मैंने अभी तक जितना भी अनुभव अर्जित किया है उसके हिसाब से, मेरा इस पर एक प्रश्नचिन्ह है।
ऐसा नही होता है, यह एक कटु सत्य है कि माँ बाप का भी अपना अपना पसंदीदा बच्चा होता है। कठिन समय मे जब भी फैसला लेना होता है, तो माँ बाप भी अपने पसंदीदा बच्चे के हित एवं अनहित को ध्यान में रखकर फैसला करते है।
चाहे वो कितना भी सच्चा या झूठा क्यों न हो।
अक्सर माँ बाप पूर्वाग्रह से भी ग्रसित होकर फैसले लेते है।
निःस्वार्थ भाव एक प्रपंच है। वक्त के साथ इसकी परिभाषा बदलती रहती है। इस दुनिया मे सब स्वार्थी है बस स्वार्थ के दायरे बदलता रहता है।
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