इस ब्लॉग में मेरे निजी विचार है। मैं इस ब्लॉग में अपने विचार व्यक्त करता हूँ और दुनिया से अपना विचार शेयर करता हूँ।
Tuesday, October 29, 2019
ट्रेन का स्वच्छ भारत अभियान
Wednesday, October 2, 2019
रमई काका और बहिरे बाबा
मैं आजकल हिमांशु वाजपेई की किताब किस्सा किस्सा लखनउवा पढ़ रहा हूं। इसी किताब में रमई काका और बहिरे बाबा का किस्सा भी है । उनका ज़िक्र आते ही, बचपन की याद आ गई। बचपने में मां द्वारा गोहराए जाने पर, उन्हें ना सुन पाने की इस्थिती में , वो अक्सर मुझे बहीरे बाबा कह कर बुलाती थी। रमई काका नाम इस इस्तेमाल हम अक्सर अपने काका को चिढ़ाने में करते थे। आज समझ में आया कि रमई काका और बहीरे बाबा का नाम कहां से आया।
Wednesday, September 18, 2019
यदि गाड़ी का आविष्कार ना होता तो?
इनदिनों हर तरफ गाड़ियों के चालान की ही बात हो रही है।
किसी को १.५ लाख का चालान लगा तो किसी को २ लाख का। चालान के भय की पराकाष्ठा इतनी है कि, कुछ लोग टोप पहन कर सो रहे है तो कोई कुर्सी पेटी पहन कर शौचालय जा रहा है। बिना वहां के पंजीकरण प्रमाण पत्र, वाहन बीमा एवं प्रदूषण प्रमाण पत्र के लोग अपना वहां सड़क पर निकाल ही नहीं रहे है। जब भी हम किसी को बिना टोप के वाहन चलाते हुए देखते है तो उसकी बहादुरी की प्रशंशा किए रहा नहीं जाता।
इसी बीच हम अपने मित्र के साथ, गाड़ी से अपने कार्यालय जा रहे थे, तभी हमे एक भैंसागाड़ी दिखी, भैसागाड़ी पर किसान, चारा लेकर जा रहा था। किसान चारे को गद्दा बना कर, उसके ऊपर चैन से लेटा हुआ था और भैंसा अपने सहज ज्ञान का प्रयोग कर के व्यस्त सड़क पर चला जा रहा था। तभी हमने सोंचा की यदि गाड़ी का अविष्कार न हुआ होता तो हम कार्यालय जाने के लिए घोड़े या गधो का प्रयोग कर रहे होते।
हम अपनी-अपनी आर्थिक स्थिती के हिसाब से अपना वाहन चुनते। हमारे प्रबंधक महोदय कार्यालय आने में हाथी का प्रयोग करते और हमारे सी.ई.ओ शायद हाथी और घोड़ो के लश्कर लेकर चलते।
कार्यालय में पार्किंग की जगह अस्तबल होते, पेट्रोल के जगह हम घोड़े को अपनी आर्थिक स्थिती के हिसाब से चारा खिलाते ।
हमारे साथ काम करने वाली महिलाये झाँसी की रानी की तरह घोड़े पर सवार होकर आती या पालकी में अपने अंगरक्षकों के साथ कार्यालय में प्रवेश करती।
गजब तो तब होता जब कोई प्रशिक्षु, गधे पर सवार होकर , सी.ई.ओ के लश्कर से किड़बिक- किड़बिक करते आगे निकल जाता। फिर प्रबंधक शान में गुस्ताख़ी समझ, उसे खरी खोटी सुनाते और शिष्टाचार का पाठ पढ़ाते । यदि प्रशिक्षु क्षमा मांग लेता तो शायद माफ़ कर दिया जाता। नहीं तो उसे बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता।
कार्यालय में घोड़ो के नस्लों के बारे में चर्चा की जाती। अच्छी नस्ल का घोडा खरीदने के लिया बैंक ऋण देती। घोड़े का भी बीमा कराया जाता और उसके स्वास्थ्य की समय समय पर जांच कराई जाती। घोड़ा के लीद के प्रबंधन का अलग से विभाग बनाया जाता।
सरकार स्वदेशी घोड़े को प्रोत्साहित करती और विदेशी घोड़ो पर अलग से कर लगाती। घोड़ो के बिक्री के हिसाब से हम अपनी जी.डी.पी के विकास की गणना करते। देश की तरक्की अच्छे नस्ल के घोड़ो पर निर्भर करती। जिस देश में अच्छे नस्ल के घोड़े होते, वो देश विकसित होता। जिस देश में गधे ज्यादा होते वो देश गरीब होता। खच्चरों वाले देश को हम विकासशील देश बोलते।
घोड़े डिजिटल उपकरण पहनते। मालिक के आँखों की पुतली के इशारे पर घोड़ा चलता। घोड़ा प्रशिक्षण केंद्र खुलते। घोड़ों को शहर का मानचित्र याद कराया जाता।
घोड़े का स्वामी जगह का नाम लेता और घोड़ा तैयार हो जाता स्वामी को गंतव्य स्थान तक पहुंचाने को। हर घोड़े पर उसके स्वामी का नाम अंकित होती। गलती से कोई और स्वामी घोड़े पर चढ़ जाता तो घोड़ा उसे हिन् हिना कर अपनी पीठ से गिरा देता।
घोड़ों की संख्या बढ़ने पर सरकारें घोड़ों के रंग के हिसाब नियम बनती की अमुक रंग का घोड़ा, अमुक शहर में, अमुक दिन प्रवेश करेगा ।
नियम तोड़ने पर घोड़े के स्वामी को आर्थिक दंड सहना पड़ता।
नाबालिक अगर घोड़े की सवारी करते हुए पाए जाते तो उनके अभिभावकों को कारागार की सजा दी जाती।
अपनी आर्थिक स्थिति से अधिक मंहगा घोड़ा खरीदने पर आयकर के छापे पड़ते।
एक आयोग भी बनता जो घोड़ों और गधों के अधिकारों की बात करता। उनका शोषण करने पर दंड का प्रावधान होता।
हम गप्पे मार ही रहे थे कि कार्यालय आ गया, गाड़ी पार्किंग में लगा हम अपने काम पर लग गए।
Saturday, September 7, 2019
दलमोठ
यह किस्सा बचपन के दिनों का है,जब हम अक्सर मेहमानों के आने पर बहुत खुश हुआ करते थे। खुशी उनके आने की नहीं, पर उनके सामने परोसे जाने वाली अलग अलग तरह की दालमोठ की होती थी। अलमारी में रखा दलमोठ, मम्मी अक्सर मेहमानों के लिए ही निकाला करती थी।
जब हम उन्हें नमस्ते करने जाते थे, तो कभी-कभी वे मुझे कह देते थे कि बेटा तुम भी तो, लो । बस इन शब्दों के इंतजार में ही तो हम रहते थे। हम एक दो चिम्मच पर रुकते ही कहां थे। मुंह भर भर के खा लेते थे।
उनके जाने के बाद हम, उस डालमोट की कटोरी को अलमारी में रखने के लिए तेजी से भागते थे और भागे भी क्यों ना। उसे रखते रखते एकाद मुट्ठी मुंह में जो भर लेते थे। मम्मी अक्सर हम पर नजर गड़ाए रहती थी कि कहीं हम उस दलमोठ को चट ना कर जाएं पर हम भी कम होशियार ना थे। मम्मी की आंख इधर से उधर हुई नहीं कि एक मुट्ठी भर हम छत की तरफ निकल जाते थे।
गजब तो तब होता था जब हम मेहमान बन किसी और के घर जाते थे। गलती से भी अगर किसी अंकल या आंटी ने बोल दिया कि बेटा तुम भी लो, तो, बस हाथ रुकते ही कहां थे । मां की आंखें बस हम पर ही होती थी । शिष्टाचार के नाते वह हमें कुछ बोल भी नहीं पाती थी।
घर वापस आते ही मां हर बार यही बोलती थी कि अब तुम्हें किसी के भी घर नहीं ले जाऊंगी।
अब हम बड़े हो गए है। हम आज खुद दलमोठ खरीद कर लाते है, पर वो चोरी चुप दलमोठ खाने का मजा आज कहां।
Monday, August 19, 2019
कहानी मेरी जान की
आम दिनों की तरह ही, मै आज सुबह तैयार होकर ऑफिस जाने के लिए उठा, तो सोचा मोबाइल पर मेसेज चेक कर लूं। एक एक कर मेसेज चेक ही कर रहा था कि, देखता क्या हूं, ऑफिस के एक ग्रुप में ढेर से मैसेज आए हुए है। मैंने सोचा इतने मैसेज, कुछ खास हुए है क्या?आज। ग्रुप में देखा तो सिर्फ मेरी ही चर्चा हो रही थी। मुझे लगा कुछ बवाला हो गया, मेरे नाम से। लोग सिर्फ जान की बात कर रहे थे। प्रश्नों का अंबार लगा हुआ था।
कोई बोला राहुल कल ज्यादा चढ़ गई थी क्या?
किसी ने बोला यह मैसेज किस जान को किया है तुमने?
कौन जान है तुम्हारी?
स्वाति को खबर करूं की तुम्हारी कोई और भी जान है।
स्क्रॉल किया तो देखता क्या हूं, जो मैसेज मैंने कल रात को अपनी पत्नी को किया था, वो पता नहीं कैसे इस ग्रुप में दिख रहा था। मेरे दिमाग में कल रात की सारी बात याद आ गई।
कल रात स्वाति जो कि अभी अपने मायके में है से बात हो रही थी। सोने से पहले स्वाति ने एक प्यार भरा मैसेज भेजा था। उसका जवाब मैंने "आई लव यू मेरी जान" लिख कर दिया था पर ना जाने वो मैसेज ऑफिस के ग्रुप ने कैसे चला गया पता नहीं।
मैंने उस मैसेज को झट से रिमूव किया, पर काफी देर हो चुकी थी। सबने पढ़ लिया था। मै यही सोंच रहा था कि, ऑफिस में आज तो सब मेरा खूब मज़ाक उड़ाएंगे । खैर डरते डरते मै ऑफिस पहुंचा। चेयर पर बैठा भी ना था कि दोस्तो की आवाज़ आ गई।
भाई जान आ गए!!!
भाई जान, तुम्हारी जान कैसी है?
कौन है तुम्हारी जान?
हम भी जाने कौन है वो?
मैंने उन्हें पूरी घटना विस्तार से बताई कि, भाई गलती से वो मैसेज ग्रुप में चला गया था, पर कोई भी मेरे मजे लेने का मौका हाथ से कैसे जाने देता। क्योंकि आज उनका दिन था। मेरा नहीं।
सब एक दूसरे से बात भी कर रहे थे तो बस जान शब्द का प्रयोग ज्यादा कर रहे थे। जब भी जान शब्द वाक्य में आता तो तेज बोलते।
दिन भर जान पर ही बात होती रही।
उनमें से कुछ वाक्य है।
- आज मेरी जान में जान आ गई।
- मेरी बहुत लोगो से जान पहचान है।
- मै अनजान लोगो से बात नहीं करती।
- तुम्हारी बातें तो जानलेवा है।
- तुम्हें जाना हो तो जाओ।
- भाई जान, ऐसा मत कर , नहीं तो जान से जाओगे।
- जानेदो जान।
- जाने वालो को जाने दो।
- बच्चे की जान लोगे क्या?
- कोई जान से खिलवाड़ नहीं करेगा।
- मै जान पे खेलता हूं।
- हम जान हथेली पर लेकर चलते है।
- ये काम जान बूझ कर मत करना।
- जान दे भाई।
- आज मै सब कुछ जान गया।
- जाने दो।
- जानते हैं हम सब।
- जानदार काम किया है भाई जान।
- बेजान सा हो गया है जानवर।
एक दोस्त ने कहा कि तुम आज ट्रेन से जा रहे हो तो, अनजान लोगो से जान पहचान मत बढ़ाना, नहीं तो जान को खतरा हो जाएगा।
होशियार रहना, क्योंकि जान है तो जहान है।
शाम ढली, तो मेरी भी जान में जान आई। मै भी अपने जान पहचान वाले लोगों के साथ बस में जाने का मौका मिला । अपनी जान से बात करते करते अनजानी जगह पहुंचा। फिर अनजाने लोगो की मदद से जानी पहचानी जगह नई दिल्ली आ गया। अनजाने में ही सही लोगो को जान पर बात करने का मौका मिला।
Sunday, August 11, 2019
किस्सागोई- सफेद चादर
यह किस्सा मेरे कॉलेज के दिनों का है, मै अपने कॉलेज से बस चंद मिनटों की दूरी पर अपने मित्र के साथ रहा करता था। मै कॉलेज में अपनी बेफिक्री के लिए मशहूर था, जगजीत सिंह की गज़ले कंप्यूटर पर लगा, घंटो गुनगुनाता रहता था। मेरा रूम मेट, वह बहुत ही व्यवस्थित तरीके से रहता था। उसका हर सामान सही समय पर, सही जगह ही रहता था और मेरा हर सामान बिस्तर पर ही। वह हर वक्त मुझे सलीके से रहने के लिए बोलता था और मै अपनी ही धुन में। उसे सफ़ेद रंग बहुत पसंद था , उसकी हर चीज़ सफ़ेद थी। चादर, तकिया और रज़ाई का लिहाफ सब कुछ सफ़ेद , वह ज़्यादातर कपडे भी सफ़ेद ही पहनता था। जबकि मेरे पसंदीदा रंग के बस कुछ कपडे ही थे, वो भी गहरे रंग के थे। हमारी तकिया, बिस्तर और रज़ाई के लिहाफ, सब गहरे रंग के होते थे , वह भी इसलिए की मुझे बार बार उन्हें धुलना न पड़े।
मै जब भी अपने घर जाता तो माँ, उसे ठीक से धुल देती थी ,जबकि मेरा मित्र हर दूसरे -तीसरे दिन अपनी चादर और तकिया धुला करता था। सफाई की इतनी धुन थी उसे की पूछो मत। मुझे वह हर हफ्ते, बार-बार यही कहता था की भाई चादर तकिया गंदे हो गए होंगे, तुम धुल लो, पर मेरे कानो पर ज़ू तक नहीं रंगति थी। एक बार की बात है जब उसके लाख कहने पर मैंने बिछाने वाली चादरे भिगो दी, धुलने के लिए। एक दिन भीगी रही वो चादरे, तभी मेरा रूममेट आया और बोला भाई तुम धुल ले, नहीं तो चादर ख़राब हो जाएगी, पर मुझे लगा की कुछ दिन और भीगी रहेगी तो थोड़ा और साफ़ हो जाएगी। आलस्य चरम पर था, कब दो दिन से सात दिन हो गए पता ही नहीं लगा। रूम मेट ने एक दिन मुझे पकड़ लिया और बोला भाई जिस बाल्टी में तुमने चादरों को भिगोया था, उससे बदबू आ रही थी, इसलिए मैंने उसे उठाकर बहार खुली जगह में रख दिया है। जब भी वक्त मिले तो धुल लेना। मैं जैसे ही बहार गया और देखा, की चादरों का तो बुरा हाल हो गया था। बदबू इतनी थी की बर्दास्त नहीं हो रही थी। किसी तरह मैंने उसका पानी फेका और अपने पैरो का प्रयोग करके धुल डाला । चादर फैलाते समय , मै देखता क्या हूँ की दोनों चादरों का असली रंग तो जा चूका था। दोनों पर तीसरा ही रंग चढ़ गया था। चादरों को जब मेरे रूम मेट ने देखा तो वह दंग रह गया। उस दिन के बाद उसने मुझे कभी भी चादरों को धुलने की सलाह नहीं दी।
इतने बरस बीत जाने के बाद , मेरे मित्र ने उस चादर की घटना को विस्तार पूर्वक मेरी पत्नी को बताई। पूरी कहानी सुनाने के बाद, मेरी पत्नी के चेहरे की भावभंगिमा मुझे समझ में नहीं आ रहा है। उस घटना पर वो गर्व करे या शर्म।
Saturday, July 20, 2019
शीला दीक्षित नहीं रहीं
अभी ज्यादा दिन नहीं हुए है, शीला के खिलाफ मोर्चा निकालते हुए कुछ लोग यह कह रहे थे की अराजकता का माहौल है। शीला हटाओ देश बचाओ और निर्भया कांड का सारा दोष शीला के सर पर उड़ेला गया। कॉमनवेल्थ गेम का सारा घोटाला शीला के नाम रहा। 15 साल मुख्यमंत्री की तरह गुजारने के बाद, अरविंद केजरीवाल मुख्यमंत्री बने एक नहीं वह भी दो बार । आज जब वह हमारे बीच नहीं हैं तो देखता क्या हूं, आम आदमी पार्टी के अरविंद केजरीवाल हो या कुमार विश्वास, शीला दीक्षित की खूब प्रशंसा कर रहे हैं और बोल रहे हैं कि वह बहुत ही शांत एवं सरल स्वभाव की थी। उन्होंने दिल्ली के विकास के लिए, बिना किसी भेदभाव के काम किया । आज जो कुछ भी हम विकास देख रहे हैं, दिल्ली का, शीला दीक्षित की हैं देन है। प्रदेश में 2 दिन का राजकीय शोक घोषित किया गया है।
मुझे यह समझ नहीं आता की मृत्यु के बाद क्या सभी मित्र हो जाते हैं और जब तक वह जीवित रहे तब तक वह शत्रु रहता है।
Saturday, July 6, 2019
चकाचौंध बेरोज़गारी
मैं काफी दिनों के बाद, अपने गृह नगर लखनऊ आया हूँ, तो मैंने सोंचा अपने मुहल्ले की सैर पर जाऊं और देखूं की वो कितना बदल गया है सो घर से निकल लिया, एक गली से दूसरी गली, फिर तीसरी गली घूमता ही रहा। जिस गली में भी मैं गया, तो देखता क्या हूँ कि लगभग हर दूसरे घर में दुकान खुली है। कोई किराने की है, तो कोई नमकीन की, कोई रेस्टोरेंट खोल कर बैठा है, तो कोई बेकरी की दुकान चला रहा है। अपने अपने माता पिता के रिटायरमेंट के पैसे के हिसाब से दुकानों में चकाचौंध नज़र आ रही थी।
जिनके बेटे पढ़ लिख गए तो वो घर से चले गए, दूर कही विदेश में अपना जीवन काट रहे है। मैं भी उनमें से एक हूँ। जो बेटा थोड़ा कम पढ़ा लिखा था, बुढ़ापे की लाठी बन, घर के नीचे दुकान खोल अपनी जीविका चला रहा है और वह हर वक्त माँ बाप की सेवा के लिए तत्पर रहता है।
दुकाने इतनी ज्यादा है कि कोई भी चल ही नही रही है। दिन भर दुकान में बैठे बैठे हताशा महसूस होने लगती है पर कोई ग्राहक नज़र आ जाये तो गनीमत है। बेटा निराश होकर कही घर से चला न जाये इसलिए माता पिता अपनी पेंशन का एक हिस्सा अपने बेटे की जरूरतें पूरी करने में व्यय कर रहे है।
मैं अपने परिवार के साथ एक मॉल घूमने गया तो देखता क्या हूँ कि मॉल में बस कुछ ही लोग थे। शनिवार का दिन होने के बाद भी कोई हलचल नही थी। नोएडा जैसे शहर में शनिवार और रविवार को तो मॉल में पाव रखने की ज़मीन नही होती है और यहां पर तो सन्नाटा पसरा हुआ था। इक्का दुक्का दुकानों पर लोग नज़र आ रहे थे पर उनमें से भी ज़्यादातर लोग विंडो शॉपिंग वाले थे। इतनी महँगी महँगी दुकाने ले कर महँगा महँगा समान डालकर दुकाने चला रहे है पर चल नही रही है। यहाँ के यूथ के पास इतना पैसा ही नही है कि वो मॉल में जाये और कुछ खरीदारी करे।
स्टार्टअप ने नाम पर सबके माँ बाप ने दुकाने खुलवा दी है अपने बुढ़ापे का सहारा बनाने के लिए। देखता हूँ कब तक मोदी का स्टार्टअप इंडिया काम करता है। उम्मीद करता हूँ कि भविष्य सुनहरा हो न सिर्फ हमारा बल्कि देश का भी।
Thursday, March 14, 2019
विलेज ऑफ कॉक्स
दूर किसी गांव में कुछ मुर्गे और मुर्गियां रहा करती थी। गांव के सारे जानवरो से उनकी खूब गहरी दोस्ती थी। जब भी मुर्गियां, अपने चूज़ों के साथ, गली से निकलती तो हर कोई उन्हें देखकर बहुत नाज़ करते थे। सारे चूज़े अपनी माँ को बिना परेशान किये एक ही लाइन में चला करते थे और जब चूज़ों के पापा उनके साथ जाते तो वो बिना खिलौने लिए घर वापस नही आते थे। किसी को गुड़िया पसंद आती, तो किसी को गुड्डा।
एक दिन की बात है जब गांव की कुछ मुर्गो ने बताया कि पड़ोस के गांव में एक लोमड़ी आयी है जो बच्चो को उठा ले जाती है और उन्हें खा जाती है।
गांव के सारे जानवरो ने फैसला किया कि अब वो अपने बच्चो को बाहर खेलने नही भेजेंगे। बच्चे घर के आंगन में ही खेलेंगे और रात में सारे मुर्गे पहरा देंगे। दिन यूं ही बीत रहे थे। बच्चो ने बाहर जाना बंद कर दिया, वो घर मे ही आपस मे खेलते थे।
काफी दिन बीत जाने के बाद जब लोमड़ी गांव में नही आई तो बच्चो ने धीरे धीरे घर से बाहर खेलना शुरू किया। चूज़ों के पापा ने भी रात में पहरा देना कम कर दिया।
ऐसे ही किसी रोज़, लोमड़ी ने गांव में दबे पांव प्रवेश किया और देखा कि गांव के सारे मुर्गे सो रहे है । उसने सोंचा कि अच्छा मौका है किसी एक घर मे धावा बोल कर सबको खा लिया जाए।
लोमड़ी ने अक्कड़ बक्कड़ बोलकर एक घर को चुना। और उनके आंगन में कूद गई। मुर्गे अपने परिवार से साथ आंगन में ही सो रहे थे, उनकी आंख खुल गयी और देखा लोमड़ी उनके बच्चो पर झपट्टा मारने के लिए तैयार थी। तभी मुर्गे ने लोमड़ी को सावधान किया और बोला कि वो वहां से चली जाए, पर लोमड़ी कहाँ पीछे हटने वाली थी तभी मुर्गे के बांग लगाई और गांव से सारे मुर्गे एक आवाज़ साथ आ खड़े हुए।
तभी एक मुर्गे ने लोमड़ी पर आक्रमण कर दिया। लोमड़ी ताकतवर थी उसके एक ही वार ने मुर्गे को अधमरा कर दिया। सारे मुर्गे उसकी ताकत को देख घबरा गए और फिर कुछ और मुर्गो ने कोशिश की पर वो भी उससे हार कर अधमरे से हो गए।
मुर्गो ने आपस मे बात की कि ऐसे लड़ेंगे तो एक एक कर हम सब मारे जाएंगे, हम सब एक साथ लोमड़ी पर आक्रमण करते है, फिर जो भी होगा देखा जाएगा। सभी लोमड़ी की तरफ बढ़े किसी ने उसके मुंह पर चोंच मारे तो किसी ने उसके आँख पर, भीषण युद्ध चला मुर्गे घायल हो किनारे हटाते गए पर हार नही मानी। मुर्गिया भी पीछे नही रही उन्होंने भी युद्ध मे भाग लिया। लोमड़ी घायल हो भागने की फिराक में थी तभी मुर्गियों के एक झुंड ने उसका रास्ता रोक लिया और बोला तुम्हे ज़िंदा नही जाने देंगे । फिर सबने एक साथ एक आखिरी वार किया और लोमड़ी वही धरासायी हो गयी।
दूसरे दिन लोमड़ी के मारे जाने की खबर आस पास के गांव में फैली तो सब मरी हुई लोमड़ी को देखने आए और गांव से सारे मुर्गे और मुर्गियों की वीरता की प्रसंसा करने लगे।
ये खबर जब राज्य से राजा को पता लगी, तो राजा ने उस गांव को वीरो का गांव घोषित किया है।
Friday, February 8, 2019
अनुषा
अनुजा का आठवां महीना पूरा होने को था, हम सब अक्सर इकट्ठा हो छोटे से बेबी की बातें किया करते थे। छोटा सा बेबी किस पर जाएगा शैलेंद्र पर या अनुजा पर। हम शैलेंद्र और अनुजा से पूछा करते थे कि वह बेटी चाहते हैं या बेटा, दोनों बस एक ही बात बोलते थे कोई भी हो पर स्वस्थ हो। इसके अलावा हमें कुछ और नहीं चाहिए। मुझे अक्सर लगता था कि शायद बेटी ही होगी, पता नहीं अंदर से कुछ आवाज सी आती थी।
अनुजा को जब नवा महीना लगा । शैलेंद्र के मम्मी-पापा और बहन, अनुजा की देखभाल करने के लिए उसके घर आ चुके थे। वीकेंड में हम साथ बैठे बात कर रहे थे कि हमें कभी भी अनुजा को हॉस्पिटल ले जाना पड़ सकता है। एक रात में हम गहरी नींद में थे कि, फ़ोन की घंटी बजती है, बड़ी मुश्किल से रजाई के बीच से कही फ़ोन हाथ लगा और देखता क्या हूँ शैलेंद्र का फ़ोन आ रहा था। फोन की घंटी सुनते ही स्वाति भी उठ कर बैठ गई थी। फ़ोन उठाते ही शैलेंद्र कि आवाज़ आयी, राहुल सो कर उठ जाओ, अनुजा को दर्द शुरू हो गया है और उसे होस्पिटल ले जाने का वक्त आ गया है।
हम झट से उठे और सामान समेटकर जाने के लिए तैयार हो गए। आदि को उसके मामा के साथ छोड़ कर हम अनुजा को लेकर कैलाश हॉस्पिटल निकल लिए। गाड़ी हम धीरे-धीरे चला रहे थे कि, कहीं अनुजा को कोई समस्या ना हो जाए। हम हॉस्पिटल पहुंचे और वहां की फॉर्मेलिटी पूरी की। अनुजा को लेबर रूम ले जाया गया। डॉक्टरों ने नॉर्मल डिलीवरी की कोशिश शुरू कर दी। तभी अनुजा की एक चीख ने, हम सब को डरा दिया । शैलेंद्र भागा-भागा अनुजा के पास पहुंचा और बोला क्या हुआ? सब ठीक तो है ना? अनुजा को लेबर पेन इतना ज्यादा था कि वो बेचैन थी, अनुजा की हालत देख, शैलेंद्र की आंखों में भी आंसू, बस छलकने को ही थे। बड़ी मुश्किल से शैलेंद्र ने अपने आप को कंट्रोल किया। अनुजा की स्थिति को देखकर, शैलेंद्र ने निर्णय लिया कि वह ऑपरेशन के लिए जाएगा।
शैलेंद्र की हामी भरने के बाद डॉक्टरों ने डिलीवरी की तैयारी शुरू की, हम सभी ने अनुजा का हौसला बढ़ाया और अनुजा ऑपरेशन थिएटर के लिए निकल गई । बाहर शैलेंद्र हाथ बांधे खड़ा हुआ था, बहुत देर खड़े होने के बाद हम सब ने शैलेंद्र से कहा कि तुम बैठ जाओ, पर वह बैठ नहीं रहा था और बोल रहा था कि, जब तक अनुजा बाहर नहीं आती वह नहीं बैठेगा और ना ही कुछ खाएगा- पिएगा। थोड़ी देर के बाद डॉक्टर ने हमें बताया एक सुंदर सी बेटी ने जन्म लिया है, यह खबर सुन सभी बहुत खुश हुए और सुंदर सी बिटिया के फूफा खुशी के मारे मिठाई का डब्बा लेकर आए, मिठाइयां सब में बांटी गई और शैलेंद्र को भी खूब ढेर सी बधाई दी गई। दादी, बाबा, बुआ सब बहुत खुश थे।
अनुजा अभी लेबर रूम से बाहर नहीं आई थी, शैलेंद्र वहीं खड़ा अनुजा का इंतजार कर रहा था । एक घंटा बीतने के बाद भी जब, अनुजा की कोई खबर नहीं आई तो वह दौड़ा - दौड़ा डॉक्टर के पास गया और बोला अनुजा कैसी है। डॉक्टरों ने शैलेंद्र को बताया की अनुजा अच्छी है और उसे थोड़ी देर में रूम में शिफ्ट कर देंगे। अभी उसे ऑब्जर्वेशन में रखा है। डॉक्टरों के बताने के बाद भी शैलेंद्र ऑपरेशन थियेटर के बाहर ही खड़ा रहा, थोड़ी देर के बाद जब अनुजा बाहर आई, अनुजा को देखने के बाद, वह अपनी प्यारी सी बेटी से मिलने बेबी रूम में गया और वहां उसका वीडियो बनाकर हम सबको दिखाया। बिटिया बहुत छोटी और प्यारी थी और हम सब भी बहुत खुश थे की, अनुजा और छोटी सी बिटिया दोनों ही स्वस्थ हैं।
दोपहर होते-होते अनुजा को रूम में शिफ्ट कर दिया हम सब वही थे धीरे-धीरे करके सारी मित्र मंडली इकट्ठा हो गई। 3 दिन हॉस्पिटल में रहने के बाद अनुजा घर आई और जश्न की तैयारी शुरू हो गई। छठी में हम झूम कर नाचे। उसके बाद बिटिया का नाम रखने की प्रक्रिया शुरू हो गई। सभी लोगों ने अपने हिसाब से छोटी सी बिटिया के लिए नाम चुने, आखिर में बुआ ने उसका नाम शिवांशी सेलेक्ट किया, सर्वसम्मति से छोटी सी बिटिया का नाम शिवांशी फाइनल हो गया। प्यार से हम शिवांशी को शिवि भी बुलाते हैं।
जब शिवांशी 12 दिन की हुई तो हमने खूब जश्न मनाया, शैलेंद्र ने सबको बुलाया। पुराने सारे दोस्त आए थे, रिश्तेदारों का भी तांता लगा था। वह पार्टी यादगार रही दादी-दादा, बुआ-फूफा, मामा-मामी, मौसी और नानी सब झूम कर नाचे।
अब वह 6 महीने की होने को है, शिवि ने शरारते शुरू कर दी है। वाह अक्सर पलट जाती है और जोर जोर से चिल्लाती है। मैं अक्सर उसे अनुशा कह कर बुलाता हूं। उसके इस नाम में अनुजा का अनु और शैलेंद्र क श है।
मैं शिवि के सुंदर भविष्य की, ईश्वर से कामना करता हूं ईश्वर उससे अच्छी बुद्धि, संस्कार और अच्छा स्वास्थ्य प्रदान करें । मेरा और स्वाति का आशीर्वाद उसके साथ हमेशा रहेगा। वाह मंडली की सबसे प्यारी बिटिया है और हम सब उसे खूब सारा प्यार देंगे।