"ज़्यादा कुछ नही बदलता उम्र के साथ .. बस बचपन की ज़िद समझौते में बदल जाती है"
गुलज़ार की ऊपर लिखी लाइनों ने मेरी सोंच में थोड़ा परिवर्तन जरूर लाया है। मेरा 3 साल का बेटा है जिसका नाम सात्विक है, घर मे हम उसे प्यार से आदि बुलाते है। वो उम्र बढ़ने के साथ साथ ज़िद्दी और शरारती होता जा रहा है।
हर वीकेंड खिलौनों की लिस्ट मेरे सामने होती है और जब हम खिलौने की दुकान पर जाते है तब वो खिलौना नही आता है जिसकी डिमांड थी। वहां उसे कुछ और ही पसंद आ जाता है जिनका ज़िक्र घर पर नही हुआ था। अगले हफ्ते फिर वही लिस्ट मेरे सामने आती है और वो फिर बोलता है की पापा आदि के पास पुलिस कार नही है, टैंकर ट्रक नही है या मेट्रो ट्रेन नही है।
अगर किसी हफ्ते खिलौना न दिलाओ तो ऐसे रोता है कि कुछ पूछो मत... आदि रोते हुए बोलता है कि " पापा प्लीज आदि को पुलिस कार दिला दो ना .... आदि के पास बिल्कुल भी नही है, ... सब कार टूट गयी है" आदि के पास कुछ भी नही है..
क्या करूँ बाप और माँ का दिल है, पसीज ही जाता है.. फिर वही चक्र चलने लगता है कि लेने कुछ जाता है और लेकर कुछ और ही आता है।
एक दिन की बात है कि, मैं आफिस से आया ही था कि आदि की ज़िद शरु हो गयी कि आदि को टॉय चाहिए... चाहिए….. और बस चाहिए... थोड़ी देर तो हम टालते रहे और स्वाति बोली कि बेटा पापा अभी आफिस से आये है, थक गए है, वीकेंड में चलेंगे फिर तुम्हे टॉय दिलाएंगे, इस टाइम टॉय की शॉप बंद हो गयी होगी कल चलेंगे, पर आदि को कहां मानना था। आदि का रोना शरू हो गया। वो रोते रोते बोलने लगा कि माँ शॉप बंद नही हुई होगी , खुली होगी, चलो टॉय की शॉप... किसी तरह हमने थोड़ा वक्त गुजरा फिर , थकहार कर स्कूटर निकाला , स्वाति और आदि को बिठाया और निकल पड़ा खिलौने की दुकान की तरफ..
आदि रास्ता बता रहा कि पापा इधर चलो टॉय की शॉप है। हमने बोला बेटा शॉप बंद हो गयी होगी पर आदि कहाँ मनाने वाला था। हम दुकान की तरफ बढ़े और देखा वो सच मे बंद थी। वहां पहुच आदि को बोला.... देखो शॉप बंद है कि नही.. फिर आदि बोला पापा कोंडली चलो वहां खुली होगी। स्वाति ने बोला वहां भी बंद हो गयी होगी बेटा अब घर चलो...
घर की तरफ निकल ही रहे थे कि आदि बोला "पापा टॉय वाले भैया सो गए है कल सुबह उठेंगे फिर शॉप खुलेगी" तब दिला देना पापा, हमने बोला ओके बेटा.. फिर आदि बोलता है कि, पापा आदि को आइसक्रीम तो दिला दो, फिर हमने , स्वाति और आदि दोनों ने आइसक्रीम दिलायी और हम घर आ गए। घर आकर आदि को वो आइसक्रीम नही चाहिए है जो खुद के लिए लाया था, उसे स्वाति वाली आइसक्रीम चाहिए। फिर स्वाति ने आदि वाली आइसक्रीम खाई और आदि ने स्वाति वाली।
पहले सोंचता था कि मैं एक सख्त पिता बनूँगा, बच्चे को अच्छे संस्कार दूँगा, मेरे ना कहने पर वो मेरी बात मान जाए और मुझसे ज़िद न करे।
अब मैं ये सोंचता हूँ कि एक दिन तो ज़िद को समझौते में बदलना ही है तो ज़िद जबतक पूरी कर सकता हूँ पूरी करूँ।
हमारे बड़े होने के बाद , हम किसी से ज़िद तो कर नही सकते है.. समझौते की अलावा कोई और ऑप्शन तो है ही नही । बचपन जितने दिनों तक रहे उतना ही अच्छा है, आदि के साथ साथ हम भी बच्चे बने रहे ।