Wednesday, October 15, 2014

मृत्यु के पश्चात अंगदान करने की सही कीमत मिले

यह मेरे निजी विचार है
मुझे लगता है यही किसी को  मृत्यु के पश्चात अंग दान करने की उचित कीमत मिले तो वह उत्साहित होगा  अपने अंग दान करने को,  जिससे जरुरतमंद को सही अंग उपलब्ध होगा ,  जब चाहे वो अपना अंग बदलवा ले सही कीमत दे कर।    वैसे भी गरीब आदमी के बस में नहीं है अंगप्रत्यारोपित करवाना।  बस पैसे वाले ही ऐसा करवा पाते है। एक दिन हॉस्पिटल का खर्च भी उठा एक गरीब आदमी के बस के बात नहीं है।  कम से कम  वो अपनी मृत्यु के पश्चात अपने अंग से मिले हुए पैसे से अपने परिवार का भविष्य सुरछित कर सकता है।  यह अंगदान उसके परिवार को इन्सुरेंस की तरह काम करेगा।

अंग दान करने वाले फॉर्म पर नॉमिनी का नाम होना चाहिए जैसा की वसीयत के समय होता है।  नाम गुप्त रखा जाता है उसका नाम जिसे अमुक व्यक्ति की मृत्यु के पश्चात उसकी जयजात में हिस्सा मिलेगा।

अंग की गुडवत्ता के हिसाब से उसकी कीमत का निर्धारण होगा।  जितना अच्छा अंग उतनी अच्छी कीमत।  फिर लोग अपने आपसे प्यार भी करेंगे कुछ भी ऐसा नहीं खाएंगे या पिएंगे जिसे उनके अंगो को हानि पहुंचे।  अपने अंग की कीमत बढ़ने के लिए पौस्टिक आहार लेंगे।  स्वस्थ्य सम्बन्दी सारी जानकारी रखेंगे क्या खाने से क्या लाभ होग।  अपने जीवन से साथ साथ अपनी मृत्यु का भी ध्यान रखेंगे। इंसान की कीमत बढ़ेगी।  अंगो की कमी से जूझ रहा देश अंग एक्सपोर्ट करने की स्थिति में आ जाएगा।

अंगो को दोबारा प्रयोग करने के लिए शोध होंगे उसके लिए पैसा भी इकठ्ठा हो सकेगा।  अलग अलग अंगो के लिए बैंक बनेगे।  इंसानो की कीमत होगी इंसान ऐसे ही सड़को पर भीख नहीं मागेंगे,   उनका सम्मान बढ़ेगा। 

Tuesday, October 14, 2014

बेटी ने दिया माँ को जन्म

शनिवार शाम विवेक का अचानक फ़ोन आया और बोला कहाँ हो भाई? बहुत इमरजेंसी है प्रशांत की माँ को खून की जरुरत है, उनकी दोनों किडनियां  फेल हो गयी है और किडनी ट्रांस्प्लांट करनी है इसके लिए १५ यूनिट खून चाहिए। मैंने बोला भाई मै  तो लखनऊ में हूँ और दिल्ली इतनी पास भी नहीं है की तुरंत आ सकूँ। मैंने विवेक से बोला पूरी बात बताओ क्या हुआ ऐसा अचानक तो विवेक ने बताया की आंटी की तबियत ख़राब थी वो पिछले १५ दिनों से गंगाराम में भर्ती थी,  डॉक्टर ने बोला की उनकी दोनों किडनिया फेल हो गयी है।

प्रीती जो उनकी बेटी है सिर्फ २५ बरस की है अपनी एक किडनी अपनी आंटी को दे रही है।

सुनते ही मेरा सर चकरा गया की इतनी काम उम्र में वो अपनी किडनी अपनी माँ को दे रही है, क्या होगा उसका भविष्य, कैसे शादी होगी उसकी, क्या होगा उसका भविष्य,  वैसे भी लोग आजकल शादी नहीं करने जाते है, कोई सामन खरीदने जाते है।  हर पहलू में लड़की परफेक्ट होनी चाहिए फिर बिना किडनी के उससे शादी कौन करेगा। उसके सामने तो पूरी ज़िन्दगी पड़ी है। पता नहीं मेरा सोंचना सही था की गलत मै नहीं जनता।
अपनी किडनी देने का फैसला करना उसके लिए भी आसान नहीं रहा होगा।  निःस्वार्थ भाव से उसने ये फैसला किया होगा।  बहुत है बहादुर लड़की है प्रीती।  मै तुम्हारी इस भावना को सलाम करता हूँ।  

मै  कुछ नहीं कर सकता था, यह अफ़सोस  था मुझे।  मैंने विवेक को बोला की कुछ मित्रो को फ़ोन करता हूँ  अगर वो तैयार हो गए तो गए तो खून का इंतेज़ाम हो जायेगा

हमने(विवेक और मै) अपने कुछ पुराने मित्रो को फ़ोन मिलाया और बोला भाई प्रशांत की माँ को खून की जरुरत है क्या तुम अपना खून दे सकते हो, उन मित्रो ने हमारी सुनी और अपने कुछ और मित्रो को भी लेकर आए।  १० यूनिट का तो इंतेज़ाम हो गया  हो गया,  दूसरे दिन भी मै लखनऊ में ही था।  रात मै दिल्ली के लिए चला फिर मैंने विवेक को फ़ोन करके आंटी का हाल चाल लिया तो पता चला की ५ यूनिट और चाहिए।  फिर मै सुबह सीधे गंगाराम हॉस्पिटल ही पहुंच गया।  मैंने देखा की वह मेरे बाकि मित्र भी वही पहुंचे हुए है।  टनटन, विवेक,  शैलेन्द्र और संदीप  कुल मिलकर हम ५ थे। बाकि खून की आवश्यकता भी पूरी हो गयी।

मेरा ब्लड ग्रुप AB+ था फिर प्रशांत ने बताया की तुम्हारा ब्लड नहीं प्लेटलेट्स चाहिए।  मै तैयार हो गया, फॉर्म भरा और प्राथमिक जाँच के लिए गया, जाँच पूरी होने के बाद मेरा नाम पुकारा गया,  मै गया तोनर्स ने मुझे बोला की मेरी नसे काफी गहराई में है साफ़ दिख नहीं रही है प्लेटलेट्स के लिए जरुरी है की नसे साफ़ दिखे ।  प्लेटलेट्स के लिए १ घंटा लगता है, आप सिर्फ अपना रक्त दान कर दे। मै थोड़ा निराश था पर काम से काम मै अपना खून दान कर सका इसका सकूँ था।  

आंटी और प्रीती का ऑपरेशन चल ही रहा था,  १८ घंटे का ऑपरेशन है। खून दे कर हम ऑफिस के लिए चल दिए।   देर रात पता चला की प्रीती तो ठीक है और अब होश में भी आ गयी है पर आंटी ७२ घंटे के बाद होश में आएंगी तब पता चलेंगे की प्रीती की किडनी को आंटी के शरीर ने एक्सेप्ट किया है की नहीं हम इंतज़ार कर रहे है शुभ समाचार का। ईश्वर सब अच्छा करे और मेरी सारी संकाओ को दूर करे।

Thursday, October 9, 2014

कौन है ये महाशय

अंश के होने के बाद स्वाति पहली बार अपने मायके गयी थी तबसे लगभग २ महीने हो गए मै दोनों से नहीं मिला था।  कुछ दिन पहले गांधी जयंती और विजयदशमी की छुट्टी में मै फैज़ाबाद गया और अंश से मिला।  वो मुझे ऐसे देख रहा था जैसे कभी देखा ही न हो।  मेरा चेहरा देखता फिर स्वाति का।  कोई भाव नहीं था उसके चेहरे पर।  थोड़ी देर बाद उसके चेहरे पर रोने का भाव देख मैंने झट से उसे स्वाति को पकड़ा दिया।

थोड़ा बड़ा हो गया है अब, पहचानने लगा है सबको, कई चीज़े सीख ली है अंश ने।  खूब तेज़ तेज़ चिल्लाता है, घूमने का उसे भी काफी शौक है हमारी तरह।
पेट के बल लेटना सीख लिया है , उल्टा होता है फिर सीधा, यही खेल दिन भर चलता है।   ३ दिन रहा मै वहाँ , पहले दिन तो मेरे पास आने पर रोने लगता।  हम दुर्गापूजा देखे गए।  पूरा शहर सजा हुआ था हर तरफ माँ की मुर्तिया ही  मुर्तिया थी , हर दस कदम पर भंडारा चल रहा था।  हमने स्वाति की नज़रो से उसका पूरा शहर देखा मनो ये एक अनोखा शहर हो।  अनोखा था भी, भीड़ नियंत्रित भी थी ऐसी कोई धक्का मुक्की नहीं थी जो हमें रस्ते में चलने पर परेशानी हो।  हम अंश को लेकर घूम रहे थे वो सो गया था सीने से चिपका हुआ था।  बहुत आनंद आ रहा था उसे अपने सीने से लगा कर।  रात १२ बजे वापस आए।  बहुत अच्छा लगा इस मौके पर जा कर. स्वाति भी   बहुत खुश थी मुझे अपने साथ पाकर ।

दूसरे दिन मेरा सामना हुआ अंश का।  धीरे धीरे वो मेरी गोद में रुक रहा था।  हल्का सा मुस्कुराता जब मै उसे पुचकारता।  स्वाति बोल रही थे लग रहा है दोस्ती हो  रही है, पूरा दिन अंश के आस पास ही गुजरा।

तीसरा दिन आया मेरे जाने का वक्त था जब जाने के लिए मैंने अंश को अपनी गोद में लिया तो वो मुस्कुरा रहा था।  मेरा उसे छोड़ कर जाने का बिलकुल भी मन नहीं कर रहा था।  पर मज़बूरी थी जाना तो था ही दिल पर पत्थर रख अंश और स्वाति से मैंने विदा ली।  रास्ते भर मेरा ध्यान दोनों पर ही था।

जल्दी ही वो दोनों लखनऊ आ जायेंगे फिर दिवाली है और उसके बाद दोनों नॉएडा मेरे पास।



Wednesday, October 8, 2014

याददाश्त

एग्ज़ाम हॉल में बैठकर हम यही सोचते हैं कि हमारी याददाश्त बहुत कमजोर है... लेकिन, जिससे कभी प्यार किया हो और उसे भूलना चाहो....
तो लगता है कि जैसे सारी दुनिया के काजू-बादाम हमने ही खा रखे हे ..!

हम भारतीय कितना थूकते है

मै अपने स्कूटर से रोज़ घर से ऑफिस जाता हूँ रास्ते भर बड़ी सावधानी से इधर उधर देखता रहता हूँ कही थूक का शिकार न हो जाऊ और मेरा नहाना बर्बाद न हो जाए।

कोई पान खा कर थूकता है,
कोई गुटका खा कर,
कोई कुछ न हो तो ऐसे ही थूकता है।

चाहे वो कार से हो,  पैदल हो, साइकिल से हो , बस में हो, सच मानो कही भी हो. बस थूक देते है।
इसमें औरत और मर्द में कोई भेद नहीं है दोनों खूब जम कर थूकते है।

" कभी कभी मुझे वो थूक वाला संवाद याद आ जाता है की अगर हम सवा सौ करोड़ लोग थूके तो पूरा पाकिस्तान डूब जायेगा"

शायद हम उसी दिन के इंतज़ार में है की एक दिन पाकिस्तान पर थूकने का मौका मिलेगा इसलिए हम अपनी आदत बनाए  रखना चाहते है।

आज एक साइकिल पर सवार एक सज्जन इधर देखा न उधर थूक दिया।  पीछे मै थे।  बाल-बाल बचा,  नहीं तो आज नहाना व्यर्थ हो जाता।  भाई को मैंने समझाया की भाई ऐसा मत किया करो  और आगे से ध्यान रखे।
ये बोल मै ऑफिस से लिए निकला लिया।

कभी कभी मेरा मन करता है की मै इन महानुभावो को सम्मान दू।