Saturday, August 26, 2017

बचपन की ज़िद समझौते में बदल जाती है

"ज़्यादा कुछ नही बदलता उम्र के साथ .. बस बचपन की ज़िद समझौते में बदल जाती है"

गुलज़ार की ऊपर लिखी लाइनों ने मेरी सोंच में थोड़ा परिवर्तन जरूर लाया है। मेरा 3 साल का बेटा है जिसका नाम सात्विक है, घर मे हम उसे प्यार से आदि बुलाते है। वो उम्र बढ़ने के साथ साथ ज़िद्दी और शरारती होता जा रहा है।

हर वीकेंड खिलौनों की लिस्ट मेरे सामने होती है और जब हम खिलौने की दुकान पर जाते है तब वो खिलौना नही आता है जिसकी डिमांड थी। वहां उसे कुछ और ही पसंद आ जाता है जिनका ज़िक्र घर पर नही हुआ था।  अगले हफ्ते फिर वही लिस्ट मेरे सामने आती है और वो फिर बोलता है की पापा आदि के पास पुलिस कार नही है, टैंकर ट्रक नही है या मेट्रो ट्रेन नही है।

अगर किसी हफ्ते खिलौना न दिलाओ तो ऐसे रोता है कि कुछ पूछो मत...  आदि रोते हुए बोलता है  कि " पापा प्लीज आदि को पुलिस कार दिला दो ना .... आदि के पास बिल्कुल भी नही है, ...  सब कार टूट गयी है"  आदि के पास कुछ भी नही है..

क्या करूँ बाप और माँ का दिल है,  पसीज ही जाता है..  फिर वही चक्र चलने लगता है कि लेने कुछ जाता है और लेकर कुछ और ही आता है।

एक दिन की बात है कि, मैं आफिस से आया ही था कि आदि की ज़िद शरु हो गयी कि आदि को टॉय चाहिए... चाहिए….. और बस चाहिए... थोड़ी देर तो हम टालते रहे और स्वाति  बोली कि बेटा पापा अभी आफिस से आये है, थक गए है,  वीकेंड में चलेंगे फिर तुम्हे टॉय दिलाएंगे, इस टाइम टॉय की शॉप बंद हो गयी होगी  कल चलेंगे,  पर आदि को कहां मानना था। आदि का रोना शरू हो गया। वो रोते रोते बोलने लगा कि माँ शॉप बंद नही हुई होगी , खुली होगी, चलो टॉय की शॉप...  किसी तरह हमने थोड़ा वक्त गुजरा फिर , थकहार कर स्कूटर निकाला , स्वाति और आदि को बिठाया और निकल पड़ा खिलौने की दुकान की तरफ..

आदि रास्ता बता रहा कि पापा इधर चलो टॉय की शॉप है। हमने बोला बेटा शॉप बंद हो गयी होगी पर आदि कहाँ मनाने वाला था। हम दुकान की तरफ बढ़े और देखा वो सच मे बंद थी। वहां पहुच आदि को बोला.... देखो शॉप बंद है कि नही.. फिर आदि बोला पापा कोंडली चलो वहां खुली होगी। स्वाति ने बोला वहां भी बंद हो गयी होगी बेटा अब घर चलो...

घर की तरफ निकल ही रहे थे कि आदि बोला "पापा टॉय वाले भैया सो गए है कल सुबह उठेंगे फिर शॉप खुलेगी" तब दिला देना पापा, हमने बोला ओके बेटा.. फिर आदि बोलता है कि, पापा आदि को आइसक्रीम तो दिला दो,  फिर हमने ,  स्वाति और आदि दोनों ने आइसक्रीम दिलायी और हम घर आ गए। घर आकर आदि को वो आइसक्रीम नही चाहिए है जो खुद के लिए लाया था,  उसे स्वाति वाली आइसक्रीम चाहिए। फिर स्वाति ने आदि वाली आइसक्रीम खाई और आदि ने स्वाति वाली।

पहले सोंचता था कि मैं एक सख्त पिता बनूँगा, बच्चे को अच्छे संस्कार दूँगा,  मेरे ना कहने पर वो मेरी बात मान जाए और मुझसे ज़िद न करे।

अब मैं ये सोंचता हूँ कि एक दिन तो ज़िद को समझौते में बदलना ही है तो ज़िद जबतक पूरी कर सकता हूँ पूरी करूँ।

हमारे बड़े होने के बाद , हम किसी से ज़िद तो कर नही सकते है.. समझौते की अलावा कोई और ऑप्शन तो है ही नही । बचपन जितने दिनों तक रहे उतना ही अच्छा है, आदि के साथ साथ हम भी बच्चे बने रहे ।

आपने मेरी फीस तो देखी ही होगी- डॉक्टर

पिछले हफ्ते की बात है जब मनोज का बाइक से  एक्सीडेंट हो गया। उस समय रात के लगभग 10 बजे थे...  चोट बहुत ज़्यादा तो नही आई थी पर,  हाथ और पैर छिल गए थे। मनोज किसी तरह एक छोटी सी क्लीनिक में पहुचां पर, वहां कोई डॉक्टर तो नही था पर , वहां एक नौसिखिया कम्पाउंडर ही मिला। रात काफी हो गयी थी इसलिए,  मनोज ने उसी से ड्रेसिंग कराने का फैसला लिया, और फिर भाभी को कॉल करके एक्सीडेंट के बारे में बताया, इत्तेफाक से हम मनोज के घर पर ही थे, भाभी के मुँह से एक्सीडेंट शब्द सुन हमने भाभी से पूछा कि क्या हुआ भाभी..  किसका एक्सीडेंट हो गया है।

भाभी ने घबराते हुए हमें बताया कि,  मनोज का एक्सीडेंट हो गया है, वो जैन क्लीनिक में है, हमने कहा की , हम जा कर देखते है, आप परेशान न हो, उसकी कंडीशन हम आपको फ़ोन करके आपको बताते है,  भाभी साथ चलने की ज़िद कर रही थी , उन्हें समझाने बुझाने के बाद हमने  स्वाति और अनुजा को उनका ध्यान रखने को बोला , फिर  मैं और शैलेन्द्र,  दोनों जैन क्लीनिक के लिए निकल पड़े।

हमारे पहुचने तक मनोज की ड्रेसिंग हो चुकी थी पर,  वो उसकी ड्रेसिंग से संतुष्ट नही था। उसने बोला कि,  हम किसी और क्लीनिक चलते है,  वहां फिर से ड्रेसिंग करा लेंगे।

हम दूसरी क्लीनिक ढूंढने लगे, रात काफी हो गयी थी, इसलिए सारे क्लीनिक बन्द हो चुके थे, फिर हमें एक क्लीनिक दिखी, इसमे लिखा था, 24 घंटे आपातकालीन सेवा।...  हमे लगा इसमे कोई न कोई डॉक्टर जरूर होगा। उस क्लीनिक का नाम था, "रोहिताश क्लीनिक",  हम मनोज को लेकर वही पहुचे, अंदर जाकर देखा तो वहां भी कोई डॉक्टर नही था, एक नर्स थी, उन्होंने बोला कि रुकिए,  मैं डॉक्टर को फ़ोन करके बुलाती हूँ, वो थोड़ी देर में आ जाएंगे।

हम वही इंतज़ार करने लगे डॉक्टर का .... इंतज़ार करते- करते काफी वक्त हो गया,  फिर मनोज ने बोला घर चलते है, अभी मैं ठीक हूँ, सुबह डॉक्टर को दिखा लेंगे, फिर हमने कहा, जहां इतना इंतज़ार किया है थोड़ा और कर लेते हैं। हमारा इंतज़ार कम नही हो रहा था, वो बढ़ता ही जा रहा था। अंत मे हमने निर्णय लिया कि चलते है घर,  अब सुबह दिखा लेंगे। हम वहां से निकल बाहर गेट तक पहुचे ही थे कि,  डॉक्टर साहब अपनी गाड़ी से आ पहुचे। डॉक्टर को देख हम रुक गए।

नर्स ने मनोज की तरफ इशारा करते हुए,  डॉक्टर को बोला कि, इन्हें चोट लगी है, डॉक्टर साहब ने  चोट तो नही देखी, पर अपनी रेट लिस्ट की तरफ इशारा करते हुए बोले..... आपने मेरी फीस तो देखी ही होगी... कोई 100 रुपये के लिए 200 का पेट्रोल तो नही फूंकेगा।

ये बात सुन हमारा माथा ठनक गया, रेट लिस्ट तो हमने पहले ही देख ली थी पर... डॉक्टर का यह व्यवहार हमे अजीब सा लगा.. न तो उसने दर्द पूछा और न ही चोट के बारे में,  डायरेक्ट फीस के बारे में बात करने लगा, जैसे हम उसकी फीस दे ही नही सकते । .. फिर हमने मनोज से पूछा तुम्हारी कंडीशन कैसी है ? मनोज ने बोला,  मैं ठीक हूँ, अब सुबह ही दिखाऊंगा।  फिर हम वहां से निकल लिए, दावा की दुकान से हमने पेनकिलर खरीदा और घर की तरफ निकल लिए,  रास्ते मे न जाने क्यों मुझे प्रेमचंद्र की सपेरे वाली कहानी याद आ रही थी ।

Thursday, August 24, 2017

डार्क चॉकलेट कड़वी नही है माँ

आज आफिस से आते वक्त, मैन सोंचा की स्वाति के लिए चॉकलेट लेता चलूं, चॉकलेट लेने जब दुकान पर गया, तो सोंचा डार्क चॉकलेट लेता चलूं, आदि तो खा नही पायेगा,  तो स्वाति को खाने को मिल जाएगा, घर पहुँच, स्वाति को चॉकलेट दे ही रहा था कि आदि पास आया और बोला पापा आदि के लिए चॉकलेट लाये है और मां आपके लिए नींबू लाये है। मुझे दो चॉकलेट...

हमने सोंचा आदि डार्क चॉकलेट क्या खा पायेगा। थोड़ी देर में वापस कर देगा , हम आदि के रहमोकरम पर थे कि शायद हमे खाने को मिलेगा। थोडा खाने के बाद आदि पास आया और स्वाति से बोला माँ चॉकलेट कड़वी बिल्कुल नही है।

आदि की यह बात सुनकर मेरी सारी चालाकी धरी की धरी रह गयी, और अंत मे हमे बचे हुए कुछ टुकड़े खाने को मिले हम उसी से संतुष्ट हो अपने आपको खुश किस्मत समझ रहे थे...

Friday, August 18, 2017

जर्दा या गर्दा

बात उन दिनो की है जब हम पुराने लखनऊ में रहा करते थे  और पापा पान खाया करते थे। संडे हम अक्सर घर के पास की ही पान की दुकान से पापा के लिए पान लाया करते थे। पापा के लिए पान लाना हमारे लिए गर्व की बात थी और हो भी क्यों ना, शायद पान खाना उस समय के फैशन में था । जितने भी बड़े लोग थे वो पान खाया करते थे। सबके पान की दुकान और उनका कांफ़्रिग्रशन फिक्स होता था, किसी और कि दुकान और किसी और के कांफ़्रिग्रशन का पान खाना किसी को पसंद नही आता था। पापा के पान का कांफ़्रिग्रशन था "एक सौ बत्तीस इलायची रसरंजन"  हमने रट्टा मार रखा था कि पापा कौन सा पान खाते है, पर हमे यह नही पता था कि उसमें क्या-क्या पड़ता है।  अगर गलती से भी  कांफ़्रिग्रशन हिल जाए तो पान बेस्वाद हो जाता था।

अक्सर हम भी सोंचते थे कि बड़े होने पर हम पान खाएंगे, जैसे कि पापा खाते है, जब भी हम किसी की शादी की दावत में जाते थे, तो अक्सर फ्री का पान खा लिया करते थे और जब भी पापा, मम्मी या दीदी को पता चलता था कि हमने पान खाया है तो वो नाराज़ हो जाया करते थे और हमे अच्छे से डाट पड़ती थी और बोलते थे कि पान खाना अच्छी बात नही होती है।

एक दिन की बात है जब हम अपने बड़े चाचा की बारात  लेकर गोरखपुर गए। बारात धर्मशाला पहुची, थोड़ा आराम करने के बाद हमे नास्ता परोसा गया , हमने नास्ता किया थोड़ी देर के बाद पापा ने बोला कि धर्मशाला के बाहर एक पान की दुकान है वही से मेरे लिए पान ले आओ। पान लेने के लिए हम पान की दुकान पर पहुंचे और हमने पान वाले अंकल से बोला कि अंकल मेरे पापा के लिए एक पान बना देना, फिर पान वाले अंकल ने बोला कि कौन सा पान खाते है?  तुम्हारे पापा , फिर हमने झट से रटा रटाया समीकरण बोला दिया  "एक सौ बत्तीस इलायची रसरंजन"  वाला पान फिर वो पान वाले अंकल पान लगाने लगे । पान लगाते लगाते पान वाले अंकल ने मुझसे पूछते है कि जर्दा पड़ेगा क्या?? मुझे समझ मे नही आया कि उन्होंने क्या बोला, मैंने फिर पूछा क्या? क्या पड़ेगा? उन्होंने  बोला जर्दा...  ये शब्द मैने पहली बार सुना था। मैने पान वाले अंकल से बोला कि, मैं पापा से पूँछ कर आता हूँ , पापा तक पहुँचते -पहुँचते जर्दा न जाने कैसे गर्दा हो गया मुझे नही पता। मैंने पापा से पूछा  कि,  पापा पान वाले अंकल पूँछ रहे है कि क्या पान में गर्दा पड़ेगा? शायद पापा के लिए भी यह शब्द नया ही था।  पापा के बगल में बैठे  किसी रिश्तेदार ने हमारी बात सुन ली, शायद वो गोरखपुर के ही थे , तभी उन्हें पता लग गया कि हम कंफ्यूज किस बात पर है,  फिर वो मुझसे बोले बेटा, जर्दा होता है गर्दा नही। जर्दा का मतलब तम्बाकू होता है और गर्दा का मतलब धूल-मिट्टी। सोंचो अगर जर्दे की जगह गर्दा पड़ जायेगा तो पान का क्या होगा!!!

मेरी इस बात को सुन सब खूब हंसे, बाद में पापा के लिए पान लेने कोई और गया, मैं नही। आज भी,  जब मुझे कोई गोरखपुर का व्यक्ति मिलता है, तो मैं ये किस्सा जरूर सुनाता हूँ।

Friday, August 4, 2017

किराये की दाल

ये उन दिनों की बात है जब हम गर्मियों की छुट्टियों में दादी और नानी के पास जाया करते थे और अपनी छुट्टियां ढेला मार कर आम तोड़ने और फिर उन कच्चे आमो को नमक के साथ चटकारा मार कर बिताया करते थे। हम पढ़ते थे लखनऊ में पर छुट्टियां दादी-नानी के आंगन में बिताते थे।

ऐसे ही एक गर्मी की छुट्टियों में हम दादी के पास थे। एक दिन दादी को मुझपर बहुत प्यार आया और अपने अवधी लहज़े में बोली - आज का खाबव, जउन तुहय पसंद होए वहय बनी ।

मैंने बहुत सोंच और बोला दाल चावल बनाओ वही खाऊंगा। तभी रसोई से काकी की आवाज़ आती है कि कौन सी दाल बनाऊ, कौन सी दाल पसंद है तुम्हे, मैन कहा कोई भी बना लो काकी।

तभी दादी की आवाज़ आती है कि तुहय बोलो घर मा सारी दाल है , जउन तू कहव!! मैन कहा - कौन कौन की दाल है? फिर दादी अवधी लहज़े में बोली- अरहरिक दाल है , उरदिक दाल है और केराओक दाल है जउन खाओ वही बनाय।

तभी मुझे आखिरी वाली दाल समझ मे नही आयी कि वो कौन सी दाल है। तभी दादी बोली-केराओक दाल।
फिर मैं बोला ये कौन सी दाल होती है!!!

किराए की दाल, किराए का घर सुना था, किराए की साईकल सुनी थी पर किराए की दाल कभी नही सुनी.... क्या इस दाल को खाने के बाद किराया देना होता है या कुछ और??

इतना सुन दादी गुस्से से बोली-  अरे अंग्रेज़ के सपूत.. तुम्हारे पापा हियै पैदा भए रहा !!! यहय दाल खाय खाय बढ़वार भए अउर तू पूछत हौ की ई कउन सी दाल है, तुम्हरे पापा  तुहय नाइ  बताइन कि किराओक दाल का होत है!!!

यह सुन बड़े काका काकी और छोटे काका ज़ोर से हसने लगे, मुझे समझ मे नही आ रहा था कि ऐसा क्या हो गया!!

तभी छोटे काका मुझे बुलाते है और दबी हुई आवाज़ में मुझे बताते है कि मटर को किराओ बोलते है और उसकी भी दाल होती है।

वो बचपन की बात पर आज भी सब ठहाके लेते है जब भी घर दाल का ज़िक्र आता है और तबसे मैं अवधी शब्दो को बड़े ही ध्यान से सुनता हूँ