधान और अपने भविष्य जानना चाहूंगा एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर के रूप में।

टैरो कार्ड रीडर: ठीक है,  तो आप सामने रखे कार्ड्स में कोई एक कार्ड सेलेक्ट कर , मुझे दीजिए।
मैं: मैंने एक कार्ड सेलेक्ट कर उन्हें दे दिया।

कार्ड देख टैरो कार्ड रीडर थोड़ा मुस्कुराई, उन्हें मुस्कुराता देख मुझे लगा, शायद मेरा भविष्य उज्ज्वल है। फिर टैरो कार्ड रीडर ने अपना हाथ उस ग्लोब पर रख, अपनी आंखें बंद की,  उस ग्लोब की रौशनी उनके चेहरे पर ऐसे पड़ रही थी, जैसे हम अक्सर जादूगर वाली मूवीज़ में देखते है, शायद वो ध्यान मुद्रा में चली गयी थी।

एक पल ध्यान में रहने के बाद वो बोली, राहुल मैं तुम्हारे लिए कुछ देख पा रही हूँ। मेरे मन में सब जान लेने की इच्छा हुई, जो कुछ भी उन्होंने देखा था अपने ध्यान में, फिर उन्होंने बोला, आप मेरा हाथ पकड़िये , मैं कुछ और भी महसूस करना चाहती हूं, आपके बारे में, पर मुझे तो उनका हाथ ही दिखाई नही दे रहा था, जो मैं पकड़ लेता। मैंने पूछा आपके हाथ है कहाँ? जो मैं पकड़ लूं। फिर उन्होंने बोला,  मेज़ के ऊपर जिसपर कार्ड रखे है उसके नीचे जगह है, आप वही अपना हाथ डालिये, मैने अपना हाथ डाला और वही एक सिरकते हुए हाथ ने मेरा हाथ थाम लिया।

फिर उन्होंने मुझे आँख बंद कर अपने विज़न के बारे में सोंचने के लिए बोला, मैंने आंखे बंद की और अपना विज़न तलाशने लगा, अपनी बंद आँखों से। कही विज़न तलाशते हुए मैं कभी लखनऊ में अपने घर पहुंचा,  तो कभी यही नोएडा में ही रहा , एक बार तो मैं अमेरिका तक जा पहुँच गया।
साथ ही टैरो कार्ड रीडर ने मेरा हाथ कस कर पकड़ा हुआ था। मेरा ध्यान एक जगह केंद्रित होता उससे पहले मेरे कंधे पर ठप ठप सी महसूस हुई जैसे कोई मुझे गहरे ध्यान से जगाना चाह रहा हो।

मैंने आँख खोली, तो सामने वाली कुर्सी पर कोई था ही नही पर किसी ने मेरा हाथ अभी भी थाम रखा था, मेरा मन चकित था कि ये क्या है ? ये कैसा चमत्कार है? तब मेरे कानों में एक आवाज़ आई राहुल ... राहुल और जब मैंने अपने बाई तरफ देखा, तो वो टैरो कार्ड रीडर अपने हाथ में एक स्माइली लिए खड़ी थी और बोली... राहुल ये एक प्रैंक था। पहले तो मुझे समझ नही आया कि ये क्या हो रहा है...  तभी एक बच्ची मेज़ के नीचे से निकली जिसने मेरा हाथ पकड़ रखा था।

प्रैंक समझने में मुझे ज़्यादा समय नही लगा। मैं मुस्कुराते हुए बाहर निकला और सोंचने लगा कि ये सच है, शायद आपको आपकी समस्याओ और विज़न के लिए खुद ही परिश्रम करना होता है इसमें कोई भी आपकी मदद नही कर सकता।

Wednesday, October 11, 2017

पत्नी का जन्मदिन

मेरी हृदय-कनिका,
आज तुम्हारा जन्मदिन है, मैं तुम्हारे बारे में क्या लिखूं कुछ शब्द ही नही मिल रहे है, तुम मेरी प्राणेश्वरी हो , तुम ही मेरी हृदयेश्वरी हो,  तुम्हे ईश्वर सुख समृद्धि और अच्छा स्वास्थ्य प्रदान करे और तुम यूँ ही चिरायु हो मेरे जीवन को फूलो की तरह महकती रहो।
तुम्हे जन्मदिन की खूब ढेर सारी बधाई।
तुम्हारा हृदयांश
राहुल शर्मा

Thursday, September 14, 2017

हिंदी दिवस

आज हिंदी दिवस है इस अवसर पर मैं अपने जीवन मे हिंदी के महत्व पर कुछ शब्द लिखना चाहता हूं। मेरा जन्म ऐसे परिवार में हुआ जहाँ हिंदी और अवधी का बोल बाला था। अंग्रजी सिर्फ मेरे पिता जी को आती थी, वो भी इतनी की सरकारी काम आसानी से निपट जाए।

आस पास का वातावरण भी जय हिंद और जय हिंदी का ही था। पूरी कॉलोनी में शायद ही कोई अखबार अंग्रजी का आता हो। हम भी हिंदी माध्यम से पढ़ रहे थे। अंग्रेजी पढाने के लिए तो बहुत लोग थे वहां,  पर हमे यह कभी समझ नही आई।

हिंदी में अच्छे नंबर ही आते थे और अंग्रेजी में अक्सर लाल निशान वाले ही अंक मिले। जैसे तैसे,  हम बिना अंग्रेजी में पारंगत हुए ही, हमने दसवी और बारहवीं की इम्तेहान पास किये। दोनों में ही हिंदी में अच्छे अंक रहे पर अंग्रेजी में अंक बस उत्तीर्ण होने जितने ही थे।

जीवन मे एक महत्त्वपूर्ण बदलाव स्नातक में आया जहां हिंदी का नामोनिशान ही नही था। हर विषय का सिर्फ अंग्रेजी में प्रारम्भ और अंग्रेजी में ही अंत होता था। कक्षा के पहले दिन ही जब सब अपना परिचय अंग्रेजी में दे रहे थे,  तो मुझे घबराहट सी होने लगी कि, मैं अपना परिचय कैसे हिंदी में दूं। एक गहरी सांस लेने के बाद मैंने अपना परिचय हिंदी में ही दिया , पता नही क्यों मेरे मन मे हीन भावना घऱ करने लगी थी।

कक्षा के सारे बच्चे जब अघ्यापक के सारे प्रश्नों का जवाब अंग्रेजी में दे रहे थे, तब जवाब आने के बाद भी, जवाब नही दे पाना एक सामान्य से घटना हो गयी थी। अब सारी कॉपी और किताब अंग्रेजी में ही थी। अंग्रेजी की स्पेलिंग की तो चर्चा क्या करना । इसपर मेरे साथियो ने मेरी काफी मदद की।

पहले सेमिस्टर में अंग्रेजी का एक अलग विषय था, जिसे पढ़ाने के लिए जिस अध्यापिका को नियुक्त किया था, उनकी अंग्रेजी मेरे सर के ऊपर से जाती थी। इम्तेहान हुआ और जब रिजल्ट आया,  तो मैंने देखा, कुछ चुनिंदा लोगो मे मेरा नाम था, जो अंग्रजी एवं अन्य विषय मे पास थे। मेरी खुशी का तो कोई ठिकाना ही नही था।

धीरे धीरे दोस्तो के मदद मेरे अंदर का अंग्रेजी का भूत भाग और स्नातक  एवं परास्नातक,  दोनों अच्छे नम्बरों से पास हुआ, पर अभी भी हाल बहुत अच्छे नही थे अंग्रेजी में मेरे,  पर हिंदी तो थी ही नही कही की उसका दामन पकड़ मैं अपनी नैया पार लगा लूं।

अब हर काम अंग्रेजी में ही करने थे, इंटरव्यू हो या अपना सी.वी हो सब अंग्रेजी में। जैसे तैसे नौकरी का इंटरव्यू हिंग्रेजी में निकला।

आज जब मैं एक सॉफ्टवेर कंपनी में काम कर रहा हूँ, और एक सॉफ्टवेर इंजीनियर हूँ, यहां भी मेरे के.आर.ए में कम्युनिकेशन पर जोर देने की बात लिखी जाती है। अंग्रेजी सुधारने में भी यहां मेरे दोस्त काफी मदद करते है, मैं निरंतर प्रयासरत हूँ कि एक दिन अंग्रेजी पर विजय प्राप्त कर लूं।

हिंदी जो कि जीवन रेखा है, मैं इसका प्रयोग अपने दिल की बात कहने में करता हूँ। मेरा फेसबुक पर एक पेज है और एक ब्लॉग भी है जिसपर मैं हिंदी में खूब लिखता हूँ।