उम्मीद करता हूँ की वक्त के साथ साथ इनको भी अक्ल आएगी और देश के लिए कुछ करेंगे।
इस ब्लॉग में मेरे निजी विचार है। मैं इस ब्लॉग में अपने विचार व्यक्त करता हूँ और दुनिया से अपना विचार शेयर करता हूँ।
Tuesday, September 30, 2014
आम आदमी पार्टी- कब अक्ल आएगी
उम्मीद करता हूँ की वक्त के साथ साथ इनको भी अक्ल आएगी और देश के लिए कुछ करेंगे।
हर अहसान की एक अंतिम तिथि होती है।
इस बात का अहसास कुछ दिनों पहले हुआ जब किसे ने फ़ोन किया की उन्होंने कभी किसी के लिए कुछ त्याग किया था और आज उन्हें उस त्याग का बदला चाहिए और दूसरी तरफ जिनके लिए उन्होंने त्याग किया था वो सब भूल कर अपना जीवन हर्षोल्लास के साथ जी रहे है।
Friday, September 26, 2014
पत्नी से माफ़ीनामा
सेवा में,
पत्नी जी
श्रीमती स्वाति शर्मा
माता अंश राहुल शर्मा
महोदया ,
सविनय निवेदन है की मै , राहुल शर्मा , पुत्र श्री राम कैलाश शर्मा एवं श्रीमती कृष्णावती शर्मा, आपसे निवेदन करता हूँ की मेरे द्धारा अतीत में की गयी सारी गलतियों के लिए माफ़ी मांगता हूँ जिससे आपके ह्रदय को घात पंहुचा है। मै आपसे ये वादा करता हूँ की मै वो गलतिया दोबारा नहीं करूँगा। कृपया नीचे लिखी पंक्तियों पर ध्यान देने की कृपा करे जो मेरे भावनाओ को व्यक्त करती है जो ये दर्शाता की मै आपको कितना अटूट प्रेम करता हूँ।
अतः आपसे अनुरोध है की आप मुझे माफ़ करके मुझे असीम प्रेम की अनुभूति कराएगी ।
Sunday, September 21, 2014
सात्विक स्वाति राहुल शर्मा
स्वाति की प्रेग्नेंसी को नौ महीने हो चुके थे, उसका बीपी काफी बढ़ा हुआ था। फिर डॉक्टर ने कहा कि स्वाति को एडमिट कर दो, हम उसका बीपी सामान्य करने की कोशिश करेंगे, उसके बाद हम सामान्य डिलीवरी का प्रयास करेंगे। हमने कुछ ऐसा ही किया, मैं शनिवार को लखनऊ गया और डॉक्टर से मिलकर स्वाति को एडमिट करा दिया। उसे तीन टाइम एक छोटी-सी टेबलेट देनी थी और हर चार घंटे बीपी नापने कोई न कोई आता रहता था। उनके जाते वक्त मैं हर बात उनसे पूछता कि बीपी सामान्य है कि नहीं। वे बोलती थीं कि ठीक है। मैं स्वाति को बताता कि सब ठीक है, हिम्मत मत हारो, सब ठीक हो जाएगा। एक दिन बीता, फिर दूसरा दिन भी बीता, फिर आया सोमवार, डॉक्टर से मिलने का वक्त आ गया।
डॉक्टर के पास हम स्वाति को लेकर गए। डॉक्टर ने बोलीं, "हम डिलीवरी का प्रयास करने जा रहे हैं, आप काउंटर पर जाकर औपचारिकताएँ पूरी कर लें।" स्वाति घबराते हुए मैटर्निटी रूम में गई। हमने दीदी और माँ को फ़ोन किया और वे सब आ गए। थोड़ी देर बाद डॉक्टर ने हमें बुलाया और बोलीं कि बीपी काफी बढ़ा हुआ है, हम सामान्य डिलीवरी नहीं करा सकते, ऑपरेशन करना पड़ेगा। हमने डॉक्टर से कहा कि जैसा आपको सही लगे। "स्वाति और बच्चा दोनों सुरक्षित रहें, मुझे बस यही चाहिए।" थोड़ी देर के बाद स्वाति को ऑपरेशन थिएटर ले जाने के लिए मैटर्निटी रूम से बाहर निकाला। मैं वहीं स्वाति का इंतज़ार कर रहा था। तभी मुझे अपने भांजे आराव के जन्म का समय याद आया। उस रात मैं तो आराम से सो रहा था, पर मेरे जीजा (दीदी के पति) बेचैन थे और जैसे-जैसे प्रेग्नेंसी का समय बढ़ रहा था, दीदी की तकलीफ उनके चेहरे पर साफ नजर आ रही थी। उस समय मेरी भी हालत कुछ वैसी ही थी। बाकी सब बच्चे का इंतज़ार कर रहे थे, और मैं सिर्फ स्वाति का। बच्चा तो अपनी जगह सबसे कीमती होता ही है, पर उसे जन्म देने वाली सबसे ज़्यादा। मैंने स्वाति का हौसला बढ़ाया और स्वाति ऑपरेशन के लिए चली गई। हम वहीं बाहर इंतज़ार करने लगे। हम मन में स्वाति के सुरक्षित रहने की दुआ माँग रहे थे। बच्चे का ख्याल मन में कम और स्वाति का ज़्यादा था। बाकी घरवालों क्या सोच रहे थे, इसका अंदाज़ा हम नहीं लगा सकते थे।
थोड़ी देर के बाद एक नर्स आई और बोलीं, "राहुल शर्मा कौन हैं?" दीदी पास ही खड़ी थीं, वह झट से उनके पास गईं और देखा कि उनके हाथ में एक बच्चा है। दुनिया का सबसे ख़ूबसूरत सात्विक उनके हाथ में था। मुझे अंदर बुलाया और बच्चे को दिखाया और एक पेपर पर सिग्नेचर करने को बोलीं। वे बोलीं, "बेटा हुआ है। दो बजकर दो मिनट पर हुआ है।" मैंने पूछा, "स्वाति कैसी हैं?" उन्होंने बोला, "वह ठीक है, उन्हें आईसीयू में स्थानांतरित कर रहे हैं, आप वहीं मिल सकते हैं।" थोड़ी देर के बाद उन्होंने हमें बुलाया और बच्चे को हमारे हवाले कर दिया। उसे देखकर हम बहुत खुश थे। दीदी बेबी को लेकर कमरे में गईं। डॉक्टर ने बोला था कि उसे हर दो घंटे पर दूध पिलाती रहना। बच्चे की माँ अभी आईसीयू में ही रहेगी। शाम को हम स्वाति से मिलने गए। स्वाति ठीक थीं, उन्होंने बच्चे की झलक ही देखी थी। हमने बोला, "बच्चा ठीक है, बस तुम जल्दी से ठीक होकर आ जाओ।" फिर मैं वापस कमरे में आ गया। थोड़ी देर बाद बच्चे की नानी और मां भी आ गईं। वे भी बहुत खुश थे, मिठाई लेकर आए थे। नीलम बुआ भी आईं। मुकुल के डूबे हुए पैसे भी वापस मिल गए, सात्विक के होते ही वह भी मिठाई लेकर आया सबके लिए। धीरे-धीरे लोग आते रहे और बच्चे को देखने लगे, पर मेरा मन स्वाति में ही लगा हुआ था। उसे देखने को मेरा मन कर रहा था। रात आँखों-आँखों में ही चली गई। सुबह खबर आई कि कुछ देर के बाद स्वाति को कमरे में ला रहे हैं। हम दोनों को एक साथ देखने के लिए बहुत खुश थे। वह वक्त भी आ गया जब स्वाति, मैं और हमारा सात्विक एक साथ थे। स्वाति को गले लगाने का मन कर रहा था और यह बोलने का मन कर रहा था कि वह दुनिया की सबसे ख़ूबसूरत लड़की है और उसने मुझे दुनिया का सबसे ख़ूबसूरत उपहार दिया है।
हम तीन दिन वहीं रहे, रोज़ सुबह पाँच बजे हम सात्विक को धूप में ले जाते। थोड़ी देर रहते फिर आ जाते। मैंने कुछ और बच्चों को भी देखा, उनकी नानी या दादी बच्चे को लेकर धूप दिखाने आती थीं। स्वाति की माँ के पैरों का ऑपरेशन हुआ था, इसलिए वह नहीं आ सकती थीं। इस कारण मुझे आना पड़ता था।
जब हम सात्विक को धूप दिखाने के लिए आते थे, तो हमें यह पता लगा कि एक ही दिन में लगभग पाँच बच्चे हुए थे, वह भी सारे लड़के। हमने देखा कि एक छोटे से बच्चे के मुँह में तो दो दाँत थे। हम देखकर अचंभित थे। वह कैसे दूध पिएगा?
वह दिन आ गया जब हम स्वाति को घर ले जा सकें। डॉक्टर ने बोलीं, "अब हम स्वाति को डिस्चार्ज कर रहे हैं, आप औपचारिकताएँ पूरी कर लें।" मैंने सारी औपचारिकताएँ पूरी कीं और कार से स्वाति को ले जाने के लिए तैयार हुए। हम घर पहुँचे, माँ ने आरती की, फिर हम सात्विक को घर ले आए। साथ में सात्विक की नानी भी थीं। उन्होंने सात्विक और स्वाति का दिन-रात ख्याल रखा। सात्विक दिनभर सोता और रात भर जागता था। नानी रात भर जागकर उसे चुप करातीं और मैं चुपचाप यह देखता कि कैसे चुप कराते हैं। सात्विक को नानी के हवाले करके मैंने खूब चैन की नींद भी ली। असली मज़ा उनके जाने के बाद ही पता लगा कि बच्चा संभालना बच्चों का काम नहीं है।
सात्विक की छठी आई। हम घरवाले ही थे - दीदी, निशि, नेहा, सात्विक की नानी और बाकी पूरा परिवार। पूरा देसी खाना बना - उड़द की दाल, दही बड़े, पूरी, खीर, मिक्स्ड सब्ज़ी और चावल। हमने खूब जमकर खाया। स्वाति ने भी खाया। फिर बाद में पता लगा कि स्वाति जो कुछ भी खाएगी, उसका असर सात्विक पर होगा। गरिष्ठ भोजन बच्चे को नुकसान कर सकता है।
मैं एक हफ़्ते स्वाति और सात्विक के साथ लखनऊ में रहा और लगा कि जीवन का असली मज़ा यही है। नोएडा आना मेरे लिए काफी कष्टकारी रहा। दोनों की याद बहुत आती रही। हर पंद्रह दिन पर लखनऊ जाता रहूँगा।
सवा महीने में हमने बरही की दावत की। पूरा परिवार साथ था - नानी-नाना, मौसा-मौसी, मामा, चाचा, दादी-दादा, बुआ-फूफा, सब थे। हमने मज़े से दावत की, मेहमानों का स्वागत हुआ, खान-पान हुआ। हर्षोल्लास के साथ सात्विक का पहला फंक्शन हुआ। सुबह कथा हुई थी। पापा और माँ ने सात्विक को लेकर कथा सुनी। सात्विक की सारी बुआओं को हमने उपहार दिए।
सात्विक, मेरा और मेरी पत्नी स्वाति का सात्विक। सात्विक का जन्म 19 मई, 2014 को लखनऊ के सेंट जोज़फ़ हॉस्पिटल में दोपहर दो बजकर दो मिनट पर हुआ। कुछ एहसास बयान नहीं किए जा सकते हैं। अचानक खुशी और ज़िम्मेदारी का एहसास होने लगा। पहली बार किसी के लिए रात-रात भर जागना कोई काम नहीं, बल्कि एक ज़िम्मेदारी है। सात्विक को हुए दो दिन ही हुए थे। सबने कहा कि यह दिन में सोएगा तो रात को जागेगा। फिर मैंने उसे जगाने की कोशिश की। वह जागा और रोने लगा। साँसें रुक सी गई थीं, दिल धक-धक करने लगा। फिर माँ ने उसे अपने सीने से लगाया, तब जाकर वह ठीक हुआ। तब से मैंने यह फ़ैसला किया कि मैं इसे सोते हुए कभी नहीं जगाऊँगा।
मेरे गुमशुदा भाई- तेरे बिना कुछ कमी सी है !!!
एक वक्त था , जब हम दिन-रात, सुबह -शाम सातो दिन एक साथ रहने के लिए बहाना ढूंढा करते थे। मैं अपनी हर छोटी बड़ी बात तुमसे साझा करने पर, कितना सकून मिलता था, इसका तो कोई अंदाज़ा ही नहीं। आप मेरी ख़ामोशी भी पढ़ लेते थे। मैंने जो कुछ भी सीखा है अपनी ज़िन्दगी में, तुमसे ही सीखा। आपने मुझे एक नजरिया दिया जो आज भी मुझे हर पल अपने आपको पहचाने में सहायता करता है और मैंने अपने आप को प्यार करने की कला भी आपसे ही सीखी। कोई ऐसा दिन शायद न आया हो जिस दिन आपको न याद करु, मै इसलिए आपको याद नहीं करता की आपसे बहुत प्यार करता हूँ। बल्कि इस लिए की आपको जीता हूँ।
मुझे अंदाज़ा तो है की आप मुझसे क्यों रूठे, आज करीब २ साल होने को है, हमने बात नहीं की, नाराज़गी का कारण भी हमने शेयर नहीं किया, हमने वो सरे रस्ते बंद कर दिए जिस के द्धारा हम एक दूसरे से संपर्क कर सकते थे। मुझे आगे आने वाले वक्त में भी उम्मीद नहीं है की हम कभी एक साथ बैठ कर बात करेंगे।
मै सिर्फ एक बात जनता हूँ आगे आने वाले वक्त में भी मै आपको जीता रहूँगा, मेरे ज़िन्दगी में आपकी छवि हमेश दिखेगी। आप मेरे नज़दीक रहो या दूर। आप कही भी रहो। मुझे इससे फर्क नहीं पड़ता।
Saturday, September 20, 2014
जन्मास्टमी में श्री कृष्ण के दर्शन - स्कॉन टेम्पल
इस जन्मास्टमी हम अपने भाई और भाभी के साथ श्री कृष्ण जी के दर्शन करने की लिए स्कॉन टेम्पल गए। भीड़ देख हमने ये फैसला किया की हम बाहर से ही दर्शन कर लेंगे और फिर भाभी अपना व्रत तोड़ देंगी और हमे ये सन्तुस्टी मिल जाएगी की हमने उनके दर्शन किये, पर हमारी किस्मत कहाँ इतने तेज़ थी। हम बहार से दर्शन तो क्या मंदिर के पास तक न भटक सके, इतनी भीड़ थी की देख मन विचलित होने लग।
गार्ड भाई से हमने हज़ारो बार मिन्नतें की कि वो हमे पास जाने दे, पर उनसे ये हो न सका। फिर मेरे मन में विचार आया यदि भगवन को सबके लिए सबके सामने लाया जाये वो सबके लिए उपलब्ध हो. की सभी दर्शन कर सके बिना लाइन लगाये बिना धक्का मुक्की किये। हर मंदिर में ये सुविधा हो की कोई भी कभी भी दर्शन कर सकते। फिर चाहे कोई भी त्यौहार हो। श्री राम का जन्म हो या श्री कृष्णा है। हर भक्त दर्शन पाये वो भी बिना किसी तकलीफ के। हम ये विचार ले कर वापस आए और एक छोटे से मंदिर में जी भर के अपने भगवन के दर्शन किये, भाभी ने व्रत तोडा और हम अपने भगवन से संवाद कर के खुश हुए।
टनटन की ऑनलाइन शॉपिंग - कूपन लगाया है-
मेरा मित्र टनटन,
हम एक साथ हम बड़े हुए, कॉलेज में पढ़े, एक ही शहर में नौकरी करते है। टनटन ऑनलाइन शॉपिंग में काफी आगे रहता है। अक्सर जब मै उसके पास जाता हूँ, तो वो बोलता है, देखो मैंने उस साइट से खरीदा है। अंदाज़ा लगाओ कितने का होगा, फिर हम अंदाज़ा लगाने में जुट जाते। अंदाज़े से अगर मैंने बोला की ये सारा सामान १५०० रुपया का है. तब वो बोलता है, न रे ये तीनो सामान ३००० रुपए के है पर मैंने कूपन लगाया और ये सारा सामान मात्र ७५० रुपए में मिल गाय। हमारी आँखे खुली रह जाती। एक दिन मैंने भी बोला भाई मेरे लिए भी कुछ ले दो और उसमे कूपन लगा देना फिर वो मुझे भी सस्ता सामान मिल जायेगा। फिर वो बोलता है की तुम्हे नहीं मिलेगा इतना सस्ता। बस ये जुगाड़, कूपन पे कूपन लगाने पड़ते है तब जा करे इतना सस्ता मिलता है।
कूपन कहाँ से मिलता है ये रहस्य आज भी मेरे मन मस्तिस्क में है। मै भी सस्ता सामान खरीदू ऑनलाइन कूपन लगा के। कुछ जुगाड़ कोई हमें भी बताए। यदि आपको इस रहस्य का तोड़ पता हो तो कृपया मेरे इस पोस्ट पर कमेंट करे और इस रहस्य का पर्दा फास करे।
धन्यवाद
Friday, September 19, 2014
दीपिका का क्लीवेज
माँ बहन की गालियां
दो प्रेमी - चिपक कर बैठो
वो बोला देखो वो दोनों (लड़का और लड़की ) कितने चिपक बैठे है गाड़ी पर। प्रेम का प्रदर्शन करना है तो घर पर करे। फिर मेरे मन में विचार आया की पता नहीं लोगो को क्यों परेशानी होती है अगर दो प्रेम करने वाले चिपक कर बैठे है। मैंने बोला मोहदय तुम अभी अपनी पत्नी के साथ ऐसा क्यों नहीं करते, तुम दोनों भी चिपक पर बैठा करो अपनी बाइक पर। वो बोला मेरे पास तो बाइक ही नहीं है। मैंने बोला कोई बात नहीं ये प्रयाश तुम नगर बस में कर सकते हो तुम अपनी पत्नी के साथ, पीछे वाली सीट पर हाथ पकड़ कर बैठो. और थोड़ा नज़दीक नज़दीक बैठो और प्रेम वार्ता करो। मेरे इस बात पर वो असहज हो रहा था। की जैसे मैंने कोई बहुत बड़ी बात बोल दी हो . अपनी पत्नी के साथ प्रेम का प्रदर्शन करने में शर्म आती है और यदि कोई और प्रेम प्रदर्शित करता है तो तकलीफ होती है और फिकरे कसे जाते है. वो शांत रहा और कुछ न बोल. मैंने बोला मै ऐसा करता हुँ. अपनी पत्नी को बोलता हूँ वो चिपक कर बैठे जैसा मै चाहता था की कोई लड़की मेरे साथ चिपक कर बैठे मेरे बाइक पर।
