Tuesday, August 9, 2022

“जो कभी कहानियाँ सुनाया करती थी , आज स्वयं एक कहानी है”, माँ


“जो कभी कहानियाँ सुनाया करती थी , आज स्वयं एक कहानी है”,  माँ 

माँ , आज तुम्हे गए,  एक बरस हो गए है, माँ के बिना कैसे जिया जाता है, अब हमने सीख लिया है।   तुम्हारे बिना, बदला तो कुछ खास नहीं है, समय अपनी ही गति से चल रहा है।  लोग सच ही कहते है कि जब तक कोई जीवित रहता है तबतक उसकी कीमत नहीं होती है और जब वो चला जाता है, तब पता लगता है कि उसका होना कितना महत्वपूर्ण था।  

तुम हथेली की पांचो उंगलियों को बांध कर रखने वाली वो शक्ति थी जिससे मुट्ठी बंधती थी।  बस आज वो मुट्ठी खुल गयी है ।
  बंद मुट्ठी लाख की खुल गयी तो ख़ाक की।  चरितार्थ हो रहा है।  लाल

सारी उंगलिया तुम्हारे जाने के बाद कट गयी। अब चाह कर भी कोई वापस जोड़ नहीं सकता।  जिस घर में तुम्हारी आवाज़ चिड़ियों की तरह चहचहाती थी, आज उसी घर मे अजीब सा सन्नाटा बसता है। 

घर कैसे बनता है, हमने तुमसे ही सीखा। तिनका तिनका जोड़ कर हमारे लिए तुमने एक घर बनाया, संस्कार दिए, जो आज हमारे काम आ रहे है। तुम हमारे साथ नही हो पर, साथ हो हमारे। 

मै आज भी सुबह सवेरे उठते ही माँ बुलाता हूँ, पहले लगता था कि आवाज़ माँ तक पहुंच रही होगी पर आज माँ एक शब्द है।  माँ पुकारने पर अब "बेटा" जैसी कोई  आवाज़ वापस नहीं आती है, वापस आता है वो भी एक “सन्नाटा”. 

ईश्वर की कृपा रही मुझपर कि  मैं अंत समय में तुम्हारे पास ही रहा।  नोयडा में नौकरी करते हुए मैं कभी सोंच भी नहीं सकता  था कि तुम्हारे पास इतना समय बिता पाउँगा और तुम्हारी सेवा भी कर पाऊंगा। धन्यवाद, ईश्वर का जिसने मुझे मौका दिया, अंत समय में तुम्हे बाहों में भर लेने का। 

सच है कि माँ के पास जाओ तो वह पूछती है कि खाना खाया की नही, बस माँ ही यह पूछती है बाकी कोई नही। 

माँ तुम्हारी बहू, तुम्हारा सिखाया बनाती तो सबकुछ है पर
माँ तेरे बिना अब वो भूख भी नही लगती। 




Tuesday, January 21, 2020

सच बोलना आता है मुझे- आदि

अपने साले की सगाई निपटा, मै रेलगाड़ी से दिल्ली कें लिए रवाना हुआ। लखनऊ पहुंचने वाला था और आप पास बैठे सहयात्रियों से बात हो रही थी। तभी स्वाति ने पूछा हम कितने बजे गाजियाबाद पहुंचेंगे। मैंने कहा अगर सब ठीक ठाक रहा और ट्रेन लेट ना हुई तो, हम सुबह  ३:३० तक गाजियाबाद पहुंच जाएंगे। 
तभी स्वाति ने बोला अगर हम टाइम से पहुंच गए तो आदि को स्कूल भेज देंगे। आदि जो कि सीट पर ऊपर नीचे कर रहा था आया और बोला कि कल शायद मै थक जाऊंगा और स्कूल नहीं जा पाऊंगा। मै स्कूल फिर कभी और चला जाऊंगा।

पहले भी जब कभी भी आदि का स्कूल जाने का मन नहीं करता था तो बोलता है कि मुझे बुखार आ सकता है या मेरा पेट दर्द कर रहा है। पूछने पर कि क्या तुम्हारा पेट दर्द कर रहा है तो बोलता है कि नहीं, अभी नहीं पर स्कूल में कर सकता है। 

इसी चर्चा में हमने बोला की आदि को सच और झूठ का मतलब भी नहीं पता है अभी। बच्चे सिर्फ बहाने बनाते है । सच या झूठ नहीं बोल पाते। तभी आदि बोलने लगा कि मै बहाने नहीं बनाता हूं और मै सच बोल लेता हूं। 

स्वाति के पास आ कर आदि ने बोला कि मै "सच" बोल लेता हूं।    तभी स्वाति ने बोला, सच क्या होता है जानते भी हो। ज़रा बोल कर दिखाओ। आदि बोला  सच सच सच.. बताओ कितनी बार बोलूं सच। आप भी बोलो १०० बार सच। तभी स्वाति भी सच का जाप करने लगी। १० बार ही हुए थे कि आदि बोलने लगा बस हो गया १०० बार। 

Saturday, January 18, 2020

प्याज़ का अर्क


जहां बाजार में प्याज ₹120 किलो बिक रहा है, लोग आजकल प्याज चूम कर काम चला रहे हैं और मेरी पत्नी प्याज का रस निकाल रही थी। मुझे क्या पता था,  खून पसीने की कमाई से खरीदे हुए प्याज का  प्रयोग मेरी पत्नी बालो की सुंदरता बढ़ाने के लिए करती है।

Friday, January 17, 2020

सवाल ए बेगम

मुहल्ले की एक पुलिया पर हम यारो के साथ तफरी काट रहे थे। हम सबका पसंदीदा विषय पत्नी पुराण चल रहा था। सभी अपनी  अपनी पत्नी के किस्से सुना रहे थे। वीकेंड का दिन था तो तफरी का मज़ा ही कुछ और था। वक्त सभी के पास था, ठहाके ज़ोर ज़ोर से लग रहे थे। सब बाते तो अपनी अपनी पत्नी की कर रहे थे पर सभी को यही लग रहा था कि उनकी ही पत्नी की बात हो रही हो। 

कोई शॉपिंग की लिस्ट से परेशान था,  तो कोई गिफ्ट से। किसी की शादी की सालगिरह आने वाली थी, तो किसी की बीत गई थी। किसी के वीकेंड का दर्द था तो किसी को ससुराल का। कोई तो पत्नी की नाराज़गी का कारण  ढूंढ़ रहा था तो कोई हल। 

मज़े की बात तो यह थी कि समस्याएं तो सबके पास थी पर हल किसी के पास नहीं था। सब एक दूसरे के दर्द पर दर्दे डिस्को कर रहे थे। 

तभी एक महोदय, ठहाको की आवाज़ सुन हमारी तरफ खींचे चले आए और हमारी मंडली में घुस गए। महोदय बस बातो का मज़ा ले रहे थे। किसी ने उनसे हाल चाल पूछा । हाल चाल ठीक बता, बस बाते पीने लगे। चर्चा जब अपने चरम पर थी और तभी किसी ने महोदय से पूछा कि भाई साहब आप भी भाभी जी के हाल चाल सुनाइए। कैसी है भाभी जी? भाभी जी का स्वास्थ्य ठीक तो है ना? आज कल आप को भी कपड़े और बर्तन तो नहीं धुलने पड़ रहे है घर में! 

महोदय जी को ये बात कुछ जमी नहीं। गंभीर मुद्रा में आ गए। दोबारा पूछने पर झट से प्रश्नों के बान चलाने लगे और बोले..

क्यों जानना चाहते हो मेरी पत्नी के बारे में?
जान कर क्या करोगे?
मेरी पत्नी में इतना इंट्रेस्ट क्यों ले रहे हो?
क्या तुम मेरी पत्नी को जानते हो? जो उसके हाल पूंछ रहे हो। 

महोदय की भाव भंगिमा देख सबके ठहाके थम गए। सन्नाटा पसर गया। महोदय के इन प्रश्नों का जवाब देने से तफ़री का मज़ा किरकिरा हो जाता।  तभी हमने बोला । 

माफ़ कर दीजिए भाई साहब!
हमने गलती की, कि आपसे भाभी का हाल पूछा। 
अगली बार हाल हम स्वयं पूछ लेंगे। आप जाईए। 

उनको दरकिनार कर हम फिर से गप्पो में व्यस्त हो गए। 

Thursday, January 9, 2020

दूध के दांत


2020 की पहली शाम थी, हम अपने दोस्तो के साथ घर पर ही नए वर्ष के पहले दिन का आनंद ले रहे थे। दोस्तो के साथ हम गप्पे मार ही रहे थे कि, तभी आदि, स्वाति के पास आया और बोला  मां, मेरा एक दांत हिल रहा है। 

स्वाति आश्चर्य में थी कि इतनी जल्दी आदि के दांत कैसे हिलने लगे। स्वाति ने आदि के दांतो पर हाथ लगा कर देखा और पाया की आदि के दांत सच में हिल रहे थे।   स्वाति ने मुझे बुलाया और बोला कि आदि के दांत गिरने वाले है। हमने आदि को समझाया कि बेटा कुछ दिनों में यह दांत गिर जाएगा और वहीं फिर से नया दात निकल आयेगा जो फिर नहीं टूटेगा। 

आदि अपनी हिलते हुए दांतो की समस्या भूल कर बच्चो के साथ खेलने में व्यस्त हो गया। घर बच्चो की चहचहाहट से भरा हुआ था। बच्चे आपस में खेल ही रहे की, आदि फिर से दौड़ता हुआ स्वाति के पास आया और बोला कि मां मुंह से खून निकल रहा है और मेरा दांत टूट गया है। आदि रोते रोते हुए बोला, की विवेक चाचू की जैकेट की वजह से मेरा दांत टूट गया है। 

विवेक भी समझ नहीं पा रहा था कि उसकी जैकेट की वजह से कैसे आदि का दांत टूट गया। खून की बात सुन हम सब भी आदि के पास पहुंचे, तो पाया कि आदि का मुंह खून से भरा हुआ था और उसका एक दांत गायब था। स्वाति भी भावुक हो बोलने लगी कि मेरा बेटा बड़ा हो रहा है।  उधर आदि का रोना बंद ही नहीं हो रहा था। कुल्ला कराया गया। मुंह तो साफ हो गया और खून का रिसाव भी कम हो गया था। स्वाति के बार बार समझाने और मेरे मित्र संदीप की बेटी के टूटे हुए दांत दिखाने के बाद आदि भी शांत हो गया। जब वह शांत हुआ तो हमने पूछा कि तुम्हारा टूटा हुआ दांत कहां है तो आदि बोला कि विवेक चाचू के पास होगा। विवेक भी हक्का बक्का कुछ समझ नहीं रहा था कि माजरा क्या है। 

दांत की ढूढाई शुरू की गई। ढूंढने पर दांत विवेक जहां बैठा था, उस कुर्सी के नीचे मिला। माजरा समझ में नहीं आ रहा था कि आदि के दांत और विवेक के बीच क्या संबंध है। आदि से जब पूछताछ की गई तो पता लगा कि आदि ने खेल-खेल में विवेक को काटने कि कोशिश की थी। जैकेट मोटी थी इसलिए विवेक को पता नहीं लगा। जैकेट की  पॉकेट की ज़िप में उसका दांत फस गया और खींचा तानी में दांत टूट गया। 

थोड़ा और तफ्तीश करने के बाद पता लगा कि, यह वह  दांत नहीं था जो हिल रहा था। यह उस हिलते हुए दांत के बगल वाला दांत था। 

माजरा खत्म होने के बाद हम सब दोस्त आपस में गप्पे मारने में व्यस्त हो गए, नए साल के पहला दिन क्या खाया जाए इसका प्लान बना रहे थे कि आदि, स्वाति के पास आया और बोला कि मां प्लीज मेरे मुंह में पट्टी बांध दो। इतना सुन हम सब हंस दिए। स्वाति ने आदि को समझाया कि बेटा मुंह में पट्टी नहीं बांधी जाती, इसे ऐसे ही छोड़ दो अपने आप ही सही हो जाएगा। 

आदि को समझाने के बाद, हम अपना खाने का  प्लान बनाने में व्यस्त हो गए । खाना लेने के लिए जैसे ही हम बाहर जाने लगे तो देखा कि बाहर के कमरे में, हीरो के बगल में फर्स्ट एड का बॉक्स  पड़ा हुआ था। पट्टी, बैंडेज और खून के निशान लगी कुछ रूई के टुकड़े पड़े हुए थे।  हमने सबको बुलाया, सभी आदि के देख कर ठहाके मार कर हसने लगे और हम अंदाज़ा लगाने लगे कि कैसे आदि ने कैसे अपने मुंह में पट्टी बांधने का प्रयास किया होगा और  जब वह ना बंधी होगी तो उसने कैसे बैंडेज लगाने की कोशिश की होगी।  आदि का चेहरा टूटे हुए दांत के साथ अजीब सा लग रहा था।

 मेरे यह लिखने  तक आदि का एक और दांत गिर चुका है। अबकी बार खून नहीं निकला सिर्फ दांत टूटा है।

Tuesday, October 29, 2019

ट्रेन का स्वच्छ भारत अभियान

दीपावली का समय था।  लखनऊ जाने की आपा धापी में, मुझे बड़ी मुश्किल से एक ट्रेन में रिजरवेशन मिला, जिसे सब डबल डेकर के नाम से जानते है।  परिवार के साथ डबल डेकर से मेरा यह पहला सफर था।  सफर कब अंग्रेज़ी का सफर बन गया हमें पता ही नहीं लगा।  ८ घंटे का सफर हमने १५ घंटे में तय किया।  मै अपने इस लेख में, ट्रेन के सफर के बात नहीं, हमारे प्रधान मंत्री द्वारा चलाए गए स्वच्छता अभियान की चर्चा करना चाहता हूं । त्यौहार के समय में ट्रेन खचाखच भरी हुई थी।  


सफर लंबा था इसलिए,  अपने साथ सफरी खाना भी ले कर गए थे।  ट्रेन चलने के बस थोड़ी ही देर के बाद हमने खाना, खाना शरू किया।  खाना खाने के बाद, जो भी कचरा बचा हमने उसे एक जगह इकठ्ठा किया और ट्रेन के डिब्बे में बने कूड़ेदान में डाल दिया।  बाकि यात्री भी या तो कूड़ा, कूड़ेदान में डाल रहे थे या तो अपना कूड़ा एक रेलवे कर्मचारी द्वारा लायी गयी थैली में डाल रहे थे।  सब यही सोंच रहे थे की हम  प्रधान मंत्री द्वारा चलाये गए स्वच्छ भारत अभियान नामक यज्ञ का हिस्सा है।  

ट्रेन धीरे धीरे अपनी मंज़िल की तरफ बढ़ रही थी। कभी वह रुक जाती तो कभी वह तेज रफ्तार में हवा से बातें करने लगती। सफर का आनंद लेते हुए जैसे ही मै हाथ धुलने के लिए, वॉशबेसिन की तरफ बढ़ा। तो देखता क्या हूँ,  एक होनहार रेलवे कर्मचारी, बड़ी शान से, हमारे द्वारा इकठ्ठा किया हुआ कूड़ा, चलती ट्रेन से बहार फेक रहा था।
मैं आश्चर्य चकित था की वह कर्मचारी ऐसा कैसे कर सकता है? क्या उसे कूड़ा प्रबंधन नहीं सिखाया गया है? की कूड़ा कहां और कैसे इकठ्ठा करना है। मैंने उस कर्मचारी को टोकते हुए बोला की, भाई यह तुम क्या कर रहे हो? ट्रेन से बाहर ही फेकना था कूड़ा तो हम ही फेक लेते। तुम्हें क्यों कष्ट देते? अगर तुमने यह कूड़ा ट्रेन से बहार फेका,  तो, मैं तुम्हारी शिकायत उच्च अधिकारी से  कर दूंगा।  तभी डरा सहमा वह कर्मचारी , कूड़ा वही बिखरा हुआ छोड़, वहां से जाने लगा।  जब मैंने उसे दोबारा बुलाया,  तब उसने अपनी जेब से एक थैला निकाला और बिखरा हुआ कूड़ा बटोरा और दो डिब्बों के बीच की जगह में छोड़, वहाँ से चला गया।  

जब मै थोड़ी देर बाद दोबारा उस जगह पर गया,  तो मैंने देखा कि , उस जगह पर न तो वह कर्मचारी था और न ही कूड़ा।  मै उम्मीद करता हूं कि वह कूड़ा ट्रेन की पटरी पर ना फेका गया हो।

Wednesday, October 2, 2019

रमई काका और बहिरे बाबा

मैं आजकल हिमांशु वाजपेई की किताब किस्सा किस्सा लखनउवा पढ़ रहा हूं।  इसी किताब में रमई काका और बहिरे बाबा का किस्सा भी है । उनका ज़िक्र आते ही, बचपन की याद आ गई। बचपने में मां द्वारा गोहराए जाने पर,  उन्हें ना सुन पाने की इस्थिती में , वो अक्सर मुझे बहीरे बाबा कह कर बुलाती थी। रमई काका नाम इस इस्तेमाल हम अक्सर अपने काका को चिढ़ाने में करते थे। आज समझ में आया कि रमई काका और बहीरे बाबा का नाम कहां से आया।