Sunday, August 11, 2019

किस्सागोई- सफेद चादर

यह किस्सा मेरे कॉलेज के दिनों का है,  मै अपने कॉलेज से बस चंद मिनटों की दूरी पर अपने मित्र के साथ रहा करता था। मै कॉलेज में अपनी बेफिक्री के लिए मशहूर था, जगजीत सिंह की गज़ले कंप्यूटर पर लगा, घंटो गुनगुनाता रहता था। मेरा रूम मेट, वह बहुत ही व्यवस्थित तरीके से रहता था। उसका हर सामान सही समय पर,  सही जगह ही रहता था और मेरा हर सामान बिस्तर पर ही। वह हर वक्त मुझे सलीके से रहने के लिए बोलता था और मै  अपनी ही धुन में।  उसे सफ़ेद रंग बहुत पसंद था , उसकी हर चीज़ सफ़ेद थी।  चादर, तकिया और रज़ाई  का लिहाफ सब कुछ सफ़ेद , वह ज़्यादातर कपडे भी सफ़ेद ही पहनता था। जबकि मेरे पसंदीदा रंग के बस कुछ कपडे ही थे, वो भी गहरे रंग के थे।  हमारी तकिया, बिस्तर और रज़ाई के लिहाफ, सब गहरे रंग के होते थे , वह भी इसलिए की मुझे बार बार उन्हें धुलना न पड़े। 

मै जब भी अपने घर जाता तो माँ, उसे ठीक से धुल देती थी ,जबकि मेरा मित्र हर दूसरे -तीसरे दिन अपनी चादर और तकिया धुला करता था।  सफाई की इतनी धुन थी उसे की पूछो मत।  मुझे वह हर हफ्ते, बार-बार यही कहता था की भाई चादर तकिया गंदे हो गए होंगे, तुम धुल लो, पर मेरे कानो पर ज़ू तक नहीं रंगति थी।  एक बार की बात है जब उसके लाख कहने पर मैंने बिछाने वाली चादरे भिगो दी, धुलने के लिए।  एक दिन भीगी रही वो चादरे, तभी मेरा रूममेट आया और बोला भाई तुम धुल ले, नहीं तो चादर ख़राब हो जाएगी, पर मुझे लगा की कुछ दिन और भीगी रहेगी तो थोड़ा और साफ़ हो जाएगी। आलस्य चरम पर था, कब दो दिन से सात दिन हो गए पता ही नहीं लगा।  रूम मेट ने एक दिन मुझे पकड़ लिया और बोला भाई जिस बाल्टी में तुमने चादरों को भिगोया था,  उससे बदबू आ रही थी,  इसलिए मैंने उसे  उठाकर बहार खुली जगह में रख दिया है।  जब भी वक्त मिले तो धुल लेना।  मैं जैसे ही बहार गया और देखा,  की चादरों का तो बुरा हाल हो गया था। बदबू इतनी थी की बर्दास्त नहीं हो रही थी।  किसी तरह मैंने उसका पानी फेका और अपने पैरो का प्रयोग करके धुल डाला ।  चादर फैलाते समय , मै देखता क्या हूँ की दोनों चादरों का असली रंग तो जा चूका था।  दोनों पर तीसरा ही रंग चढ़ गया था।  चादरों को जब मेरे रूम मेट ने देखा तो वह दंग रह गया।  उस दिन के बाद उसने मुझे कभी भी चादरों को धुलने की सलाह नहीं दी।

इतने बरस बीत जाने के बाद , मेरे मित्र ने उस चादर की घटना को विस्तार पूर्वक मेरी पत्नी को बताई।  पूरी कहानी सुनाने के बाद, मेरी पत्नी के चेहरे की भावभंगिमा मुझे समझ में नहीं आ रहा है। उस घटना पर वो गर्व करे या शर्म।

Saturday, July 20, 2019

शीला दीक्षित नहीं रहीं

अभी ज्यादा दिन नहीं हुए है, शीला के खिलाफ मोर्चा निकालते हुए कुछ लोग यह कह रहे थे की अराजकता का माहौल है। शीला हटाओ देश बचाओ और निर्भया कांड का सारा दोष शीला के सर पर उड़ेला गया।  कॉमनवेल्थ गेम का सारा घोटाला शीला के नाम रहा। 15 साल मुख्यमंत्री की तरह गुजारने के बाद, अरविंद केजरीवाल मुख्यमंत्री बने एक नहीं वह भी दो बार । आज जब वह हमारे बीच नहीं हैं तो देखता क्या हूं,  आम आदमी पार्टी के अरविंद केजरीवाल हो या कुमार विश्वास,  शीला दीक्षित की खूब प्रशंसा कर रहे हैं और बोल रहे हैं कि वह बहुत ही शांत एवं सरल स्वभाव की थी।  उन्होंने दिल्ली के विकास के लिए, बिना किसी भेदभाव के काम किया । आज जो कुछ भी हम विकास देख रहे हैं, दिल्ली का, शीला दीक्षित की हैं देन है। प्रदेश में 2 दिन का राजकीय शोक घोषित किया गया है।

मुझे यह समझ नहीं आता की मृत्यु के बाद क्या सभी मित्र हो जाते हैं और जब तक वह जीवित रहे तब तक वह शत्रु रहता है।

Saturday, July 6, 2019

चकाचौंध बेरोज़गारी

मैं काफी दिनों के बाद, अपने गृह नगर लखनऊ आया हूँ, तो मैंने सोंचा अपने मुहल्ले की सैर पर जाऊं और देखूं की वो कितना बदल गया है सो घर से निकल लिया, एक गली से दूसरी गली, फिर तीसरी गली घूमता ही रहा। जिस गली में भी मैं गया,  तो देखता क्या हूँ कि लगभग हर दूसरे घर में दुकान खुली है। कोई किराने की है, तो कोई नमकीन की, कोई रेस्टोरेंट खोल कर बैठा है, तो कोई बेकरी की दुकान चला रहा है।  अपने अपने माता पिता के रिटायरमेंट के पैसे के हिसाब से दुकानों में चकाचौंध नज़र आ रही थी।

जिनके बेटे पढ़ लिख गए तो वो घर से चले गए, दूर कही विदेश में अपना जीवन काट रहे है।  मैं भी उनमें से एक हूँ। जो बेटा थोड़ा कम पढ़ा लिखा था, बुढ़ापे की लाठी बन, घर के नीचे दुकान खोल अपनी जीविका चला रहा है और वह हर वक्त माँ बाप की सेवा के लिए तत्पर रहता है।

दुकाने इतनी ज्यादा है कि कोई भी चल ही नही रही है। दिन भर दुकान में बैठे बैठे हताशा महसूस होने लगती है पर कोई ग्राहक नज़र आ जाये तो गनीमत है। बेटा निराश होकर कही घर से चला न जाये इसलिए माता पिता अपनी पेंशन का एक हिस्सा अपने बेटे की जरूरतें पूरी करने में व्यय कर रहे है।

मैं अपने परिवार के साथ एक मॉल घूमने गया तो देखता क्या हूँ कि मॉल में बस कुछ ही लोग थे। शनिवार का दिन होने के बाद भी कोई हलचल नही थी। नोएडा जैसे शहर में शनिवार और रविवार को तो मॉल में पाव रखने की ज़मीन नही होती है और यहां पर तो सन्नाटा पसरा हुआ था। इक्का दुक्का दुकानों पर लोग नज़र आ रहे थे पर उनमें से भी ज़्यादातर लोग विंडो शॉपिंग वाले थे। इतनी महँगी महँगी दुकाने ले कर महँगा महँगा समान डालकर दुकाने चला रहे है पर चल नही रही है। यहाँ के यूथ के पास इतना पैसा ही नही है कि वो मॉल में जाये और कुछ खरीदारी करे।

स्टार्टअप ने नाम पर सबके माँ बाप ने दुकाने खुलवा दी है अपने बुढ़ापे का सहारा बनाने के लिए। देखता हूँ कब तक मोदी का स्टार्टअप इंडिया काम करता है। उम्मीद करता हूँ कि भविष्य सुनहरा हो न सिर्फ हमारा बल्कि देश का भी।

Thursday, March 14, 2019

विलेज ऑफ कॉक्स

दूर किसी गांव में कुछ मुर्गे और मुर्गियां रहा करती थी। गांव के सारे जानवरो से उनकी खूब गहरी दोस्ती थी। जब भी मुर्गियां, अपने चूज़ों के साथ, गली से निकलती तो हर कोई उन्हें देखकर बहुत नाज़ करते थे। सारे चूज़े अपनी माँ को बिना परेशान किये एक ही लाइन में चला करते थे और जब चूज़ों के पापा उनके साथ जाते तो वो बिना खिलौने लिए घर वापस नही आते थे। किसी को गुड़िया पसंद आती, तो किसी को गुड्डा।

एक दिन की बात है जब गांव की कुछ मुर्गो ने बताया कि पड़ोस के गांव में एक लोमड़ी आयी है जो बच्चो को उठा ले जाती है और उन्हें खा जाती है।

गांव के सारे जानवरो ने फैसला किया कि अब वो अपने बच्चो को बाहर खेलने नही भेजेंगे। बच्चे घर के आंगन में ही खेलेंगे और रात में सारे मुर्गे पहरा देंगे। दिन यूं ही बीत रहे थे। बच्चो ने बाहर जाना बंद कर दिया, वो घर मे ही आपस मे खेलते थे।

काफी दिन बीत जाने के बाद जब लोमड़ी गांव में नही आई तो बच्चो ने धीरे धीरे घर से बाहर खेलना शुरू किया। चूज़ों के पापा ने भी रात में पहरा देना कम कर दिया।

ऐसे ही किसी रोज़, लोमड़ी ने गांव में दबे पांव प्रवेश किया और देखा कि गांव के सारे मुर्गे सो रहे है । उसने सोंचा कि अच्छा मौका है किसी एक घर मे धावा बोल कर सबको खा लिया जाए।

लोमड़ी ने अक्कड़ बक्कड़ बोलकर एक घर को चुना। और उनके आंगन में कूद गई। मुर्गे अपने परिवार से साथ आंगन में ही सो रहे थे, उनकी आंख खुल गयी और देखा लोमड़ी उनके बच्चो पर झपट्टा मारने के लिए तैयार थी। तभी मुर्गे ने लोमड़ी को सावधान किया और बोला कि वो वहां से चली जाए, पर लोमड़ी कहाँ पीछे हटने वाली थी तभी मुर्गे के बांग लगाई और गांव से सारे मुर्गे एक आवाज़ साथ आ खड़े हुए।

तभी एक मुर्गे ने लोमड़ी पर आक्रमण कर दिया। लोमड़ी ताकतवर थी उसके एक ही वार ने मुर्गे को अधमरा कर दिया। सारे मुर्गे उसकी ताकत को देख घबरा गए और फिर कुछ और मुर्गो ने कोशिश की पर वो भी उससे हार कर अधमरे से हो गए।

मुर्गो ने आपस मे बात की कि ऐसे लड़ेंगे तो एक एक कर हम सब मारे जाएंगे, हम सब एक साथ लोमड़ी पर आक्रमण करते है, फिर जो भी होगा देखा जाएगा। सभी लोमड़ी की तरफ बढ़े किसी ने उसके मुंह पर चोंच मारे तो किसी ने उसके आँख पर, भीषण युद्ध चला मुर्गे घायल हो किनारे हटाते गए पर हार नही मानी। मुर्गिया भी पीछे नही रही उन्होंने भी युद्ध मे भाग लिया। लोमड़ी घायल हो भागने की फिराक में थी तभी मुर्गियों के एक झुंड ने उसका रास्ता रोक लिया और बोला तुम्हे ज़िंदा नही जाने देंगे । फिर सबने एक साथ एक आखिरी वार किया और लोमड़ी वही धरासायी हो गयी।

दूसरे दिन लोमड़ी के मारे जाने की खबर आस पास के गांव में फैली तो सब मरी हुई लोमड़ी को देखने आए और गांव से सारे मुर्गे और मुर्गियों की वीरता की प्रसंसा करने लगे।
ये खबर जब राज्य से राजा को पता लगी, तो राजा ने उस गांव को वीरो का गांव घोषित किया है।


Friday, February 8, 2019

अनुषा

अनुजा का आठवां महीना पूरा होने को था, हम सब अक्सर इकट्ठा हो छोटे से बेबी की बातें किया करते थे। छोटा सा बेबी किस पर जाएगा शैलेंद्र पर या अनुजा पर। हम शैलेंद्र और अनुजा से पूछा करते थे कि वह बेटी चाहते हैं या बेटा, दोनों बस एक ही बात बोलते थे कोई भी हो पर स्वस्थ हो। इसके अलावा हमें कुछ और नहीं चाहिए। मुझे अक्सर लगता था कि शायद बेटी ही होगी,  पता नहीं अंदर से कुछ आवाज सी आती थी।

अनुजा को जब नवा महीना लगा । शैलेंद्र के मम्मी-पापा और बहन, अनुजा की देखभाल करने के लिए उसके घर आ चुके थे। वीकेंड में हम साथ बैठे बात कर रहे थे कि हमें कभी भी अनुजा को हॉस्पिटल ले जाना पड़ सकता है। एक रात में हम गहरी नींद में थे कि, फ़ोन की घंटी बजती है, बड़ी मुश्किल से रजाई के बीच से कही फ़ोन हाथ लगा और देखता क्या हूँ शैलेंद्र का फ़ोन आ रहा था। फोन की घंटी सुनते ही स्वाति भी उठ कर बैठ गई थी।  फ़ोन उठाते ही शैलेंद्र कि आवाज़ आयी, राहुल सो कर उठ जाओ, अनुजा को दर्द शुरू हो गया है और उसे  होस्पिटल ले जाने का वक्त आ गया है।

हम झट से उठे और सामान समेटकर जाने के लिए तैयार हो गए। आदि को उसके मामा के साथ छोड़ कर हम अनुजा को लेकर कैलाश हॉस्पिटल निकल लिए। गाड़ी हम धीरे-धीरे चला रहे थे कि,  कहीं अनुजा को कोई समस्या ना हो जाए। हम हॉस्पिटल पहुंचे और वहां की फॉर्मेलिटी पूरी की।  अनुजा को लेबर रूम ले जाया गया। डॉक्टरों ने नॉर्मल डिलीवरी की कोशिश शुरू कर दी।  तभी अनुजा की एक चीख ने, हम सब को डरा दिया । शैलेंद्र भागा-भागा अनुजा के पास पहुंचा और बोला क्या हुआ? सब ठीक तो है ना? अनुजा को लेबर पेन इतना ज्यादा था कि वो बेचैन थी, अनुजा की हालत देख, शैलेंद्र की आंखों में भी आंसू, बस छलकने को ही थे। बड़ी मुश्किल से शैलेंद्र ने अपने आप को कंट्रोल किया। अनुजा की स्थिति को देखकर, शैलेंद्र ने निर्णय लिया कि वह ऑपरेशन के लिए जाएगा।

शैलेंद्र की हामी भरने के बाद डॉक्टरों ने डिलीवरी की तैयारी शुरू की, हम सभी ने अनुजा का हौसला बढ़ाया और अनुजा ऑपरेशन थिएटर के लिए निकल गई । बाहर शैलेंद्र हाथ बांधे खड़ा हुआ था, बहुत देर खड़े होने के बाद हम सब ने शैलेंद्र से कहा कि तुम बैठ जाओ, पर वह बैठ नहीं रहा था और बोल रहा था कि, जब तक अनुजा बाहर नहीं आती वह नहीं बैठेगा और ना ही कुछ खाएगा- पिएगा। थोड़ी देर के बाद डॉक्टर ने हमें बताया एक सुंदर सी बेटी ने जन्म लिया है, यह खबर सुन सभी बहुत खुश हुए और सुंदर सी बिटिया के फूफा खुशी के मारे मिठाई का डब्बा लेकर आए, मिठाइयां सब में बांटी गई और शैलेंद्र को भी खूब ढेर सी बधाई दी गई। दादी, बाबा, बुआ सब बहुत खुश थे।

अनुजा अभी लेबर रूम से बाहर नहीं आई थी,  शैलेंद्र वहीं खड़ा अनुजा का इंतजार कर रहा था । एक घंटा बीतने के बाद भी जब, अनुजा की कोई खबर नहीं आई तो वह दौड़ा - दौड़ा डॉक्टर के पास गया और बोला अनुजा कैसी है। डॉक्टरों ने शैलेंद्र को बताया की अनुजा अच्छी है और उसे थोड़ी देर में रूम में शिफ्ट कर देंगे। अभी उसे ऑब्जर्वेशन में रखा है। डॉक्टरों के बताने के बाद भी शैलेंद्र ऑपरेशन थियेटर के बाहर ही खड़ा रहा, थोड़ी देर के बाद जब अनुजा बाहर आई, अनुजा को देखने के बाद,  वह अपनी प्यारी सी बेटी से मिलने बेबी रूम में गया और वहां उसका वीडियो बनाकर हम सबको दिखाया। बिटिया बहुत छोटी और प्यारी थी और हम सब भी बहुत खुश थे की, अनुजा और छोटी सी बिटिया दोनों ही स्वस्थ हैं।

दोपहर होते-होते अनुजा को रूम में शिफ्ट कर दिया हम सब वही थे धीरे-धीरे करके सारी मित्र मंडली इकट्ठा हो गई। 3 दिन हॉस्पिटल में रहने के बाद अनुजा घर आई और जश्न की तैयारी शुरू हो गई। छठी में हम झूम कर नाचे। उसके बाद बिटिया का नाम रखने की प्रक्रिया शुरू हो गई। सभी लोगों ने अपने हिसाब से छोटी सी बिटिया के लिए नाम चुने, आखिर में बुआ ने उसका नाम शिवांशी सेलेक्ट किया, सर्वसम्मति से छोटी सी बिटिया का नाम शिवांशी फाइनल हो गया। प्यार से हम शिवांशी को शिवि भी बुलाते हैं।

जब शिवांशी 12 दिन की हुई तो हमने खूब जश्न मनाया,  शैलेंद्र ने सबको बुलाया। पुराने सारे दोस्त आए थे,  रिश्तेदारों का भी तांता लगा था। वह पार्टी यादगार रही दादी-दादा, बुआ-फूफा, मामा-मामी, मौसी और नानी सब झूम कर नाचे।

अब वह 6 महीने की होने को है,  शिवि ने शरारते शुरू कर दी है। वाह अक्सर पलट जाती है और जोर जोर से चिल्लाती है। मैं अक्सर उसे अनुशा कह कर बुलाता हूं। उसके इस नाम में अनुजा का अनु और शैलेंद्र क श है।

मैं  शिवि के सुंदर भविष्य की, ईश्वर से कामना करता हूं ईश्वर उससे अच्छी बुद्धि, संस्कार और अच्छा स्वास्थ्य प्रदान करें । मेरा और स्वाति का आशीर्वाद उसके साथ हमेशा रहेगा।  वाह मंडली की सबसे प्यारी बिटिया है और हम सब उसे खूब सारा प्यार देंगे।

Monday, January 28, 2019

गौरैया


हम कुछ ही दिन पूर्व ही शहर की घनी आबादी वाले इलाके से निकल उसी शहर की बाहरी इलाके में एक बहुमंजिला ईमारत में शिफ्ट हुए है।  शरू के कुछ दिन  में हमने बिलकुल भी अच्छे नहीं लगे। उस इलाके में हमारा कोई जानने वाला भी ना था।  एक सुबह देखता क्या हूँ एक नन्ही से गौरैया हमारे कमरे में दाखिल होती है। गर्मियों के दिन थे इसलिए हमने पंखा चला रखा था। गौरैया के आता देख हम झट से पंखे को ऑफ करने के लिए बढे। की कही चिड़िया को पंखे से चोट न लग जाये।

पंखा बंद तो हो गया पर चिड़िया बहार जाने का नाम ही नहीं ले रही थे, कभी परदे की रोड पर बैठ जाती तो कभी बंद पंखे के पारो पर।  भगाये तो कैसे भगाये  फिर हमने कमरे की सारी लाइट्स बंद की और सिर्फ एक ही दरवाज़ा खोला। अचानक चिड़िया फुर से उस गयी।


चिडियो को देख कर ना जाने क्यों हमे बहुत अच्छा सा लगा।  शहर की उस घनी आबादी में लोग तो बहुत थे बार कोई भी गौरैया नहीं थी।  हर जगह से गौरैया ख़त्म सी हो गयी है।  चहचहाने की की आवाज़े तो हमने बरसो बाद सुनी थी।  मानो ऐसा लग रहा था की हम किसी जीवित जगह आ गए है।

अब हम रोज़ चिडियो को अपनी बालकनी में दाना डालते है और जिस दिन भी हम भूल जाते थे चिडियो का चहचहाना बहुत ही बढ़ जाता है।  कुछ तो घर के अंदर आकर मानो हमे बताने का प्रयाश कर रही होती है की हम दाना डालना भूल गए हो।  हम झट से दरवाज़ा खोल दाना डालते है।  साथ में कुछ कबूतर भी दानो का मज़ा लेते है।




Monday, January 7, 2019

सनीलियोनि चाप


नए साल की शुरुवात हुए बस कुछ ही दिन हुए थे, हम अपनी पत्नी के साथ,अपने मुहल्ले की मार्केट की सैर कर  रहे थे कि, हमे एक दुकान दिखाई दी, जिसमे बड़ी भीड लगी हुई थी, हमारा भी मन किया कि हम जा कर देखे की क्या बिक रहा है। नज़दीक जा कर हमने देखा की दुकान में तरह तरह की चाप बिक रही थी। 
दुकानदार से हमने पूछा की चाप शाकाहारी ही होती है या नही? दुकानदार ने बोला सर् ये शाकाहारी होती है और इस दुकान में सबकुछ शाकाहारी ही है। पूछना थोड़ा जरूरी था क्योंकि चाप दिखने में मुर्गे की टांग की तरह लग रही थी। पत्नी भी साथ थी इसलिए पूछना थोड़ा ज्यादा जरूरी था। हमने कभी भी चाप नही खाई थी इसलिए मेरा मन किया कि चलो एक बार ट्राय किया जाए। पत्नी को हमने मनाया और उसने बड़ी हिम्मत की और चाप खाने के लिए तैयार हो गयी।
दुकानदार से हमने बोला, भाई चाप कैसे दे रहे हो? दुकानदार बोला सर् आप कौन सी चाप खाना पसंद करेंगे? बताइये। मैंने बोला, भाई, मुझे नही पता की हम कौन सी चाप खाए। आप ही बताओ कि हमे कौन सी चाप खानी चाहिए। आपके पास कौन सी मशहूर चाप है जिसे  लोग ज़्यादा पसंद करते है।
दुकानदार ने हमें बताया की, उसके पास एक स्पेशल चाप है, जिसका नाम सनीलियोनि चाप है।  सनीलियोनि का नाम सुन हमदोनो को हँसी आ गयी, थोड़ा हसने के बाद हमने बोला की ऐसी भी कोई चाप होती है क्या? मुस्कुराते हुए हमने अपनी पत्नी की तरफ देखा। हमारी पत्नी ने भी मुस्कुराते हुए सनीलियोनि चाप खाने के लिए तैयार हो गयी।
सनीलियोनि चाप सार्वजनिक जगह पर खाने की जगह हमने तय किया की हम घर जाकर सकून से इसका आनंद लेंगे। हम घर आये। मेरी पत्नी, एक सुंदर सी थाली में सनीलियोनि चाप परोसकर ले आयी। हमने पूरा आनंद लेकर चाप का सेवन किया। चाप खाने में बहुत चटपटी थी और छूने पर मख़मली ।  हमने अपने साले को भी चाप खिलायी। मेरे साले को सनीलियोनि चाप अच्छी लगी और उसने भी अपने हिस्से की चाप बड़े आनंद से खाई, बस उसे हमने चाप का नाम नही बताया।